फ्रेडरिक हेगल का प्रकृति दर्शन

फ्रेडरिक हेगल का प्रकृति दर्शन | Nature Philosophy of Friedrich Hegel in Hindi

प्रकृति दर्शन (Philosophy of Nature)

यह हेगल के दर्शन का द्वितीय अंग है। यह प्रतिपक्ष (Anti-thesis) है। यह अमूर्त विज्ञान का मूर्त रूप है। तात्पर्य यह है कि यह विज्ञान से वस्तुओं की सृष्टि का स्वरूप है। इस भाग में हेगल सांसारिक वस्तुओं की सृष्टि बतलाते हैं। अमूर्त विज्ञान शुद्ध सत्ता या भाव है। यह सामान्य या जातिरूप है। यही विज्ञान अपने से बाहर होकर विशेष या व्यक्ति का रूप धारण कर लेता है। अतः इस भाग में हेगल विज्ञान से वस्तु की उत्पत्ति का वर्णन करते हैं। विज्ञान अपने आप में अमूर्त रूप में नहीं रह सकता। अमूर्त में मूर्त अन्तर्निहित है। वह अपने अन्तर्निहित मूर्त रूप की अभिव्यक्ति करता है। मूर्त रूप में अभिव्यक्ति कर विज्ञान बाह्य प्रकृति का रूप धारण कर लेता।

प्रकृति आन्तरिक विज्ञान का बाह्य रूप है। जैसे तर्कशास्त्र के पक्ष, प्रतिपक्ष और समन्वय इस त्रिक् रूप से हेगल प्रत्यय या विज्ञान जगत् की व्याख्या करते हैं। वैसे ही अपने प्रकृति दर्शन में भी हेगल पक्ष, प्रतिपक्ष और समन्वय को स्वीकार करते हैं। तर्कशास्त्र में हेगल ने अमूर्त विज्ञान या शुद्ध विज्ञान को पक्ष माना है। अपने प्रकृति दर्शन में उन्होंने दिक् (Space) को पक्ष माना है। संसार के सभी पदार्थ इस अनन्त दिक् के ही परिणाम हैं। यह दिक् बिल्कुल रिक्त तथा अमूर्त है। शुद्ध विज्ञान के समान इसका भी कोई स्वरूप नहीं। हेगल के अनुसार यह अमूर्त दिक् प्रकृति का सर्वप्रथम अंश है। सर्वप्रथम होने के कारण यह निम्नतर स्तर पर विद्यमान है। इसका उच्ततम स्तर आत्म-जगत् है। प्रकृति की सभी वस्तुएँ इन दोनों के बीच में हैं। हेगल इस दिक् को विज्ञान का विरोधी मानते हैं।

विज्ञान मानसिक प्रत्यय है तो दिक् बाह्य वस्तु है। विज्ञान का जगत् आत्म-जगत् है और दिक् का जगत् विषय-जगत् है। इस विषय जगत् में हेगल के अनुसार सतत् विकास है। सभी वस्तुएँ निम्न से उच्च की ओर सर्वदा अग्रसर हो रही हैं। प्रकृति का त्रिक् रूप-जड़ रूप, रासायनिक रूप और प्राण रूप है| जड़ जगत् पक्ष है। यह गति का आधार है। यह यान्त्रिक जगत् है। इस जगत् में चैतन्य का नितान्त अभाव है। दूसरा प्रतिपक्ष रासायनिक जगत् है जिसमें थोड़ी सी विकसित चेतना है। यह प्रकाश, ताप आदि का जगत् है। तीसरा समन्वयात्मक रूप प्राण है।

यह वनस्पति जगत है| पशु जगत् में प्राण है तथा चेतना भी है। इस जगत में संवेदनाएँ होती हैं। इसी जगत का विकसित रूप मानव जगत् ह। जिसमें विकसित चेतना या आत्मगत चेतना है। फ्रेडरिक हेगल के अनुसार सम्पूर्ण जगत् चेतना का विकास है। इस विकास के तीन स्तर हैं-

१. यान्त्रिक जगत् (Mechanics)- यह प्रकृति का सर्वप्रथम स्तर है जिसमें सोयी हई चेतना रहती है, यही जड जगत है। यह जगत यान्त्रिक नियमा । परिचालित होता है, परन्तु इस जगत् में भी विकास है।

