अरस्तु की जीवनी

अरस्तू की जीवनी, तर्कशक्ति, कारण सिद्धान्त की विवेचना | Aristotle’s Biography in Hindi

अरस्तू (Aristotle) [३८४ ई० पू० से ३२२ ई० पू०]

अरस्तू का जन्म मेसेजेनिया की सीमापरस्टेगिरा नामक नगर में हुआ था उनके पिता निकोमेशस मेसीडोन के राजा फिलिप के राजवैद्य तथा परामर्शदाता थे। बाल्यकाल में ही पिता की मृत्यु हो जाने से उनका पालन पोषण प्रॉक्सीनस ने किया। १७ वर्ष की अवस्था में ये एथेन्स गये और प्लेटो की एकेडमी में प्रवेश पाये तथा लगातार २० वर्षों तक प्लेटो की छत्रछाया में विद्याध्ययन करते रहे। अपने गुरु की मृत्यु के बाद इन्होंने अकादमी छोड़ दिया तथा अपने मित्र आइसीक्रेटीज के साथ अहारनियस नामक नगर में रहने लगे।

ई. पू. ३४३ में फिलिप के पुत्र सिकन्दर महान् का शिक्षक बनने का इन्हें अवसर प्राप्त हुआ। ३ वर्ष बाद सम्राट की मृत्यु हो गयी और अरस्तू वहाँ से एथेन्स लौट आये। एथेन्स लौटकर इन्होंने लाइसियम (Lyceum) नामक संस्था की स्थापना की। इस संस्था को पर्यटनशील पाठशाला (Peripatetic school) भी कहते हैं, क्योंकि अरस्तू घूम-घूम कर भी शिक्षा दिया करते थे। ई0 पू0 ३२३ में सिकन्दर की मृत्यु हो गयी तथा शासन सिकन्दर के विरोधियों के हाथ में आ गया। सिकन्दर के गुरु अरस्तू पर अधार्मिकता (Sacrilege) का अभियोग लगाया गया। अरस्तू एथेन्स छोड़कर चालसिस नामक नगर को चले गये और वहीं ई० पू० ३२२ में उनकी मृत्यु हो गयी। अरस्तू ज्ञानियों के सम्राट (Master of those who know) कहे जाते हैं।

अरस्तू की रचनाएँ

अरस्तू ने लगभग ४00 पुस्तकें लिखीं, परन्तु इनमें से अधिकांश का पता नहीं। उनकी रचनाओं को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:-

१. प्लेटोकालीन रचनाएँ: इसकी रचनाएँ प्लेटो की अकादमी में हुई।

२. संक्रमणकालीन रचनाएँ: इनकी रचना माइटेलाइन और मेसिडोन राजदरबार में हुई।

३. लाइसियमकालीन रचनाएँ: इनकी रचना लाइसियम नामक संस्था में हुई।

प्रथम काल की रचनाओं में यूडिमस (Eudemus) और प्रोटेप्टिकस (proleptic) मुख्य हैं। इनमें पहला संवाद है तथा दूसरा पत्र-रचना है। द्वितीय काल की रचनाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण अरस्तू की मेटाफिजिक्स (Metaphysics) है। तृतीय युग की रचनाओं में ‘ऑन क्रियेशन एण्ड डेस्ट्रक्शन’ (On Creation and Destruction), आन हेवेन्स (On Heavens) आदि प्रसिद्ध हैं। 1 अरस्तू के दार्शनिक विचार पाँच भागों में विभक्त हैं: तर्कशास्त्र (Logic), तत्त्वमीमांसा (Metaphysics), भौतिकी (Physics), नीतिशास्त्र (Ethics), सौन्दर्यशास्त्र (Aesthetics)

 अरस्तु का तर्कशास्त्र (Logic) सिद्धान्त

अरस्तू तर्कशास्त्र के जन्मदाता हैं। अरस्तू के पूर्व भी वाद-विवाद या शिक्षा देते समय किसी प्रकार के तर्क का प्रयोग अवश्य किया जाता था। उदाहरणार्थ, जेनो का द्वन्द्वात्मक तर्क, सॉफिस्ट लोगों का कुतर्क, सुकरात की प्रत्यय-पद्धति तथा प्लेटो की द्वन्द्वात्मक पद्धति भी किसी प्रकार के तर्क का प्रयोग है। अरस्तू के पूर्व सभी दार्शनिकों का तर्क किसी समस्या तक सीमित था। अरस्तू ने तर्क को सुसम्बद्ध शास्त्र का रूप प्रदान किया। अत: अरस्तू को तर्कशास्त्र का जन्मदाता कहते है। इन्होंने तर्कशास्त्र की मुख्य निगमनात्मक पद्धति को जन्म दिया।

