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द्वैतवाद क्या है, रेने देकार्त और द्वैतवाद | Descartes and Dualism in Hindi

द्वैतवाद (Dualism)

उपरोक्त विवरण से मन तथा शरीर का द्वैत स्पष्ट है। चेतना तथा जड़ दोनों विरोधी हैं, अतः इनमें कोई पारस्परिक सम्बन्ध सम्भव नहीं। परन्तु यहाँ अनुभव का अपलाप स्पष्ट हो रहा है। हम मन तथा शरीर में अन्तक्रिया का प्रतिदिन अनुभव करते हैं। हमारे शरीर को भूख, प्यास लगती है और मन खिन्न हो जाता है। पुनः मन में दुःख-सुख का भाव उत्पन्न होता है और शरीर क्षीण तथा अप्रसन्न हो जाता है। हमारा मन प्रसन्न रहता है तो चेहरा भी खिला हुआ लगता है, मन में दुःख होने पर या निराश होने पर शरीर भी क्षीण होने लगता है।

भूख, प्यास शरीर में उत्पन्न होती है परन्तु सन्तोष का अनुभव मन को होता है। यह कैसे सम्भव है? तात्पर्य यह है कि यदि मन और शरीर दोनों दो है तो अन्तक्रिया कैसे? देकार्त के दर्शन में यहाँ स्पष्ट रूप से असंगति हो रही है। इसका उत्तर देकार्त अपने चिदचित् संयोगवाद सिद्धान्त के द्वारा देते हैं। यही देकार्त का अन्तक्रियावाद या क्रिया-प्रतिक्रियावाद (Inter-actionism) का सिद्धान्त कहलाता है।

इस सिद्धान्त के अनुसार आत्मा और शरीर में पीनियल ग्रन्थि के द्वारा क्रिया-प्रतिक्रिया होती है। शरीर की क्रिया से आत्मा में प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है जिसके फलस्वरूप आत्मा को बाह्य जगत् का ज्ञान प्राप्त होता है। इसी प्रकार आत्मा की क्रिया से शरीर में प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। जिसके फलस्वरूप शरीर में विचार के अनुकूल व्यवहार होने लगता है। इसकी प्रक्रिया ऐसे हैं :

(क) बाह्य जगत् से संवेदनाएं उत्पन्न होती है। इन संवेदनाओं को इन्द्रियाँ ग्रहण करती हैं। इस प्रकार बाह्य विषयक संवेदनाएँ उद्दीपक (Exciting) हैं जिनका प्रभाव इन्द्रियों पर पड़ता है।

(ख) इन प्रभावों के फलस्वरूप जैविक शक्ति (Animal spirit) उद्दीप्त होती है।

(ग) जैविक शक्ति के उद्दीप्त होने पर इसके माध्यम से प्रभाव पुरीतत नाड़ी (Pineal gland) तक पहुँच जाते है।

(घ) परीतत नाडी से जैविक शक्ति स्नायु मण्डल में विचरण करती हुई मांसपेशियों तक पहुंचती है। इसके बाद शारीरिक व्यापार होने लगता है।

इसी प्रकार जब मानसिक विचारों के अनुकूल शारीरिक कार्य होता है तो पुरीतत नाड़ी से जैविक शक्ति स्नायु मण्डलों द्वारा शरीर में क्रिया उत्पन्न करती है।

संक्षेप में, पुरीतत नाडी ही मन और शरीर के मिलन की शय्या है। स्वयं देकार्त का कहना है कि मानव शरीर में पीनियल ग्लैण्ड (Pineal gland) नामक एक विशेष गन्थि है। यह ग्रन्थि मन और शरीर का मिलन बिन्दु है। इसी ग्रन्थि के द्वारा मन में। होने वाली क्रिया-प्रतिक्रिया का प्रभाव शरीर पर पड़ता है तथा शरीर की क्रिया-प्रतिक्रिया का प्रभाव मन पर पड़ता है।

