जाॅन बर्कले का जड़-वाद

जाॅन बर्कले का बाह्य-वस्तु या जड़वाद क्या है

जाॅन बर्कले का बाह्य-वस्तु या जड़वाद

जाॅन लॉक के समान बर्कले की तत्त्व-मीमांसा भी उनकी ज्ञान-मीमांसा पर आधारित है। जिस वस्तु का अनुभव नहीं होता उसका अस्तित्व भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। तात्पर्य यह है कि सत्ता या अस्तित्व उपलब्धि पर आश्रित है। हमारा ज्ञान केवल प्रत्ययों तक सीमित है। हम प्रत्ययों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं जानते। हम बाह्य वस्तु (जड़ जगत) का प्रत्यक्ष नहीं होता, अतः जड़ जगत् की सत्ता मान्य नहीं। लॉक ने जड़ द्रव्य की सत्ता को स्वीकार किया है, परन्तु लॉक जड़ द्रव्य की सत्ता सिद्ध नहीं कर पाते। अतः लॉक का निष्कर्ष सन्देहात्मक है। यदि जड़ को स्वतन्त्र द्रव्य मान भी लिया जाय तो ईश्वर और जड़ का द्वैत स्पष्ट ही है।

जाॅन बर्कले यहाँ तक कहते हैं कि जड़ द्रव्य (Matter) को स्वीकार करने का अर्थ है नास्तिकता तथा भौतिकवाद को स्वीकार करना। अतः सन्देहवाद, नास्तिकवाद तथा अधार्मिकता के निराकरण के लिये जड वस्तु या जड़वाद का निषेध आवश्यक है। जड़वाद के निराकरण के लिये ही बर्कले ने सर्वप्रथम अमूर्त प्रत्ययों (Abstract ideas) का खण्डन किया है, क्योंकि अमूर्तीकरण बाह्य वस्तु या जड़ द्रव्य की सिद्धि में सहायक है।

जड़ द्रव्य के निराकरण के पूर्व हमें जड़ द्रव्य के इतिहास पर विहंगम दृष्टि से विचार करना आवश्यक है। विज्ञान और वस्तु का द्वैत प्रायः प्लेटो के दर्शन से प्रारम्भ होता है। प्लेटो ने विज्ञान (Idea) को सत् तथा वस्तु (Object) को असत् माना है। वस्तु को विज्ञान की प्रतिच्छाया प्रतिलिपि (Copy) मात्र है। प्लेटो ने विज्ञान और वस्तु का भेद तो स्वीकार किया है, परन्तु जड़ जगत् के स्वरूप की उन्होंने संगतिपूर्ण व्याख्या नहीं की है। अरस्तू (Aristotle) का वस्तु विज्ञान से संयुक्त है। विज्ञान देश-काल के बिना स्थित नहीं रह सकता। इनकी देश-काल में स्थिति स्वीकार करने के लिए हमें जड़ वस्तु की सत्ता स्वीकार करनी पड़ेगी। अरस्तू ने स्पष्ट बतलाया है कि जड़ का गुण गति है।

इस गति के कारण ही जड़ वस्तु के स्वरूप में परिवर्तन होता है, परन्तु जड़ तत्त्व ज्यों का त्यों बना रहता है, अर्थात् जड़ की आकृति में परिवर्तन नहीं होता है। इस विवरण से स्पष्ट है कि अरस्तू जड़ की सत्ता मानते हैं। देकार्त ने भी किसी वस्तु के स्थायी होने का कारण उसकी जड़ता को ही स्वीकार किया है, अर्थात् परिवर्तन के पश्चात् भी जड़ता के कारण वस्तु वहीं बनी रहती है। देकार्त ने चित्-अचित् रूप से द्रव्य का भेद स्वीकार किया है। चित् का गुण विचार है तथा अचित् का गुण विस्तार है।