अरस्तू के अनुसार तर्कशास्त्र यथार्थ चिन्तन का विज्ञान है। किसी भी शास्त्र का अध्ययन हम यथार्थ या वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति के लिए करते हैं, अतः सकल शास्त्र के ज्ञान के लिए तर्कशास्त्र की आवश्यकता है। इसीलिए अरस्तू ने इसे ‘आरम्भिक विज्ञान’ या ‘विज्ञानों का विज्ञान’ कहा है क्योंकि यह सबके मूल में है। प्रश्न यह है कि यथार्थ ज्ञान क्या है जिसका साधन तर्कशास्त्र है? अरस्तू के अनुसार यथार्थ ज्ञान अनिवार्य (Necessary) तथा सार्वभौम (Universal) ज्ञान है। अनिवार्य ज्ञान वह है जिसका विपरीत सत्य नहीं होता तथा सार्वभौम ज्ञान वह है जो सभी स्थान और काल में एक समान हो। उदाहरणार्थ, दो और दो मिलाकर चार होते हैं, यह ज्ञान अनिवार्य तथा सार्वभौम है, अत: यथार्थ ज्ञान है। इसके विपरीत ‘हंस सफेद होते हैं। यह अनिवार्य ज्ञान नहीं, क्योंकि इसका विपरीत सत्य हो सकता है। इस प्रकार से सार्वभौम तथा अनिवार्य ज्ञान निर्णय (Judgement) कहलाते हैं। ये अनिवार्य वाक्य सामान्य होते हैं तथा विशेष वाक्यों की सत्यता इनमें निहित है। अतः विशेष वाक्यों की सत्यता हम सामान्य वाक्यों से निकालते हैं। यही निगमनात्मक अनुमान है। उदाहरणार्थ;

 मनुष्य मरणशील है,

सुकरात मनुष्य है,

अतः सुकरात भी मरणशील है।

इस अनुमान में ‘सुकरात मरणशील है इस विशेष वाक्य की सत्यता सभी मनुष्य मरणशील हैं’ इस सामान्य वाक्य पर आश्रित है। प्रत्येक अनुमान का न्याय (Syllogism) के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। प्रत्येक न्याय में तीन पद (Term) तथा तीन वाक्य होते हैं।

तीन पद है:-

१. वृहत् पद (Major term)

२. लघु पद (Minor term)

३. मध्य पद (Middle term)

 

तीन वाक्य हैं:

१. वृहत् वाक्य (Major premise)

२. लघु वाक्य (Minor premise)

३. निगमन (Conclusion)

 

यही अरस्तू के निगमनात्मक अनुमान का एक उदाहरण है। इस उदाहरण में निगमन की सत्यता आधार वाक्यों पर आश्रित है; परन्तु आधार वाक्य स्वयंसिद्ध वाक्य है। ये आधार वाक्य अधिक व्यापक होते हैं तथा निगमन कम व्यापका इसीलिए कम व्यापक वाक्यों की सत्यता अधिक व्यापक वाक्यों पर निर्भर है। इसके अतिरिक्त अरस्तू ने वाच्य धर्म (Predicables), आकार तथा संयोग (Mood) भी बतलाये हैं। वाच्य धर्म उद्देश्य तथा विधेय का सम्बन्ध है। यह पाँच प्रकार का हैपरिभाषा (Definition), गुण-धर्म (Proprium), जाति (Genus), विभेदक गुण (Differentium) एवं आकस्मिक गुण (Accidents)। विभिन्न वाच्य धर्मों के अनुसार दो प्रकार के वाक्य होते हैं: भावात्मक (Affirmative) तथा निषेधात्मक (Negative)| आकार (Figure) चार है-प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ। संयोग (Mood) १९ हैं, जैसे Barbara, Celarent, Darii, Ferio इत्यादि।

अरस्तु की तत्त्व-मीमांसा(Metaphysics)

अरस्तु के दर्शन में तत्व-विचार सबसे महत्वपूर्ण विचार है। अरस्तू स्वयं तत्त्व-विचार को प्रथम दर्शन (First philosophy) कहते हैं, क्योंकि दर्शनशास्त्र में उस प्राथमिक, परम, सामान्य तत्त्व का अध्ययन किया जाता है जिससे सम्पूर्ण संसार का निर्माण हुआ है। उस प्राथमिक तत्त्व को अरस्तू तत्त्वमीमांसा कहते हैं। उनके अनुसार तत्त्वमीमांसा का ज्ञान ही सर्वोत्कृष्ट ज्ञान है। दार्शनिक वही है जिसे उस परम तत्व का ज्ञान हो। अरस्तू के अनुसार तत्त्व परम द्रव्य (Substance) है। द्रव्य, नित्य, कूटस्थ तथा स्वयं अपरिणामी होते हुए भी सभी परिणामों का आधार है।

