विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग तथा माध्यमिक शिक्षा आयोग

विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग, माध्यमिक शिक्षा आयोग तथा शिक्षा आयोग (1964-66)

विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग

भारत सरकार ने विश्वविद्यालयी शिक्षा के पुनर्गठन के सम्बन्ध में विधियाँ और साधन तथा साधन सुझाने हेतु एक विश्विविद्यालय शिक्षा आयोग डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में 1948 में नियुक्त किया, जिसे राधाकृष्णन आयोग से जाना गया। सन् 1949 में इसने अपनी आख्या प्रस्तुत की।

 

विश्वविद्यालयी शिक्षा के उद्देश्य

इस आयोग ने विश्वविद्यालयी शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य प्रस्तुत किए-

(1) विश्वविद्यालय राजनीति, प्रशासन, व्यवसायों, उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में नेतृत्व प्रदान करें। 

(2) विश्वविद्यालयों को सभ्यता का अवयव होना चाहिए और वे सभ्यता के मानसिक अग्रदूतों को प्रशिक्षित करें।

(3) विश्वविद्यालय बौद्धिक साहसिकों को जन्म दें।

(4) विश्वविद्यालय ऐसे बुद्धिमान व्यक्तियों का सृजन करें, जो प्रजातंत्र को सफल बनाने के लिए ज्ञान का विकीरण कर सकें, जो नवीन ज्ञान की सतत् खोज में रत रहें तथा जो जीवन का अर्थ प्रदान करने के लिए निरंतर प्रयत्न करते रहें।

(5) शिक्षा की विषयवस्तु- आधुनिक प्रगति में जो सबसे अच्छा है, उसे स्वीकार करें, किन्तु अपने अतीत की सांस्कृतिक परम्परा को न छोड़ें।

(6) विश्वविद्यालय छात्रों का आध्यात्मिक विकास करें। 

(7)विश्वविद्यालय देश की संस्कृति और सभ्यता का संरक्षण करें और हमें सभ्य कहलाने के लिए विश्वविद्यालय दोनों के प्रति सहानुभूति, स्त्रियों के प्रति आदर, शांति और स्वतंत्रता के प्रति प्रेम तथा क्रूरता एवं अन्याय के प्रति घृणा के आदर्शों को छात्रों में प्रकट करें।

(8) विश्वविद्यालय व्यक्ति में निहित गुणों की खोज करें तथा उन्हें विकसित करें।

(9) विश्वविद्यालय छात्रों में मानसिक विकास के साथ-साथ उनका शारीरिक विकास भी करें।

(10) विश्वविद्यालय सामान्य शिक्षा में मातृभाषा को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान करें।

(11) हम न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की सिद्धि के द्वारा प्रजातंत्र की खोज में संलग्न हैं, अस्तु विश्वविद्यालयों को इन आदर्शों का प्रतीक एवं रक्षक होना चाहिए।

इस आयोग ने भारतीय शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य निर्धारित किए-

(1) विवेक का विस्तार करना।

(2) नए ज्ञान के लिए इच्छा जागृत करना।

(3) जीवन का अर्थ समझने के लिए प्रयत्न करना।

(4) व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था करना।

 

 

माध्यमिक शिक्षा आयोग (1952-53)

विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (1948-49) ने यह विचार व्यक्त किया था कि माध्यमिक शिक्षा के उन्नयन के बिना उच्च शिक्षा का समुचित विकास संभव नहीं है, इसलिए सन् 1952 में भारत सरकार ने माध्यमिक शिक्षा आयोग डॉ. ए. लक्ष्मण स्वामी मुदालियर की अध्यक्षता में नियुक्त किया। अतः इसे मुदालियर आयोग भी कहा जाता है। इस आयोग ने 1953 में अपनी आख्या प्रस्तुत की और शासन ने इसे स्वीकृति प्रदान की।

 

माध्यमिक शिक्षा आयोग ने व्यक्ति तथा भारतीय समाज की आवश्यकताओं को दृष्टि में रखते हुए शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य निर्धारित किए-

(1) प्रजातांत्रिक नागरिकता का विकास।

(2) व्यावसायिक दक्षता का उन्नयन।

(3) व्यक्तित्व का विकास।

(4) नेतृत्व के लिए शिक्षा।

 

(1) प्रजातांत्रिक नागरिकता का विकास (Development of Democratic citizenship):

 

देश के जनतंत्र को सबल एवं सफल बनाने के लिए प्रत्येक बालक को सच्चा, ईमानदार तथा कर्मठ नागरिक बनाना अति आवश्यक है। इसके लिए शिक्षा का परम उद्देश्य बालकों को जनतांत्रिक नागरिकता की शिक्षा देना है, जिससे वे स्वतंत्र रूप से। चिंतन कर सही निर्णय लेने के योग्य बन सकें। बालक शिक्षित होने के उपरान्त सत्य और असत्य, वास्तविकता और प्रचार में अंतर स्पष्ट कर विभिन्न समस्याओं के विषय में वैज्ञानिक दृष्टिकोण द्वारा अपना निजी निर्णय ले सकें।

