सन्त ऑगस्टाइन के दार्शनिक विचार

सन्त ऑगस्टाइन-सन्त ऑगस्टाइन के दार्शनिक विचार | St. Augustine in Hindi

सन्त ऑगस्टाइन (Saint Augustin)[ ३५४ ई. से ४३० ई.]

सन्त ऑगस्टाइन मध्य युग के सबसे बड़े धार्मिक दार्शनिक माने जाते हैं। ये  इसाई धर्म तथा दर्शन के मूल स्रोत समझे जाते हैं। इनका जन्म उत्तरी अफ्रीका के टेगास्ट (Tagaste) नामक नगर में १३ नवम्बर, ३५४ ई. में हुआ था। इनकी माता का नाम सन्त मोनिका (St. Monica) था जो इसाई थीं तथा पिता का नाम पेट्रोसियस (Patrocius) था जो पैगन (Pagan) थे। इनकी माँ का इन पर अमिट प्रभाव पड़ा। प्रारम्भ में ये सन्देहवादी थे, परन्तु मिलान के बिशप सन्त ऐम्ब्रोस के साहचर्य से इनके विचारों में परिवर्तन हुआ तथा ये इसाई बन गये। अपने पुराने विलासमय जीवन का त्याग कर हिप्पो के पादरी (Bishop of Hippo) बने और मृत्यु पर्यन्त इस पद पर रहे। इनकी कई रचनाएँ हैं जिनमें कन्फेशन (Confession) और सिटी ऑफ गॉड (City of God) सबसे प्रसिद्ध हैं।

सन्त ऑगस्टाइन मध्य युग के सबसे महत्त्वपूर्ण इसाई विचारक माने जाते हैं। उनके दर्शन के तीन प्रमुख उद्देश्य हैं:-

१. यह स्पष्ट करना कि रोमन साम्राज्य का पतन इसाई धर्म को अपनाने के कारण नहीं हुआ था।

२. इसाई धर्म-संघों को शक्तिशाली बनाना तथा उसका राज्य स्थापित करना।

३. इसाई धर्म के विरुद्ध लगाये गये आरोपों का खण्डन करना।

उनकी सबसे प्रमुख कृति ‘ईश्वरीय नगर (City of God) है। यह ग्रन्थ २२ खण्डों में विभाजित है। प्रथम १० खण्डों में इसाई धर्म के विरुद्ध पैगनों की आलोचना से रक्षा की गई है तथा अन्य १२ खण्डों में ईश्वरीय नगर का स्वरूप बतलाया गया है।

ईश्वरीय नगर में ऑगस्टाइन ने दो नगरों के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। वे नगर हैं, सासांरिक एवं आध्यात्मिक या दिव्य नगर मनुष्य आत्मा और शरीर दोनों का संयोग है। शरीर के कारण वह सांसारिक नगर में निवास करता है तथा अपने लौकिक हितों की रक्षा करता है। परन्तु आत्मा से वह अपने पारलौकिक हितों की रक्षा करता है। इस प्रकार ऑगस्टाइन के अनुसार मनुष्य प्रवृत्ति के कारण ही ईश्वरीय तथा सांसारिक दोनों नगरों का नागरिक है। सांसारिक नगर का सम्बन्ध शरीर से है और इस नगर में शैतान का शासन है। ईश्वरीय नगर का सम्बन्ध आत्मा से है और इसमें क्राइस्ट का शासन है।

सन्त ऑगस्टाइन के अनुसार इन दोनों नगरों में भेद का ज्ञान मानव के लिए आवश्यक है। मनुष्य में काम, क्रोध, मान, मोह आदि कुत्सित प्रवृत्तियाँ हैं। इन प्रवृत्तियों के कारण वह सांसारिक नगर का नागरिक बन जाता है। इस नगर में उसे शान्ति नहीं मिलती, वह स्वर्गीय शान्ति के लिए ईश्वरीय नगर का नागरिक बनना चाहता है। इस नगर में ही उसे सांसारिक बन्धन से मुक्ति प्राप्त हो सकती है। इश्वरीय नगर के सभी नागरिक देवता है। यह नगर शाश्वत है तथा कभी नष्ट नहीं होता। चर्च धरती पर ईश्वरीय नगर का प्रतिनिधित्व करता है। चर्च की आज्ञा ईश्वर की आज्ञा है।

