मध्य युगीन प्रमुख दार्शनिक एन्सेल्म,एक्विनस

मध्य युगीन प्रमुख दार्शनिक-जॉन स्कॉट्स एरिजेना,एन्सेल्म,थॉमस एक्विनस

जॉन स्कॉट्स एरिजेना (John Scotus Erigena) [सन् ८१९ से सन् ८८०]

परिजेना मध्य युग के सर्वप्रथम तो नहीं, किन्तु सबसे प्रभावशाली दार्शनिक इनका जन्म आयरलैण्ड में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा आयरलैण्ड में हुई धर्म संघ में शिक्षा पाने से ये प्रारम्भ से ही धार्मिक हो गये। ग्रीक भाषा अध्ययन ने इनकी धार्मिक अभिरुचि को और भी सुदृढ़ बनाया। ४० वर्ष की अवस्था में इन्होंने फ्रांस की यात्रा की तथा चार्ल्स के पैलेण्टाइन स्कूल (Palantine School) में नियुक्त हुए। वहाँ उन्होंने कई ग्रीक भाषा के धर्म ग्रन्थों का लैटिन में अनवाद किया और उन पर महत्वपूर्ण भाष्य लिखे। जॉन स्कॉट्स की सबसे महत्वपूर्ण कृति (De Divisione Naturae) है। इनकी रचना सन् ८३२ से सन् ८६४ के बीच हुई। इस महान् ग्रन्थ के पाँच भाग हैं। इस महान् ग्रन्थ में सभी विषयों का प्रतिपादन सम्भाषण (Dialogue) शैली में किया गया है। सन् ८७७ में ये एथेलनी के महन्त बनाये गये। कहा जाता है कि उसी धर्म संस्था के पुजारियों ने इन्हें जान से मरवा डाला।

एरिजेना की सबसे महत्त्वपूर्ण कृति नेचर (Nature) है। इस ग्रन्थ में मुख्यतः ईश्वर के स्वरूप पर विचार किया गया है। प्रकृति (Nature) के चार विभिन्न रूपों पर एरिजेना ने विचार व्यक्त किया है:-

१. प्रकृति जो स्वयम्भू है, परन्तु सृष्टि करती है (Nature which creates and is uncreated) : स्वयम्भू तथा सृष्टिकर्ता केवल ईश्वर है। ईश्वर विश्व का कारण है, परन्तु स्वयं अकारण है, सबका आधार होते हुए भी वह स्वयं निराधार है। विश्व का आदि कारण होने से ईश्वर को प्रथम सिद्धान्त (First Principle) कहा गया है। वह विश्व का आदि, मध्य तथा अन्त है। वह आदि है, क्योंकि विश्व की उत्पत्ति ईश्वर से ही होती है। वह मध्य है; क्योंकि विश्व की स्थिति ईश्वर के कारण ही है। वह अन्तिम कारण है; क्योंकि वह पूर्ण है तथा विश्व पूर्णता की ओर अभिमुख है। इस प्रकार एरिजेना ईश्वर को स्वयं सृष्ट (Uncreated creator) मानते हैं।

 

२. प्रकृति जो सृष्ट है और सृष्टि करती है (Nature which is created and creates) : ईश्वर सर्वप्रथम मूल कारण (Primordial cause) को उत्पन्न करता है तथा इस मूल कारण से ही जगत् के सभी जड़ चेतन कार्यों की उत्पत्ति होती है। विश्व का मूल कारण तो आदि-विज्ञान है। ईश्वर ने सर्वप्रथम इस आदि रूप की सृष्टि की। यह आदि रूप नित्य विज्ञान है। इस नित्य विज्ञान को विश्वात्मा (World soul) कहा गया है। अतः परमात्मा ने विश्वात्मा की सृष्टि की विश्वात्मा से समस्त जगत् की सृष्टि हुई। विश्वात्मा से नित्य विज्ञान परमात्मा की सृष्टि है, परन्तु वह सम्पूर्ण जगत् का स्रष्टा है। अतः ईश्वर सृष्ट तथा स्रष्टा दोनों है। ईश्वर ही पिता है तथा ईश्वर ही पुत्र है। नित्य विज्ञान जागतिक पदार्थों के जनक है परन्तु ईश्वर से जन्य है। अतः विश्वात्मा में जन्य जनकत्व दोनों (Both created and creator) भाव सम्पन्न हैं।

 