संसार में दो वस्तुएँ हैं-द्रव्य और परिणामा द्रव्य ही परिणाम का कारण है। द्रव्य एक है तथा उनके गुण या पयार्य अनेक होते हैं। उदाहरणार्थ, सुकरात द्रव्य रूप में एक है तथा किशोर, युवा, वृद्ध आदि अनेक गुणों को धारण करने वाले हैं। द्रव्य सभी प्रकार के परिणामों, परिवर्तनों का मूल कारण है। इसीलिये द्रव्य को मौलिक या प्राथमिक तत्त्व कहते हैं। परम द्रव्य सभी द्रव्यों का द्रव्य तथा सभी परिणामों का आधार है। दर्शन का कार्य इसी परम द्रव्य का ज्ञान प्राप्त करना है।

अरस्तू का द्रव्य विचार प्लेटो के विज्ञानवाद के खण्डन से प्रारम्भ होता है। प्लेटो के दर्शन में विज्ञान और वस्तु, परमार्थ और व्यवहार में भेद है। वस्तु असत् तथा विज्ञान सत् है। वस्तु की सत्ता व्यावहारिक है, विज्ञान की सत्ता पारमार्थिक है। दूसरे शब्दों में, प्लेटो का परमार्थ है विज्ञान, जो अनुभवातीत है तथा इन्द्रिय जगत् से नितान्त भिन्न, असम्बद्ध है। इस प्रकार व्यवहार और परमार्थ में द्वैत है। अरस्तू विज्ञान तथा वस्तु में नितान्त भेद नहीं स्वीकार करते। अरस्तू विज्ञान को वस्तु में अनुस्यूत या अन्तर्निहित मानते हैं। अरस्तु प्लेटो के विज्ञानवाद की आलोचना निम्नलिखित ढंग से करते हैं:-

१. प्लेटो के अनुसार विज्ञान वस्तु के कारण हैं। विज्ञान सामान्य है तथा वस्तु विशेष है। सजातीय वस्तु के सार ही सामान्य हैं। यह सामान्य ही जाति या विज्ञान है जिसका निर्माण अमूर्तीकरण (Abstraction) द्वारा होता है। उदाहरणार्थ, श्वेत, वस्तुओं का सार श्वेत है| यही श्वेत सामान्य है जो सभी श्वेत वस्तुओं का कारण है। परन्तु श्वेत विज्ञान से श्वेत वस्तु की उत्पत्ति कैसे होती है? प्लेटो विज्ञान को वस्तु का कारण तो बतलाते हैं, परन्तु विज्ञान से वस्तु की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं करते।

२. प्लेटो विज्ञान तथा वस्तु के सम्बन्ध की व्याख्या नहीं करते। विज्ञान नित्य, अपरिणामी तथा सांसारिक वस्तु अनित्य, परिणामी तथा गति-युक्त है। दोनों नितान्त भिन्न हैं, अतः दोनों में पारस्परिक सम्बन्ध कैसा? प्लेटो के अनुसार वस्तु विज्ञान के अंश हैं, या वस्तु विज्ञान में भाग लेता है। ये तो केवल कवित्वपूर्ण रूपकमात्र है।। इनसे विज्ञान और वस्तु के सम्बन्ध की व्याख्या नहीं हो पाती।

 ३. किसी वस्तु की उत्पत्ति के लिए गति (Motion) की आवश्यकता है। विज्ञान तो गतिशून्य है, अतः उनसे वस्तु की उत्पत्ति कैसे? तात्पर्य यह है कि गति के बिना हम उत्पत्ति की व्याख्या नहीं कर सकते। श्वेत विज्ञान से श्वेत वस्तु की उत्पत्ति के लिए, सौन्दर्य विज्ञान से सुन्दर वस्तु की उत्पत्ति के लिए गति, परिवर्तन या परिणाम की आवश्यकता है। अतः उत्पत्ति, स्थिति तथा विनाश की व्याख्या गति या परिणाम के बिना नहीं हो सकती।