 

ऑगस्टाइन के दार्शनिक सिद्धान्त 

सन्त ऑगस्टाइन धार्मिक दार्शनिक है। उन्होंने धर्म और दर्शन दोनों पर पर्याप्त विचार किया है। परन्तु यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि उनका दर्शन धर्म से ओत-प्रोत है। वे मूलतः धार्मिक ही हैं, अतः सभी धार्मिक सिद्धान्तों की दार्शनिक व्याख्या ही उनका प्रतिपाद्य विषय है। मूलतः सन्त होने के कारण उनके सभी दार्शनिक विचार ईश्वर केन्द्रित है। धर्म ही दर्शन का मूल है, अतः धर्म से पृथक् किसी दार्शनिक सिद्धान्त की व्याख्या तो अपूर्ण है।

 

ज्ञान सिद्धान्त(Theory of knowledge)

सन्त ऑगस्टाइन के अनुसार यथार्थ ज्ञान ईश्वर विषयक है। ज्ञान का कार्य केवल परमात्मा के स्वरूप पर प्रकाश डालना है। अतः परमात्मा का ज्ञान ही सर्वोत्तम ज्ञान है, अन्य सभी सांसारिक या व्यवहारिक ज्ञान है। ईश्वर से अलग किसी ज्ञान का स्वतः अस्तित्व नहीं है। संसार में नीतिशास्त्र, तत्त्वशास्त्र, विज्ञान आदि अनेक प्रकार के ज्ञान हैं। ये सभी ज्ञान बौद्धिक हैं, परन्तु बौद्धिक ज्ञान केवल ईश्वर विषयक होकर ही सार्थक होते हैं।

बौद्धिक ज्ञान यथार्थ है, प्रमाण हैं, परन्तु अपने आप में अन्त नहीं। यह तो केवल ईश्वर ज्ञान का साधन है। ईश्वर का ज्ञान बुद्धि से सम्भव नहीं। ईश्वर अनुभवगम्य है, वह आस्था का विषय है। परन्तु आस्था को सुदृढ़ करने के लिये बुद्धि की आवश्यकता है, विश्वास को प्रबल करने के लिए तर्क आवश्यक है। इस प्रकार विश्वास और बुद्धि एक दूसरे के पूरक है। विश्वास करो जिससे समझ सको, समझो जिससे विश्वास कर सको। कुछ विषयों को विश्वास के बिना समझ नहीं सकते तथा कुछ को समझे बिना उनमें विश्वास नहीं उत्पन्न होता। विश्वास आत्मा का विषय है तथा समझना बुद्धि का धर्म है। बुद्धि का मुख्य कार्य है आस्था। को तर्क से सुदृढ करना। इस प्रकार सभी बौद्धिक ज्ञान ईश्वरीय ज्ञान के साधन है।

सन्त ऑगस्टाइन के अनुसार ज्ञान निम्नलिखित तीन प्रकार का है:-

१. ऐन्द्रिक ज्ञान (Sense-knowledge) : ऐन्द्रिक ज्ञान निम्न स्तर का ज्ञान है। ऐन्द्रिक ज्ञान संवेदनात्मक होता है, संवेदनाएँ अर्थ (वस्तु) जन्य होती है। हमारी इन्द्रियों का जब अर्थ या वस्तु से सम्पर्क होता है तो संवेदनाएँ उत्पन्न होती है। इसी कारण ऑगस्टाइन इसे संवेदना-सापेक्ष (Dependent on sensation) कहते। हैं। इसे ऑगस्टाइन निम्नस्तरीय ज्ञान मानते हैं, क्योंकि यह ज्ञान मनुष्य या पशु को समानतः प्राप्त होता है। पशु को भी मनुष्य के समान ही संवेदनाएँ होती है। यह ज्ञान इन्द्रिय तथा विषय के सम्पर्क का परिणाम है। यह वस्तु जगत् का ज्ञान भी कहलाता है।

