शिक्षा के उद्देश्य एवं लक्ष्य

मूल्य शिक्षा क्या है एवं महत्व, शिक्षा के उद्देश्य एवं लक्ष्य, उद्देश्यों का अर्थ | What is Value Education in Hindi

शिक्षा में मूल्य, उद्देश्य तथा लक्ष्यों का सम्बन्ध एवं शिक्षा में इनका महत्त्व

(अ) मूल्य शिक्षा क्या है एवं महत्व है (Relation of Values with Education and their importance in Education)

शिक्षा, दर्शन का क्रियात्मक पक्ष स्वीकार किया जाता है। दर्शन शिक्षा के उद्देश्यों, पाठ्यक्रम आदि का निर्माण करता है। पर जानना यह है कि दर्शन किस प्रकार शिक्षा के उद्देश्य निर्धारित करता है? उत्तर में कहा जा सकता है कि दर्शन, जीवन-लक्ष्य निर्धारित करता है और जैसे जीवन के लक्ष्य होते हैं, वैसे ही शिक्षा के उद्देश्य भी होते हैं। अर्थ स्पष्ट है कि दर्शन, मूल्यों का निर्धारण करता है तथा ‘मूल्य शिक्षा के उद्देश्य निर्धारित करते हैं और जिस प्रकार के शिक्षा के उद्देश्य होते हैं, वैसा ही उसका पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियाँ आदि हुआ करते हैं। मूल्यों की अनुपस्थिति में शिक्षा दिशाविहीन है, मूल्य ही शिक्षा को दिशा देते है। अतः समझना चाहिए कि मूल्य शिक्षा के निर्देशक हैं, शिक्षा के स्वरूप-निर्धारण के निर्देशक तत्त्व हैं। अतः कहा जा सकता है कि ‘मूल्य’ शिक्षा का आधार होने के फलस्वरूप शिक्षा इनसे सीधे जुड़ी हुई है। दूसरे चूँकि इनके बिना शिक्षा के स्वरूप (उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधियों आदि) की संकल्पना नहीं की जा सकती। अतः शिक्षा के क्षेत्र में मूल्यों के अध्ययन का विशिष्ट स्थान है।

 

 

(ब) शिक्षा के लक्ष्य एवं उद्देश्य का महत्त्व(Importance of Aims and Objectives in Education)

उद्देश्यों और लक्ष्यों की अनुपस्थिति में शिक्षा तो क्या, जीवन के किसी भी पहलू में आगे बढ़ना कठिन होता है, क्योंकि इस प्रकार उद्देश्यों और लक्ष्यों की अनुपस्थिति में बढ़ना विनाश का कारण ही बनता है। अतः कहा जा सकता है कि किसी भी प्रक्रिया के लिए दिशा तथा लक्ष्य निर्धारण अनिवार्य है। इसके बिना हम नहीं जान पायेंगे, कि किधर जा रहे हैं? हमारे द्वारा निश्चित की जाने वाली दिशा सही है अथवा नहीं। हम आगे किस मात्रा में बढ़े हैं? हमारा लक्ष्य हमारे से कितनी दूरी पर है? लक्ष्य प्राप्ति में कहां और क्या दोष है? इत्यादि।

 

शिक्षा सीखने-सिखाने की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के कारण मानव-व्यवहार में परिवर्तन होता है। हम जब तक व्यवहार परिवर्तन की दिशा एवं लक्ष्य निश्चित नहीं करेगे, तब तक यह प्रक्रिया ठीक से न चल पायेगी। इसलिए शिक्षा में उद्देश्यों और लक्ष्यों का निर्धारण आधारभूत क्रिया स्वीकार किया जाता है।

 

हमें सर्वप्रथम व्यापक उद्देश्यों का निर्धारण करना होता है। तत्पश्चात् विशिष्ट एवं स्पष्ट लक्ष्यों का, जिनकी सम्प्राप्ति हमारा परम उद्देश्य होता है तथा जिनको शिक्षण क्रिया द्वारा ग्रहण किया जा सकता है। वास्तव में लक्ष्य वे बिन्दु हैं, जिनकी दिशा में कार्य करते हुए उसे उपलब्ध किया जाता है। इसके अनुसार शिक्षण-लक्ष्य के अन्तर्गत तीन बातें निहित होती हैं-

(अ) दिशा

(ब) नियोजित परिवर्तन

(स) तत्सम्बन्धी क्रिया

 