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(2) व्यावसायिक दक्षता का उन्नयन (Improvement of Vocational efficiency):

शिक्षा का उद्देश्य बालकों में व्यावसायिक कुशलता की उन्नति करना है। इसके लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण की आवश्यकता है। अतः बालकों के मन में श्रम के प्रति आ तथा रुचि उत्पन्न करना एवं हस्तकला के कार्यों पर बल देना परमावश्यक है। पाठय में विभिन्न व्यवसायों को उचित स्थान दिया जाए, जिससे प्रत्येक बालक अपनी रुचि व्यवसाय चन सके। इससे एक ओर व्यवसायों के लिए कुशल और प्रशिक्षित कारीगर सकेंगे तथा दूसरी ओर औद्योगिक प्रगति के कारण देश की आर्थिक दशा में सुधार संभव हो सकेगा।

 

(3) व्यक्तित्व का विकास (Development of Personality):

शिक्षा का उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास करना है। बालक के व्यक्तित्व के विकास का अर्थ बालक के बौद्धिक, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा व्यावहारिक आदि सभी पक्षों एवं रचनात्मक शक्तियों के विकास से है। इस उद्देश्य के अनुसार बालकों को क्रियात्मक एवं रचनात्मक कार्यों के लिए प्रेरित करना पड़ेगा।

उनमें साहित्यिक, कलात्मक एवं सांस्कृतिक आदि विविध रुचियों का इस प्रकार से सृजन करना होगा ताकि वे आत्माभिव्यक्ति, आत्मबोध, सांस्कृतिक तथा सामाज सम्पत्ति में वृद्धि, अवकाश के समय का सदुपयोग तथा चहँमुखी विकास करने में सक्षम हो सकें।

 

(4) नेतृत्व के लिए शिक्षा (Education for Leadership):

शिक्षा का उद्देश्य ऐसे नागरिकों का निर्माण करना हो जो देश को आदर्श नेतृत्व प्रदान कर सकें। इसके अनुसार बालकों में अनुशासन, सहनशीलता, त्याग, सामाजिक भावनाओं की समझदारी तथा नागरिक एवं व्यावहारिक कुशलता आदि गुणों का विकास सम्मिलित है। इन गुणों के विकसित होने पर वे हर क्षेत्र में अपने उत्तरदायित्व को सफलतापूर्वक निभाते हुए देश का सही नेतृत्व कर सकेंगे।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् प्राथमिक अथवा प्रारंभिक शिक्षा के संबंध में कोई आयोग या महत्त्वपूर्ण समिति नहीं बनाई गई। उसके संबंध में केवल भारतीय संविधान में ही उल्लेख मिलता है। संविधान के अनुच्छे-45 में यह शिक्षा नीति घोषित की गई कि राज्य को 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए। यह संकल्प 1960 तक पूर्ण होना चाहिए।

 

 

शिक्षा आयोग (1964-66)

सन् 1964 में भारत सरकार ने यह विचार कर कि शिक्षा के सभी स्तरों पर सुधार एवं प्रगति अपेक्षित है और सभी पर समग्र रूप से विचार होना चाहिए, ‘शिक्षा आयोग‘ की नियुक्ति की, जिसका कार्य था, राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली’ तथा शिक्षा के सभी स्तरों और सभी पक्षों के विकास के सामान्य सिद्धान्तों एवं नीतियों पर शासन को परामर्श देना। इस आयोग ने 1966 में आख्या प्रस्तुत की। इसके अध्यक्ष डॉ. सी.एस. कोठारी थे। इस आयोग द्वारा प्रस्तुत आख्या को शिक्षा और राष्ट्रीय विकास (Education and National Development) का नाम दिया गया। विभिन्न भागों में शिक्षाविदों, शिक्षकों एवं शिक्षक प्रशासकों के विचारों, संविधान की मान्यताओं और उसके प्रावधानों, अतीत के अनुभवी एवं भावी भारत की आशाओं एवं आकांक्षाओं को दृष्टिगत रखते हुए शिक्षा आयोग ने शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य प्रस्तुत किए-

(1) शिक्षा को जीवन की आवश्यकताओं और जनता की आकांक्षाओं से सम्बद्ध किया जाए।

(2) शिक्षा को उत्पादन से संबद्ध किया जाए।

(3) शिक्षा सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकीकरण का प्रतिपादन करने तथा राष्ट्रीय चेतना जागृत करने में अपनी भूमिका अदा करे।

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(4) शिक्षा आधुनिकीकरण को बढ़ावा दे।

(5) शिक्षा सामाजिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूलयों की प्रस्थापना कर उनका विकास करे।