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४. संसार में वस्तु अनेक हैं। इन अनेक वस्तुओं की व्याख्या के लिए प्लेटो ने अनेक विज्ञानों की कल्पना की। परन्तु इससे प्लेटो वस्तु की व्याख्या तो कर नहीं। पाते, वरन् व्याख्या के लिए वे श्वेत विज्ञान की कल्पना करते हैं। परन्तु इस कल्पना से उनका भार और बढ़ जाता है। यहाँ अरस्तू प्लेटो की तुलना एक ऐसे व्यक्ति से करते हैं जो छोटी संख्या की गिनने में असमर्थ है, परन्तु वह एक बड़ी संख्या की कल्पना करता है जिससे कि वह छोटी संख्या को गिनने में सफल हो जाय। वस्तुतः वह व्यक्ति छोटी संख्या को गिन नहीं पाता तथा बड़ी संख्या की कल्पना कर अपना भार दुगुना कर लेता है।

५. प्लेटो के अनुसार विज्ञान अनुभवातीत है तथा वस्तु अनुभवगम्य है, अत: उन्होंने अनुभवगम्य वस्तु की व्याख्या अनुभवातीत विज्ञान से करने का प्रयत्न किया। परन्तु अनुभवातीत जगत् में कुछ न पाकर उन्होंने अनुभवगम्य वस्तु को ही अनुभवातीत विज्ञान का नाम दे दिया। उदाहरणार्थ, अश्व वस्तु और अश्व विज्ञान में कोई भेद नहीं। वस्तुतः अश्व विज्ञान अनुभवातीत नहीं, वरन् सांसारिक या अनुभवगम्य वस्तु है जिसे दूसरा नाम दे दिया गया तथा दैवी गुणों से विभूषित कर दिया गया। उदाहरणार्थ, प्रचलित धर्म के अनुसार अनेक देवता केवल देवत्वारोपित (Deified) मनुष्य हैं, उसी प्रकार अनेक विज्ञान केवल नित्यतारोपित (Eternalised) वस्त हैं। तात्पर्य यह है कि यथार्थ में वे वस्तु हैं, उन्हें केवल नित्य विज्ञान की संज्ञा दे दी गयी है।

६. प्लेटो के सामान्य विज्ञान लोक के व्यक्ति नहीं हैं। यह सामान्य व्यक्ति है जो सांसारिक व्यक्ति से सर्वथा भिन्न है। उदाहरणार्थ, सुकरात इस लोक के व्यक्ति हैं, परन्तु इनका मूलरूप सामान्य अतीन्द्रिय है। अतः दोनों भिन्न हैं। पहला लौकिक है और दूसरा दिव्य है। परन्तु इन दोनों में भी एक तृतीय मनुष्य (Third Man) मनुष्यत्व की कल्पना करनी होगी जो इन दोनों का सामान्य होगा। पून: उस सामान्य तथा व्यक्ति में भी एक तीसरा सामान्य होगा जो दोनों का समान धर्म हो। इस प्रकार सामान्य की धारा कहीं समाप्त ही नहीं होगी तथा अनवस्था दोष (Fallacy of Infinite Regress) होगा। मनुष्य लौकिक और मनुष्य दिव्य के बीच के मनुष्य को। अरस्तू तृतीय मनुष्य’ कहते हैं जिसकी सर्वदा आवश्यकता पड़ेगी तथा कहीं अन्त नहीं होगा।

७. प्लेटो के अनुसार विज्ञान वस्तु के सार (Essence) है। परन्तु प्लेटो ने वस्तु के सार को वस्तु से पृथक् कर दिया। किसी वस्तु का सार उस वस्तु में ही रह सकता है, उससे बाहर नहीं। उदाहरणार्थ, अश्वत्व सभी अश्वों का समान धर्म या सार है जो सभी अश्वों में अनुस्यूत या अनुगत धर्म है। परन्तु प्लेटो के अनुसार अश्वत्व (विज्ञान) तो दिव्य है जो अतीन्द्रिय लोक का निवासी है, अरस्तू के अनुसार प्लेटो के विज्ञानवाद का सबसे बड़ा दोष है कि प्लेटो वस्तु के सार को वस्तु से पृथक् कर देते हैं।

प्लेटो की अन्तिम आलोचना से अरस्तू के द्रव्य-विचार का प्रारम्भ होता है। अरस्तू भी प्लेटो के अनुसार सामान्य की ही एकमात्र निरपेक्ष सत्ता मानते हैं। तात्पर्य यह है कि अरस्तू का द्रव्य सामान्य है। परन्तु अरस्तू का सामान्य कोरी कल्पना नहीं, वास्तविक सत् है। सामान्य विशेषों से पृथक् नहीं वरन् विशेषों में अनुस्यूत या अनुगत धर्म है| विज्ञान वस्तु का सार है, परन्तु किसी वस्तु का सार उस वस्तु में ही रहेगा, उस वस्तु के बाहर नहीं। अरस्तू के अनुसार द्रव्य स्वतन्त्र तत्त्व है जिसका अस्तित्व किसी दूसरे पर आश्रित नहीं।