देकार्त इसे एक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करते हैं- अश्व तथा अश्वारोही दोनों भिन्न है परन्तु उनमें पारस्परिक क्रिया सम्मभव है। जिस प्रकार अश्वारोही अश्व की गति में वेग उत्पन्न करता है, अश्व की गति में वृद्धि करता है। उसी प्रकार मन भी शारीरिक क्रियाओं को उत्तेजित करता है। परन्तु उपरोक्त उदाहरण केवल उपमा है, व्याख्या नहीं। अश्व तथा अश्वारोही दोनों में उद्देश्यगत साम्य है, अतः दोनों की प्रकृति प्रायः समान (गतिमूलक) कही जा सकती है। परन्तु मन और शरीर दोनों नितान्त भिन्न हैं। जड़ और चेतन, विस्तार और विचार में किसी प्रकार की समता नहीं। परन्तु दोनों में अन्तक्रिया का अनुभव हमें प्रतिदिन होता है। देकार्त इसकी समुचित व्याख्या नहीं कर पाते। जैनों के जीव और अजीव, रामानुज के चित् और अचित्, सांख्य के पुरुष और प्रकृति के समान ही देकार्त के मन और शरीर में द्वैत स्पष्ट है।

रेने देकार्त और द्वैतवाद(Descartes and Dualism)

देकार्त को उग्र द्वैतवादी कहा जाता है। चेतन और अचेतन, मन और शरीर, भौतिक और आध्यात्मिक का विरोध ही द्वैतवाद का आधार है। दोनों नितान्त भिन्न, एक दूसरे के विरोधी है। इन दोनों में समन्वय स्थापित करना बड़ा कठिन कार्य है। पाश्चात्य दर्शन के पिता प्लेटो के दर्शन में इन्द्रिय और अतीन्द्रिय जगत, व्यवहार और परमार्थ, वस्तु और विज्ञान, आत्मा और शरीर का भेद स्पष्टतः द्वैतवाद का द्योतक है। मध्य युग में भी आत्मा और शरीर का भेद द्वैत सिद्ध करता है। आधुनिक युग में देकार्त की प्रमुख दार्शनिक समस्याओं में सर्वत्र द्वैतवाद दिखलाई पड़ता है। कार्त का उग्र द्वैतवाद निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर स्पष्टतः सिद्ध होता है-

(क) देकार्त चेतन और अचेतन, आत्मा और शरीर को दो विभिन्न द्रव्य मानते हैं जिनमें किसी प्रकार की क्रिया और प्रतिक्रिया सम्भव नहीं। उन्होंने पुरीतत नाडी (Pineal gland) के सहारे जड़ और चेतन में क्रिया-प्रतिक्रिया की व्याख्या का प्रयास किया है। परन्तु इसमें वे सफल नहीं। उनके दर्शन में जड़ चेतन का द्वैत है।

(ख) देकार्त की ज्ञान मीमांसा में भी द्वैत है। देकार्त प्रतिनिधित्ववाद (Representationism) को मानते हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार हमें बाह्य वस्तुओं का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता, वरन् परोक्ष रूप से होता है। हमारा ज्ञान तो मानसिक विज्ञानों तक सीमित है। मानसिक विज्ञान मन के प्रत्यय हैं। ये प्रत्यय या विज्ञान ही बाह्य वस्तुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। परन्तु प्रत्यय मानसिक है, वस्तु बाह्य है। मन के प्रत्यय बाह्य वस्तुओं का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकते हैं? दोनों में द्वैत स्पष्ट है।

(ग) रेने देकार्त के अनुसार गुणों में द्वैत है। गुण दो हैं; मूलगुण (Primary quality) और उपगुण (Secondary quality)| आकृति, विस्तार आदि मूलगुण हैं। रूप, रस आदि उपगुण है। पहले का ज्ञान स्वतन्त्र है पर दूसरे का परतन्त्र है। स्पष्ट है कि देकार्त मूलगुण और उपगुण में भेद मानते हैं। आगे चलकर लॉक के दर्शन में भी यह भेद विद्यमान है। यह देकार्त का गुणात्मक द्वैतवाद है।