शिक्षण द्वारा हम बालक के व्यवहार में परिवर्तन लाना चाहते हैं। अतः यह स्पष्ट तौर पर निश्चित करना होता है कि उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित क्या परिवर्तन लाना चाहते हैं। इसके अतिरिक्त पाठ्यवस्तु-विश्लेषण एवं विभिन्न शिक्षण-नीतियों, युक्तियों, शिक्षण-सहायक सामग्री आदि के सम्बन्ध में निर्णय लेने में भी मदद मिलती है।

मानव जो भी कार्य करता है उसके पीछे कुछ न कुछ उद्देश्य अवश्य निहित होता है। उद्देश्य को निश्चित एवं स्पष्ट किए बिना यदि कोई कार्य कर भी लिया जाये तो उसकी सफलता सदैव संदिग्ध ही रहती है। उद्देश्य विहीन कार्य की तुलना उस नाविक से की जा सकती है, जो नाव खे तो रहा है परन्तु उसे यह ज्ञात नहीं कि अंत में किस स्थान पर पहुँचना है। अतः किसी भी कार्य को प्रारंभ करने से पूर्व उसके उद्देश्यों का निर्धारण करना पड़ता है। जब तक उद्देश्यों को निर्धारित नहीं किया जाता, उन्हें प्राप्त करने की योजना बनाना व्यर्थ है। स्पष्ट और पूर्व निर्धारित उद्देश्य किसी भी कार्य की सफलता की ओर संकेत करते हैं तथा कार्य को निश्चित दिशा एवं मार्गदर्शन प्रदान करते हैं उद्देश्य कार्य को गति प्रदान करते हैं, समस्या प्रस्तुत करते हैं तथा वांछित आदर्श निश्चित करते हैं, इसीलिए यह आवश्यक है कि कार्य प्रारंभ करने से पूर्व उद्देश्यों का निर्धारण कर लेना चाहिए।

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उद्देश्यों के संबंध में एक बात निर्विवाद सत्य है कि यह आवश्यक नहीं कि जो भी उद्देश्य निर्धारित किए जायें उन सभी की प्राप्ति संभव हो। अनेक स्थितियाँ, परिस्थितियाँ और अवस्थाएँ ऐसी उत्पन्न हो सकती हैं, जो उद्देश्यों की सम्प्राप्ति में बाधक अथवा साधक सिद्ध हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में उद्देश्यों की प्राप्ति हो भी सकती है और नहीं भी। वास्तविक उद्देश्यों को सामान्य आदर्शात्मक और प्रमुख रूप से अमूर्त तथा पर्याप्त मात्रा में प्राप्ति से परे होना चाहिए। उद्देश्य अधिक व्यापक तथा उदार होते हैं, इसलिए इनमें निश्चितता कम होती है।

 

उद्देश्यों का अर्थ क्या है?

शिक्षा एक सौद्देश्य प्रक्रिया है। उपर्युक्त तथा पूर्व निर्धारित उद्देश्यों के अभाव में किसी भी प्रकार की फलदायक शिक्षा की कल्पना भी संभव नहीं। कोई भी शिक्षा या कैसी भी शिक्षा पूर्व निर्धारित उद्देश्यों के अभाव में सफलतपूर्वक सम्पादित नहीं की जा सकती है। शिक्षा के क्षेत्र में निरुद्देश्य क्रिया की कल्पना करना असंभव है। उद्देश्य ही आदर्शों का ज्ञान कराते हैं। यह सत्य है कि उद्देश्य आदर्शमूलक, दूरवर्ती तथा प्राप्त करने में कठिन होते हैं, फिर भी आवश्यक होते हैं। शिक्षा गत्यात्मक प्रक्रिया होने के नाते परिवर्तनशील है। शिक्षा सामाजिक प्रक्रिया है। समाज में भी परिवर्तन वांछनीय है। अतः शिक्षा के उद्देश्य समाज द्वारा मान्य एवं स्वीकृत होने आवश्यक हैं। यदि ऐसा नहीं होगा तो न तो समाज उन्हें मान्यता देगा और न ही उनकी सम्प्राप्ति में सहायक सिद्ध होगा और न ही ऐसे उद्देश्य प्रभावी हो सकते हैं। समाज ऐसे उद्देश्यों को कभी स्थिर नहीं रहने देगा अर्थात् समाज ऐसे उद्देश्यों को नकार देगा।