सामान्य ही द्रव्य है जो विभिन्न बस्तुओं में अनुगत (Immanent) सामान्य विशेषों के परे (Transcendent) नहीं, वरन् विशेषों में अनुस्यूत है।- अरस्तू इसी द्रव्य को वास्तविक सामान्य मानते हैं। अरस्तू के सामान्य ही सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनका सामान्य विशेषों से पृथक् काल्पनिक सामान्य नहीं। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि विशेषों में अनुस्यूत है। ये सामान्य ही अरस्तू के द्रव्य हैं। अरस्तू के अनुसार द्रव्य सर्वदा किसी वाक्य में उद्देश्य होता है, विधेय नहीं। उदाहरणार्थ, ‘स्वर्ण गुरु पदार्थ है’, इस वाक्य में स्वर्ण उद्देश्य है तथा

गुरुता विधेय है। गुरुता का अस्तित्व स्वर्ण पर निर्भर है। परन्तु स्वर्ण का आधार गुरुता नहीं| यहाँ एक आवश्यक प्रश्न होता है कि क्या प्लेटो के विज्ञान द्रव्य हैं? अरस्तु के अनुसार नहीं, क्योंकि विज्ञान तो किसी सजातीय वस्तु के सार हैं। उदाहरणार्थ, सभी मनुष्यों में मनुष्यत्व’ सार-सामान्य-विज्ञान है। अरस्तू के अनुसार यह मनुष्यत्व तो विधेय है। मनुष्यत्व तो मनुष्य का सार है, वह मनुष्यों से पृथक् नहीं। किया जा सकता, जैसे गुरुता स्वर्ण से। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार भारीपन भारी वस्तुओं से पृथक् नहीं उसी प्रकार मनुष्यत्व मनुष्यों से भिन्न नहीं, अश्वत्व अश्वों से भिन्न नहीं। परन्तु जिस प्रकार सामान्य द्रव्य नहीं उसी प्रकार विशेष (Particular) भी द्रव्य नहीं।

सामान्य और विशेष में अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। तात्पर्य यह है कि सामान्य विशेष पर तथा विशेष सामान्य पर आश्रित है। उदाहरणार्थ, स्वर्ण गुरु है, पीत है, ठोस है। गुरु, पीत तथा ठोस आदि विशेषताएँ सोने के बिना नहीं रह सकतीं तथा सोना भी इनके बिना नहीं रह सकता। यदि हम सोने से सभी गुणों को निकाल दें तो ‘स्वर्ण’ केवल एक अमूर्त (Abstract) प्रत्यय है, वास्तविक नहीं। अतः शुद्ध विशेष तो केवल अमूर्त विचार है, वस्तु नहीं। परन्तु अरस्तू के अनुसार तो द्रव्य वास्तविक विशेष (Concrete individual) है जिसमें सामान्य की सत्ता अनुस्यूत है। अतः द्रव्य सामान्ययुक्त विशेष है। प्रत्येक वस्तु में विज्ञान अनुगत है| संसार का प्रत्येक पदार्थ द्रव्य है; क्योंकि वह सामान्ययुक्त विशेष है। उदाहरणार्थ, अश्व एक द्रव्य है; क्योंकि वह अश्वत्व सामान्य से युक्त है। स्वर्ण, रजत, पीतल आदि सभी द्रव्य हैं; क्योंकि ये विशिष्ट वस्तु हैं जो सामान्य गुणों से युक्त हैं।

 

अरस्तु का कारण(Causation) सिद्धान्त

अरस्तू के द्रव्य विचार को भली-भाँति समझने के लिए उनके कारण-नियम की व्याख्या आवश्यक है। प्रश्न यह है कि कारण क्या है? अरस्तू कारण शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में करते हैं। उन्होंने प्रयोजन (Reason) और (Cause) में भेद किया है। प्रयोजन कारण से अधिक व्यापक है तथा प्रयोजन में कारण का अन्तर्भाव हो जाता है। अरस्तू के अनुसार कारण प्रयोजन का उपकरण है जिससे प्रयोजन अपना फल उत्पन्न करता है।