यह अचित्-तत्त्व ही जड़ द्रव्य है जिसका गुण विस्तार माना गया है। जड़ विस्तृत होता है, जैसे शरीर लॉक जड़ द्रव्य की सत्ता स्वीकार करते हैं, परन्तु उनके अनुसार जड़ द्रव्य प्रत्यक्ष नहीं, अनुमेय है। प्रत्यक्ष तो हमें केवल गुणों का होता है, परन्तु गुणों के आश्रय रूप में हम द्रव्य की सत्ता मान लेते हैं। लॉक तीन प्रकार का द्रव्य मानते हैं-चित् (आत्मा), अचित् (जड़) और ईश्वर! लॉक के अनुसार गुण द्रव्य की शक्ति है जो हमारी आत्मा में प्रत्यय उत्पन्न करती है। अतः लॉक इन प्रत्ययों का कारण रूप में जड़-तत्त्व को स्वीकार करते हैं।

तात्पर्य यह है कि जड़-तत्त्व का स्वतन्त्र अस्तित्व है जिसके कारण प्रत्ययों की उत्पत्ति होती है। जाॅन लॉक के अनुसार गुण दो प्रकार के होते हैं, मूलगुण तथा उपगुणा मूलगण। मूलगुण द्रव्य के अविच्छेद्य यथार्थ धर्म है, यथा घनत्व, विस्तार, आकार, गति, स्थिति और संख्या। उपगुण हमारे मन के संवेदन मात्र हैं जिनकी उत्पत्ति मूलगुणों के कारण होती है। रूप, रस, गन्ध, स्पर्श आदि उपगुण हैं। ये मूलगुण के द्वारा उत्पन्न इन्द्रिय संवेदन मात्र हैं। संक्षेप में लॉक के जड़ या अचित् तत्त्व की तीन विशेषताएँ हैं-

१. गुण या प्रत्यक्ष होता है, अतः इनके आधार की कल्पना हम करते हैं। वह अज्ञेय, अनुमेय, आधार जड़ द्रव्य है।

२. यह जड़ द्रव्य ही जड़ात्मक वस्तु के अस्तित्व का सूचक है।

३. जड़ द्रव्य में प्रत्यय उत्पन्न करने की शक्ति है जिसे गुण कहा जाता है।

 

 जाॅन बर्कले का जड़-तत्त्व का खण्डन

जाॅन बर्कले जड़-तत्त्व के खण्डन के लिये निम्नलिखित युक्तियाँ देते हैं-

१. लॉक गुणों के आधार या आश्रय रूप में जड़ तत्त्व की सत्ता स्वीकार करते है, परन्तु गुणों के आधार का अर्थ क्या है? यहाँ आधार या आश्रय शब्द प्रचलित या शाब्दिक अर्थ में स्वीकार नहीं किया गया है। लॉक स्वयं कहते हैं कि जिस प्रकार भवन स्तम्भों पर आश्रित होता है उसी प्रकार जड़ तत्त्व गुणों पर आश्रित नहीं होता है। इससे स्पष्ट है कि यहाँ आश्रय का अर्थ भौतिक आश्रय या आधार नहीं, क्योंकि भौतिक रूप में जड़-तत्त्व का प्रत्यक्ष हमें नहीं होता।

अतः लॉक कहते हैं कि हम नहीं जानते कि जड़-तत्त्व क्या हैं (I do not know what is matter)| इससे सिद्ध होता है कि जड़-तत्त्व की सामान्य सत्ता (Being in general) है। इस सामान्य सत्ता के विज्ञान (Ideas) से गुणों का विज्ञान संयुक्त है परन्तु सामान्य सत्ता का विज्ञान तो केवल एक अमूर्त प्रत्यय है जो स्वतः असिद्ध है। अतः गुणों के आधार का अर्थ स्पष्ट नहीं।

२. लॉक का कहना है कि जड़द्रव्य मन के बाहर है। यदि मन के बाहर बाह्य पदार्थ है तो इन्हें हम कैसे जान सकते हैं? हम दो ही प्रकार से इन्हें जान सकते हैं इन्द्रिय प्रत्यक्ष -रूप में या बुद्धि द्वारा अनुमान रूप में। इन्द्रियों से हमें जिस वस्तु का ज्ञान प्राप्त होता है उसे हम चाहे जिस नाम से पुकारे परन्तु इन्द्रियाँ हमें मन के बाहर किसी वस्तु के अस्तित्व की सूचना नहीं देती जो दृष्ट वस्तु के समान हा इसका विकल्प यह है कि दृष्टार्थ के आधार पर अदृष्टार्थ का अनुमान हो सकता है।