३. प्रकृति जो सृष्ट है पर सृष्टि नहीं करती (Nature which is created and does not create) : विश्वात्मा का इस दिक्कालात्मक जगत् में प्राकट्य ईसा मसीह (Christ) के रूप में होता है। वे जीवात्माओं को परम पिता से मिलाने के लिए अवतरित होते हैं। चर्च उनका शरीर है। अत: चर्च मानव को ईश्वर से मिलाने की श्रृंखला है। ईश्वर ही सब कुछ है और सब में उन्हीं की सत्ता है।

 

४. प्रकृति जो न सृष्ट है और न सृष्टि करती है (Nature which neither creates nor is created) : ईश्वर निर्गुण और सगुण दोनों है। निर्गुण रूप में वह न स्रष्टा है और न सृष्ट है। ईश्वर को निर्गुण तथा सगुण दोनों मानकर एरिजेना ईश्वर को सब कुछ (All in all) स्वीकार करते हैं। एरिजेना अपने ईश्वर सिद्धान्त में सन्त ऑगस्टाइन से स्पष्टतः प्रभावित हैं। ऑगस्टाइन के समान इन्होंने भी ईश्वर के तीन स्वरूप (Trinity) को स्वीकार किया है। पिता (Father), पुत्र (Son) तथा जीव (Holy ghost) ये तीन ईश्वर के रूप है। ईश्वर स्वरूप के सम्बन्ध में स्कॉट्स पूर्णतः श्रुति से सहमत हैं। उनके अनुसार हमारी बुद्धि ईश्वर स्वरूप की उपलब्धि में असमर्थ है। प्रमाण तो बौद्धिक है; परन्तु ईश्वर बुद्धि के परे है। ईश्वर आस्था का विषय है तथा उसके स्वरूप का ज्ञान हमें केवल धर्मशास्त्र से ही हो सकता है। अतः धर्मशास्त्र या श्रुति ही प्रमाण हैं।

 

सन्त एन्सेल्म (Saint Anselm) [सन् १०३५ से सन् ११०९]

सन्त एन्सेल्म का जन्म एसोटा (Asota) में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा बरगण्डी (Burgundy), एमरेन्वेज (Amaranches) तथा बेक (Bec) में हुई। सन् १०७८ ई. में ये केण्टरबरी के बड़े पादरी (Archbishop of Canterbury) नियुक्त हए तथा इसी पद पर सन् ११०९ में इनकी मृत्यु हो गयी। सन्त एन्सेल्म ऑगस्टाइन के अनुयायी थे। ऑगस्टाइन के समान ही इनका पूर्ण दर्शन विश्वास की बौद्धिक व्याख्या है। बुद्धि का कार्य विश्वास को और प्रबल बनाना है। विश्वास का स्थान बुद्धि से ऊँचा है। ईश्वर आस्था या विश्वास का विषय है, बुद्धि का नहीं। बुद्धि ईश्वर तक पहुँचने में सर्वथा असमर्थ है, परन्तु बुद्धि हमारी आस्था को सुदृढ़ करती है। हे प्रभु! मैं तेरे अपार स्वरूप की उपलब्धि के लिए बुद्धि का सहारा लेने का साहस नहीं करता, क्योंकि मैं जानता हूं कि हमारी बुद्धि इस कार्य के लिए समर्थ नहीं। परन्तु मेरा हृदय जिसमें अनुरक्त है उसे मैं (बुद्धि से) समझना चाहता हूँ। मैं इसलिए नहीं समझना चाहता कि मैं विश्वास करूँ, वरन् मैं विश्वास करता हूँ जिससे समझ सकूँ। मैं अपने विश्वास को भी विश्वास के बिना समझ नहीं सकता। अतः विश्वास प्रथम है। ज्ञान के लिए श्रद्धा की आवश्यकता है। श्रद्धा के बिना हमें धर्म का ज्ञान नहीं हो सकता।

 

 