(घ) रेने देकार्त के द्रव्य की धारणा में भी द्वैतवाद है। देकार्त के अनुसार ‘द्रव्य वह है जिसकी सत्ता स्वतन्त्र हो तथा जिसका ज्ञान भी स्वतन्त्र हो। इस दृष्टि से केवल ईश्वर ही द्रव्य हो सकता है, क्योंकि ईश्वर ही सबका कारण होते हुए स्वयं अकारण है, सर्वाधार होते हुए स्वयं निराधार है। ईश्वर के ज्ञान में भी स्वयं ईश्वर ही प्रमाण है। अतः ईश्वर परम द्रव्य है। परन्तु देकार्त के अनुसार द्रव्य के दो प्रकार हैं-निरपेक्ष और सापेक्षा निरपेक्ष द्रव्य केवल ईश्वर है। चेतन और अचेतन सापेक्ष द्रव्य है। द्रव्य की इस धारणा में निरपेक्ष और सापेक्ष का द्वैत स्पष्ट है।

(ङ) रेने देकार्त के दर्शन में धर्म और विज्ञान में भी द्वैत है। देकार्त के अनुसार धर्म का सम्बन्ध आध्यात्मिक चेतना से है और विज्ञान का सम्बन्ध भौतिक बाह्य जगत् से है। ये दोनों जगत् पूर्णतः एक दूसरे के विरोधी हैं तथा दोनों स्वतन्त्र है। दोनों के कार्यक्षेत्र नितान्त भिन्न हैं। इस प्रकार देकार्त के विज्ञान और धर्म में द्वैत है। देकार्त के दर्शन में द्वैतवाद बहुत बड़ी समस्या है। इनका द्वैतवाद आगे चलकर स्पिनोजा के दर्शन में अद्वैतवाद बन गया तथा इनका अन्तक्रियावाद समानान्तरवाद (Parallelism) में बदल गया।

 

समीक्षा

रेने देकार्त को आधुनिक दर्शन का पिता (Father of Modern Philosophy) माना जाता है। निस्सन्देह रूप से रेने देकार्त ने एक नयी दार्शनिक प्रणाली को जन्म दिया। देकार्त के पहले का युग अन्धविश्वास का युग था जिसमें दार्शनिक केवल परम्परावादी लोग ही थे। देकार्त ने सर्वप्रथम दर्शन को परम्परा के कारागार से मुक्त किया तथा स्वस्थ विचारों के लिए स्वच्छन्द वातावरण का निर्माण किया। देकार्त पूर्णतः मध्य युग के प्रभावों से अछूते नहीं; फिर भी एक नयी दार्शनिक दिशा की ओर निस्सन्देह रूप से इंगित करते हैं।

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देकार्त सर्वप्रथम दार्शनिक हैं जिनका दृष्टिकोण वैज्ञानिक है। देकार्त के विचारों पर गणित तथा भौतिक विज्ञान का गहरा प्रभाव है। देकार्त दार्शनिक महल को वैज्ञानिक नीव पर खड़ा करना चाहते हैं, यह उनकी सबसे बड़ी देन है। यह वैज्ञानिक नींव ही वर्तमान युग को मध्य युग से पृथक् करती है। गणित तथा भौतिक विज्ञान के निस्सन्देह निष्कर्षों के प्रति देकार्त की गहरी आस्था है। अतः देकार्त के लिए मौलिक समस्या है-दार्शनिक सत्यों को वैज्ञानिक निष्कर्षों के समान सर्वमान्य बनाना।

यदि दार्शनिक निष्कर्ष २+२=४ के समान सर्वमान्य हो जाय तो दार्शनिक विवादों का अन्त हो जाय। रेने देकार्त के समान ही ब्रूनो (Bruno) ने भी अन्धविश्वास और परम्परागत विचारों के प्रति पूर्णतः विरोध की भावना व्यक्त की है। उन्होंने भी मध्य युग की सभी मान्यताओं का खण्डन किया है, परन्तु ब्रूनो की प्रवृत्ति पूर्णतः ध्वंसात्मक है, सृजनात्मक नहीं। देकार्त ध्वंस निर्माण के लिए चाहते है।

रेने देकार्त सभी परम्परागत विचारों का केवल खण्डन करना ही अपना लक्ष्य नहीं मानते। वे परम्परागत विचारों की भी परीक्षा करना चाहते हैं। यदि वे विचार परीक्षित सत्य हो सकते हैं, तो वे निश्चित रूप से मान्य हैं। यही कारण है कि देकार्त अपने से पूर्व विचारों का खण्डन करते हुए भी अपने पूर्ववर्ती दार्शनिकों के निकट है। उदाहरणार्थ देकार्त के द्वारा ईश्वर सिद्धि के लिए दिया गया तर्क एन्सेल्म और एक्विनस के प्रायः समान है। अतः केवल परम्परा के प्रति विद्रोह से ही देकार्त आधुनिक दर्शन के पिता नहीं माने जा सकते। विद्रोह की प्रवृत्ति सम्भवतः ब्रूनो में अधिक है।