२. भौतिक जगत् (Physics)- यह विकास का दूसरा स्तर हा यह प्रय नक्षत्र आदि का जगत् है। इस जगत् में संवेदना है, परन्तु यह चेतना का विकसित अवस्था नहीं है।

३. प्राणी जगत् (Organics)- यह प्राणियों का जगत् है। इसमें पशु से लेकर मानव जगत् तक का विकास है। पशु जगत् में संवेदना है परन्तु चेतना नहीं, मानव जगत् चेतना जगत् है। मानव जगत् में प्रकृति का विकास पूर्ण हो जाता है।

 

आत्म विज्ञान(Philosophy of Spirit)

यह फ्रेडरिक हेगल के दर्शन का तृतीय खण्ड है। यह समन्वय (Synthesis) है। हमने पहले देखा है कि अमूर्त विज्ञान पक्ष है, मूर्त विज्ञान प्रतिपक्ष है और आत्म-विज्ञान समन्वय है| तात्पर्य यह है कि अमूर्त विज्ञान, विज्ञान का निरपेक्ष, शुद्ध, आत्मगत रूप है। मूर्त विज्ञान, विज्ञान का बाह्य और विषयगत रूप है। तर्कशास्त्र में फ्रेडरिक हेगल ने निरपेक्ष विज्ञान का वर्णन किया है। यह शुद्ध विज्ञान है जो विषय जगत् के पूर्व है। यह सभी विषय की अनभिव्यक्त अवस्था है। प्रकृति के रूप में यह व्यक्त होकर बाह्य विषय बन जाता है। आत्म जगत् में विज्ञान पुनः अपने चित् रूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। यह विज्ञान की मूर्त तथा अमूर्त दोनों अवस्थाओं का सम्मिश्रण है। यह विषयी जगत् है। जिसमें विषय और विज्ञान दोनों का अंश विद्यमान है। फ्रेडरिक हेगल के अनुसार यही मानव जगत् है।

मानव मूर्त तथा अमूर्त विज्ञान का समन्वय है| विषयी में विषय और विज्ञान दोनों का समन्वय है। एक ओर वह शुद्ध विज्ञान या निरपेक्ष विज्ञान है। दूसरी ओर उसका सम्बन्ध पशु जगत् से है। मानव में इन दोनों का समन्वय है| विषय और विज्ञान का इस जगत् में भेद समाप्त हो जाता है। वस्तु जगत् में विज्ञान अपने शुद्ध चेतन रूप को छोड़कर अचेतन (जड़) के रूप में परिणत हो जाता है। मानव के रूप में वह पुनः अपने चेतन स्वरूप को प्राप्त होता है। विषय में रूप में विज्ञान बन्दी था परन्तु विषय जगत् में ही विज्ञान विकास की अवस्था में रहता है। मानव जगत् से वह अपने को पूर्ण स्वतन्त्र कर लेता है। अतः मानव विकास की चरम अवस्था है।

जिस प्रकार प्रकृति में विकास के विभिन्न चरण हैं वैसे आत्मजगत् में भी विभिन्न चरण हैं। तात्पर्य यह है कि आत्मजगत में विज्ञान निम्न से उच्च, उच्चतर और उच्चतम अवस्था को प्राप्त हो जाता है। इन्हीं अवस्थाओं का वर्णन आत्मजगत् है| आत्म-जगत में भी विक रूप है। तात्पर्य यह है कि इसमें भी पक्ष, प्रतिपक्ष भार समन्वय है| विषयी विज्ञान (Subjective spirit) पक्ष है, विषय विज्ञान Objective spirit) प्रतिपक्ष है और निरपेक्ष विज्ञान (Absolute spirit) समन्वय है।

१. विषयी विज्ञान (Subjective Spirit)- यह आत्म-विकास का सर्वप्रथम पक्षरूप है। यह जीवनिष्ठ रूप है। जीव के रूप में विज्ञान व्यक्तिगत है या चेतना आत्मनिष्ठ है। इस आत्मनिष्ठ चेतना के इन्द्रिय संवेदन, त्रक, कल्पना, स्मृति इत्यादि विभिन्न रूप है। आत्मनिष्ठ रूप में चेतना के दो मुख्य कार्य हैः ज्ञान और संकल्प। इन्द्रिय संवेदन तर्क आदि सभी ज्ञान के रूप हैं। संकल्प के रूप में जीव का ज्ञाता भोक्ता आदि स्वरूप है।