ईश्वर-अस्तित्त्व के लिए प्रमाण

सन्त एन्सेल्म ने ईश्वर सिद्धि के लिए जो प्रमाण दिये हैं उसे सत्तामूलक तर्क (Ontological argument) कहते हैं। इस तर्क का आशय है-विचार के अनुरूप वस्तु सिद्ध करना। ईश्वर का विचार ही ईश्वर की सिद्धि करता है। हम ईश्वर को पूर्ण (Perfect) रूप से जानते हैं। इस पूर्ण विचार का कारण अपूर्ण मनुष्य नहीं हो सकता। अतः पूर्ण विचार का कारण पूर्ण ईश्वर ही है। ईश्वर विचार से ही ईश्वर की सिद्धि होती है। इस अनुमान को एन्सेल्म इस प्रकार व्यक्त करते हैं कि ईश्वर वह है जिससे अधिक पूर्ण का हम विचार नहीं कर सकते वृहत् वाक्य। जिससे अधिक पूर्ण का हम विचार नहीं कर सकते वह अवश्य केवल विचार जगत् में नहीं, वरन् बाह्य जगत् में सत् है-लघु वाक्या इसलिए ईश्वर भी केवल विचार जगत् में ही नहीं, वरन् बाह्य जगत् में सत् है-निगमन।

See also  दल-शिक्षण क्या है? | अर्थ एवं परिभाषा | दल शिक्षण के सिद्धान्त | दल का गठन | Team Teaching in Hindi

इस अनुमान के द्वारा ईश्वर-विचार से ईश्वर की सत्ता सिद्ध की जाती है। इसी तर्क को आगे चलकर देकार्त ने अपनाया। एन्सेल्म के समकालीन गोंनिलो (Gaunilo) ने इस तर्क का खण्डन भी किया है। हमारे मन में किसी समुद्र के मध्य में पूर्ण द्वीप का भी विचार है। क्या इससे यह सिद्ध है कि समुद्र के मध्य पूर्ण द्वीप भी है? समुद्र के मध्य में पूर्ण द्वीप का विचार केवल पूर्ण द्वीप की सत्ता का विचार ही सिद्ध कर सकता है, वस्तुतः पूर्ण द्वीप को नहीं। उसी प्रकार पूर्ण ईश्वर का विचार केवल पूर्ण ईश्वर की सत्ता का विचार ही सिद्ध कर सकता है, पूर्ण ईश्वर को नहीं। आगे चलकर काण्ट ने सत्तामूलक तर्क के खण्डन के लिए इसी तर्क को अपनाया था।

 

सन्त थॉमस एक्विनस (Saint Thomas Aquinas)[ सन् १२२५ से सन् १२७४ ]

थॉमस एक्विनस का जन्म इटली के पास नेपत्स में हआ था। इनके पिता का नाम काउण्ट लैण्डोल्फो था। ये जर्मन एडवर्ड दि ग्रेट के शिष्य थे। ये कैथोलिक सम्प्रदाय की होमिनियम शाखा के पादरी थे। इनकी अप्रतिहत प्रतिभा के कारण इन्हें दैवी डाक्टर (Angelic Doctor) कहा करते थे। एक्विनस ने अरस्तू की कृतियों पर विस्तृत भाष्य लिखे हैं तथा अरस्तू के दर्शन का इसाईकरण करने का सफल प्रयास किया है। इसी कारण कहा जाता है कि एक्विनस ने दर्शन के जल को धर्मशास्त्र की शराब में बदल दिया।

एक्विनस भी ऑगस्टाइन और एन्सेल्म के समान धार्मिक दार्शनिक हैं। इन्होंने भी सभी दार्शनिक सिद्धान्तों की इसाई मत के अनुरूप व्याख्या करने का प्रयास किया है। अतः ऑगस्टाइन के समान ही एन्सेल्म के दार्शनिक विचारों में धर्म की ही प्रधानता है। दूसरे शब्दों में, इनका दर्शन भी धर्म से ओत-प्रोत है। इनका दर्शन तो धार्मिक आस्था को सुस्पष्ट करने का साधन है, धर्म से पृथक् दर्शन निष्प्रयोजन है।

एक्विनस भी धर्म और दर्शन में भेद करते हैं। दर्शन का सम्बन्ध तर्क से है। दर्शन तर्क के सहारे ऐसे सत्यों की स्थापना करना चाहता है जिसकी व्याख्या हम बुद्धि से करते हैं। दूसरे शब्दों में, दर्शन का प्रतिपाद्य विषय बौद्धिक सत्य है जिन्हें सिद्ध तथा असिद्ध केवल तर्क के द्वारा किया जा सकता है। परन्तु धर्मशास्त्र इससे भिन्न है। धर्मशास्त्र का क्षेत्र तो आस्था या विश्वास है। ये आस्था पर आधारित सत्य तर्क के परे होते हैं। ये सद्यः सत्य कहे जाते हैं जिन्हें हम बुद्धि के द्वारा कदापि नहीं प्राप्त कर सकते। परन्तु इन सद्यः सत्यों की व्याख्या के लिए हमें वृद्धि की आवश्यकता पड़ती है। अतः सद्यः प्राप्त सत्य (धार्मिक) की व्याख्या तथा विश्लेषण करना ही बुद्धि का कार्य है।