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परन्तु दृष्टार्थ से अदृष्टार्थ के अनुमान के लिये तो अनिवार्य सम्बन्ध की आवश्यकता है जो इनमें है ही नहीं। हम जो देखते हैं उनमें कौन-सी युक्ति हमें यह विश्वास दिला सकती है कि मन के बाहर वस्तु का अस्तित्व है, क्योंकि जड़ तत्त्व के संरक्षक स्वयं स्वीकार करते हैं कि उनमें और प्रत्ययों में कोई अनिवार्य सम्बन्ध नहीं। वस्तुतः प्रत्ययों के अतिरिक्त जड़ द्रव्य का प्रत्यक्ष हमें कभी नहीं होता, अतः उनके सम्बन्ध का प्रश्न व्यर्थ है।

हमारे ज्ञान के यथार्थ विषय प्रत्यय ही है। इनके अनुरूप वस्तु मानने की कोई आवश्यकता नहीं| स्वप्न तथा उन्माद की अवस्था में हम बहुत से ऐसे प्रत्ययों का अनुभव करते हैं जिनके अनुरूप वस्तु नहीं। अत: संवाद सिद्धान्त की यहाँ कोई आवश्यकता नहीं। तात्पर्य यह है कि विचार के अनुरूप वस्तु भा हो, ऐसा आवश्यक नहीं। स्वप्न में बहुत से विचार उत्पन्न होते हैं जिनके अनुरूप वस्तु नहीं होती।

३. लॉक मूलगुण तथा उपगुण में भेद के आधार पर जड़ तत्त्व की सिद्धि करते हैं। उनका कहना है कि मूलगुण मन के बाहर जड़ तत्त्व के वास्तविक धर्म हैं। उपगुणों को लॉक ने व्यक्ति तथा स्थिति के अनुसार परिवर्तनशील बतलाया है। उदाहरणार्थ रूप, गन्ध, ध्वनि आदि उपगुण हैं। ये उपगुण जड़ तत्त्व के वास्तविक धर्म नहीं, वरन् मन की भावनाएँ मात्र हैं। उदाहरणार्थ, उष्ण तथा शीतल मन की भवनाएँ हैं। एक ही वस्तु किसी को शीतल तथा दूसरे को उष्ण प्रतीत हो सकती है। बर्कले का कहना है कि यही तक के लिये भी प्रयोग किया जा सकता है। विस्तार, आकृति आदि को मूलगुण माना गया है, परन्तु उनमें भी व्यक्ति की स्थिति से परिवर्तन होता है। उदाहरणार्थ, प्रकाश की अपेक्षा कुहरे में वस्तु का स्वरूप बड़ा प्रतीत होता है। सुदूर विमान की गति समीपस्थ की अपेक्षा न्यून प्रतीत होती है।

४. लॉक के अनुसार मूलगुण का परिमाण निश्चित किया जा सकता है तथा निश्चित परिमाण की दृष्टि से व्यक्ति और स्थिति के अनुसार परिवर्तन का निराकरण हो सकता है। परन्तु यह तर्क तो उपगुणों के लिये भी दिया जा सकता है। श्वेत का कागज दिन के प्रकाश में श्वेत, लाल प्रकाश में लाल, हरे प्रकाश में हरा प्रतीत होता है, तो भी उसे श्वेत कहेंगे। अतः गुण का भेद तो प्रत्यक्ष स्थिति तथा सापेक्षता पर निर्भर है, जो सभी गुणों पर समान रूप से घटित होता है। अतः हमें यह कहने का कोई अधिकार ही नहीं कि कुछ गुण मनाश्रित हैं तथा कुछ वस्तु-स्थित।