२. विषय विज्ञान (Objective Spirit)- यह आत्म-विज्ञान का प्रतिपक्ष रूप है। इस रूप में जीव का आत्मगत चैतन्य बाह्य संस्थाओं के रूप में विषयगत होता है। राज्य, नैतिकता, कानून आदि सभी आत्मगत चैतन्य के बाह्य रूप है। यह बाह्य स्वरूप संस्थागत रूप धारण कर लेता है| तात्पर्य यह है कि राज्य, नैतिकता आदि की विभिन्न संस्थायें व्यक्ति के आत्मनिष्ठ चैतन्य के सामाजिक या संस्थागत रूप हैं।

एक ओर ये संस्थायें जड़ जगत् के समान व्यक्ति से भिन्न हैं, दूसरी ओर ये सभी आत्मजगत् के विकसित बाह्य विषयगत रूप हैं। सभी संस्थाओं में व्यक्ति की चेतना प्रतिध्वनित होती है। ज्यों-ज्यों व्यक्ति की चेतनायें विकसित होती जाती हैं। त्यों-त्यों पारिवारिक, सामाजिक, राजकीय संस्थाएँ भी बढ़ती जाती हैं। इस प्रकार फ्रेडरिक हेगल इस संस्था को आत्म-विकास का स्तर मानते हैं।

३. निरपेक्ष विज्ञान (Absolute Spirit)- यह आत्मगत का समन्वय (Synthesis) है। यह चित् शक्ति का पूर्ण रूप है। चेतन की पूर्ण अभिव्यक्ति कला, धर्म और दर्शन-शास्त्र में होती है। कला निरपेक्ष विज्ञान की सर्वप्रथम अभिव्यक्ति है। कला की विभिन्न कृतियों में हम आत्म-जगत् की अभिव्यक्ति पाते हैं। धर्म कला से उच्च है। यह निरपेक्ष विज्ञान का उच्चतर विकास है। इसमें ईश्वर, जीव आदि के सम्बन्ध की विवेचना होती है| दर्शन निरपेक्ष विज्ञान की पूर्णतम अभिव्यक्ति की अवस्था है। इसमें परम विज्ञान अपनी निरपेक्ष शुद्ध अमूर्त अवस्था को प्राप्त होता है।

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फ्रेडरिक हेगल के अनुसार यह पूर्ण विकसित अवस्था है अर्थात् विकास की चरम सीमा है। दर्शन में हम परम तत्त्व को परम विज्ञान (Absolute idea) के रूप में पाते हैं। यहाँ पर हेगल परम विज्ञान और परम तत्व को एक बतलाते हैं। ये दोनों एक ही विज्ञान के दो रूप प्रतीत होते हैं जो वस्तुतः एक हैं। दर्शन शास्त्र में हम इसी विज्ञान का अध्ययन करते हैं जो मूलतः तथा अन्तत: परम तत्व या परम विज्ञान है।

तर्कशास्त्र में हम इस परम तत्व का विश्लेषण परम विज्ञान के रूप में करते हैं। परम विज्ञान शुद्ध या अमूर्त विज्ञान है। प्रकृति दर्शन में हेगल के अनुसार यह अमूर्त-मूर्त बन जाता है। यह जड़-जगत् है। पहला सामान्य या जाति का जगत् है, दूसरा विशेष और व्यक्ति का जगत् है। आत्म-जगत् में विज्ञान जाति और व्यक्ति का सम्मिलित रूप है। यह तृतीय अन्तिम रूप है।

 

 

फ्रेडरिक हेगल की समीक्षा

फ्रेडरिक हेगल का दर्शन विश्व दर्शन (Universal Philosophy) कहलाता है। स्वतः हेगल महोदय ने कई स्थानों पर बतलाया है कि उनके दर्शन में उनके पूर्व विचारों का सार निहित है| इसी कारण वैलेस (Wallace) प्रभृति व्याख्याकारों का कहना है कि हेगल का दर्शन कोई नया मत नहीं, वरन् प्राचीन मत का ही नया रूप है। फ्रेडरिक हेगल का विश्व दर्शन बड़ा ही प्राचीन है। प्रारम्भ से लेकर आज तक यह अनेक निरन्तर गति से चलता आ रहा है। कभी इस विश्व का मार्ग संकीर्ण तथा कभी विस्तृत हो जाता है परन्तु प्राचीन ग्रीक दार्शनिक प्लेटो तथा अरस्तु से लेकर आज तक यह विद्यमान है।

