राजपूताना इतिहास क्या था और राजवाडे कौन थे।

राजपूताना इतिहास क्या था और राजवाडे कौन थे।

राजपूत कौन थे? उनकी उत्पत्ति के सिद्धान्तों का विवरण दीजिए।

हर्ष की मृत्यु के पश्चात् भारत की राजनैतिक एकता नष्ट हो गयी। भारत में अनेक छोटे-छोटे राज्यों का आविर्भाव हुआ, जिससे नवीन राजवंशों की स्थापना हुयी। ये राजवंश एक नई जाति से सम्बन्धित थे, जो सामूहिक रूप से राजपूत राजवंशों के नाम से भारतीय इतिहास में विख्यात हैं। हर्ष की मृत्यु के बाद से 12 वीं शताब्दी तक का समय ‘राजपूत युग’ के नाम से पुकारा जाता है।

राजपूत संसार की ऐसी अद्वितीय जाति का नाम है, जो अपनी मान-मर्यादा की रक्षा के लिए हँसते-हँसते अपना आत्मोत्सर्ग करने के लिए सदैव तत्पर रहती थी।

राजपूतों की उत्पत्ति

राजपूतों की उत्पत्ति के संबंध में इतिहासकार एकमत नही हैं। भारतीय विद्वान इन्हें प्राचीन क्षत्रियों का वंशज मानते हैं जबकि पाश्चात्य इतिहासकार विदेशी आक्रमणकारियों की सन्तान मानते हैं। राजपूत शब्द राजपुत्र का रूपान्तर है। क्षत्रिय वर्ग के ही हाथ में भारत की शासन व्यवस्था की बागडोर थी। अतः राजपुत्र से व्यवहार में राजपूत हो गया। राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्रचलित सिद्धान्त निम्नवत् –

(1) अग्निकुण्ड का सिद्धान्त-

पृथ्वीराज रासो के अनुसार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुण्ड से हुयी थी। परशुराम के द्वारा पृथ्वी के समस्त क्षत्रियों को विनाश कर दिये जाने पर सभी देवता आबू पर्वत पर एकत्रित हुए। वहाँ अग्निकुण्ड में चार दिव्य पुरुष उत्पन्न हुए जो परमार, प्रतिहार, सोलंकी और चौहान थे। राजपूत इन्ही चार पुरुषों की सन्तानें हैं। डॉ० ईश्वरी प्रसाद और श्री सी० वी० वैद्य ने इस मत का खण्डन किया है।

(2) विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त-

कर्नल टॉड आदि इतिहासकारों के अनुसार राजपूत भारत पर आक्रमण करने वाली उन विदेशी जातियों की संतानें हैं, जो समयसमय पर आक्रमणकारियों के रूप में भारत आयीं और स्थायी रूप से भारत में ही बस गयीं।

(3) मिश्रित उत्पत्ति का सिद्धान्त-

कुछ विद्वानों के अनुसार-राजपूत जाति की उत्पत्ति आर्यों एवं विदेशी तत्वों के सम्मिश्रण के परिणामस्वरूप हुयी। इतिहासकार स्मिथ राजपतों को शक, कुषाण तथा हूण आदि विदेशी जातियों का वंशज मानते हैं। भारत में आने वाले विदेशी आक्रमणकारियों ने यहाँ बस जाने पर भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर उसे अपना लिया। भारतीयों तथा इनके मध्य वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित होने के परिणामस्वरूप रक्त के सम्मिश्रण से राजपूत जाति की उत्पत्ति हुयी।

उपर्युक्त रक्त-सम्मिश्रण का यह सिद्धान्त पूर्णतः उपेक्षित नही किया जा सकता किन्त राजपूत जाति में परम्परागत आत्माभिमान, स्वतन्त्रता, प्रेम, भारतीय संस्कृति के प्रति गौरव की भावना के गुण इस विचार को पुष्ट करते हैं कि राजपूत प्राचीन क्षत्रियों की संतान हैं।