५. लॉक का मूलगुण तथा उपगुण में भेद ठीक नहीं। लॉक के अनुसार मूलगुण तो जड़ तत्त्व के यथार्थ धर्म हैं, परन्तु उपगुण जड़ तत्त्व का धर्म नहीं है, यह कहना उचित नहीं। प्रसार मूलगुण है तथा रंग उपगुण हैं। ऐसा कोई द्रव्य नहीं जिसमें प्रसार या विस्तार न हो। बर्कले का कहना है कि ऐसा कोई जड़ द्रव्य नहीं जिसका कोई रंग न हो। विस्तृत वस्तु रगहीन नहीं हो सकती। अतः दोनों के भेद का कोई औचित्य नहीं।

६. जाॅन लॉक जड़ तत्त्व को निष्क्रिय मानते हैं तथा गुण को द्रव्य की शक्ति कहते हैं। मूलगुण जड़ द्रव्य से ही उत्पन्न धर्म हैं। यहाँ विरोध स्पष्ट है। यदि जड़ तत्त्व निष्क्रिय हैं तो उनमें गुणों को उत्पन्न करने की शक्ति कहाँ? यदि सशक्त है तो निष्क्रिय कैसे? दोनों बातों में विरोध है। इसी विरोध का परिहार करने के लिये बर्कले केवल आत्मा को ही सक्रिय मानते हैं।

उपरोक्त तर्कों से यह स्पष्ट है कि मूलगुण तथा उपगुण का भेद असंगत है तथा इस भेद के आधार पर जड़-तत्त्व की सिद्धि भी मिथ्या है। वस्तुतः गुण के आश्रय रूप में बाह्य पदार्थ (जड़-तत्त्व) की सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि गुण संवेदन मात्र हैं, अतः उनका आश्रय या अधिष्ठान आत्मा हो सकता है, जड़ पदार्थ नहीं। आत्मा ही सभी प्रकार के अनुभवों का अनुभावक या अधिष्ठान है।

जाॅन लाॅक का सत्ता अनुभवमूलक है 

जड़ तत्त्व के निराकरण के पश्चात् बर्कले इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि सत्ता अनुभवमूलक हा तात्पर्य यह है कि अनुभवविहीन सत्ता मान्य नहीं, अर्थात् अस्तित्व अनुभवात्मक है। होना  तथा प्रत्यक्ष होना  दोनों एक है। ऐसी सत्ता ही नहीं जिसका हमें प्रत्यक्ष न हो। बर्कले विज्ञानवादी हैं, वे विज्ञान के अतिरिक्त वस्तु की सत्ता स्वीकार नहीं करते। वस्तु विज्ञानरूप ही है। जिसे हम बाह्य वस्तु कहते हैं वह वस्तुतः आन्तरिक विज्ञान है। हमारे ज्ञान के विषय अर्थात् ज्ञेय विज्ञान ही हैं, क्योंकि विज्ञान के अतिरिक्त हमें किसी वस्तु का ज्ञान नहीं होता। इसी कारण बर्कले कहते हैं कि जो कुछ भी ज्ञेय है वही सत् है।

ज्ञेय विषय तो केवल विज्ञान ही हैं, विज्ञान ही सत् है, वस्तु नहीं। ज्ञेय के लिये ज्ञाता की अपेक्षा, अनुभव, अनुभावक या अनुभवकर्ता-सापेक्ष है। अनुभवकर्ता तो केवल आत्मा है तथा अनुभव के विषय विज्ञान हैं। अतः ज्ञाता (आत्मा) और ज्ञेय (विज्ञान) के अतिरिक्त किसी की सत्ता नहीं है। परन्तु ज्ञाता और ज्ञेय में तादात्म्य सम्बन्ध है। ज्ञेय ज्ञानरूप होने से ज्ञाता से पृथक् नहीं। यह सम्भव नहीं कि ज्ञेय की सत्ता रहे तथा ज्ञाता की न रहे| उदाहरणार्थ, हम कहते हैं, घट है इसका अर्थ है कि घट का अस्तित्व या सत्ता है। परन्तु घट के अस्तित्व का ज्ञान भी हमारे देखने या स्पर्श करने पर निर्भर है। यदि घड़ा कमरे में है और मैं वहाँ न हूँ तो इसका अर्थ है कि घड़े की सत्ता है, क्योंकि मैं यदि वहाँ होता तो उसे देखता। यदि मैं न देखू तो उसे कोई और देखेगा परन्तु उसका अस्तित्व देखने पर ही आश्रित है।

