लाइबनिट्ज का पूर्व स्थापित सामन्जस

लाइबनिट्ज का पूर्व-स्थापित सामञ्जस्य क्या है | Leibniz’s Pre-established Harmony in Hindi

पूर्व-स्थापित सामञ्जस्य(Pre-established Harmony)

लाइबनिट्ज के अनुसार चिदणु गवाक्षहीन (Windowless) हैं, छिद्ररहित है अर्थात वे बाह्य प्रभावविहीन हैं। वे अपने आन्तरिक नियमों से ही परिचालित होने है। सभी स्वतन्त्र है। शरीर कम चेतन है तथा आत्मा अधिक चेतन है, परन्त दोनो का कार्यक्षेत्र स्वतन्त्र है। प्रश्न यह है कि शरीर और आत्मा में सम्बन्ध है या नहीं। यदि सभी चिदणु स्वतन्त्र रूप से शक्ति के पुञ्ज है तो उनमें अन्तक्रिया कैसे प्रत्येक चिदणु का कार्य-क्षेत्र अलग-अलग है तो विश्व में एकरूपता या समानता कैसी? शरीरात्मा सम्बन्ध तथा विश्व में साम्य, एकरूपता की व्याख्या पूर्व स्थापित सामञ्जस्य से होती है।

चिदणु स्वतन्त्र तथा निरपेक्ष होकर भी एक दूसरे के सहयोगी है। इसी कारण संसार में नियम तथा व्यवस्था है। विश्व में नियम तथा व्यवस्था, एकता तथा सामञ्जस्य का कारण ईश्वर है। यह सामञ्जस्य ईश्वर के द्वारा सृष्टि के पूर्व ही स्थापित है। चिदणु की सृष्टि करने के समय ईश्वर ने ऐसी व्यवस्था निश्चित कर दी है कि सभी चिदणु में समान परिवर्तन हों। एक की क्रिया के समान दूसरे में भी क्रिया उत्पन्न हो। अतः चिदणु गवाक्षहीन होकर भी एक दूसरे के सहचारी हैं, सभी चिदणु में एक समान ही क्रिया उत्पन्न होती है।

पूर्व स्थापित सामञ्जस्य की व्याख्या लाइबनिट्ज दो उदाहरणों से करते हैं। एक तान संगीत (Orchestra) के वाद्य यन्त्र भिन्न-भिन्न होते हैं, परन्तु सब से एक ही स्वर की सृष्टि होती है। एक की क्रिया दूसरे में प्रतिक्रिया नहीं उत्पन्न करती, वरन् सबमें समान स्वर उत्पन्न होता है। अतः वाद्य यन्त्रों की भिन्नता से संगीत में विषमता नहीं उत्पन्न होती। इसी प्रकार दो घड़ियाँ हैं, जिनकी गति में समानता है। फलतः एक का समय दूसरे के समान है।

लाइबनिट्ज के अनुसार घड़ीसाज ने घड़ियों को इस निपुणता से बनाया है कि(दोनों के यन्त्र बिल्कुल समान है) एक के समान दूसरे में भी समय है। घडीसाज हस्तझेप नहीं करता, वरन् निर्माण काल में ही उनकी गति की समानता निश्चित कर दी गयी है। इनमें प्रथम उदाहरण से विश्व के साम्य तथा एकरूपता की व्याख्या होती है तथा दूसरे उदाहरण से शरीरात्मवाद की समस्या का निदान होता है। पूर्व-स्थापित सामञ्जस्य के निम्नलिखित गुण हैं-

१. पूर्वस्थापित सामञ्जस्य के द्वारा लाइबनिट्ज शरीरात्म सम्बन्ध की व्याख्या करते है देकार्त के अनुसार शरीर और आत्मा में अन्तक्रिया (Interactionism) होती है जिस कारण शरीर आत्मा से तथा आत्मा शरीर से प्रभावित होता है। स्पिनोजा दोनों में समानान्तरवाद (Parallelism) मानते हैं, अर्थात् जड़ और चेतन एक द्रव्य की दो समानान्तर धाराएँ हैं। प्यूलिंक्स और मेलेब्राञ्च देहात्मनिमित्तिवाद (Occasionalism) को मानते हैं।

