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पारसंस के सामाजिक क्रिया का सिद्धांत

पारसन्स, सामाजिक परिवर्तन की दो दिशाओं का उल्लेख करते हैं – प्रथम सामाजिक व्यवस्था के अन्दर परिवर्तन एवं द्वितीय सामाजिक व्यवस्था में आमूल परिवर्तन सामाजिक व्यवस्था के भीतर होने वाले परिवर्तन का प्रमुख कारण है- जनसंख्या में वृद्धि उसका घनत्व एवं एकत्रीकरण। मानव द्वारा खाद्य संसाधनों तथा उत्पादन प्रौद्योगिकी पर दबाव पड़ता है।

इतिहास इस बात का प्रमाण देता है कि प्राचीन विशाल सामाजिक व्यवस्थाओं जैसे कि बड़े समुदायों, नगरों तथा राजनीति के संगठित रूपों का विकास नदी घाटियों के समीप हुआ। वहाँ की भूमि काफी उर्वरक थी, जिसमें अनाज की खुब पैदावार होती थी। इस वृद्धि से जनसंख्या बढ़ी तथा सामाजिक व्यवस्था के अन्दर श्रम विभाजन शहरों का विकास तथा भारत में जाति व्यवस्था, यूरोप में गिल्ड, आदि सामाजिक संगठन जैसे बडे सामाजिक परिवर्तन देखे गये। पारसन्स के कथनानुसार ये परिवर्तन आसानी से नहीं होते है, बल्कि सदा ही पूर्व तथा वर्तमान सम्बन्ध विन्यासों, मूल्यों तथा हितों के बीच टकराव होने से तथा पुनः सन्तुलन कायम रखने की आवश्यकता के माध्यम से होते हैं। पारसन्स कहते हैं कि “परिवर्तन विन्यास का रूपान्तरण मात्र नहीं है, बल्कि विरोध पर विजय द्वारा रूपान्तर है। विरोध पर विजय पाने से पारसन्स का आशय है सामाजिक व्यवस्था में तनाव या द्वन्द्व का समाधान करना।

पारसन्स का कथन है कि किसी एक कारण में ही सामाजिक तनाव उत्पन्न नही नही सामाजिक परिवर्तन का कोई एक कारक होता है। सामाजिक तनाव विकास के उच्च बिन्दु को प्रकट करता है, जहां व्यवस्था की पुरानी संस्थाओं रचनाओं का सम्यक नवान तत्वा स होता है, जिसके कारण पुराना सन्तुलन डगमगाने लगता है तथा नवीन सन्तुलन की दिशा में बढ़ने की प्रवृत्ति की शुरूआत होती इसके लिए पारसन्स कुछ कारको का उल्लेख करते हैं।

परिवर्तन के लिए दबाव उत्पन्न करने वाले कारक

पारसन्स परिवर्तन के लिए दबाव उत्पन्न करने वाले निम्नलिखित कारकों का उल्लेख करते हैं

(1) लोगों का एक स्थान से दूसरे स्थान को सामूहिक पलायन, प्रजातियों का अन्तर्मिश्रण (अन्तसमुदाय विवाह) एवं जनसंख्या में वृद्धि दर से सामाजिक व्यवस्था में। परिवर्तन आता है।

(2) खाद्य सामग्री एवं उत्पादन में बढ़त के कारण जनसंख्या में होने वाला परिवर्तन भी सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन पैदा करता है।

(3) भौतिक वातावरण में बदलाव जैसे- मदा, जल, मौसम आदि की समाप्ति । इसके कारण भी सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन आ सकते हैं।

(4) विज्ञान और प्रौद्योगिकी में परिवर्तन के कारण भी सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन आते है।

(5) नवीन धार्मिक विचार अथवा धार्मिक मूल्यों तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आदि के मध्य एकीकरण उदाहरणार्थ नये ‘सांस्कृतिक संरूप’ (Culture Configuration) भी सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन कर सकते हैं।

पारसन्स का मत है कि ये कारक स्वयं में पूर्ण नहीं है, अपितु अन्य तत्त्वों के साथ मिलकर सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन लाने का कार्य करते हैं।

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पारसन्स परिवर्तन की क्रिया को और भी आसानी से प्रकट करने के लिए दो प्रमुख प्रक्रियाओं तर्क संगतिकरण’ (Rationalization) एवं परम्परागत होना(Rationalization) का उल्लेख करते हैं। जब किसी सामाजिक व्यवस्था के भीतर नवीन तत्त्वों का आगमन होता है तो उस व्यवस्था में तनाव आ जाता है। किन्तु व्यवस्था स्वतः ही सन्तुलन लाने में सक्षम होती है, अतः वह अपनी तार्किक शक्ति का एक प्रयोग करके नये पुराने के बीच समझौता कर लेती है तथा व्यवस्था कुछ नये तत्त्वों का आगमन होता है तथा कुछ पुराने तत्त्वों का निष्कासन हो जाता है। यहां तक कि प्रक्रिया को पारसन्स ‘तर्कसंगतिकरण’ का नाम देते हैं। लेकिन इस तर्कसंगतिकरण के साथ-साथ व्यवस्था में सन्तुलन स्थापित करने का कार्य भी चलता रहता है। सन्तुलन से आशय नये तत्त्वों को सामाजिक स्वीकृति से है। समाज की पूर्ण स्वीकृति मिलने के बाद ये तत्त्व संस्थागत हो जाते है।