यदि कोई देखने वाला नहीं, अर्थात् अनुभवकर्ता नहीं, तो अनुभव का विषय नहीं। इसीलिये कहा गया है कि अनुभव का विषय अनुभवकर्ता पर आश्रित है। अनुभव हमें सत्ता या अस्तित्व का ही होता है, अर्थात् सत्ता अनुभवमूलक है, अथवा ज्ञेय का अस्तित्व ज्ञाता के प्रत्यक्ष पर आश्रित है। किसी भी विषय को यदि हम कहें कि है तो इसका अर्थ है कि वह प्रत्यक्षगम्य है, अर्थात् ‘होना’ तथा ‘प्रत्यक्ष होना’ में तादात्म्य बतलाते हुए बर्कले कहते हैं कि हमारे विचार, भाव या कल्पना द्वारा निर्मित प्रत्यक्ष किसी का भी मन के बिना अस्तित्व नहीं। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि प्रत्यक्ष करने वाले मन के बिना किसी का अस्तित्व ही नहीं।

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अतः अस्तित्व शब्द का प्रयोग ही संवेद्य विषयों के लिये किया जाता है। संवेद्य विषय तो प्रत्यय या विज्ञान है जो संवेदनकर्ता के मन या आत्मा पर निर्भर है। बर्कले एक उदाहरण के द्वारा इसे स्पष्ट करते हैं। मैं एक मेज पर लिख रहा हूँ। जिस (मेज) पर मैं लिख रहा हूँ, वह है (क्योंकि) मैं उसे देखता हूँ, स्पर्श करता हूँ। यदि मैं अपने अध्ययनकक्ष के बाहर होता तब भी मैं कहता कि वह मेज है, क्योंकि यदि मैं भीतर होता ता उसका प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता था।

यदि में नहीं तो कोई आर इसका प्रत्यक्ष करता; परन्तु बिना प्रत्यक्ष के इसकी सत्ता स्वीकार्य नहीं। जिस प्रकार मेज का अस्तित्व देखने पर है, उसी प्रकार अन्य वस्तुओं का भी। इसी दृष्टि से बर्कले कहते हैं कि अस्तित्व (Esse) का अर्थ अनुभव करना (Percipii) है। उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि मेज का अस्तित्व अनुभव पर है। गन्ध का अस्तित्व सूंघने पर है तथा रूप का अस्तित्व देखने पर है।

बर्कले बाह्य पदार्थ की सत्ता का पूर्णतः निषेध करते हैं। वस्तुतः विज्ञान ही सत् है। विज्ञान अभौतिक या अजड़ है। इनकी सत्ता बाह्य नहीं, आन्तरिक है। ये आत्मा या मन पर आश्रित हैं। प्रश्न यह है कि बाह्य वस्तु का स्वरूप क्या है? घर, पर्वत. नदी आदि बाह्य वस्तु की सत्ता तो हमें स्पष्टतः प्रतीत होती है। बर्कले का कहना है। कि यदि हम अपने मन का सर्वेक्षण करें तो हमें यहाँ बाह्य-दोष स्पष्टत: प्रतीत होगा। वस्तुतः हमारा ज्ञान तो इन्द्रिय-जन्य है और इन्द्रियों को प्रत्यय या विज्ञान से भिन्न किसी वस्तु का ज्ञान नहीं होता।

उपरोक्त सभी विषय बाह्य नहीं, आन्तरिक हैं, वस्तु नहीं विज्ञान हैं। मन या आत्मा के बिना उनका कोई अस्तित्व ही नहीं, क्योंकि उनकी सत्ता केवल दृश्यता या ज्ञेयता है। यदि हम किसी बाह्य पदार्थ (जड़ तत्त्व) का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि जड़ वस्तु केवल निष्क्रिय, अचित् तत्त्व है जिसमें विस्तार, आकार, गति आदि गुण हैं, परन्तु विस्तार, आकार, गति आदि तो मन में रहने वाले प्रत्यय मात्र हैं। अत: जड़ का विचार ही बाधित है|