लाइबनिट्ज के अनुसार शरीर और आत्मा में सम्बन्ध का कारण ईश्वर है। ईश्वर ने शरीर-चिदणु और आत्मा-चिदण का निर्माण। कर उनमें पहले से ही सम्बन्ध नियत कर दिया है। दोनों स्वतन्त्र हैं, निरपेक्ष हैं परन्त सहचारी हैं तथा एक दूसरे से सम्बद्ध हैं। दोनों एक ही विकास के दो स्तर हैं। लाइबनिट्ज ने घड़ी की गति में समानता के उदाहरण से शरीरात्म पर प्रकाश डाला है। किन्हीं दो घड़ियों की गति में समानता है। इसके तीन कारण हो सकते हैं-

(क) दोनों घड़ियों के यन्त्र बिल्कुल समान हों तथा किसी माध्यमिक यन्त्र से दोनों जुड़े हों जिसके कारण एक ही क्रिया से दूसरे में प्रतिक्रिया उत्पन्न हो सके। यह उदाहरण देकार्त के अन्तक्रियावाद के लिए है। उसके अनुसार पीनियल ग्लैण्ड (Pineal gland) नामक विशेष ग्रन्थि ही शरीर और आत्मा का मिलन-बिन्दु है। लाइबनिट्ज इसे स्वीकार नहीं करते, क्योंकि शरीर-चिदणु आत्मा-चिदणु से भिन्न है तथा दोनों चिदणु गवाक्षहीन हैं।

(ख) दो घड़ियों की गति में समानता हो सकती है यदि उन्हें कोई कुशल कारीगर बराबर ठीक करता रहे। शरीरात्मनिमित्तवादियों (Occasionalists) ने बतलाया है कि ईश्वर ही शरीर तथा आत्मा में सहचार का कारण है। लाइबनिट्ज इसे भी नहीं मानते, क्योंकि उन्हें ईश्वर का सतत् हस्तक्षेप मान्य नहीं तथा यह हस्तक्षेप ईश्वर के लिए उपयुक्त भी नहीं।

(ग) दो घड़ियों की गति में समानता हो सकती है, यदि उनका निर्माण ही इस कौशल से किया जाय कि दोनों सहचारी हों। तात्पर्य यह है कि उनके सहचार को पहले से ही नियत कर दिया जाय। लाइबनिट्ज की यही मान्यता है। लाइबनिट्ज कुशल कारीगर के रूप में ईश्वर को मानते हैं, परन्तु ईश्वर का सतत् हस्तक्षेप नहीं स्वीकार करते।

उपरोक्त घड़ी का उदाहरण देकर लाइबनिटज जड और चेतन की समस्या का समाधान करते हैं। जड़ और चेतन नितान्त भिन्न नहीं (जैसा देकार्त मानते हैं) तथा दोनों समानान्तर भी नहीं (जैसा स्पिनोजा मानते है) वरन् दोनों सम्बद्ध है। दोनों का सम्बन्ध ईश्वर के द्वारा नियत कर दिया गया है। लाइबनिट्ज पूर्णतः अचेतन में जड़ की सत्ता नहीं मानते। देकार्त जड़ और चेतन को नितान्त भिन्न मानते अतः उनके दर्शन में द्वैतवाद स्पष्ट है।

लाइबनिट्ज के अनुसार जड़ का अर्थ न्यना चेतन है, अचेतन नहीं। जिसमें जितनी जड़ता है वह उतना ही निष्क्रिय है। अतः जडता निष्क्रियता का द्योतक है। केवल ईश्वर ही पूर्णत: चेतन है, अतः पूर्णत: सक्रिय है। ईश्वर के अतिरिक्त अन्य सभी चिदणु में न्यूनाधिक मात्रा में जड़ता अवश्य है।

शरीर और आत्मा का पारस्परिक सम्बन्ध बुद्धिवादी दार्शनिकों के लिए बहुत बड़ी समस्या है। देकार्त, स्पिनोजा, लाइबनिट्ज तीनों ने इस समस्या पर भिन्न-भिन्न विचार दिये है-

 