 

२. बौद्धिक ज्ञान (Rational knowledge) : वृद्धि या विवेक मानव की विशेषता है। अतः यह ज्ञान पश जगत से भिन्न है, क्योंकि पशु को मनुष्य के समान संवेदनाएं तो प्राप्त होती है, परन्तु उसके पास विवेक नहीं। यह ऐन्द्रिक ज्ञान तथा अन्तज्ञान के बीच की अवस्था है। यह शुद्ध बुद्धि का व्यापार है, सविकल्पक ज्ञान है। हमें जो भी बाह्य जगत् से संवेदनाएँ प्राप्त होती है, बुद्धि उन्हें सार्थक बनाती है, संवेदनाओं को स्वरूप प्रदान कर बोधगम्य बनाती है। ऑगस्टाइन इसे भी निम्न ज्ञान मानते हैं, क्योंकि इसका सम्बन्ध वस्तु जगत् की संवेदनाओं से है। संवेदना ही इसके उपकरण हैं, जिसकी अभाव में बुद्धि कार्य नहीं कर सकती। परन्तु बुद्धि को कार्य करने की शक्ति आत्मा से प्राप्त होती है। इसीलिए ऑगस्टाइन इसे इन्द्रिय और आत्मा के बीच बौद्धिक या मानसिक ज्ञान मानते हैं।

बौद्धिक ज्ञान के सहारे ही हम इन्द्रियों द्वारा प्राप्त संवेदनाओं पर निर्णय देते हैं। ऑगस्टाइन ऐन्द्रिक तथा बौद्धिक ज्ञान में भेद यों करते हैं- इन्द्रियों से हमें भौतिक वस्तु का ज्ञान प्राप्त होता है, परन्तु बुद्धि से अभौतिक वस्तु का उदाहरणार्थ, सुन्दर वस्तु का ज्ञान ऐन्द्रिक है, परन्तु सौन्दर्य का ज्ञान बौद्धिक ज्ञान है। सुन्दर वस्तु अनित्य तथा परिणामी है, परन्तु सौन्दर्य नित्य तथा अपरिणामी है। अत: बौद्धिक ज्ञान नित्य, अपरिणामी सत्यों (Eternal and immutable truths) का ज्ञान है।

३. आन्तर ज्ञानः यह उच्चतम जान है। ऑगस्टाइन इसे प्रज्ञा (Wisdom) कहते है। यह बद्धि का सर्वोत्तम स्वरूप है। बुद्धि निर्णय करती है; परन्तु निर्णय करने की शक्ति प्रज्ञा से आती है। ऑगस्टाइन बुद्धि तथा प्रज्ञा में भेद करते हैं। बौद्धिक ज्ञान सविषयक होता है, प्रज्ञा निर्विषयक है। संवेदना बौद्धिक ज्ञान का उपकरण है, परन्तु प्रज्ञा तो स्वतः प्रसूत ज्ञान है। इसी कारण ऑगस्टाइन बुद्धि को व्यावहारिक (Practical) मानते हैं, क्योंकि व्यवहार-जगत् या वस्तु जगत् का ज्ञान बुद्धि के बिना सम्भव नहीं। परन्तु प्रज्ञा तो बुद्धि का पर्यवसान हा प्रज्ञा ध्यान-परक ज्ञान (Contem- plative) है। यह सत्य के शाश्वत स्वरूप का ध्यान है।

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प्रज्ञा बुद्धि का ज्ञान नहीं, वरन आत्मा का ज्ञान है। नित्य सत्यों का ज्ञान हमें बुद्धि से नहीं, वरन् आत्मा से ही प्राप्त होता है। आत्मा प्रकाश-पज है। बुद्धि में विषयों को प्रकाशित करने की शक्ति आत्मा के कारण ही आती है। यह प्रकाश देवी अतीन्द्रिय है। वस्तुत: इन्द्रिय जगत के ज्ञान का मूल भी अतीन्द्रिय प्रकाश ही है| बुद्धि इस दैवी प्रकाश के कारण ही सांसारिक विषयों को प्रकाशित करती है। अतः इन्द्रिय से अतीन्द्रिय की ओर जाने के लिए बुद्धि ही साधन है। परन्तु इसका साध्य प्रज्ञा है। यह उच्चतम दैवी प्रकाश है जिससे शाश्वत सत्यों का ज्ञान तथा ईश्वरानुभूति होती है। यह आत्मा में परमात्मा का अंश है। इसी अंश के कारण ही मानव बुद्धि परमपिता परमेश्वर को पहचानती है।