प्रयोजन युक्तिपूर्ण होता है, परन्तु कारण की युक्ति का पता नहीं। उदाहरणार्थ, मृत्यु का कारण बीमारी या दुर्घटना हो सकती है; परन्तु इन कारणों से मत्यु की व्याख्या नहीं हो पाती; अर्थात् मृत्यु संसार में क्यों है, हम इन कारणों से नहीं जान पाते। रोग या दुर्घटना से केवल यही लगता है कि मृत्यु कैसे हुई; परन्तु इनसे यह नहीं स्पष्ट होता कि मृत्यु क्यों हुई। प्रयोजन युक्तिपूर्ण होता है, अर्थात्  क्यों का उत्तर युक्ति से ही प्राप्त होता है।

अरस्तू का कारण सिद्धान्त अधिक व्यापक है। इसमें कारण तथा प्रयोजन दोनों सम्मिलित हैं, क्योंकि किसी कार्य या फल को जानने के लिए उसके कारण तथा प्रयोजन दोनों की व्याख्या आवश्यक है। इस प्रकार अरस्तू का कारण सिद्धान्त आधुनिक विज्ञान की अपेक्षा अधिक व्यापक है।

इस व्यापक अर्थ में अरस्तू के अनुसार कारण चार प्रकार के होते हैं :-

१.उपादान कारण (Material Cause)

२. निमित्त कारण (Efficient cause)

३. स्वरूप कारण (Formal cause)

४. लक्ष्य कारण (Final cause)

किसी वस्तु के निर्माण के लिए इन चारों कारणों की आवश्यकता पड़ती है। उदाहरणार्थ; संगमरमर की प्रतिमा को लीजिये; इनमें चारों कारणों की आवश्यकता है-

१. उपादान कारणः किसी वस्तु का निमार्ण किसी द्रव्य या उपादान से होता है। वह उपादान या द्रव्य ही उस वस्तु का कारण है। उदाहरणार्थ, संगमरमर की प्रतिमा संगमरमर से बनी हुई है, अतः संगमरमर प्रतिमा का उपादान कारण है। मृत्तिका घट का, तन्तु पट का उपादान कारण है। उपादान कारण को समवायिकारण भी कहते हैं, क्योंकि कार्य समवाय सम्बन्ध से अपने उपादान कारण में ही रहता है।

२. निमित्त कारणः यह किसी कार्य का शक्त कारण है। किसी कार्य की उत्पत्ति के लिये शक्ति की आवश्यकता है। यह गति या परिवर्तन का कारण है। इसीलिये इसे चालक शक्ति भी कहते हैं। संगमरमर की प्रतिमा में निर्माता में ही गति है, क्योंकि उसकी गति के कारण ही संगमरमर में परिवर्तन होता है। अतः निर्माता निमित्त कारण है। कुम्भकार घट का निमित्त कारण है।

३. स्वरूप कारणः यह किसी वस्तु का तत्त्व या सार है। किसी वस्तु का सार उसकी परिभाषा में व्यक्त होता है। परिभाषा प्रत्ययात्मक होती है (हम पहले विज्ञान के लक्षण में देख चके हैं कि परिभाषा ही प्रत्यय है; क्योंकि दोनों सामान्य और सार गुणा पर आधारित हैं)। इस प्रकार किसी वस्तु का स्वरूप कारण उस वस्तु का प्रत्यय या विज्ञान है। उदाहरणार्थ, संगमरमर की प्रतिमा बनने के पूर्व प्रतिमा का स्वरूप या विज्ञान निर्माता के मस्तिष्क में विद्यमान रहता है। अतः मूर्ति का विज्ञान ही उसका स्वरूप कारण है।

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4. लक्ष्य कारणः जिस अन्त या उद्देश्य को ध्यान में रखकर परिवर्तन किया जाता है, वही लक्ष्य कहलाता है। साध्य या लक्ष्य के कारण ही उपादान के स्वरूप में परिवर्तन सम्भव है। उदाहरणार्थ, संगमरमर की प्रतिमा में पूर्ण प्रतिमा ही लक्ष्य या अन्त कारण है, क्योंकि प्रतिमा का ही पूर्ण करना निर्माता का लक्ष्य है। इसी प्रकार पूर्ण घट का निर्माण कुम्भकार का लक्ष्य या साध्य है।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि अरस्तु का कारण अत्यन्त व्यापक है। उनके अनुसार केवल उपादान और निमित्त ही नहीं, वरन् स्वरूप और लक्ष्य भी कारण है।। आगे चलकर अरस्तू ने चार कारणों को दो रूपों में व्यक्त किया है-द्रव्य (Matter) | और आकार (Form)| उनके अनुसार निमित्त स्वरूप तथा लक्ष्य ये सभी स्वरूप कारण के ही रूपान्तर हैं। सर्वप्रथम स्वरूप तथा लक्ष्य एक ही वस्तु के काल्पनिक तथा वास्तविक रूप हैं।