देकार्त

देकार्त के अनुसार मन और शरीर भिन्न-भिन्न द्रव्य है। मन का गुण विचार है तथा शरीर का गुण विस्तार है। मन सक्रिय है और शरीर निष्क्रिय है। दोनों चेतन और अचेतन द्रव्य एक दूसरे से भिन्न हैं, परन्तु दोनों में अन्तक्रिया सम्भव है। यह कैसे? हमारे शरीर को भूख लगती है और मन खिन्न हो जाता है। मन प्रसन्न रहता है तो शरीर भी खिला हुआ दिखलायी पड़ता है। देकार्त ने इसका उत्तर अन्तक्रियावाद के द्वारा दिया है। उनके अनुसार मानव शरीर में पीनियल ग्लैण्ड (Pineal gland) नामक एक विशेष ग्रन्थि है। यह ग्रन्थि मन और शरीर का मिलनबिन्दु है। इसी के सहारे मन में होने वाली क्रिया-प्रतिक्रिया का प्रभाव शरीर में पड़ता है और शरीर में होने वाली क्रिया-प्रतिक्रिया का प्रभाव मन पर पड़ता है।

देकार्त के अनुसार जिस प्रकार अश्वारोही अश्व में गति उत्पन्न करता है उसी प्रकार मन की क्रिया भी शरीर में प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। यही देकार्त का अन्तक्रियावाद है। इसमें दोष है। दो नितान्त भिन्न द्रव्यों में एक की क्रिया से दूसरे में प्रतिक्रिया नहीं उत्पन्न हो सकती। इसी कारण देकार्त के दर्शन में द्वैतवाद (Dualism) है।

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स्पिनोजा-

स्पिनोजा भी देकार्त के द्रव्य को मानते हैं पर इसमें कुछ दोष बतलाते हैं। स्पिनोजा के अनुसार चित और अचित (मन और शरीर) द्रव्य के दो स्वरूप है। द्रव्य तो केवल एक ही ईश्वर है। एक ही परम द्रव्य ईश्वर भौतिक और अभौतिक रूपों में प्रतीत होता है। एक ही ईश्वर एक दृष्टि से भौतिक तथा दूसरी दृष्टि से अभौतिक प्रतीत होता है। दोनों का कारण ईश्वर ही है। दोनों आपस में समान है, समानान्तर है।

इनमें कोई किसी का कार्य कारण नहीं। दोनों ही ईश्वर के कार्य है। एक ही सार्वभौम, अद्वैत ईश्वर जड़ जगत में जडात्मक प्रतीत होता है तथा चेतन वस्तुओं में चेतन प्रतीत होता है। दोनों में, जड और चेतन में भेद नहीं वरन् भिन्नता है। चित् और अचित् दोनों धर्म है। दोनों का धर्मी केवल एक ईश्वर है।

स्पिनोजा के अनुसार विचार और विस्तार एक ही वस्तु के दो अंग या पक्ष है। जिस प्रकार किसी चश्मे में बहिर्गोल (Convex) तथा अन्तर्गोल(Concave) नामक दो पक्ष होते है उसी प्रकार विचार और विस्तार एक ही वस्तु के अंग हैं। ये दोनों आपस में समानान्तर हैं। ईश्वर अनन्त है। वह अनन्त ईश्वर वेतन वस्तुओं में अनन्त है। वहीं अनन्त ईश्वर अचेतन वस्तुओं में अनन्त विस्तार दिखलायी देता है तथा चेतन वस्तुओं में अनन्तबुद्धि रूप में दिखलायी देता वास्तव में ये दोनों अनन्त ईश्वर के गुण प्रकट करते हैं।

स्पिनोजा के अनुसार जगत के विशेष तथ्य विचार (Idea) है और विस्तृत जगत् के विशेष तथ्य वस्तु है। विचार और वस्तु का संसार भिन्न-भिन्न है, परन्तु विचार ही वस्तु है और वस्तु ही विचार है। चैतन्य की दृष्टि से जो विचार है वही विस्तार की दृष्टि से प्राप्त है और जो विस्तार की दृष्टि से वस्तु है वही चैतन्य की दृष्टि से विचार है। इस प्रकार विचार और वस्तु दोनों एक ही तथ्य के दो अंग या पहलू कहे जा सकते हैं।