रेने देकार्त को हम आधुनिक दर्शन का पिता इसलिए मानते हैं कि उन्होंने आधुनिक णाली तथा आधुनिक समस्याओं को जन्म दिया। वर्तमान दार्शनिक समस्याओं की और संकेत करने वाला देकार्त के पूर्व कोई नहीं था। वर्तमान युग पर देकार्त का हत प्रभाव है। उदाहरणार्थ देकार्त ने चेतन को पूर्णतः जड़ता से शून्य बतलाया है। देकार्त का यह विचार प्रत्ययवाद (Idealism) की आधारशिला है। इसी प्रकार देकार्त का जड़ सम्बन्धी मतवाद के जड़वाद (Materalism) का आधार स्तम्भ है। देकार्त की सन्देह प्रणाली में वर्तमान सन्देहात्मक प्रवृत्ति की पूर्ण झलक है।

 

 रेने देकार्त और बुद्धिवाद

रेने देकार्त का ज्ञान-सिद्धान्त पूर्णतः बुद्धिवादी है। देकार्त का दर्शन निस्सन्देह सत्य तथा सुस्पष्ट ज्ञान का साधन है। प्रश्न यह है कि ज्ञान सुस्पष्ट कैसे हो? अनुभव तथा बद्धि दोनों ज्ञान के साधन स्वीकार किये गए है। परन्तु इन्द्रियजन्य अनुभव से निस्सन्देह सत्य का निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता, क्योंकि इन्द्रियों से हमें वस्तु की बाह्य प्रतीति होती है, यथार्थ ज्ञान नहीं। किसी वस्तु की बाह्य प्रतीति उसके गुणों तक सीमित है। उदाहरणार्थ, हमें किसी वस्तु का रूप-रस-गन्ध स्पर्श रूप ज्ञान प्राप्त होता है। परन्तु ये सभी वस्तु के बाह्य स्वरूप या गुण हैं। वस्तु के यथार्थ स्वरूप नहीं| वस्तु का यथार्थ स्वरूप तो बुद्धिगम्य है, इन्द्रियगम्य या अनुभवात्मक नहीं। अतः वस्तु का यथार्थ निश्चयात्मक ज्ञान तो बुद्धिजन्य है| बुद्धि में जन्मजात प्रत्यय होते हैं। ये जन्मजात प्रत्यय (Innate ideas) सार्वभौम तथा निश्चयात्मक होते हैं। अतः निश्चयात्मक तथा प्रामाणिक ज्ञान के लिए हमें जन्मजात प्रत्ययों की शरण लेनी होगी जो बुद्धिजन्य हैं।

 

 

देकार्त के परवर्ती(Successor of Descartes)

हम पहले देख आए हैं कि देकार्त के दर्शन में अनेकों असंगतियाँ है। देकार्त के परवर्ती दार्शनिकों के लिये ये असंगतियाँ समस्या बन गयीं। अतः परवर्ती दार्शनिकों ने इन असंगतियों को दूर करने का प्रयास कर देकार्त के विचारों की एक नये ढंग से व्याख्या प्रारम्भ की। देकार्त के दर्शन में निम्नलिखित असंगतियाँ हैं-

१. रेने देकार्त ने तत्त्व का लक्षण स्वतन्त्र होना बतलाया है। उनके अनुसार तत्त्व तीन हैं-ईश्वर, चित् और अचित्। चित्, अचित् सापेक्ष तत्त्व हैं तथा ईश्वर निरपेक्ष तत्त्व है। चित् और अचित् द्रव्यों से ईश्वर के सम्बन्ध की व्याख्या करते हुए देकार्त कहते हैं कि ईश्वर अचित् या जड़ तत्त्व में गति प्रदान करता है। पुनः चित् तत्त्वों के लिए ईश्वर ही उद्देश्य या प्रयोजन (Teleology) है। ईश्वर ही चित् तथा अचित का कर्ता है। अतः चित्, अचित् दोनों उसके कार्य हुए। ईश्वर जड़ द्रव्यों का निमित्त कारण माना गया है। इसका अर्थ है कि जड़ स्वयं उपादान कारण है। इससे द्वैतवाद स्पष्टतः सिद्ध होता है।