(6) पूर्व प्राथमिक शिक्षा का बालक के शारीरिक, भावात्मक एवं मानसिक विकास हेतु अत्यधिक महत्व है, विशेष रूप से उन बच्चों के लिए जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि असन्तोषजनक है।

(7) प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य उत्तरदायित्वपूर्ण एवं उपयोगी नागरिक तैयार करना है।

(8) विश्वविद्यालयी शिक्षा के उद्देश्य निम्न प्रकार होने चाहिएं-

(क) नवीन ज्ञान की खोज एवं इसका संवर्धन करना, सत्य की खोज में प्रबल रूप से तथा निर्भय होकर संलग्न होना तथा प्राचीन ज्ञान की व्याख्या नवीन आवश्यकताओं एवं खोजों की दृष्टि से करना।

(ख) जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नेतत्व प्रदान करना, प्रतिभाशाली युवकों की पहचान करना और उन्हें शारीरिक स्वस्थता के संवर्द्धन, मानसिक शक्तियों के विकास तथा उचित रुचियों, दृष्टिकोणों और नैतिक एवं बौद्धिक मूल्यों के संवर्द्धन द्वारा उनमें निहित संभाव्यता विकसित करने में उनकी सहायता करना।

(ग) समाज को कृषि, कलाओं, चिकित्सा शास्त्र, विज्ञान और अन्य विभिन्न व्यवसायों में निपुण ऐसे स्त्री-पुरुष उपलब्ध कराना जो साथ ही सुसंस्कृत एवं सामाजिक उद्देश्य से प्रेरित हों।

(घ) समानता और सामाजिक न्याय के उन्नयन हेतु प्रयास करना और ज्ञान के विकीरण द्वारा सामाजिक एवं सांस्कृतिक अन्तरों को कम

करना।

(ड) शिक्षकों ओर विद्यार्थियों तथा उनके माध्यम से सामान्य रूप से समाज में ऐसे दृष्टिकोणों और मूल्यों का पोषण करना, जो व्यक्तियों और समाज में अच्छा जीवन विकसित करने के लिए आवश्यक हैं।

(च) वे राष्ट्र की चेतना के रूप में सेवारत होना सीखें।

(छ) वे विद्यालयों में गुणात्मक उन्नयन के प्रयासों में सहायता करें।

 

 

10+2 शिक्षा के अन्तर्गत शिक्षा के उद्देश्य

शिक्षा नीति 1986 के भाग-3 के अन्तर्गत राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था का वर्णन है। राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था के अन्तर्गत यह जरूरी है कि सम्पूर्ण देश में एक ही प्रकार की शैक्षिक संरचना हो। 10 + 2 + 3 के ढांचे को पूरे देश में स्वीकार कर डस ढाँचे के पहले 10 वर्षों के सम्बन्ध में यह प्रयास किया जायेगा कि इसका इस प्रकार हो-प्रारंभिक शिक्षा में 5 वर्ष का प्राथमिक स्तर और 3 वर्ष का उच्च प्राथमिक स्तर तथा उसके बाद 2 वर्ष का हाई स्कूल।

राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था पूरे देश के लिए एक राष्ट्रीय शिक्षाक्रम के ढाँचे पर आधारित होगी, जिसमें एक सामान्य केन्द्रिक (Common core) होगा और अन्य हिस्सों की बाबत लचीलापन रहेगा, जिन्हें स्थानीय पर्यावरण एवं परिवेश के अनुसार ढाला जा सकेगा। सामान्य केन्द्रिक’ में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास, संवैधानिक जिम्मेदारियाँ तथा राष्ट्रीय अस्मिता से सम्बन्धत अनिवार्य तत्व शामिल होंगे। ये मुद्दे किसी एक विषय का हिस्सा न होकर लगभग सभी विषयों में पिरोये जायेंगे। इनके द्वारा राष्ट्रीय मूल्यों में ये बातें शामिल हैं- हमारी समान सांस्कृतिक धरोहर, लोकतंत्र, धर्म निरपेक्षता, स्त्री-पुरुष के बीच समानता, पर्यावरण का संरक्षण, सामाजिक समानता, सीमित परिवार का महत्व और वैज्ञानिक तरीकों के उपयोग की आवश्यकता। यह सुनिश्चित किया जावेगा कि सभी शैक्षिक कार्यक्रम धर्म निरपेक्षता के मूल्यों के अनुरूप ही आयोजित हों।

उपरोक्त विवरण से 10+2 के उद्देश्य उभर कर सम्मुख आये हैं वे इस प्रकार हैं-

(1) जनतंत्र एवं संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन

(2) राष्ट्रीय धरोहरों की रक्षा

(3) राष्ट्रीय मूल्यों को जीवन का अंश बनाना,

(4) राष्ट्रीय एवं भावात्मक एकता का विकास

(5) विश्वव्यापी दृष्टिकोण, अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग तथा शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की भावना का विकास।

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