यह भी आवश्यक नहीं कि उद्देश्यों को शिक्षण द्वारा प्रत्यक्ष रूप में तत्क्षण ही प्राप्त किया जा सके। उद्देश्यों को तो परोक्ष रूप में तथा पर्याप्त समय के उपरान्त भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। साथ ही साथ यह भी आवश्यक नहीं कि उद्देश्यों की सम्प्राप्ति मात्र भौतिक रूप में ही हो। उद्देश्यों की प्राप्ति परिवर्तित दृष्टिकोण, रुचि, अभिरुचि, अभियोग्यता, चरित्र तथा जीवन मूल्यों के रूप में भी हो सकती है।

उद्देश्यों की वास्तविकता इस बात में है कि वे शिक्षार्थियों के सम्मुख करणीय कार्य एवं उचित समस्याएँ प्रस्तुत करें। ये कार्य एवं समस्याएँ ऐसी हों जिन्हें शिक्षार्थी समझ सके, जो प्राप्य हों तथा जिनमें असम्भाव्यता का अंश न हो। वे उद्देश्य जो प्रारंभ में ही असम्भव प्रतीत हों, उन्हें प्राप्त करने का न तो शिक्षार्थी प्रयास ही करेगा और न ही वे उन्हें प्रेरणा दे सकेंगे।

उद्देश्यों की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए वेस्ले तथा रान्सकी ने लिखा है कि उद्देश्यों में अग्रलिखित गुणों का समावेश होना चाहिए-

(1) उद्देश्य समाज द्वारा मान्य हों।

(2) उद्देश्यों की शिक्षण द्वारा प्राप्ति की सम्भावना हो।

(3) उद्देश्य सम्भव समस्या को प्रस्तुत करें।

(4) शिक्षार्थियों द्वारा ग्राह्य हों।

 

शिक्षा के उद्देश्यों को परिभाषित करते हुए बी.एस.ब्लूम ने लिखा है कि- “शैक्षिक उद्देश्य केवल ध्येय मात्र नहीं हैं जिनके तदनुरूप पाठ्यक्रम को रूप प्रदान करना है या जिनके अनुसार शिक्षण को दिशा प्रदान करनी है अपति ये वे ध्येय हैं जिनके अनुसार मूल्यांकन तकनीकियों का निर्माण एवं प्रयोग करना है।”

भारतीय माध्यमिक शिक्षा आयोग (Secondary Education Commission) ने शिक्षा के उद्देश्यों की विशेषताओं के संबंध में लिखा है कि- “शिक्षा व्यवस्था को आदतों, अभिरुचियों, चारित्रिक गुणों के विकास में आवश्यक रूप से योगदान करना चाहिए, जिससे नागरिक प्रजातंत्रीय नागरिकता के उत्तरदायित्वों का निर्वाह कर सके तथा उन सभी विनाशात्मक प्रवृत्तियों का विरोध कर सके जो व्यापक राष्ट्रीय तथा धर्म निरपेक्ष दृष्टिकोण के विकास में बाधक होते हैं।”

उद्देश्यों के संबंध में स्पष्ट है कि “शिक्षा का कोई एक अंतिम उद्देश्य नहीं होता ओर न होना भी चाहिए। शिक्षा बहुआयामी है अतः उसका उद्देश्य भी कोई एक हो ही नहीं सकता। समाज गतिशील एवं परिवर्तनशील है। देश एवं समाज की अवश्यकताएँ बदलती रहती हैं। आज भारत एक लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। आज के भारत एवं भारतीय समाज की आशाएँ, अपेक्षाएँ एवं आवश्यकताएँ प्राचीन समय से भिन्न हैं। अतः आज के उदीयमान भारतीय समाज को ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है, जो समाज एवं देश को सही प्रकार से विकसित और समृद्ध होने में मदद दे सके; शिक्षा उन संवेदनों तथा दृष्टिकोणों को परिमार्जित करती है, जिनसे राष्ट्रीय एकता, वैज्ञानिक-स्वरूप और मस्तिष्क तथा आत्मा की स्वतंत्रता बनती है।