इस अर्थ में एक्विनस भी बुद्धि को आस्था के लिए आवश्यक मानते हैं। परन्तु बुद्धि का क्षेत्र सीमित है तथा धर्म असीम है। अतः एक्विनस धर्म और दर्शन, आस्था और तर्क को बराबर नहीं मानते, परन्तु दोनों में सम्बन्ध का भी निषेध नहीं करते। हम अपनी आस्था की बौद्धिक व्याख्या कर सकते। हैं। इससे आस्था का स्वरूप और भी स्पष्ट होगा तथा हमारा विश्वास प्रबल होगा। उदाहरणार्थ, ईश्वर आस्था का विषय है, तर्क का नहीं। हम ईश्वर के अस्तित्त्व में सन्देह नहीं प्रकट कर सकते, परन्तु ईश्वर के अस्तित्त्व को तर्क से सिद्ध कर सकते है, अर्थात् उनके अस्तित्त्व को प्रमाण से सिद्ध कर सकते हैं। यही तर्क का प्रयोजन है, बुद्धि की सार्थकता है। तात्पर्य यह है कि बुद्धि विश्वास में सहायक है, तर्क आस्था को और सुदृढ बनाता है। इससे स्पष्ट है कि एक्विनस दर्शन को धर्म के लिए ही सार्थक मानते हैं।

 

ईश्वर सिद्धि के लिए प्रमाण

एक्विनस सन्त एन्सेल्म के द्वारा दिये गये प्रमाण से सहमत नहीं है, अतः वे नया प्रमाण देते हैं। सन्त एन्सेल्म ने बतलाया है कि विचार ही बाह्य वस्तु का द्योतक है। हममें पूर्ण ईश्वर का विचार है, इससे पूर्ण ईश्वर का अस्तित्त्व सिद्ध होता है। हमने पहले देखा है कि गॉनिलो ने इसका खण्डन करते हुए बतलाया कि विचार से विचार ही सिद्ध हो सकता है, वस्तु नहीं। एक्विनस भी इससे सहमत हैं कि पूर्ण ईश्वर के विचार से पूर्ण ईश्वर अस्तित्व का विचार ही सिद्ध हो सकता है, पूर्ण ईश्वर नहीं। इसी कारण एक्विनस एन्सेल्म के सत्तामूलक प्रमाण का खण्डन करते है तथा नया प्रमाण उपस्थित करते हैं-

१. जगत में गति और परिणाम है। प्रत्येक गतिशील पदार्थ में गति अपने पूर्व से उत्पन्न होती है तथा प्रत्येक कार्य का कारण अपने से पूर्व होता है। ईश्वर ही प्रथम गति उत्पन्न करने वाला है तथा वहीं आदि कारण है। यदि ईश्वर को हम प्रथम कारण न मानें तो कारण के अनन्त हो जाने पर अनवस्था का दोष (Fallacy of infinite regress)

२. प्रकृति का प्रत्येक पदार्थ सम्भाव्य (Possible) है, अर्थात् प्रत्येक के सत् होने की सम्भावना है। परन्तु इस सम्भावना का तभी कोई अर्थ होगा जब कोई अनिवार्य सत् भी हो। यही अनिवार्यता सम्भावनाओं का आधार है। यह अनिवार्य सत् ईश्वर है।

३. संसार में पूर्णता की मात्रा में न्यूनाधिक्य है, अर्थात् संसार की सभी वस्तुएँ पूर्णता की ओर अभिमुख हैं। परन्तु सभी वस्तुओं की पूर्णता का आदि कारण पूर्ण होना चाहिए, उसमें पूर्णता का न्यूनाधिक भाव नहीं, अर्थात् वह पूर्णतः पूर्ण है, वही ईश्वर है।