इस प्रकार ऑगस्टाइन विवेक या बौद्धिक ज्ञान और प्रज्ञा में भेद करते है तथा दूसरी ओर विवेक को प्रज्ञा का साधन बतलाते है। वस्तुतः इन्द्रिय तथा आत्मा के बीच बुद्धि का स्थान है। बुद्धि निश्चयात्मिका शक्ति है, परन्तु यह शक्ति आत्मा की देन है, क्योंकि आत्मा परमात्मा का अंश होने के कारण प्रकाश-पुञ्ज है। आत्मा बुद्धि को प्रकाशित करती है तथा बुद्धि विषयों को। बुद्धि जब विषयों से हटकर आत्माभिमुख होती है तो शुद्ध विवेक या प्रज्ञा का रूप धारण कर लेती है। प्रज्ञा दैवी ज्ञान है।

 

ईश्वर विचार

सन्त ऑगस्टाइन अन्य मध्ययुगीन दार्शनिकों के समान परम भक्त दार्शनिक थे। नित्य परमात्मा में उनका अटूट विश्वास था। ईश्वर सत् है, वह जगत् के कण-कण में व्याप्त है। ईश्वर स्वयम्भु है तथा जगत् का द्रष्टा है। ऑगस्टाइन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे ईश्वर सिद्धि के लिये कुछ प्रमाण देते हैं जो निम्नलिखित है-

१. नित्य तथा अनिवार्य सत्य (Necessary and changeless truths) का कारण ईश्वर ही सिद्ध होता है। नित्य, सत्य किसी व्यक्ति या किसी देश विशिष्ट का सत्य नहीं, वरन् सार्वभौम सत्य है, जिन्हें सभी देश तथा काल में स्वीकार किया जाता है। प्रश्न यह है कि इन सत्यों का कारण कौन हो सकता है? इन सत्यों का कारण हमारा। मन नहीं, क्योंकि हमारा मन तो अनित्य है, परिणामी है। इन नित्य सत्यों का कारण नित्य परमात्मा ही हो सकता है। नित्य सत्य कार्य है तथा परमात्मा इनका कारण। हम कार्य से कारण का अनुमान करते हैं, अतः नित्य सत्यों से नित्य परमात्मा का ज्ञान होता है। ये नित्य सत्य ही सभी सांसारिक सत्यों के कारण है। परन्तु ये अकारण नहीं। जिस प्रकार अनित्य सत्यों का कारण मानव है; उसी प्रकार नित्य सत्य का कारण ईश्वर ही है|

२. सृष्टि से द्रष्टा का अस्तित्त्व सिद्ध है। संसार में जो कुछ भी है, वह कार्य है। इनका कारण एकमात्र ईश्वर ही हो सकता है। ईश्वर के सम्बन्ध में यह कार्य कारण तर्क सर्वमान्य तर्क है जिसके अनुसार ईश्वर को कारण तथा जगत् को कार्य माना जाता है। कार्य अकारण नहीं हो सकता, अत: ईश्वर ही इसका कारण है। इस कार्यकारण तर्क को ऑगस्टाइन दूसरे प्रकार से रखते हैं। उनके अनुसार मानव आत्मा सदा दिव्यानन्द के लिये विह्वल है।

ऑगस्टाइन मानव को पदच्युत मानते हैं मानव पहले स्वर्गीय आनन्द का अनुभव करता था, परन्तु आदम तथा ईव रूप में पाप करने के कारण उस आनन्द से वञ्चित हो गया। वह नैसर्गिक आनन्द की प्राप्ति के लिये सदा प्रयास करता है। सांसारिक विषयों में मानव को वह आनन्द नहीं प्राप्त होता। यह आनन्द के प्रति प्रयास ही सिद्ध करता है कि परमानन्द का धाम परमेश्वर है जिसकी ओर आत्मा अभिमुख है।

