जॉर्ज बर्कले की जीवनी

जॉर्ज बर्कले की जीवनी और दार्शनिक विचार | George Berkeley in Hindi

जॉर्ज बर्कले (George Berkeley)[सन् १६८५ ई. से सन् १७५३ ई.]

जॉर्ज बर्कले का जन्म आयरलैण्ड के किल्केनी (Kilkenny) प्रान्त में सन १६८५ ई. में हुआ था। उनके माता-पिता इसाई धर्म के मानने वाले थे। बर्कले की प्रारम्भिक शिक्षा किल्केनी कॉलेज (Kilkenny College) में हुई और तत्पश्चात् १५ वर्ष की आयु से ट्रिनिटी कॉलेज, डब्लिन (Trinity College, Dublin) में हुई। ट्रिनिटी कॉलेज उन दिनों ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज आदि सभी से अधिक महत्त्वपूर्ण समझा जाता था। यहाँ उन्होंने गणित, भौतिक शास्त्र, धर्म शास्त्र आदि अनेक शास्त्रों का अध्ययन किया| यहाँ बर्कले न्यूटन तथा जॉन लॉक के विचारों से अधिक प्रभावित हुए।

सन् १७०४ ई. में बर्कले ने बी. ए. की परीक्षा पास की तथा सन् १७०७ ई. में उसी विद्यालय के फेलो (Fellow) नियुक्त किये गए। यहाँ उन्होंने अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे। अध्ययन के अतिरिक्त बर्कले की पर्यटन आदि में भी अभिरुचि थी। सन् १७१३ ई. में इन्होंने फ्रांस, इटली आदि देशों की यात्रा की। इस पर्यटन काल में ही वे स्विफ्ट, एडिसन, स्टील, पोप आदि के साहित्यिक संस्थानों के सम्पर्क में आए। सन् १७२१ ई. में ये डब्लिन लौटे तथा सन् १७२५ ई. में डीन ऑफ डेरी (Dean of Derry) के पद पर नियुक्त किये गए। सन् १७२८ ई. में इन्होंने अमेरिका की यात्रा की तथा न्यूपोर्ट रोड आइलैण्ड (Newport Road Island) में कुछ काल तक निवास किया। यहाँ वे सेम्युएल जॉनसन नामक आलोचक के सम्पर्क में आए।

सन् १७३१ ई. में पुनः लन्दन लौटे, सन् १७३४ ई. में इन्हें आयरलैण्ड के क्लोन का बिशप (Bishop of Cloyne) नियुक्त किया गया। इस पद पर वे बहुत दिनों तक कार्य करते रहे। सन् १७५२ ई. के ग्रीष्म काल से इनका स्वास्थ्य बिगड़ना। प्रारम्भ हो गया तथा १४ जनवरी १७५३ को इनकी मृत्यु हो गयी। इनकी मृत्यु अचानक हुई जब उनकी पत्नी कोरिन्थयास प्रथम’ ग्रन्थ का पन्द्रहवाँ अध्याय इन्हें सुना रहीं थीं। इनका अन्तिम संस्कार, क्राइस्ट चर्च में हुआ।

 

 

बर्कले के मुख्य ग्रन्थ

कॉमन प्लेस बुक (Common Place Book) सन् १७०५ ई. में, ऐन एसे टुवर्ड्स ए न्यू थियरी ऑफ विजन (An Essay Towards A New Theory of Vision) सन् १७०९ ई. में, ए ट्रिटाइज कन्सर्निंग द प्रिन्सिपल्स ऑफ अण्डरस्टैण्डिंग प्रथम भाग (A Treatise Concerning the Principles of Understanding, Part ) सन् १७१० ई. में, पैसिव ओबिडिएन्स (Passive Obedience) सन् १७११ ई. में, ऐन एसे टुवर्ड्स प्रिवेण्टिंग दी रूइन ऑफ ग्रेट ब्रिटेन (An Essay Towards Preventing the Ruin of Great Britain) सन् १७२१ ई. में, हाइलस और फिलानस के तीन संवाद (Three Dialogues Between Hylas and Philoneus) सन् १७३१ ई. में, एल्सिफ्रोन या सूक्ष्मदर्शी दार्शनिक (Alciphron or the Minute Philosopher) सन् १७३२ ई. में, द थियरी ऑफ विजन विण्डिकेटेड एण्ड एक्सप्लेण्ड (The Theory of Vision Vindicated and Explained) सन १७३३ ई में द ऐनलिस्ट (The Analyst) सन् १७३४ ई. में, ए डिफेन्स ऑफ फ्री थिंकिंग इना मैथेमैटिक्स (A Defence of Free Thinking in Mathematics) सन् १७३५ ई. में, सिरिज (Siris) सन् १७४४ ई. में इत्यादि।