स्वरूप मस्तिष्क में विज्ञान है तथा लक्ष्य इस विज्ञान का वास्तविक पूर्ण रूप है। अतः दोनों में कोई भेद नहीं। पुन: लक्ष्य कारण तथा निमित्त कारण में भेद नहीं। निमित्त कारण परिणाम का साधन माना गया है तथा लक्ष्य कारण उस परिणाम का साध्य है। निमित्त कारण परिवर्तन का आधार है तथा लक्ष्य कारण परिवर्तन का फल है| लक्ष्य या साध्य के कारण ही परिवर्तन उत्पन्न होता है। अतः जो परिणाम का कारक है वही अन्त में उसका लक्ष्य है। इस प्रकार स्वरूप कारण तथा लक्ष्य कारण एक हैं। अतः दो कारण शेष रहे-उपादान (Material) तथा स्वरूप (Formal)। ये दोनों ही अरस्तू के अनुसार मूल कारण है। जिनसे किसी वस्तु का निर्माण होता है।

अरस्तु का द्रव्य और स्वरूप(Matter and Form) क्या है

अरस्तू के अनुसार द्रव्य तथा स्वरूप ही दो मौलिक पदार्थ हैं जिनसे सम्पूर्ण जगत का निर्माण हुआ है। एक मेज को लीजिए, इसका द्रव्य या उपादान है काष्ठ या लकड़ी तथा स्वरूप या आकृति है चौपाया होना| इसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् का कोई द्रव्य तथा स्वरूप अवश्य है। अतः द्रव्य तथा स्वरूप आधारभूत तत्त्व हैं। द्रव्य और स्वरूप की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं :-

१. द्रव्य और स्वरूप दोनों अपृथक् (Inseparable) हैं। संसार में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं जिसमें केवल द्रव्य हो या केवल स्वरूप हो, अर्थात् सभी वस्तुओं में दोनों तत्त्व मिले हुए हैं। विचार की दृष्टि से इनमें भेद सम्भव है (अर्थात् हम इन्हें अलग-अलग सोच सकते हैं) परन्तु वास्तविक दृष्टि से इनमें भेद सम्भव नहीं। क्योंकि ऐसी कोई भी सांसारिक वस्तु नहीं जिसमें एक हो और दूसरा न हो।

अत: इन दोनों में अन्योन्याश्रय सम्बन्ध माना गया है। द्रव्य स्वरूप पर आश्रित है तथा स्वरूप द्रव्य परा विचार या चिन्तन की दृष्टि से हम इनमें भेद कर सकते है। उदाहरणार्थ वृत्त, वर्ग, आयत आदि सभी स्वरूप या आकार है। हम वृत्ताकार वस्तु से भिन्न वृत्त के बारे में विचार कर सकते हैं, परन्तु व्यावहारिक जगत् में अमूर्त वृत्त नहीं मिल सकता; अर्थात सर्वदा हम वृत्ताकार वर्गाकार वस्तु ही प्राप्त करेंगे।

२. स्वरूप सामान्य है तथा द्रव्य विशेष है। अतः जिस प्रकार स्वरूप और द्रव्य एक दूसरे से पृथक् नहीं हो सकते उसी प्रकार सामान्य और विशेष भी। वस्तुतः प्लेटो के प्रति अरस्तू का सबसे बड़ा आक्षेप यही है कि प्लेटो सामान्य और विशेष, विज्ञान और वस्तु, जाति और व्यक्ति को पृथक् मानते हैं। अरस्तू के अनुसार दोनों अपृथक हैं। अरस्तु के अनुसार सामान्य विशेष में अनुस्यूत है। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति। सामान्य और विशेष, द्रव्य और आकार का संघात है। अरस्तू का सामान्य, वास्तविक । सामान्य (Concrete universal) है जो विशेष अनुगत धर्म है।