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि बर्कले ज्ञान के विषय नदी, पर्वत, घर आदि को बाह्य नहीं, आन्तरिक प्रत्यय या विज्ञान मानते हैं। बर्कले की प्रसिद्ध उक्त है कि मैं वस्तु को विज्ञान नहीं बनाता, वरन् विज्ञान को वस्तु बना रहा हूँ। विज्ञान को वस्तु कहने का तात्पर्य है कि ज्ञेय विषय विज्ञान ही है। हमें ज्ञान प्रत्ययों या विज्ञाना का ही होता है। इन प्रत्ययों के लिये किसी बाह्य वस्तु की कल्पना तो निरर्थक है। प्रत्यय तो मनाश्रित है। इनकी सिद्धि के लिये बर्कले एक उदाहरण भी देते है। मैं जिस मेज पर लिख रहा हूँ वह क्या है? यह मेज तो केवल रूप, आकृति, विस्तार आदि प्रत्ययों का समुदाय मात्र है। इन प्रत्ययों के अतिरिक्त मेज कुछ भी नहीं।

मेज तो शब्द होने के कारण एक संज्ञामात्र है जिसके सुनने से केवल प्रत्ययों के समुदाय का बोध होता है, जैसे रूप-प्रत्यय, विस्तार-प्रत्यय, आकृति-प्रत्यय इत्यादि। अतः जब हम कहत है कि मेज है तो इसका अर्थ है कि इसके प्रत्ययों का हमें अनुभव हो रहा है, अर्थात् सत्ता अनुभवमूलक है। यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न उपस्थित होता है। कि जिस समय हमें मेज का प्रत्यक्ष नहीं होता तो क्या मेज नहीं है? बर्कले का उत्तर है कि मेज है।

यहाँ प्रत्यक्ष का अर्थ ‘प्रत्यक्ष-सामर्थ्य’ है। मेज है का अर्थ है कि मेज मे प्रत्यक्ष का सामर्थ्य है। अतः १. यदि मैं होता तो मेज का प्रत्यक्ष करता, २. यदि में नहीं तो कोई दूसरा प्रत्यक्ष करता, ३. यदि कोई मेज का प्रत्यक्ष नहीं करता तो ईश्वर उसका प्रत्यक्ष करता है। तात्पर्य यह है कि प्रत्यक्ष से परे अस्तित्त्व का कोई अर्थ नहीं। परन्तु प्रत्यक्ष व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं, अपितु ससीम तथा असीम (व्यक्ति तथा ईश्वर) सभी का आत्मा से इसका सम्बन्ध है|

एक दूसरा स्वाभाविक प्रश्न यह उपस्थित होता है कि सत्ता अनुभवमूलक है। अथवा अस्तित्व प्रतीति का विषय है। इसका अर्थ यह है कि सत्ता प्रत्यक्षगम्य है। प्रत्यक्ष तो केवल इन्द्रियों तक सीमित है। अतः सत्ता या अस्तित्व इन्द्रियातीत नहीं। यदि यह सत्य है तो आत्मा का बोध कसे, परमात्मा का अस्तित्व कसे? जिन विषया का हमें प्रत्यक्षात्मक ज्ञान नहीं होता (बुद्धि आदि अन्य माध्यम से होता है) उनका अस्तित्व कैसे सिद्ध होगा? बर्कले अनुभव तथा बुद्धि दोनों को ज्ञान का साधन स्वीकार करते हैं।

अनुभव तो प्रत्यक्षगम्य है, अर्थात् अनुभव हमें प्रत्यक्षात्मक ही होता है। इन्द्रियों से हमें जगत् की सत्ता तथा सांसारिक घटनाओं का ज्ञान प्राप्त होता है| बुद्धि के द्वारा हमें इन घटनाओं के कार्य-कारण सम्बन्ध का ज्ञान होता है। आत्मा-परमात्मा तथा अन्य वैज्ञानिक नियमों का ज्ञान हमें बुद्धि द्वारा ही होता है। अतः स्पष्ट है कि इन्द्रियों से अनुभव और बुद्धि से ज्ञान प्राप्त होता है। इन्द्रियों को ज्ञान नहीं और बुद्धि को अनुभव नहीं।

 

 

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