पाश्चात्य दर्शन के इतिहास में बर्कले का विज्ञानवाद अत्यन्त महत्वपूर्ण है। विज्ञानवाद का प्रारम्भ प्रायः प्लेटो से माना जाता है। इसलिये बर्कले के पूर्व कई विज्ञानवादी दार्शनिक हो चुके हैं, परन्तु बर्कले के दर्शन में विज्ञानवाद का चरम उत्कर्ष है। बर्कले के पूर्ववर्ती दार्शनिकों ने विज्ञानवाद को स्वीकार तो किया है, परन्तु विज्ञान और वस्तु के द्वैत को किसी ने पूर्णतः समाप्त नहीं किया। दूसरे शब्दों में, भौतिक वस्तु या जड़ पदार्थ का सर्वतोभावेन निषेध किसी ने नहीं किया। बर्कले की यही विशेषता है कि उन्होंने जड़ पदार्थ का पूर्णतः निषेध किया है तथा अध्यात्मवाद की स्थापना की है।

बर्कले मूलतः धार्मिक दार्शनिक हैं। ईश्वर और आत्मा की सत्ता सिद्ध करना ही वे अपना पुनीत कर्त्तव्य समझते हैं। परन्तु ईश्वर, आत्मा आदि आध्यात्मिक विषयों की नींव तभी सुदृढ़ हो सकती है जब भौतिकवाद और नास्तिकवाद की दीवारें धराशायी हो जाँय। इसी कारण बर्कले ने भौतिकवाद (Materialism) और नास्तिकवाद (Atheism) का पूर्णतः खण्डन किया है। बर्कले दार्शनिक होने के पूर्व पादरी थे। समाज में धार्मिक भावों को जगाना वे अपना पावन कर्तव्य समझते थे। इस प्रकार किसी दृष्टि से मध्ययुगीन परम्परा पुनः बर्कले में जग पड़ी। जिस प्रकार मध्य युग में आत्मा, परमात्मा आदि ही प्रमुख दार्शनिक विषय थे, उसी प्रकार बर्कले के दर्शन की मौलिक समस्या आत्मवाद तथा ईश्वरवाद की स्थापना है।

उनकी दृष्टि में आत्मा और ईश्वर की सिद्धि से अध्यात्मवाद की स्थापना हो सकती है। उनके अध्यात्मवाद की व्याख्या करते हुए एक विद्वान् आलोचक (कुशमैन) कहते हैं कि जिस व्यक्ति के चारो ओर बर्कले का दर्शन हो (अर्थात् वह बर्कले की विचारधारा से ही घिरा हो) वह अवश्य ही आध्यात्मिक है। ऐसा व्यक्ति वर्तमान समाज से ऊपर उठ जाता है क्योंकि वह भौतिक समाज का नहीं वरन धार्मिक समाज का व्यक्ति है जो ईश्वर के साथ विहार और वार्तालाप करता है।

अध्यात्मवाद की स्थापना के लिये बर्कले का सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ सिरिज है। इस ग्रन्थ में बर्कले ने पूर्णतः भौतिकवाद का खण्डन किया है। उनके अनुसार संसार की प्रत्येक वस्तु परम निःश्रेयस (Supreme good) से सञ्चालित होती है। अतः जगत निष्प्रयोजन तथा भौतिक नहीं, वरन् सप्रयोजन तथा आध्यात्मिक है। इस प्रकार हम संक्षेप में कह सकते हैं कि बर्कले के दर्शन की मौलिक समस्याएँ दो हैं – भौतिकवाद का खण्डन और अध्यात्मवाद का मण्डन। इस अध्यात्मवाद या ईश्वरवाद की सिद्धि के लिये बर्कले प्रत्ययवाद (Idealism) का सहारा लेते हैं या उनका ईश्वरवाद प्रत्ययवाद पर आधारित है।

प्रत्ययवाद या विज्ञानवाद वस्तु के स्थान पर विज्ञान को ही सत् बतलाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार हमें वस्तु की नहीं, वरन् विज्ञान की ही उपलब्धि होती है। बर्कले अपने विज्ञानवाद की सिद्धि से ईश्वर, आत्मा आदि आध्यात्मिक विषयों की सिद्धि करते हैं। वस्तुतः जिसे हम देख करके या स्पर्श करके जानते हैं वह भौतिक वस्तु नहीं विज्ञान रूप ही है। विज्ञान के अतिरिक्त हम किसी वस्तु को देख या स्पर्श नहीं कर सकते।

तात्पर्य यह है कि तथाकथित वस्तु का अस्तित्व तो देखने या छूने पर है परन्तु देखना और छूना तो विज्ञान है| इन विज्ञानों का अस्तित्व मन या आत्मा पर निर्भर है। अतः वस्तुओं का अस्तित्व भी आत्म सापेक्ष या आत्म निर्भर है। अतः सम्पूर्ण जगत् मन या आत्मा पर निर्भर है। आत्मा ही द्रष्टा या अनुभवकर्ता है। आत्मा में अनुभव करने की शक्ति परमात्मा या ईश्वर की देन है। ईश्वर-प्रदत्त शक्ति के कारण ही आत्मा इन्द्रिय विज्ञानों का अनुभवकर्ता होता है।