स्पिनोजा के अनुसार विचार के बिना विस्तार नहीं और विस्तार के बिना विचार नहीं विचार ज्ञाता है और विस्तार ज्ञेय है। परन्तु ज्ञाता ज्ञेय के बिना नहीं तथा ज्ञेय जाता के बिना नहीं। दोनों का अस्तित्व सापेक्ष है। ये दोनों आपस में विरुद्ध नहीं वरन समान है। स्पिनोजा के अनुसार भौतिक और अभौतिक एक ही द्रव्य के दो स्वरूप हैं,जैसे किसी सिक्के (Coin) का आन्तरिक और बाह्य रूप।

 

लाइबनिट्ज-

लाइबनिट्ज सर्वचेतनावादी है। लाइबनिट्ज के अनुसार चेतना तो द्रव्य का मौलिक गुण है। कोई भी ऐसा द्रव्य नहीं जो चेतन न हो। तात्पर्य यह है कि विश्व में कोई अचेतन पदार्थ नहीं। पाषाण से लेकर ईश्वर तक न्यून या अधिक मात्रा में सभी चेतन है, सभी जीवधारी हैं। लाइबनिट्ज जड़ और चेतन का द्वैत नहीं स्वीकार करते। लाइबनिट्ज के अनुसार शरीर या जड़ केवल निम्नकोटि का चिदणु है और आत्मा उच्चकोटि का चिदणु है, परन्तु दोनों चिदणु है।

चेतना चिदणु का आन्तरिक धर्म है। कोई भी चिदणु अचेतन नहीं परन्तु उनमें कम या अधिक चेतना है। लाइबनिट्ज के अनुसार चिदणु की एक तारतम्यक श्रेणी है। यही लाइबनिट्ज का विकासवाद है। इसके निम्नतर स्तर पर नग्न चिदणु (Nacked monad) हैं तथा इसके अन्तिम स्तर पर पूर्ण चेतन चिदणु ईश्वर है। निम्नतम और उच्चतम श्रेणी में केवल मात्रा का भेद है। चेतन और अचेतन दोनों चिदण हैं। दोनों में केवल मात्रा का भेद है।

शरीर कम चेतन है और आत्मा अधिक चेतन है। दोनों में बोध या ज्ञान है। आत्मा में अहम् बोध है जो शरीर में नहीं हैं। लाइबनिटज के अनुसार शरीर का विकसित स्तर आत्मा है और आत्मा का कम विकसित स्तर शरीर है। शरीर को कम ज्ञान है और आत्मा को अधिक उच्च स्तर का ज्ञान भी अधिक स्पष्ट है। इस प्रकार शरीर को ज्ञान होता है तो आत्मा को स्पष्टतर ज्ञान होता है।

लाइबनिट्ज के अनुसार चदणु में प्रतिबिम्बित करने की शक्ति है। आत्मा शरीर के कार्यों को म्वत करता है तथा शरीर आत्मा के कार्यों को प्रतिबिम्बित करता है। इस प्रकार शारीरिक जगत् में प्रत्येक मानसिक जगत् की घटनाओं की झलक मिलती है तथा मानसिक जगत में प्रत्येक शारीरिक घटनाओं की झलक मिलती है।

चेतन और अचेतन समस्या के समाधान के लिये लाइबनिट्ज पूर्व-स्थापित सामञ्जस्य का सहारा लेते है। शरीर कम चेतन है आत्मा अधिक चेतन है। दोनों का कार्यक्षेत्र स्वतन्त्र है। परन्तु दोनों एक दूसरे के सहयोगी हैं, सहचारी है। दोनों में एकरूपता है। इस एकरूपता ईश्वर ने पहले से ही स्थापित कर दिया है। यही पूर्व स्थापित सामञ्जस्य है। इसके लिये लाइबनिट्ज दो उदाहरण देते हैं

१. एक तान संगीत में वाद्य यन्त्र भिन्न-भिन्न है परन्तु सबों से एक ही स्वर की। सृष्टि होती है। वाद्य-यन्त्र भिन्न होने पर भी स्वर समान हैं।

२. दो घड़ियों की गति में समानता है। घडीसाज ने दोनों घड़ियों के यन्त्र को इस निपुणता से बनाया है कि एक के समान दूसरे में भी समय होता है।