परन्तु प्रश्न यह है कि यह विश्व दर्शन क्या है जो अनवरत गति तथा अविच्छिन्न परम्परा से प्रत्येक दर्शन में विद्यमान है। स्पष्ट है कि हेगल के विश्व-दर्शन को समझने के लिये हमें विभिन्न रूपों में तथा विभिन्न पूर्ववर्ती दार्शनिकों में विश्व दर्शन के स्वरूप को देखना होगा। तात्पर्य यह है कि हेगल का विश्व दर्शन अपने पूर्ववर्ती दार्शनिकों से कहाँ तक प्रभावित है? हेगल के पूर्व दार्शनिकों का लम्बा क्रम है। हम इनमें से कुछ प्रतिनिधि ग्रीक दार्शनिकों के यहाँ उल्लेख करेंगे तथा उनका प्रभाव हेगल पर देखेंगे।

हेगल और इलियाई मत- सर्वप्रथम विश्व दर्शन का परिचय हमें इलियाई मत (Eleatic School) से मिलता है। इस मत को ग्रीक दर्शन का सर्वप्रथम सुव्यवस्थित सत् का सिद्धान्त कहा जा सकता है। इलियाई मत के महान् दार्शनिक पार्मेनाइडीज के अनुसार सत् और असत् (Being and Non-being) में भेद है। संसार की सभी वस्तुएँ अनित्य, क्षणिक तथा परिवर्तनशील हैं। अतः संसार की सभी वस्तुएँ असत् हैं। सत् तो नित्य निरपेक्ष और अपरिवर्तनशील होता है, यही परम तत्व है। यह परम तत्त्व उत्पत्ति तथा विनाश के परे है। इस परम तत्त्व के विषय में हम कुछ कह नहीं सकते। यह केवल सत् मात्र है। यह शुद्ध सत्ता है। इसका ज्ञान इन्द्रियों से नहीं वरन् बुद्धि से सम्भव है।

इस प्रकार पार्मेनाइडीज सर्वप्रथम सत् और असत् में तथा इन्द्रिय और बुद्धि में भेद करते हैं। सत् का ज्ञान इन्द्रियों से सम्भव नहीं। इस प्रकार इलियाई मत में सत् को परम तत्त्व माना गया है जो बुद्धिगम्य है। तत्त्व तो केवल सत् है, सत् केवल सत्ता है, सत्ता केवल विचार है। विचार का विषय वस्तु नहीं वरन् विचार ही है। जिसका विचार नहीं वही असत् है। आगे चलकर हम ये देखेंगे कि हेगल महोदय ने भी विचार और सत्ता में तादात्म्य स्थापित किया है। उनकी प्रसिद्ध उक्ति है-सत्ता ही विचार है, विचार ही सत्ता है। इस प्रकार फ्रेडरिक हेगल के प्रसिद्ध सिद्धान्त का बीज रूप पार्मेनाइडीज में विद्यमान है।

हेगल और प्लेटो- सत् और असत् का तथा इन्द्रिय और बुद्धि का स्पष्ट भेद हमें पुनः प्लेटो के दर्शन में मिलता है। प्लेटो के अनुसार विज्ञान और वस्तु में भेद है।

विज्ञान सत् है तथा वस्तु असत् है। वस्तु इन्द्रिय जगत् का पदार्थ है, विज्ञान अतीन्द्रिय जगत् के विषय है। विज्ञान सामान्य है; वस्तु विशेष है। विज्ञान एक है, वस्तु अनेक हैं। वस्तु देश और काल से अवच्छिन्न है, विज्ञान देश और काल से अनवच्छिन्न है। विज्ञान नित्य, निराकार और निर्विकार है; वस्तु अनित्य, संविकार और साकार है। इस प्रकार प्लेटो के दर्शन में विज्ञान और वस्तु का द्वैत मौलिक है।