२. देकार्त ने चित् तथा अचित् को भी द्रव्य माना है। ये दोनों द्रव्य आपस में स्वतन्त्र है, परन्तु ईश्वर-तन्त्र हैं। यदि चित् तथा अचित्, आत्मा और शरीर दोनों विरोधी हैं तो दोनों में किसी प्रकार की क्रिया-प्रतिक्रिया सम्भव नहीं। यहाँ दो असंगतियाँ हैं। पहली असंगति यह है कि केवल ईश्वर ही परम स्वतन्त्र द्रव्य है तथा आत्मा और शरीर उसकी सृष्टि है। दूसरी असंगति यह है कि चित् तथा अचित् दोनों आपस में स्वतन्त्र द्रव्य है फिर भी उनमें अन्तक्रिया होती है|

 

देहात्मनिमित्तवाद(Occasionalism)

देकार्त के परवर्ती दार्शनिकों ने शरीर-आत्मा सम्बन्ध पर पुन. विचार किया है। इन विचारकों में आरनाल्ड ग्यूलिंक्स और निकोलस मेलेब्राञ्च का नाम प्रसिद्ध है। इन दोनों दार्शनिकों ने देकार्त के अन्तक्रियावाद पर पुनः विचार किया है। देकार्त ने आत्मा और शरीर को अलग-अलग द्रव्य माना है। आत्मा का गुण विचार तथा शरीर का गुण विस्तार है। इन दोनों में पारस्परिक स्वतन्त्रता है। प्रश्न यह है कि यदि आत्मा और शरीर दोनों द्रव्य है तो दोनों में अन्तक्रिया कैसे सम्भव है? देकार्त ने कठिनाई को दूर करने के लिए बतलाया है कि शरीर और आत्मा में अन्तक्रिया का माध्यम एक विशेष ग्रन्थि (Pineal gland) है। इसी ग्रन्थि के द्वारा शरीर की संवेदनाएँ आत्मा तक और आत्मा की संवेदनाएँ शरीर तक पहुँचती हैं।

तात्पर्य यह है कि शरीर की क्रिया-प्रतिक्रिया का प्रभाव आत्मा पर और आत्मा की क्रियाप्रतिक्रिया का प्रभाव शरीर पर इसी ग्रन्थि के द्वारा पड़ता है। यह ग्रन्थि ही शरीर और आत्मा का मिलन स्थान है। यह ग्रन्थि मस्तिष्क के मध्य में स्थित है। यहीं पर शरीर तथा आत्मा में पारस्परिक आदान-प्रदान होता है जिसके फलस्वरूप अन्तक्रिया होती है। हमारा शरीर चलता है और चलने की अनुभूति आत्मा को होती है, मन में प्रेम उत्पन्न होता है, परन्तु शरीर को भी इसका स्पष्ट अनुभव होता है।

अतः शरीरात्मनिमित्तवाद में देकार्त के अन्तक्रियावाद का निषेध किया गया है। इस सम्प्रदाय के दार्शनिक ‘ईश्वर की इच्छा’ को ही अन्तक्रिया का कारण मानते हैं। देकार्त भी ईश्वरेच्छा को कारण मानते हैं, परन्तु शरीरात्म निमित्तवादी ईश्वर पर अधिक बल देते हैं। जिस प्रकार लाइवनिट्ज पूर्व स्थापित सामञ्जस्य का कारण ईश्वरेच्छा मानते हैं, उसी प्रकार म्यूलिंक्स भी शरीर और आत्मा में क्रिया-प्रतिक्रिया का कारण ईश्वर को ही मानते है। इन दोनों की क्रिया प्रतिक्रिया में कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं है, अर्थात् एक की क्रिया दूसरे का कारण नहीं तथा दूसरे की क्रिया पहले का कार्य नहीं। इन दोनों में कार्य-कारण-भाव नहीं है, जैसे सूर्य की दैनिक गति तथा घडी में है।