३. विश्व सम्मति (Universal consent) : ऑगस्टाइन का कहना है कि विश्व के सभी व्यक्तियों के मन में ईश्वर की धारणा विद्यमान है। इस विचार का स्रष्टा और कोई नहीं हो सकता। मानव अपूर्ण है, असीम है। सृष्टि का कर्त्ता तो पूर्ण तथा असीम ईश्वर ही हो सकता है। इस तर्क से यह सिद्ध किया जाता है कि ईश्वर ही विश्व का रचयिता है (God is the author of the world)| इसे सभी बौद्धिक प्राणी स्वीकार करते हैं। सबों की स्वीकृति से ईश्वर की सत्ता सिद्ध है।

वस्तुतः उपरोक्त तीनों तर्क कार्य-कारणमूलक तर्क (Casual proof) के रूपान्तर है। आगे चलकर हम एन्सेल्स तथा देकार्त में देखेंगे कि इन्ह कार्य-कारण तर्क गया है। ऑगस्टाइन में तर्क सुस्पष्ट नहीं है। परन्तु एन्सेल्म और देकार्त के आधार है।

 

 

नैतिक दर्शन

अन्य विचारको के समान सन्त ऑगस्टाइन के नैतिक विचार भी ईश्वर केन्द्रित है। नैतिक जीवन तो ईश्वराभिमुख जीवन है। परमात्मा की प्रसन्नता प्राप्त करना ही मानव जीवन का उद्देश्य है। परमात्मा की प्रसन्नता से ही हमें परमात्मा की कृपा प्राप्त होती है तथा कृपा से परमात्मा की प्राप्ति होती है। ईश्वर की कृपा से मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है। परमात्मा मनुष्य को क्षमा प्रदान करते हैं। पापों से मुक्त हो मानव दिव्य नगर (City of God) का निवासी बन कर परमात्मा का साक्षात्कार कर परमानन्द का अनुभव करता है। परन्तु परमात्मा की प्राप्ति के लिए हमें परमात्मा द्वारा प्रणीत मार्ग का अनुसरण करना, ईश्वर की आज्ञा का पालन करना परमावश्यक है। ईश्वर-मार्ग ही धर्म मार्ग है। यही उचित मार्ग है, नैतिक मार्ग है। अत: ऑगस्टाइन की नैतिकता का उद्देश्य ईश्वर ही है।

सन्त ऑगस्टाइन के अनुसार सुख ही मानव के नैतिक कार्यो का एकमात्र लक्ष्य है। परन्तु ऑगस्टाइन का सुख अरस्तू से भिन्न है। अरस्तू के अनुसार सुख ही निःश्रेयस है। परन्तु ऐन्द्रिक सुख साध्य नहीं, वरन बौद्धिक सुख साध्य है। यह बौद्धिक सुख आनन्द है। ऑगस्टाइन के अनुसार भी आनन्द ही नैतिकता का मापदण्ड है, परन्तु यह आनन्द केवल परमात्मा से ही प्राप्त हो सकता है। अतः यह आनन्द आध्यात्मिक है।

सभी सांसारिक आनन्द नित्य है। इस आनन्द की प्राप्ति हमें आनन्दधाम परमात्मा से ही हो सकती है। अतः परमात्मा से प्रेम करना ही मानव का यथार्थ धर्म है। मानव अपूर्ण है, ईश्वर पूर्ण है। अपूर्ण का पूर्ण की ओर अभिमुख होना ही उन्नति या उत्कर्ष है। अतः जब अपूर्ण जीव पूर्ण ईश्वर से प्रेम करता है तभी उसे यथार्थ आनन्द की प्राप्ति होती है। इस प्रकार नैतिकता केवल ईश्वर के प्रति प्रेम या भक्ति है। तन, मन, धन से ईश्वर में तन्मय हो जाना ही मानव जीवन की सार्थकता है। ईश्वर के प्रति प्रेम ही यथार्थ आदर्श है। जो कार्य इस आदर्श के अनुकूल है वह नैतिक कार्य है।