वस्तु और विज्ञान के समान प्लेटो इन्द्रिय और बुद्धि में भी भेद करते है। वस्तु का ज्ञान हमें इन्द्रियों से होता है, परन्तु विज्ञान तो बुद्धिगम्य है। इन्द्रियों से हमें सुन्दर वस्तुओं का ज्ञान हो सकता है, परन्तु सौन्दर्य विज्ञान तो बद्धिगम्य ही निजात तो वस्तुओं के सार हैं। किसी वर्ग के विभिन्न व्यक्तियों का सार ही उस वर्ग का विज्ञान है। उदाहरणार्थ, सौन्दर्य विज्ञान तो सुन्दर वस्तुओं का सार है। रमणी का मुख सुन्दर है, चाँदनी रात सुन्दर है, प्रकृति के दृश्य सुन्दर हैं। अतः सुन्दर वस्तुएँ अनेक हैं, इन सभी सुन्दर वस्तुओं से हम उनके सार सौन्दर्य को पृथक् कर लेते हैं तथा सौन्दर्य विज्ञान का निर्माण करते हैं।

सार को पृथक् करने के लिए तुलना की आवश्यकता है। हम विभिन्न सुन्दर वस्तुओं में तुलना करते हैं तथा सबके सामान्य और सार गुण का पता लगाते हैं। सौन्दर्य की तुलना बुद्धि का कार्य है, इन्द्रियों का नहीं। आँखों से हमें सुन्दर वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त हो सकता है, परन्तु साररूप सौन्दर्य की उपलब्धि तो हमें बद्धि से ही हो सकती है। बुद्धि ही किसी वर्ग के सान्य तथा वैषम्य के आधार पर विज्ञान का पता लगा सकती है। इस प्रकार विज्ञान बुद्धिगम्य है, इन्द्रियगम्य नहीं।

फ्रेडरिक हेगल प्लेटो के विज्ञानवाद से प्रभावित हैं। उन्होंने जिस विज्ञानवाद की स्थापना की है, उसका बीजरूप प्लेटो में अवश्य ही विद्यमान है। परन्तु प्लेटो का विज्ञानवाद पूर्ण नहीं। प्लेटो के अनुसार विज्ञान ही सत् है तथा वस्तु असत् वस्तु सांसारिक है। तथा विज्ञान पारमार्थिक है। परन्तु प्रश्न यह है कि विज्ञान और वस्तु का सम्बन्ध क्या है? प्लेटो ने वस्तु और विज्ञान के सम्बन्ध की व्याख्या के लिए दो सिद्धान्तों को अपनाया है। पहला, अंशवाद जिसके अनुसार वस्तु विज्ञान जगत् का अंश है, परन्तु इसमें दोष है। यदि वस्तु विज्ञान का अंश है तो वस्तु और विज्ञान का भेद समाप्त हो जाता है। दूसरा सिद्धान्त प्रतिबिम्बवाद है जिसके अनुसार विज्ञान बिम्ब है तथा वस्तु प्रतिबिम्ब।

इन्द्रिय जगत् विज्ञान जगत् की प्रतिलिपि या प्रतिच्छाया मात्र है। वस्तु जहाँ तक विज्ञान के अनुरूप है वहाँ तक सत् है, जहाँ तक विज्ञान के अनुरूप नहीं है, असत् है। परन्तु इस सिद्धान्त को मान लेने पर वस्तु की सत्ता ही समाप्त हो जाती है, क्योंकि यह असत् है। इस प्रकार प्लेटो वस्तु और विज्ञान के सम्बन्ध की व्याख्या के लिए अनेकों रूपक का सहारा लेते हैं। पर व्याख्या नहीं हो पाती। परन्तु हेगल के अनुसार प्लेटो के दर्शन का सबसे बड़ा गुण यह है कि प्लेटो सत् को स्वीकार करते हैं। यह सत् शुद्ध सत्ता है जो विज्ञान है। यह विज्ञान बुद्धिगम्य है। फ्रेडरिक हेगल भी केवल विज्ञान को ही मानते हैं, परन्तु उनके विज्ञान का स्वरूप दूसरा है।