राजपूत कालीन सामाजिक स्थिति-

राजपूत काल में वर्णाश्रम व्यवस्था में शिथिलता आ गयी थी। समाज में संकीर्णता तथा रूढ़िवादिता का समावेश हो गया था। अब वर्ण कार्य पर आधारित न होकर जाति पर आधारित हो गया था। जातियों में अनेक उपजातियाँ बन गयी थी। ब्राह्मण स्वयं को समाज का नेता तथा धर्म और संस्कृति का एकाधिकारी समझता था। क्षत्रिय युद्ध को अपना कार्य समझते थे तथा बात-बात पर पड़ोसी राजा से युद्ध ठान लेने में अपनी शान समझते थे।

समाज में छुआछूत व्याप्त हो गया था। उच्च वर्ग निम्न वर्ग की छाया से बचना चाहते थे । कृषक तथा उत्पादक वर्ग निम्न स्तर पर थे। श्रमिकों की दशा दयनीय थी।

समाज में स्त्रियों की सम्मानित स्थिति थी। पर्दे की प्रथा का प्रचलन न था। स्त्रियों ने कला तथा विज्ञान के क्षेत्र में दक्षता प्राप्त कर ली थी। राजवंश की स्त्रियाँ राजनीति में सक्रिय भाग लेती थीं। इसी समय सती-प्रथा, जौहर-प्रथा तथा देवदासी प्रथाएँ प्रचलित थीं। बाल-विवाह, बहुविवाह, अन्तर्जातीय विवाह तथा अनुलोम विवाह का प्रचलन था।

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राजपूतकालीन समाज की धार्मिक स्थिति-

राजपूत काल में हिन्दू धर्म चरमोत्कर्ष स्थिति में था। जैन तथा बौद्ध दोनों धर्मों का पतन प्रारम्भ हो गया था। इस समय वैष्णव सम्प्रदाय का खूब प्रचार था। इस समय दुर्गा, काली, शक्ति के प्रतीक के रूप में पूजित थी। शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट, रामानुज आदि विद्वानों ने इस समय हिन्दू धर्म का खूब प्रचार किया।

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तत्कालीन हिन्दू धर्म, ब्राह्मण एवं बौद्ध धर्म का मिश्रित रूप था। अवतारवाद, मूर्तिपूजा, मन्दिरों में श्रद्धा इसके प्रमुख अंग थे। हिन्दू धर्म में कर्मकाण्ड, आडम्बर, भ्रष्टाचार, तन्त्रवाद का बोलबाला हो रहा था। मठ व्यभिचार के अड्डे बन रहे थे। हिन्दू सम्प्रदाय के अनेक वर्गों में बँट जाने से समाज का एकीकरण नष्ट होता जा रहा था।

उत्तर भारत के प्रमुख राजवंशों का वर्णन निम्नवत् है-

(1) कन्नौज के प्रतिहार एवं गहड़वाल वंश-

छठी शताब्दी में कन्नौज पर प्रतिहार वंश का आधिपत्य स्थापित हो गया था। नागभट्ट द्वितीय ने 861 ई० में इस नगर को हर्ष के उत्तराधिकारियों से छीनकर अपनी राजधानी बनाया। 1170 ई० में जयचन्द कन्नौज का राजा बना । दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान द्वारा उसकी पुत्री संयोगिता का बलपूर्वक हरण कर लिये जाने के कारण वह पृथ्वीराज से शत्रुता रखता था। 1194 ई० में गोरी ने उसे हराकर कन्नौज को तुर्क साम्राज्य में मिला लिया।