पूर्व-स्थापित सामञ्जस्य और कुशल घड़ीसाज की उपमा के द्वारा लाइबनिट्ज शरीरात्मवाद का निदान बतलाते हैं। शरीर और आत्मा, चेतन और अचेतन में क्रिया-प्रतिक्रिया की व्याख्या पहले ही ईश्वर ने कर दी है। ईश्वर ने शरीरचिदणु और आत्मा-चिदणु का सम्बन्ध निर्माण के पूर्व ही नियत कर दिया है। दोनों स्वतन्त्र हैं, निरपेक्ष हैं परन्तु सहचारी है, सम्बद्ध हैं। दोनों विकास के दो स्तर है। दोनों चेतन हैं। जड़ और चेतन नितान्त भिन्न नहीं जैसा देकार्त मानते हैं। दोनों समानान्तर भी नहीं जैसा स्पिनोजा मानते हैं। लाइबनिट्ज के अनुसार दोनों सम्बद्ध तथा सहचारी हैं। इनका सहचार ईश्वर के द्वारा नियत है जैसे दो घड़ियों के समय में समानता घड़ीसाज के द्वारा पहले से नियत कर दी गयी है।

 

 

विकासवाद

चिदणु के श्रेणी विभाजन के समय हमने देखा है कि चिदणु विभिन्न प्रकार के हैं। चिदणु का विभाजन चेतना शक्ति के आधार पर किया गया है। निम्नतम से लेकर उच्चतम चिदणु सभी चेतन है, परन्तु उनमें मात्रा का भेद है। साथ-साथ लाइबनिट्ज यह भी मानते हैं कि चिदणु का प्रत्येक स्तर से सम्बन्ध है। दूसरा स्तर पहले का विकास है तथा तीसरा दूसरे का अचेतन से दूसरा स्तर उपचेतन तथा उपचेतन से चेतन, पुनः चेतन से स्वचेतन है।

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इस प्रकार निर्जीव जगत् से लेकर ईश्वर तक सभी जीव विकास के क्रम में है। निर्जीव जगत् से वनस्पति जगत, वनस्पति से पशु जगत्, पशु जगत् से मानव जगत् तथा मानव जगत् से ईश्वर तक सभी विकास के क्रम में है। लाइबनिट्ज के विकासवाद की दो विशेषताएँ हैं। पहली विशेषता यह है कि उच्च श्रेणी तथा निम्न श्रेणी सम्बद्ध है। उच्च श्रेणी निम्न श्रेणी की विकसित अवस्था है, अतः निम्न श्रेणी उच्च श्रेणी की बीजावस्था है। इस प्रकार कोई भी श्रेणी अकस्मात् नहीं। दूसरी विशेषता यह है कि विकास सप्रयोजन (Teleological) है, निष्प्रयोजन नहीं।

सभी स्तर के चिदणु विकास के क्रम में हैं। इनका अन्तिम उद्देश्य दैवी पूर्णता (Divine perfection) को प्राप्त करना है। दैवी पूर्णता पूर्ण चेतन तथा स्पष्टतम ज्ञान की अवस्था है। अतः इसी अवस्था की प्राप्ति ही विकास का प्रयोजन है। लाइबनिट्ज सप्रयोजन विकासवाद यन्त्रवादी (Mechanistic) विकासवाद से भिन्न है। यान्त्रिक विकास में अन्धगति (Blind) से विकास होता है, अर्थात् विकास निष्प्रयोजन होता है।

 

आलोचना

लाइबनिट्ज का चिदणुवाद उनके दर्शन में सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है। चिदणु चेतन परमाणु हैं। ये विश्व के अन्तिम अवयव हैं, नित्य तथा अनन्त हैं। इनके चेतन होने से सम्पूर्ण विश्व चेतन है। अचेतन का कहीं अस्तित्व नहीं है। विश्व का कणकण चेतन युक्त है, चिन्मय है। एक ही अनन्त विभु, विराटरूप चेतना की अभिव्यक्ति विभिन्न स्तरों में होती है जिसे चिदणु का स्तर कहते हैं। चेतना के न्यनाधिक होने से वस्त में भेद होता है, परन्तु तात्विक रूप से सभी एक ही श्रृखंला की विभिन्न कड़ियाँ है। लाइबनिट्ज के चिदणुवाद में कुछ दोष भी बतलाए जाते हैं-