४. विश्व में प्रयोजन है। विश्व में विकास हो रहा है। विकास की अवस्था उच्च से उच्चतर स्तर की प्राप्ति है। उच्चतर अवस्था की प्राप्ति ही उच्च अवस्था का लक्ष्य है। इस विकास का परम प्रयोजन उच्चतम अवस्था की परम प्राप्ति है। यह प्रयोजन ईश्वर है, अर्थात् सभी वस्तुएँ ईश्वर की ओर अभिमुख हैं। ईश्वर ही विकास का प्रयोजन है।

५. प्रत्येक कार्य का कारण उपादान तथा निमित्त दोनों होता है। कोई भी उपादान बिना किसी निमित्त कारण की सहायता के किसी कार्य में परिणत नहीं हो सकता है। उदाहरणार्थ, पत्थर की मूर्ति बनाने में पत्थर ही उपादान है परन्तु इसके लिये शिल्पी की भी आवश्यकता है जो मूर्ति बनाता है। इस प्रकार यदि संसार के प्रत्येक कार्य का विश्लेषण करें तो प्रत्येक में हमें निमित्त की आवश्यकता स्वीकार करनी होगी। इस निमित्त कारण की श्रृंखला का आदि निमित्त कारण ईश्वर ही है।

See also  शैक्षिक तकनीकी के प्रकार,महत्त्व | Types of Educational Technology In Hindi

उपरोक्त प्रमाणों में प्रथम और द्वितीय प्रमाण सृष्टि मूलक (Ontological) है। तीसरा और चौथा प्रयोजनमूलक (Teleological) हैं तथा पाँचवाँ कार्य-कारण मूलक (Causal) है। ये प्रमाण आगे चलकर देकार्त की ईश्वर सिद्धि के आधार हैं। काण्ट ने भी इन प्रमाणों पर बहुत विचार किया है। इस प्रकार ये प्रमाण बड़े महत्त्वपूर्ण है।

 

 

सामान्य विचार

मध्य युग में सामान्य की समस्या पर भी गम्भीर विचार किया गया है। प्रायः सभी दार्शनिकों ने इस प्रश्न पर कुछ विचार व्यक्त किया है। इस समस्या का सूत्रपात ग्रीक युग में हुआ। सर्वप्रथम सामान्य की समस्या पर सॉफिस्ट लोगों ने विचार किया। सॉफिस्ट लोगों के अनुसार मनुष्य ही सभी पदार्थों का मापदण्ड है (Man is the measure of all things)। प्रत्येक मनुष्य को जो सत्य प्रतीत होता है वही उसके लिये सत्य है। कोई भी सामान्य सत्य नहीं। सामान्य या जाति तो मिथ्या है। इसी कारण ज्ञान तथा नैतिकता दोनों क्षेत्रों में सॉफिस्ट लोगों ने व्यक्तिगत सत्य को ही सत्य माना है, सामान्य सत्य को नहीं। महात्मा सुकरात ने सॉफिस्ट लोगों की इस मान्यता का खण्डन कर सामान्य की सत्ता स्वीकार किया है।

सुकरात के अनुसार व्यक्तिगत ज्ञान नहीं, सामान्य यथार्थ ज्ञान होता है। इन सामान्यों के सहारे ही हमें यथार्थ ज्ञान की उपलब्धि होती है। अत: सामान्य ही यथार्थ ज्ञान है। ये सामान्य व्यक्तियों के सार हैं। इन्हें सुकरात प्रत्यय (Concept) कहते हैं। प्लेटो के अनुसार ये प्रत्यय केवल मनुष्य के मस्तिष्क में विद्यमान नहीं, वरन् बाह्य संसार में भी इनका अस्तित्व है। प्लेटो के अनुसार सामान्य विज्ञान (Idea) हैं। विज्ञान वस्तु के सार है। वस्तु की सत्ता उसके विज्ञान पर ही निर्भर है। उदाहरणार्थ, मनुष्यत्व सभी मनुष्यों का सार है जो सभी व्यक्तिगत मनुष्यों से भिन्न है, परन्तु सभी मनुष्यों का कारण है।

अरस्तू ने प्लेटो के सामान्य का खण्डन किया है। अरस्तू के अनुसार किसी व्यक्ति का सार उस व्यक्ति में ही रहेगा, उससे पृथक् नहीं। अतः सामान्य और विशेष, जाति और व्यक्ति तो सापेक्ष हैं। जाति व्यक्ति का सार है, परन्तु वह व्यक्ति में ही समवेत है। इस प्रकार अरस्तू सामान्य और विशेष दोनों को सापेक्ष मानते हैं। इस प्रकार ग्रीक युग के प्राय: सभी दार्शनिकों ने सामान्य पर विचार किया है।