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तात्पर्य यह है कि सूर्य की गति घड़ी में समय-ज्ञान का कारण है। जैसे-जैसे सूर्य की गति में वृद्धि होती है, वैसे-वैसे घड़ी में समय भी बढ़ता जाता है। एक घड़ी में जितना समय होगा, दूसरे में भी उतना ही होगा, क्योंकि दोनों एक ही कारण (सूर्य की गति) के कार्य है। शरीर और आत्मा में अन्तक्रिया का कारण कार्यकारण नियम नहीं, वरन् ईश्वर ने इन दोनों का ऐसा निर्माण ही किया है कि एक ही क्रिया से दूसरे में प्रतिक्रिया अवश्य होगी। किसी कुशल कारीगर के समान ईश्वर ने इसका निर्माण ही इस कुशलता से किया है कि एक दूसरे को सर्वदा प्रभावित करते रहते हैं।

ग्यूलिंक्स शरीरात्म सम्बन्ध को स्पष्ट करने के लिए दो घटिका की उपमा देते है। आगे लाइबनिट्ज ने इसी को प्रायः पूर्वस्थापित सामजस्य बतलाया है। लाइबनिट्ज के पूर्व स्थापित सामञ्जस्य और ग्यूलिंक्स के शरीरात्म- निमित्तवाद में भेद अवश्य है, परन्तु दोनों ही घटिका की उपमा देते हैं और ईश्वर को निपुण कलाकार (घड़ीसाज) मानते हैं। अतः संक्षेप में दोनों के पारस्परिक प्रभाव का कारण ईश्वर की निपुणता या कार्य कुशलता है। ईश्वर ने इस ढंग से शरीर और आत्मा का निर्माण किया है कि एक का प्रभाव दूसरे पर पड़ता है। इसमें किसी को कार्य या कारण मानने की आवश्यकता नहीं।

ईश्वर की निपुणता के कारण ही शरीर और आत्मा दो विभिन्न तत्त्व एक ही सूत्र में बँधे हैं..जब मेरे मन में कोई इच्छा उत्पन्न होती है तो तदनुरूप शरीर में गति उत्पन्न हो जाती है तथा जब गति उत्पन्न होती है तो इच्छा का अभ्युदय होता है। म्यूलिंक्स के सिद्धान्त देकार्त तथा लाइबनिट्ज दोनों से भिन्न है। म्यूलिंक्स देकार्त के कार्य-कारण को नहीं मानते हैं तथा लाइबनिट्ज के पूर्व स्थापित सामञ्जस्य को भी नहीं स्वीकार करते। ग्यूलिंक्स देकार्त के अन्तक्रियावाद के स्थान पर पारस्परिक प्रभाव को मानते हैं, अर्थात् निपण ईश्वर के कारण सहक्रिया की स्वीकार करते हैं।

ग्यूलिंक्स अपने देहात्मनिमित्तवाद को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि जब तक मुझे यह ज्ञात न हो कि कोई घटना कैसे घटती है तब तक मैं उसका कारण नहीं समझ सकता। इससे स्पष्ट है कि घटना की प्रक्रिया को जाने बिना हम घटना के कारण की खोज नहीं कर सकते। शारीरिक क्रिया और प्रतिक्रिया का कारण परमात्मा है। तात्पर्य यह है कि चेतन और अचेतन में अन्तक्रिया परमात्मा के कारण ही सम्भव है। हम इस अन्तक्रिया का कारण नहीं हो सकते, क्योंकि हम मन और शरीर में होने वाली क्रिया और प्रतिक्रिया को नहीं जान पाते। यह किसी अदृष्ट शक्ति या परमात्मा का ही कार्य है।