(2) दिल्ली और अजमेर का चौहान वंश-

इस समय अजमेर का प्रथम प्रतापी शासक अजयराज द्वितीय था। उसने अजमेर को जीतकर उसे अपनी राजधानी बनाया। एक अन्य प्रभावशाली शासक विग्रहराज द्वितीय ने दिल्ली के तोमर वंशीय शासक को परास्त किया। पृथ्वीराज चौहान इस वंश का अन्तिम प्रतापी राजा था। इसका सबसे भयंकर युद्ध 1191 ई० में तराइन के मैदान में मुहम्मद गोरी से हुआ। इस युद्ध में गोरी परास्त हुआ परन्तु 1192 ई० में मुहम्मद गोरी ने पुनः पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण कर उसे परास्त कर दिल्ली से चौहान वंश का सफाया कर दिया।

(3) बुंदेलखण्ड का चन्देल वंश-

चन्देल प्रतिहारों के अधीन थे किन्तु धीरे-धीरे उन्होंने अपनी स्वतन्त्र सत्ता स्थापित कर ली। महोबा उनकी राजधानी थी। इस वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक यशोवर्मन था। इस वंश का अन्य प्रतापी शासक धंग और गण्ड थे। परमाल इस वंश का अन्तिम शासक था। चन्देल नरेशों ने खजुराहो के प्रसिद्ध मन्दिरों का निर्माण कराया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1203 ई० में इस राज्य को जीत लिया था।

(4) मालवा का परमार वंश-

गुजरात के परमार वंशी शासकों ने मालवा पर अपनी स्वतन्त्र सत्ता स्थापित कर ली थी। इस वंश का प्रथम शासक श्री हर्ष था, इसके बाद ‘वाक्पतिमुंज’ राजा बना। इस वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा भोज था। वह कुशल सेनानी, राजनीतिज्ञ, कला तथा साहित्य का प्रेमी था। महान व्यक्तित्व के कारण उसका यश दूर-दूर तक फैल गया था। उसने दक्षिण में भोजपुर नामक नगर बसाया । इल्तुतमिश ने मालवा पर आक्रमण कर इस वंश का शासन समाप्त कर दिया ।

राजपूतों की पराजय के कारणों की समीक्षा कीजिए।

राजपूत जाति अपनी वीरता, साहस, शौर्य एवं पराक्रम के लिए इतिहास में प्रसिद्ध है। ऐसी साहसी जाति अपनी ही धरती पर विदेशी आक्रान्ताओं से बार-बार पराजित हुयी। उनकी पराजय के निम्नलिखित कारण थे-

(1) शक्तिशाली केन्द्रीय सत्ता का अभाव-

राजपूत युग में सम्पूर्ण देश छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था। ये परस्पर संघर्षरत थे। उनमें रम्जनैतिक एकता का अभाव था। प्रत्येक राज्य अपनी प्रभुसत्ता पृथक रूप से बनाये रखना चाहते थे। अतः सशक्त केन्द्रीय सत्ता का अभाव इसके पतन का प्रमुख कारण था।

(2) राजपूतों में कूटनीति का अभाव-

राजपूत धर्म-युद्ध में आस्था रखते थे तथा कूटनीति का प्रयोग धर्म-विरुद्ध समझते थे। इसके विपरीत तुर्क कूटनीति एवं विश्वासघात से काम लेना जानते थे। अतः कूटनीति के अभाव में राजपूत तुर्कों से पराजित हुए।

(3) उत्तरी-पश्चिमी प्राकृतिक सीमा की उपेक्षा-

राजपूतों ने भारत की उत्तरीपश्चिमी सीमा की सुरक्षा की ओर ध्यान नहीं दिया तथा उसे बाह्य आक्रमणकारियों के लिए खुला छोड़ दिया। जयचन्द ने स्वयं गोरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया। तुर्क भारत की उत्तरी-पश्चिमी सीमा से भारत में प्रविष्ट हो राजपूतों को पराजित कर डालते थे।

(4) प्राचीन युद्ध-प्रणाली-राजपूत अत्यन्त प्राचीन युद्ध-

प्रणाली एवं शस्त्रों का प्रयोग करते थे जबकि तुर्क नई युद्ध-प्रणाली का प्रयोग करते थे। इसी कारण राजपूत तुर्कों से सदैव पराजित होते रहे।