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राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में स्पष्ट उल्लेख किया गया है- “शिक्षा सुसंस्कृत बनाने का माध्यम है। यह हमारी संवेदनशीलता और दृष्टि को प्रखर करती है, जिससे राष्ट्रीय एकता पनपती है, वैज्ञानिक सोच की प्राप्ति की सम्भावना बढ़ती है और समझ व चिन्तन में स्वतंत्रता आती है। साथ ही शिक्षा हमारे संविधान में प्रतिष्ठित समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के लक्ष्यों की प्राप्ति में अग्रसर होने में हमारी सहायता करती है। अतः शिक्षा के उद्देश्यों को भी देश एवं काल के अनुसार बदलते रहना चाहिए।

 

 

शिक्षा का ऐतिहासिक प्ररिप्रेक्ष्य

शिक्षा गत्यात्मक तथा परिवर्तनशील प्रक्रिया है। अतः इसके उद्देश्य भी परिवर्तित होते रहते हैं। यह आवश्यक भी है कि उद्देश्यों को देश और काल के अनुसार परिवर्तित होते रहना चाहिए, तभी वे समाज, देश और राष्ट्र के नागरिकों को गतिशील बनाकर उन्नति के शिखर पर ले जा सकते हैं। प्राचीन समय में एथेन्स में शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य अपने देशवासियों का राजनैतिक, बौद्धिक नैतिक तथा सौन्दर्यात्मक विकास करना था। भारत में भी शिक्षा के उद्देश्य इसी प्रकार के थे, परन्तु शिक्षा एक वर्ग विशेष तक ही सीमित थी। प्राचीन काल में भारत में जीवन के हर क्षेत्र में धर्म की प्रधानता रही है।

धर्म से तात्पर्य उन समस्त व्यवस्थाओं, परम्पराओं, रीतियों और रिवाजों से है जो मनुष्य और समाज को उचित-अनुचित का ज्ञान कराते हुए कर्तव्य-कर्म की प्ररेणा देता था। इसीलिए उस समय शिक्षा के उद्देश्य भी इन्हीं का समावेश करते हुए निर्धारित किए गए थे। स्पार्टा (Sparta) की शिक्षा व्यवस्था इस लक्ष्य को ध्यान में रख कर निर्धारित की गई कि उस देश के नागरिक वीर सैनिक बनें। उस समय उस देश की विचारधारा थी कि प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए नहीं वरन् राष्ट्र के लिए पैदा होता है। मध्य युग में शिक्षा पर धार्मिक प्रभाव इतना प्रबल हो गया कि शिक्षा के उद्देश्य भी धार्मिक हो गए। वैदिक संस्कृति में जीवन में चार पुरुषार्थों की कल्पना की गई। प्रत्येक व्यक्ति को इनकी प्राप्ति हेतु प्रयत्न करना चाहिए, तभी उसका जीवन सफल माना जाता था। ये चार पुरुषार्थ थे-धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष और इनका ध्यान रख कर ही मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता था।

इस युग में शिक्षा के उद्देश्य भी इन्हीं तत्वों से प्रभावित रहे। मानवतावादियों (Humanists) ने उदार शिक्षा (Liberal Education) को पुनः जाग्रत किया तथा स्वतंत्र व्यक्ति (Free Man) के विकास के लिये शिक्षा की रचना की। इन उदारवादियों में कामेनियस (Comenious), लाक (Locke), रूसो (Rousseau) तथा काण्ट (Kant) प्रमुख थे, जिन्होंने व्यक्तिगत उद्देश्यों को प्राथमिकता दी। इनके अनुसार शिक्षा के उद्देश्य व्यक्ति को दैवीय आन्तरिक सुख पहुंचाना, व्यक्ति की समस्त स्वतंत्र शक्तियों तथा प्राकृतिक शक्तियों का विकास करने का अवसर इस प्रकार प्रदान करना था ताकि वे अपना विकास स्वेच्छापूर्वक कर सके, किन्तु हीगल (Hegal) ने व्यक्तिगत उद्देश्यों की अपेक्षा सामाजिक उद्देश्यों को अधिक प्रधानता दी। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र के लिए है अतः शिक्षा द्वारा व्यक्ति में राष्ट्रीयता का विकास करना परमावश्यक है।

हरबर्ट स्पेन्सर (Herbart Spencer) ने शिक्षा में वैज्ञानिक प्रवृत्ति का समावेश करते हुए लिखा है कि “शिक्षा के द्वारा बालक को पूर्ण जीवन (Complete Living) के लिये तैयार करना चाहिए।”

 

 

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