 

संकल्प स्वातन्त्र्य(Freedom of Will)

संकल्प की स्वतन्त्रता नैतिकता की आधारशिला है। किसी परिस्थिति में मानव के सामने शुभ और अशुभ अनेको विकल्प आते हैं, इन विकल्पों में हम अपनी स्वतन्त्र इच्छा से किसी एक का चयन करते हैं। यदि बिना किसी दबाव या प्रलोभन के हम किसी विकल्प का चयन करते हैं तभी हमें उस विकल्प के प्रति उत्तरदायी भी समझा जाता है। यदि चयन करने में हम स्वतन्त्र नहीं हैं तो हम उत्तरदायी भी नहीं होंगे। अत: इच्छा की स्वतन्त्रता नीतिशास्त्र की प्रमुख समस्या है।

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सन्त ऑगस्टाइन संकल्प स्वातन्त्र्य को स्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि मनुष्य के सामने दो मार्ग है, ईश्वराभिमुख होना तथा ईश्वर-विमुख होना। इन दोनों में एक का चयन करने में मानव स्वतन्त्र है। वह अपनी इच्छा से ईश्वर-विमुख होना चाहता है, अतः उसके कार्य अनैतिक हैं। ईश्वर विमुख होने में मानव स्वतन्त्र है। यह विमुखता ही अनैतिकता है। मनुष्य अपनी इच्छा से दिव्य प्रेम से विमुख होकर सांसारिक वस्तुओं से प्रेम करता है। फलतः वह अनैतिक कर्म करता है, अशुभ कर्म करता है तथा पाप का भागी बनता है।

 

पाप की समस्या(Problem of Evil)

संकल्प स्वातन्त्र्य के साथ पाप की समस्या का गहरा सम्बन्ध है। प्रश्न यह है कि जब पाप और पुण्य दोनों मार्ग मनुष्य के सामने हैं तो वह अपनी इच्छा से पापमार्ग का चयन क्यों करता है तथा फलतः दुःखी क्यों होता है? इस प्रश्न का उत्तर ऑगस्टाइन पूर्णतः इसाई मत के अनुसार देते हैं। इसाई धर्म के अनुसार ईश्वर ने विश्व में सर्वप्रथम मानव आदम (Adam) को भेजा। आदम पृथ्वी पर स्वर्गिक आनन्द का अनुभव करते थे। परन्तु उनमें लोभ और वासना का अभ्युदय हुआ और वे स्वर्गिक आनन्द को छोड़कर सांसारिक सुख के पीछे दौड़े, फलत: वे सांसारिक व्यक्ति बन गये। ईश्वर ने आदि मानव के सामने दोनों ही विकल्प रखे थे, परन्तु आदम ने अपनी स्वतन्त्र इच्छा शक्ति से सांसारिक सुख का ही वरण किया और वे ईश्वर-विमुख हो गये। उन्होंने स्वतन्त्र-इच्छा से पाप-मार्ग का चयन किया और पापी बने। आदम की सन्तान होने के कारण आदमी आज भी पापी है। इस प्रारम्भिक पाप से मुक्ति के लिये ही ईश्वर ने प्रभु ईसा मसीह को पृथ्वी पर भेजा। प्रभु ईसा मसीह ही मानव के त्राता (Saviour) हैं। वे मानव द्वारा किये गए पापों को क्षमा करने के लिये परमात्मा से प्रार्थना करते हैं। उन्हीं की प्रार्थना से मानव पापों से मुक्त हो पुनः स्वर्गिक आनन्द को प्राप्त कर सकता है।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि पाप तो आदि मानव (आदम) के संकल्प स्वातन्त्र्य का परिणाम है। परन्तु यहाँ एक आवश्यक प्रश्न यह है कि पाप का स्वरूप क्या है? महात्मा सुकरात ने बतलाया कि हम पाप इसलिए करते हैं कि हमें पुण्य का ज्ञान नहीं। हम सद्गुण का आचरण तभी कर सकते हैं जब हमें सद्गुणों का सम्यक जान हो। जिसे नैतिकता का ज्ञान है वह अनैतिक कार्य नहीं कर सकता। तात्पर्य यह है कि पाप तो कवल पुण्य का अभाव है। ऑगस्टाइन इससे सहमत नहीं। यदि पाप केवल पुण्य का अभाव है तो यह अभावात्मक है और इसका अपना कोई अस्तित्व नहीं।