(5) दोषपूर्ण सामाजिक व्यवस्था-

तत्कालीन समाज अनेक जातियों एवं उपजातियों में विभक्त था। युद्ध में केवल राजपूत जाति ही भाग लेती थी। राजपूतों की संख्या कम होने के कारण वे सदैव पराजित होते रहे।

(6) धार्मिक दुर्बलता-

भारतीय शासक धर्मनिष्ठ होने के कारण विभिन्न देवीदेवताओं में आस्था रखते थे। इस प्रकार वे भाग्यवादी हो गये तथा उनमें आत्मविश्वास का अभाव हो गया जिससे वे पराजित हुए।

(7) सामन्तीय प्रथा-

राजपूतों में सामन्तीय प्रथा थी। राज्य जागीरों में बँटा था। राज्य की रक्षा इन सामन्तों के साहस और स्वामिभक्ति पर निर्भर रहती थी। सामंत के राजा से असंतुष्ट हो जाने पर उसकी सेना राजा का साथ नहीं देती थी और राजा पराजित हो जाता था।

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(8) रक्षात्मक युद्ध-

राजपूत रक्षात्मक युद्ध करते थे। तुर्क सदैव आक्रमणात्मक युद्ध करते थे, अपनी सुविधानुसार रणस्थल भी चुनते थे जिससे राजपूतों को रक्षात्मक युद्ध लड़ने पड़ते थे और उनकी हार हो जाती थी।

(9) सैनिक कारण-

तुर्क सैनिकों को भारतीय लूट का 4/5 भाग दिया जाता था अतः वे धन के आकर्षण से जी-जान से लड़कर युद्ध जीतने का प्रयास करते थे।

(10) आकस्मिक कारण-

तुर्कों की विजय को सौभाग्यपूर्ण संयोग और आकस्मिक घटनाओं से भी सफलता मिली। जयचन्द की आँख में तीर लगना, आनन्दपाल के पुत्र के हाथी का बिगड़ जाना ऐसी आकस्मिक घटनाएँ थीं, जिससे युद्ध का परिणाम राजपूतों के विरुद्ध हो गया।

राजपूत शासक बड़े साहित्य प्रेमी तथा कला के संरक्षक थे।-

(1) साहित्य-राजपूत शासक कवियों तथा विद्वानों को खुले हाथों से दान-दक्षिणा तथा पुरस्कार दिया करते थे। बहुत से राजपूत शासक स्वयं उच्च कोटि के विद्वान् तथा कवि थे। इनमें भोजराज, मुंज, वाक्पति, सिद्धराज बहुत प्रसिद्ध हैं। कन्नौज के महेन्द्र पाल ने राजशेखर नामक कवि को आश्रय प्रदान किया था जिसने ‘कर्पूरमंजरी नामक ग्रन्थ की रचना की थी। बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन का आश्रय जयदेव नामक कवि को प्राप्त था। जयदेव ने ‘गीत गोविन्द’ नामक ग्रंथ की रचना की। कश्मीर में कल्हण ने ‘राजतरंगिण’ और सोमदेव ने ‘कथा सरित्सागर’ नामक ग्रन्थों की रचना की। चन्दबरदाई के आश्रयदाता पृथ्वीराज चौहान थे। चन्दबरदाई ने ‘पृथ्वीराज रासो’ नामक काव्य की रचना की। वस्तुतः राजपूत शासक साहित्य के संरक्षक थे।