संस्थागत होने के बाद ये तत्त्व पूराने तत्त्वों के साथ घुल-मिल जाते हैं अर्थात् परम्परा के अंग हो जाते हैं। तर्कसंगतिकरण और परम्परागत होने की यह प्रक्रिया हमेशा गतिमान रहती है तथा परिवर्तन होता रहता है। जिनमें नये तत्त्वों को सामाजिक व्यवस्था में स्थान पाने के लिए पुराने तत्त्वों के साथ तनावपूर्ण परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है।

कछ निश्चित समय के बाद पराने तत्त्व इन नवीन तत्त्वों को स्वीकार कर लेते। हैं। यह आवश्यक नहीं है कि ये तत्त्व सदैव सकारात्मक ही हो. किन्त व्यवस्था में प्रवेश के बाद ये अपना स्थान बना ही लेते हैं। तर्कसंगतिकरण और परम्परागत होने की प्रक्रिया सदैव चक्रीय रूप से चलती रहती हैं। यह अवश्य हो सकता है कि कभी यह गति मंद हो तो कभी तीव्र।

संरचनात्मक प्रकार्यवाद को पारसन्स का योगदान

अमेरिकी समाजशास्त्री टॉलकॉट पारसन्स आधुनिक संरचनात्मक प्रकार्यवादी समाजशास्त्री है, जिन्होंने सामाजिक व्यवस्था का प्रकार्यवादी विश्लेषण प्रस्तुत किया है। पारसन्स ने समाज को एक ‘क्रिया व्यवस्था’ रूप में स्वीकार किया है, जो कि विभिन्न वर्गों से मिलकर निर्मित होती है। उन्होंने समाज की संरचना के तीन आधारों का उल्लेख किया है –

1. व्यक्तित्व व्यवस्था,

2. सांस्कृतिक व्यवस्था और

3. सामाजिक व्यवस्था।

इन तीनों के व्यवस्थित और प्रकार्यात्मक संयोग का नाम ही समाज है। इन तत्त्वों के विशिष्ट प्रकार्य हैं, जिनका सम्बन्ध ज्ञानात्मक, उद्देश्यात्मक और रागात्मक तत्त्वों से होता है। सामाजिक व्यवस्था के विभिन्न तत्त्व मनुष्यों की जैविकीय तथा मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायता करते हैं। समाज के विभिन्न तत्त्व जब प्रभावपूर्ण ढंग से अपनी सामाजिक भूमिकाओं को पूर्ण करते हैं. तो समाज में सन्तलन और व्यवस्था बना रहती है। संस्थायें और संस्तरण या संस्थाकरण और विभेदीकरण दो प्रमुख तत्त्व सामाजिक प्रकार्यों को पूर्ण करते हैं।

पारसन्स ने प्रकार्यात्मक विश्लेषण में मनुष्य की जैविकीय आवश्यकताओं को भी स्थान दिया है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायता करती है। व्यावसायिक नियम , धर्म, आर्थिक,सस्था, आदि सामाजिक नियन्त्रण के प्रमुख साधन भी है, जो सामाजिक सन्तुलन  व्यवस्था के लिये अत्यन्त आवश्यक है, प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था में मनुष्यों की प्रकार्यात्मक आवश्यकतायें कहा है। समाज सन्तुलन और व्यवस्था के लिये अत्यन्त आवश्यक है, प्रत्येक व्यवस्था में मनुष्यों की प्रकार्यात्मक आवश्यकतायें कहा है। समाज सन्तुलन और व्यवस्था  रखने  के लिये सदस्यों को स्वीकृत आदर्शों के अनुकूल चलने की प्रेरणा देने वाला एक क प्रतिमान भी प्रत्येक समाज में होता है। आवश्यकता पूर्ति और नियंत्रण के साधन समाज के लिए प्रकार्यात्मक होते हैं। इन सबको समझने के लिये सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था को समझना जरूरी है। अत: पारसन्स के विचार से प्रकार्यात्मक विश्लेषण में सामाजिक व्यवस्था की विवेचना की उपेक्षा नहीं की जा सकती। सम्पूर्ण व्यवस्था को ध्यान में रखकर ही सामाजिक समस्या का विश्लेषण किया जा सकता है।

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पारसन्स के अनुसार, सम्पूर्ण व्यवस्था की क्रियाशीलता में सहायक समस्त दशाओं और प्रक्रियाओं का व्यवस्था के साथ प्रकार्यात्मक सम्बन्ध होता है। प्रकार्यात्मक विश्लेषण में उन सभी तथ्यों, प्रक्रियाओं और दशाओं की व्याख्या होनी चाहिए, जिनका योगदान मानवीय व्यवहारों और सामाजिक संगठन को प्रभावित करने में होता है। इस दृष्टि से परिस्थिति भी एक महत्वपूर्ण तत्त्व है। पारसन्स के विचार से असामान्य या पाकृत व्यवहार का विश्लेषण करने में परिस्थिति के तत्त्व की व्याख्या बहत आवश्यक और महत्वपूर्ण होती है। संक्षेप में पारसन्स ने प्रकार्यात्मक सिद्धान्त में जैविकीय आवश्यकताओं परिस्थितियों, प्रेरणाओं, लक्ष्यों, संस्थाओं और स्थितियों तथा भूमिकाओं को विशेष रूप से सम्मिलित किया है।

पारसन्स ने प्रकार्यवाद को जिस प्रकार से स्पष्ट किया है, उसका बुनियादी केन्द्र व्यवस्था ही है। समाज के कर्ताओं के सभी कार्य एक व्यवस्था का निर्माण करते हैं और इस प्रकार विभिन्न व्यक्तियों की क्रियायें व्यवस्था के साथ जुड़ जाती हैं।

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