ऑगस्टाइन के अनुसार पाप असत् नहीं, परन्तु पुण्य के समान यह सत्-रूप या भाव-रूप भी नहीं। यदि पाप को भावरूप मान लें तो पुण्य के समान पाप का भी सष्टा ईश्वर को स्वीकार करना पड़ेगा। पाप का कारण स्रष्टा (Cretor) नहीं वरन सष्ट इच्छा (Created will) है। परमात्मा ने मानव को बनाया तथा उसमें इच्छा की भी सृष्टि की। मानव के सामने पुण्य और पाप के विकल्प रख छोडे मानव ने स्वेच्छा से पाप का चयन किया। अतः पाप का कारण मानव की स्वतन्त्र इच्छाशक्ति है। पाप पुण्य के समान भावभूत परमात्मा की सृष्टि नहीं।

पाप अपने आप में केवल ईश्वरविमुख होना है। ईश्वर-विमुख होना तो ईश्वराभिमुख होने का अभाव है। इस अर्थ से पाप अभावात्मक अवश्य है। मानव ईश्वर से विमुख होने के कारण, परमात्मा के पथ से भ्रष्ट होकर पापी है। आदम ने ईश्वर की अवज्ञा की और परिणाम स्वरूप ईश्वर की कृपा से वञ्चित हो गया, स्वर्गिक आनन्द को खो बैठा तथा सम्पूर्ण मानव जाति को भ्रष्ट कर दिया। आदमी आदम की सन्तान है, अतः पाप करना उसके लिये स्वाभाविक है। पाप न करना सम्भव नहीं, क्योंकि आदि पाप (Original sin) आदम के वंशज में विद्यमान है। क्या यह निराशावादी दृष्टिकोण है? क्या पाप नैसर्गिक है?

ऑगस्टाइन पाप को मानव प्रकृति का अंग अवश्य मानते हैं परन्तु पाप से मुक्ति भी स्वीकार करते हैं। पाप से मुक्ति या छुटकारा (Redemption) हमें ईश्वर की कृपा से प्राप्त हो सकता है, मानव खोए हुए स्वर्ग (Paradie regain) को पुनः प्राप्त कर सकता है। अतः ऑगस्टाइन आशावादी है। एक आवश्यक प्रश्न यह भी होता है कि पाप यदि पथभ्रष्ट होना ही है तो पाप की आवश्यकता क्या है?

ऑगस्टाइन के अनुसार पाप और पुण्य सापेक्ष (Relative) हैं। पाप के बिना पुण्य निरर्थक है। पुनः पाप से पुण्य का महत्त्व बढ़ता है, अन्धकार से प्रकाश का महत्त्व और स्पष्ट होता है। अतः ऑगस्टाइन का कहना है कि पाप अच्छा नहीं, लेकिन यह अच्छा है कि पाप ही पुण्य की प्रवृत्ति का जनक है, मानव को ईश्वराभिमुख बनाता है। अतः पाप भी निष्प्रयोजन नहीं सप्रयोजन है। पाप से मुक्ति प्राप्त करने के लिये ही हम ईश्वर की कृपा के भिखारी बनते है। अत: पाप ईश्वर के महत्त्व को भी बढ़ाता है। इस प्रकार ऑगस्टाइन के पाप सिद्धान्त में तीन महत्त्वपूर्ण बातें हैं-

१. पाप पुण्य का अभाव है (Evil is the privation of good)|

२. पाप सम्प्रयोजन है, पाप पुण्य के महत्व को बढ़ाता है।

३, पाप मानव के संकल्प-स्वातन्त्र्य का परिणाम है, अतः पाप के लिये मानव उत्तरदायी है।

 

 

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