३. अरस्तू के अनुसार द्रव्य और स्वरूप का एक विशेष अर्थ है। द्रव्य का प्रचलित अर्थ भौतिक द्रव्य है, जैसे स्वर्ण, लौह, काष्ठ आदि सभी द्रव्य है। ये सभी भौतिक द्रव्य हैं जो सर्वदा द्रव्य ही रहते हैं, अर्थात् इनमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता। इनके आकार का परिवर्तन हो सकता है, परन्तु ये द्रव्य ही रहते है। उदाहरणार्थ, पीतल एक भौतिक द्रव्य है। यह जस्ता, रेडियम, हीलियम आदि रूपों में बदल सकता है, परन्त इन परिवर्तित रूपों में भी यह द्रव्य ही रहता है। इसी प्रकार भौतिक आकार भी आकार रहता है। परन्तु अरस्तू के अनुसार द्रव्य और स्वरूप के विचार सापेक्ष (Relative) हैं। एक ही वस्तु किसी दृष्टि से द्रव्य तथा दूसरी दृष्टि से स्वरूप हो सकती है।

द्रव्य स्वरूप में परिवर्तित हो सकता है और स्वरूप द्रव्य में। उदाहरणार्थ, लकड़ी द्रव्य है तथा मेज, कुर्सी आदि आकार हैं (मेज, कुर्सी आदि की। दृष्टि से) पुन: लकड़ी आकार है (वृक्ष की दृष्टि से)। इसी प्रकार बीज के लिए वृक्ष स्वरूप है, पर लकड़ी के लिए द्रव्य है। इसी प्रकार द्रव्य तथा स्वरूप स्थिर नहीं, परिवर्तनशील हैं तथा दोनों की धारणा सापेक्ष है| यहाँ प्रचलित दृष्टिकोण तथा अरस्तू के दृष्टिकोण में भेद स्पष्ट है। प्रचलित दृष्टि से द्रव्य और स्वरूप स्थिर है।

 

अरस्तु के अनुसार ईश्वर (God) क्या है

अरस्तू के अनुसार ईश्वर ही सृष्टि का आदि और अन्त है। वही द्रव्य में गति प्रदान करता है परन्तु स्वयं गतिहीन है। वह नित्य, कूटस्थ, अचल और ध्रुव है। ईश्वर स्वयं गति शून्य, अपरिणामी होते हुए भी गति, परिणाम और परिवर्तन का स्रोत माना गया है। सम्पूर्ण जगत् द्रव्य से स्वरूप की ओर विकसित हो रहा है। ईश्वर ही इस विकास का सर्वोत्तम रूप है, विकास की चरम सीमा है। वह द्रव्य का चालक कहा गया है, क्योंकि सर्वप्रथम द्रव्य में गति प्रदान करता है परन्तु वस्तुतः ईश्वर गति देता’ नहीं, वरन् उसकी उपस्थिति से ही गति उत्पन्न हो जाती है। जैसे सुन्दर चित्र से आत्मा में स्पन्दन होता है।

जिस प्रकार किसी आदर्श से मानव को कार्य करने की प्रेरणा मिलती है उसी प्रकार ईश्वर भी प्रेरणा का स्रोत माना गया है। वह परम शुभ है जिसकी ओर जगत् के सभी पदार्थ एवं विकास की प्रत्येक श्रेणी उन्मुख है। स्वरूप को अरस्तू ने सत् माना है। ईश्वर विकास की पराकाष्ठा होने के कारण परम स्वरूप है, अतः वह परम सत् (Absolutely actual) है। अरस्तू के अनुसार ईश्वर के निम्न लिखित गुण हैं:-

१. अरस्तू के अनुसार स्वरूप वास्तविक है, काल्पनिक नहीं। यहीं अरस्तू का प्लेटो से भेद है। ईश्वर ही परम (Absolutely actual) स्वरूप है, अतः परम सत् है। विकास की सभी श्रेणियों में पूर्णता न्यूनाधिक मात्रा में है, परन्तु ईश्वर परम स्वरूप होने से पूर्ण या पूर्णसिद्ध कहा गया है। वह विकास की चरम सीमा है, अतः सिद्धि की पराकाष्ठा है।

२. स्वरूप में निमित्त कारण तथा अन्तिम कारण तीनों है, अतः ईश्वर में तीनों कारण हैं। निमित्त कारण रूप में वही संसार में गति प्रदान करने वाला अर्थात् गति या परिवर्तन का कारण है। वहीं जगत् का आकारिक कारण है, क्योंकि वह विज्ञान रूप, प्रत्यय रूप तथा विश्व के सभी पदार्थों के स्वरूप तथा स्वभाव का निश्चय करता है, वह जगत् का अन्तिम कारण भी है, क्योंकि विकास की चरम सीमा है। वह पूर्ण है तथा संसार के सभी पदार्थ पूर्णता की ओर अग्रसर है।

 

 

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