 सामान्य की समस्या पर मध्य युग में भी बहुत विचार किया गया है। रोसेलिन। के अनुसार व्यक्ति से पृथक् जाति की सत्ता, विशेष से पृथक् सामान्य की सत्ता नहीं है तथा व्यक्ति में समवेत भी नहीं। अतः सामान्य तो केवल कल्पनामात्र है। हम विभिन्न व्यक्तियों को देखते हैं, उनमें कुछ समान विशेषताएँ पाते है। इन्हीं समान विशेषताओं को हम सामान्य की संज्ञा दे देते हैं। उदाहरणार्थ, सभी मनुष्यों की कुछ समान विशेषतायें हैं। इसी समान विशेषता को मनुष्य सामान्य की संज्ञा हम प्रदान करते है। संज्ञा तो एक सार्थक ध्वनि मात्र है। हम विभिन्न व्यक्तियों की समान विशेषताओं को देखकर उनके लिए एक सार्थक शब्द का प्रयोग करते है। वस्तुतः यह सामान्य एक नाम या संज्ञा मात्र (Nominalism) है। अत: रोसेलिन के अनुसार सामान्य समान विशेषताओं का एक नाम है। जब हम समान विशेषताएँ पाते हैं तो एक नाम या संज्ञा प्रदान कर देते हैं। वस्तुतः यह कोई पदार्थ नहीं। व्यक्ति ही सत् है, जाति असत् है। जाति तो केवल नाममात्र है जो हमारी बुद्धि पर आश्रित है।

स्कॉट्स एरिजेना के विचार रोसेलिन से भिन्न हैं। प्लेटो तथा प्लोटाइनस के समान एरिजेना सामान्य को वास्तविक (Real) मानते हैं। उनके अनुसार सामान्य केवल संज्ञा या नाम मात्र नहीं वरन सत् (Existent) है। सामान्य ही विशेष का, जाति ही व्यक्ति का कारण है। सामान्य का स्वरूप क्या है तथा इसकी सृष्टि कैसे होती है? प्लेटो का अनुगमन करते हुए स्कॉट्स मानते हैं कि ईश्वर ही सामान्यों का स्रष्टा है तथा सामान्य सजातीय वस्तुओं के सार हैं।

सामान्यों की उपलब्धि हमें अलग से नहीं होती, अर्थात् ये व्यक्ति में ही समवेत रहते हैं। वस्तुतः उपलब्धि तो हमें व्यक्तिगत ही होती है, परन्तु जाति के बिना इसका कोई अस्तित्व नहीं। हम टॉम, हेरिक आदि व्यक्तियों को मनुष्य रूप में इसलिए जानते हैं कि उनमें मनुष्यत्व जाति है। हम इस मनुष्यत्व जाति को प्रत्यक्ष नहीं कर सकते। लेकिन मनुष्यत्व के बिना मनुष्य (विशेष) का कोई अस्तित्व नहीं।

एक्विनस का सामान्य विचार सामान्य विशिष्ट व्यक्तिवाद कहलाता है। एक्विनस का यह मत अरस्तू के समीप है। एक्विनस के अनुसार सामान्य सत् है, परन्तु विशेषों से पृथक् इनका अस्तित्व नहीं। संसार के सभी व्यक्ति जाति से विशिष्ट हैं अथवा विशेष सामान्य से युक्त हैं। ये सामान्य ईश्वर के नित्य विज्ञानों से उत्पन्न होते हैं तथा मानव मस्तिष्क में सजातीय वस्तुओं के सार सामान्य रूप में निवास करते हैं। संसार के सभी जड़ तथा चेतन पदार्थ की उत्पत्ति इन्हों से होती है। इस प्रकार सामान्य का सम्बन्ध नित्य विज्ञान तथा अनित्य वस्तु दोनों से है। सामान्य का कारण तो ईश्वर या नित्य विज्ञान हैं, परन्तु सामान्य ही अनित्य वस्तुओं के कारण है।

 

 

आप को यह भी पसन्द आयेगा-

 

 

 

Disclaimer -- Hindiguider.com does not own this book, PDF Materials, Images, neither created nor scanned. We just provide the Images and PDF links already available on the internet or created by HindiGuider.com. If any way it violates the law or has any issues then kindly mail us: [email protected]

Leave a Reply