१. लाइबनिट्ज चिदणु को नित्य तथा अनन्त मानते हैं तथा यह भी कहते है। कि चिदणु को उत्पन्न करने वाला ईश्वर ही है। यदि चिदण उत्पन्न होते हैं तो उनका विनाश भी आवश्यम्भावी है। अत: चिदण अनित्य तथा सान्त होंगे।

२. विश्व की एकता तथा सामाञ्जस्य की व्याख्या के लिये लाइबनिट्ज पूर्व- स्थापित सामञ्जस्य का सिद्धान्त बतलाते हैं। चिदणु गवाक्षहीन हैं, छिद्ररहित हैं फिर भी सबके कार्य में समता है, क्योंकि सबका उद्देश्य एक है। यह उद्देश्य ईश्वर द्वारा निश्चित कर दिया गया है। एक ओर लाइबनिट्ज कहते हैं कि चिदणु केवल अपने ही आन्तरिक नियमों से परिचालित होते है। दूसरी ओर वे चिदणु के अतिरिक्त ईश्वरीय सामञ्जस्य को स्वीकार कर लेते हैं। यहाँ चिदणु की परतन्त्रता स्पष्टतः प्रतीत होती है।

३. लाइबनिट्ज ने बतलाया कि मूलतः चिदणु एक हैं। सभी चेतन हैं, परन्तु पुनः वे बतलाते हैं कि चेतना की भिन्नता के कारण चिदणु के विभिन्न स्तर है, अतः चिदणु अनेक हैं।

४. लाइबनिट्ज कहते हैं कि विश्व में केवल चिदणु की सत्ता है, चिदणु के अतिरिक्त विश्व में कुछ भी नहीं। पुनः वे कहते हैं कि चिदणु विश्व के दर्पण है। प्रत्येग चिदणु में पूरा संसार प्रतिबिम्बित होता है। यदि चिदणु से इतर से कुछ है ही नहीं तो उनमें प्रतिबिम्बित क्या होता है या कुछ भी प्रतिबिम्बित होता है उसकी सत्ता अवश्य अलग है।

५. लाइबनिट्ज चिदणु को स्वतन्त्र चित्शक्ति मानते हैं परन्तु प्रत्येक चिदणु में कुछ जड़ता का अंश भी स्वीकार करते हैं। यदि चिदण केवल चेतन ही हैं तो उनमें जड़ता कैसी?

6. इसी प्रकार लाइबनिट्ज चिदणु को सक्रिय और निष्क्रिय दोनों मानते है। उनके अनुसार चिदणु स्वभावतः सक्रिय है, परन्तु जड़ता के कारण उनमें निष्क्रियता भी है। यहाँ स्पष्ट विरोध हो रहा है।

७. लाइबनिट्ज विदणु का विकास मानते है तथा चिदणु का स्वभाव ईश्वर के द्वारा पूर्व नियत भी मानते हैं। यदि चिदणु विकास के क्रम में हैं तो उनका स्वभाव नियत नहीं स्वीकार किया जा सकता।

८. लाइबनिटज चिदणु को परस्परापेक्ष नहीं मानते फिर उनमें आपस का सम्बन्ध स्वीकार करते हैं। एक तान संगीत से विश्व में साम्य तथा एकरूपता की और दो घड़ियों के उदाहरण से उन्होंने शरीरात्मवाद की समस्या का समाधान किया है। परन्तु वस्तुतः ये दोनों उदाहरण विश्वगत साम्य और जड-चेतन सम्बन्ध की व्याख्या नहीं कर पाते, दृष्टान्त और दार्ष्टान्त में भेद है। यह केवल उपमा है, व्याख्या नहीं।

९. लाइबनिट्ज चिदणु का तारतम्यक विकास (Hierarchical order) स्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि चिदणु की उच्च श्रेणी निम्न श्रेणी की विकसित अवस्था है। वे इस विकास को क्रमिक बतलाते है। क्रमबद्धता नियम (Law of Continuity) के अनुसार सभी चिदणु क्रमिक विकास के स्तर में हैं, सभी अपने पूर्व स्तर से सम्बद्ध है परन्तु व्यक्ति विशेष नियम (Law of Individuality) के अनुसार वे प्रत्येक चिदणु को व्यक्ति विशेष बतलाते हैं। उनका कहना है कि कोई चिदणु समान नहीं।

 

 

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