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हेगल और अरस्तू- अरस्तू का दर्शन द्रव्य-विचार से प्रारम्भ होता है, परन्तु उसका द्रव्य-विचार प्लेटो के विज्ञानवाद के खण्डन से प्रारम्भ होता है। प्लेटो के अनुसार विज्ञान और वस्तु में द्वैत है। विज्ञान सत् है तथा वस्तु असत्। वस्तु की सत्ता व्यावहारिक है तथा विज्ञान की सत्ता पारमार्थिक है। परन्तु अरस्तू विज्ञान और वस्तु का भेद नहीं स्वीकार करते; अरस्तू विज्ञान को वस्तु में अनुस्यूत या अन्तर्निहित मानते हैं। अरस्तू के अनुसार प्लेटो के विज्ञानवाद की सबसे बड़ी त्रुटि यह है कि वे विज्ञान को वस्तु का सार मानकर भी विज्ञान को वस्तु से पृथक् मानते हैं। किसी वस्तु का सार उस वस्तु में ही रह सकता है उससे बाहर नहीं। अतः अरस्तू के अनुसार विज्ञान या सामान्य ही द्रव्य है, परन्तु सामान्य की सत्ता निरपेक्ष नहीं।

अरस्तू का विज्ञान या सामान्य प्लेटो के समान काल्पनिक नहीं, वरन वास्तविक है। सामान्य विशेषों से पृथक नहीं। सामान्य विशेषों में अनस्यत या अनगत धर्म है। विज्ञान वस्तु का सार है; परन्तु वस्तु का सार उस वस्तु में ही रहेगा। अतः अरस्तू के अनुसार द्रव्य स्वतन्त्र तत्त्व है। जिसका अस्तित्व किसी दूसरे पर आश्रित नहीं। सामान्य ही द्रव्य है जो विभिन्न वस्तुओं में अनुगत है। इसी द्रव्य को अरस्तू वास्तविक सामान्य (Concrete universal) कहते हैं। उदाहरणार्थ, अश्व ही द्रव्य है। जो अश्वत्व सामान्य से युक्त है। संसार का प्रत्येक पदार्थ है; क्योंकि सामान्य युक्त विशेष है। हेगल अरस्तू के वास्तविक सामान्य से प्रभावित हैं; परन्तु हेगल का द्रव्य दूसरा है।

अरस्तू के द्रव्य और स्वरूप के सम्बन्ध से फ्रेडरिक हेगल बड़े प्रभावित हैं। अरस्तू के अनुसार द्रव्य और स्वरूप दोनों अपृथक् हैं, अर्थात् दोनों मिले हुए हैं। विचार की दृष्टि से हम इनमें भेद कर सकते हैं, परन्तु वास्तविक दृष्टि से इनमें भेद सम्भव नहीं; क्योंकि संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसमें एक हो और दूसरा न हो। अतः अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। द्रव्य स्वरूप पर आश्रित है तथा स्वरूप द्रव्य पर।

विचार या चिन्तन की दृष्टि से हम इनमें भेद कर सकते हैं। उदाहरणार्थ, वृत्त, वर्ग, जाद सभी स्वरूप हैं। हम वृत्ताकार वस्तु से भिन्न वृत्त के बारे में विचार कर परन्तु व्यावहारिक जगत् में अमूर्त वृत्त नहीं मिलता। हम सर्वदा वृत्ताकार या वर्गाकार वस्तु ही प्राप्त करते हैं। इसी कारण अरस्तु द्रव्य और स्वरूप को सापेक्ष कहते है। एक ही वस्तु एक दृष्टि से द्रव्य और दूसरी दृष्टि से स्वरूप है| स्वरूप सामान्य है तथा द्रव्य विशेष। परन्तु बिना विशेष का सामान्य नहीं तथा बिना सामान्य को अरस्तू किसी वाक्य का विधेय कहते हैं। उदाहरणार्थ, सोना पीला है। इसमें पीला होना विध्य है। परन्तु पीला सोने के बिना नहीं। इसी प्रकार कोई भी गुण बिना गुणी का नहीं। ये गुण ही सामान्य है जो गुणी के बिना नहीं रह सकते। किसी भी गुणी से गुण को पृथक् कर दिया जाय तो उसकी सत्ता नहीं रह सकती। फ्रेडरिक हेगल इस विचार से प्रभावित हैं।