(2) कला-राजपूत शासक कला-प्रेमी भी थे। उन्होंने कला को भी संरक्षण प्रदान किया। राजपूत शासकों ने अपने राज्य की रक्षा के लिये अनेक मजबूत दुर्गों का निर्माण करवाया। इन दुर्गों में रणथम्भौर, चित्तौड़, ग्वालियर, कालिंजर आदि के दुर्ग बहुत सुदृढ़ हैं। राजपूत शासकों ने अपने निवास के लिये राजप्रासादों का निर्माण करवाया। इनमें ग्वालियर के महाराज मानसिंह का राजमहल, उदयपुर के राजा का महल तथा जयपुर के राजा का हवामहल बहुत प्रसिद्ध है। इस काल में अनेक प्रसिद्ध मन्दिरों का भी निर्माण हुआ जिनमें कोणार्क का सूर्य मन्दिर, पुरी का जगन्नाथ मन्दिर, आबू का जैन मन्दिर, खजुराहो के महादेव मन्दिर उल्लेखनीय हैं। राजपूतों को संगीत से भी प्रेम था। अतः उन्होंने संगीतज्ञों को भी अपने दरबार में आश्रय दिया।

सिन्ध पर अरब-आक्रमण और उसके प्रभावों का वर्णन कीजिए।

सिन्ध पर अरबों के आक्रमण के समय भारत सांस्कृतिक तथा आर्थिक दृष्टि से अत्यंत संपन्न था। राजनीतिक दृष्टि से यहाँ के शासक विद्वेषवश परस्पर संघर्षरत थे। अरबवासियों ने व्यापार के माध्यम से भारतीयों से निकटतम सम्बन्ध स्थापित किया। इस्लाम धर्म का उन्माद उन्हें भारत की ओर खींच रहा था। खलीफाओं की साम्राज्यवादी नीति ने भी उन्हें भारत पर आक्रमण के लिए प्रेरित किया। लंका से आ रहे अरब जहाजों को देवल के समुद्रतट पर कुछ भारतीय डाकुओं ने लूट लिया। खलीफा ने सिन्ध के राजा दाहिर से लूट की क्षतिपूर्ति की माँग की। दाहिर द्वारा इसका समुचित उत्तर न मिलने पर ईराक के गवर्नर अल-हज्जाज ने खलीफा की अनमति से 711 ई० में भारत पर आक्रमण किया परन्तु सफल न हो सका। अरबों ने पुनः 712 ई० में महम्मद विनकासिम को एक विशाल सेना के साथ सिन्ध पर आक्रमण के लिए भेजा। राजा दाहिर इस युद्ध में देवल स्थान पर पराजित हुआ तथा देवल पर अरबों का अधिकार हो गया। 712 ई० में पुनः रावर नामक स्थान पर दाहिर की कासिम से मुठभेड़ हुयी तथा दाहिर मारा गया। मुहम्मद बिन कासिम का समूचे सिन्ध पर अधिकार स्थापित हो गया।

   अरबों द्वारा सिन्ध पर आक्रमण करने के फलस्वरूप उसके व्यापक तथा दूरगामी प्रभाव नहीं पड़े। लेनपूल के शब्दों में- ‘यद्यपि आदिवासियों ने सिंध पर विजय प्राप्त कर ली पर भारत व इस्लाम के इतिहास में यह एक घरमा माथी राजनीतिक दृष्टि से अरबों की सिंध-विजय महत्वहीन रही। अरबों के आक्रमण का भारत की राजनीति, धर्म, दर्शन तथा साहित्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा किन्त भारतीय संस्कृति, ज्ञान तथा विज्ञान का प्रभाव अरबों पर पड़ा। भारतीयों की अंक तथा दशमलब प्रणाली का ज्ञान अरबों ने प्राप्त किया। भारतीय ग्रंथों का अनुवाद अरबी भाषा में होने के कारण भारतीय ज्ञान का अमूल्य भंडार अरब के माध्यम से यूरोप तक पहुँच गया। अरबों ने भारतीयों से चिकित्सा शास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया। अरबों के आक्रमण के फलस्वरूप भारत में इस्लाम धर्म का प्रवेश हुआ तथा सिंध मुस्लिम बहुल प्रदेश बन गया।

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