चेतन आत्मा में स्वतन्त्र इच्छा शक्ति है जिसके कारण मानसिक जगत् के कार्यों का सञ्चालन होता है। ईश्वर ने हममें स्वतन्त्र संकल्प की शक्ति भर दी है जिसके कारण हम परिस्थितियों में चयन करते हैं, विभिन्न विकल्पों में एक को अपनाते हैं। दूसरी ओर ईश्वर ने अचेतन जगत् के नियन्त्रण के लिए यान्त्रिक नियमों को बनाया है जिससे अचेतन जगत् का संचालन होता है परन्तु यान्त्रिक नियमों और संकल्प शक्ति में ईश्वर ही सामञ्जस्य स्थापित कर सकता है। ग्यूलिंक्स इशी आशय से कहते हैं कि ईश्वर ने अचेतन में गति और चेतन की संकल्प शक्ति में सामञ्जस्य स्थापित किया है। इसी कारण जब हमारे मन में संकल्प होता है तो उसके अनुरूप शरीर में गति भी होने लगती है।

दूसरी ओर शरीर में गति के अनुरूप मन में संकल्प भी होने लगता है। इसमें कोई आपसी कार्य-कारण का भाव नहीं तथा अन्तक्रिया भी नहीं। दो घड़ियों का समय सूर्य की दैनिक गति से नियन्त्रित किया जाता है। इसी के फलस्वरूप एक घड़ी जितने घण्टों को इङ्गित करती है, दूसरी घड़ी भी उन्हीं घण्टों को प्रदर्शित करती है। इनमें (दोनों घड़ियों में) कोई किसी का न तो कार्य है और न कारण। इसी प्रकार आत्मा और शरीर में भी क्रिया और प्रतिक्रिया होती रहती है। दोनों में पारस्परिक क्रिया का आधार निर्माता की निपुणता है। निर्माता ईश्वर ने दोनों का निर्माण इतनी कला और निपुणता के साथ किया है कि दोनों के कार्य में समता है।

ग्यूलिंक्स के इस सिद्धान्त का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि उनका यह मत देकार्त से बहुत दूर और लाइबनिट्ज के बहुत निकट है। देकार्त के अन्तक्रियावाद में त्रुटि को देखकर ही म्यूलिंक्स ने देहात्मनिमित्तवाद को बतलाया। परन्तु अपने देहात्मनिमित्त्वाद में वे कुशल कलाकार ईश्वर की निपुणता के कारण ही चेतन और अचेतन में क्रिया मानते है। लाइबनिट्ज ने अपने पूर्व स्थापित सामञ्जस्य सिद्धान्त में बतलाया कि चेतन और अचेतन में क्रिया और प्रतिक्रिया सृष्टि के पूर्व ईश्वर के द्वारा स्थापित कर दी गई है। यद्यपि ग्यूलिंक्स और लाइबनिट्ज के दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न हैं फिर भी ग्यूलिंक्स का देहात्मनिमित्तवाद लाइबनिट्ज के पूर्व स्थापित सामञ्जस्य का एक रूप सा लगता है।

 

मेलेनाञ्च(Malebranche)

ग्यूलिंक्स के समान मेलेब्राञ्च ने भी शरीर और आत्मा में अन्तक्रिया का विरोध किया है। उनके अनुसार भी शरीर और आत्मा में क्रिया-प्रतिक्रिया का कारण ईश्वर है। मेलब्राञ्च का कहना है कि हमारे सभी शारीरिक और मानसिक व्यवहारों का आधार ईश्वर है। अत: पदार्थ स्वयं निष्क्रिय होता है, उसमें गति स्वयं नहीं उत्पन्न हो सकती। इसके लिए ईश्वर की आवश्यकता है। इसी प्रकार मानसिक क्रियाएँ भी ईश्वर के बिना नहीं हो सकतीं। परन्तु यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न उपस्थित होता है कि यदि सभी प्रकार की क्रियाएँ ईश्वरेच्छा से ही सम्पन्न होती हैं तो मनुष्य पाप क्यों करता है? क्या ईश्वर मनुष्य से पाप कर्म कराना चाहता है? एक सच्चे इसाई के रूप में मेलेब्राञ्च इसका उत्तर यही देते हैं कि मनुष्य के पाप का कारण मानव का आदिम पतन (Fall) है। आदिम पतन के कारण मनुष्य संसारी बना तथा संसार के विषय वासनाओं का दास (आदम और ईश्वर की आदिम भूल) बना। इसी कारण मानव का पवित्र ज्ञान नष्ट हो गया तथा (शैतान के वश में होकर) उसमें पाप की प्रवृत्ति आ गई। अतः पाप का कारण ईश्वर नहीं है।

 

 

 

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