अरस्तू के सम्भावना (Potentiality) और वास्तविकता (Actuality) के सिद्धान्त से भी हेगल प्रभावित हैं। हेगल के दर्शन में यह अन्तर्निहित (Implicit) तथा बाह्य (Explicit) कहलाता है| अरस्तू के दर्शन में द्रव्य केवल शक्ति (Potentiality) है तथा स्वरूप ही वस्तु (Actuality) है। द्रव्य सभी वस्तुओं का मूल कारण होने से अधिष्ठान है परन्तु अधिष्ठान रूप में यह निर्गुण और निराकार है। इसे हम किसी वस्तु की संज्ञा नहीं प्रदान कर सकते वरन् सभी वस्तुओं की शक्ति या सम्भावना मान सकते हैं। मूल रूप में सभी द्रव्य तो एक ही हैं। भेद तो गुणों के कारण होता है। पीतल एक द्रव्य है यह अनेकों रूप धारण कर सकता है। अतः पीतल शक्ति है। इसमें सभी आकृतियों की सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। किसी आकार के कारण ही यह वास्तविक वस्तु बन जाता है। एक ही लकड़ी के विभिन्न स्वरूप है। जैस मेज, कुर्सी आदि लकड़ी का कोई रूप नहीं, कोई गुण नहीं; परन्तु सभी रूपों तथा गुणों की सम्भावना इसमें है। अरस्तू के अनुसार यही सम्भावना तथा वास्तविकता का विरोध है। हेगल भी इस विरोध को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि प्रत्येक वस्तु सम्भावना से वास्तविकता की ओर अग्रसर होती है।

हेगल और आधुनिक विचारक- हेगल के दर्शन पर आधुनिक विचारकों का भी गहरा प्रभाव है। मुख्य रूप से स्पिनोजा तथा काण्ट के दर्शन से हेगल बड़े प्रभावित लगते हैं। उदाहरणार्थ स्पिनोजा का विशेषण तो किसी वस्तु को सीमित करता है (All determination is negation)| हम सार्वभौम तत्व के लिये किसी विशेषण का प्रयोग नहीं कर सकते। निर्वचन करना तो असीम को सीमित करना है, निर्गुण और निराकार को सगुण और साकार बनाना है। हेगल अपने दर्शन में इसी सिद्धान्त को अभाव से भाव सिद्धान्त (Negation is the essence of positive being) में अपनाते हैं। सम्पूर्ण संसार की सृष्टि अभाव से होती है। अतः स्पिनोजा के अनुसार निर्वचन तो निषेध (To posit is to negate) है। परन्तु हेगल के अनुसार निषेध करना ही निर्वचन करना (To negate is to posit) है।

स्पिनोजा के अनुसार असीम को सीमित करना निषेध करना है। हेगल के अनुसार निषेध से ही असीम सीमित हो सकता है। अतः अभाव भाव का जनक है। परन्तु हेगल स्पिनोजा के निरपेक्ष तत्व से अवश्य प्रभावित है। स्पिनोजा का निरपेक्ष तत्व परम द्रव्य है जो असीम, अनन्त, निर्गुण और निराकार है। हेगल का परम तत्व निरपेक्ष विज्ञान है। परन्तु यह विज्ञान अमूर्त (Abstract) नहीं, वरन् मूर्त (Concrete) है। मूर्त कहने का तात्पर्य यह है कि परम तत्व काल्पनिक नहीं, वास्तविक है।

हेगल काण्ट और शेलिंग के दर्शन से भी अत्यन्त प्रभावित है। फ्रेडरिक हेगल काण्ट के समान दर्शन का स्वरूप आलोचनात्मक मानते हैं। परन्तु काण्ट के द्वैतवाद को हेगल नहीं स्वीकार करते। द्वैतवाद दार्शनिक जिज्ञासा को शान्त नहीं कर सकता। काण्ट व्यवहार और परमार्थ में भेद मानते हैं। हेगल इसे नहीं स्वीकार करते। काण्ट के अनुसार हमारा ज्ञान तो संवेदना और विकल्प तक सीमित है। परम तत्व की संवेदना हमें नहीं होती, अतः तत्व अज्ञेय है। हेगल अज्ञेयवाद का खण्डन करते हैं। हेगल के अनुसार विज्ञान बौद्धिक है, अतः बुद्धिगम्य है। जो भी सत्ता है वह बौद्धिक है। बुद्धि के परे कुछ अज्ञेय नहीं कहा जा सकता। अज्ञेय का अर्थ ज्ञान का विषय न होना है। जो ज्ञान का विषय नहीं, वह अज्ञेय कैसे?

 

 

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