बर्कले के दर्शन को समझने के लिये यह आवश्यक है कि हम उनके पूर्ववर्ती दार्शनिकों पर कुछ विचार करें। ऐतिहासिक दृष्टि से बर्कले का समय लॉक और ह्यूम के बीच है। लॉक अनुभववाद के जन्मदाता माने जाते हैं। ह्यूम के दर्शन में अनुभववाद की चरम परिणति सन्देहवाद में होती है। बर्कले इन दोनों के बीच है। बर्कले अनुभववाद के न तो जन्मदाता हैं और न तो उनके दर्शन में अनुभववाद का अन्त ही होता है| बर्कले के दर्शन में लॉक का बीजरूप अनुभववाद पल्लवित और पुष्पित होकर वृक्ष रूप धारण कर लेता है।

बर्कले ने लॉक की त्रुटियों का निराकरण किया है तथा अनुभववाद को पूर्ण बनाया है। इसी दृष्टि से कहा जाता है कि बर्कले दोषरहित लॉक है। तात्पर्य यह है कि लॉक के अनुभववाद में कुछ असंगति है। बर्कले ने इनका निराकरण कर अनुभववाद को पूर्ण बनाने का प्रयास किया है। इस कथन में सत्य का अंश चाहे जितना भी हो, इतना अवश्य है कि बर्कले के दर्शन को हम लॉक के बिना नहीं समझ सकते, क्योंकि लॉक का अनुभववाद ही बर्कले का विज्ञानवाद या प्रत्ययवाद नामक स्वरूप धारण कर लेता है।

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अनुभववादी लॉक ने ज्ञान सम्बन्धी बुद्धिवादी मान्यताओं का पूर्णत: निषेध किया है। बुद्धिवादी दार्शनिकों के अनुसार यथार्थ ज्ञान अनिवार्य तथा सार्वभौम होता है। अनिवार्य ज्ञान जन्म से ही हमारे मन में विद्यमान रहता है। इन्हें हम अनुभव से नहीं सीखते। इसी कारण ऐसे ज्ञान को जन्मजात या सहजात (Innate idea) प्रत्यय कहा गया है। उदाहरणार्थ, देकार्त ने बतलाया है कि आत्मा का ज्ञान सहजात है। मैं विचार करता हूँ, इसलिए मेरा (आत्मा का) अस्तित्व है, अन्यथा मैं विचार कैसे करता? इसी प्रकार अन्य बुद्धिवादी दार्शनिक भी सहजात प्रत्ययों को ही यथार्थ ज्ञान मानते हैं। बुद्धिवाद का चरम उत्कर्ष लाइबनिट्ज के दर्शन में है| लाइबनिट्ज के अनुसार पण न समस्त ज्ञान की सम्भावना निहित है। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि ज्ञान सहजात है।

लॉक सहजात प्रत्ययों का खण्डन करते है। लॉक ने ज्ञान का विश्लेषण कर बतलाया है कि ज्ञान का कोई भी प्रत्यय जन्मजात नहीं है। हमारा मन तो जन्म के समय सफेद कागज रहता है जिस पर कुछ भी अंकित नहीं होता। अनुभव के द्वारा ही हमारे ज्ञान का भण्डार भरता है। संवेदन और स्वसंवेदन ही ज्ञान के दो वातायन हैं जिनसे प्रकाश प्रवेश करता है। संवेदना के द्वारा हमें इन्द्रियों के माध्यम से सद्य ज्ञान प्राप्त होता है। उदाहरणार्थ विस्तार, स्थिरता, संख्या, आकृति, ठोसपन इत्यादि का हमें सद्यः अनुभव होता है। इन्हीं प्रत्ययों को लॉक मूलगुण (Primary quality) कहते हैं। लॉक के अनुसार मूलगुण ही वस्तु का यथार्थ प्रतिनिधित्व करते है। इस प्रकार संवेदना से हमें बाह्य जगत् का ज्ञान प्राप्त होता है। स्वसंवेदना से हमें आन्तरिक जगत् की अनुभूति होती है।

दूसरे शब्दों में स्वसंवेदना का विषय मनः स्थिति है। स्वसंवेदनाएँ वस्तु के गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं तथा वस्तु की प्रतिलिपि न होकर केवल प्रक्रिया को व्यक्त करती हैं जो वस्तु से सञ्चालित होती है। उदाहरणार्थ रूप, ताप आदि उपगुण है। बर्कले इन मान्यताओं का खण्डन करते हैं। बर्कले के अनुसार यदि हमारा ज्ञान प्रत्ययों तक सीमित है तो हम प्रत्ययों के अतिरिक्त कछ भी नहीं जानते। दूसरे शब्दों में हमारा ज्ञान संवेदना या अनुभव तक सीमित है। इसी कारण बर्कले अपने प्रसिद्ध निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सत्ता अनुभवमूलक है अर्थात् अस्तित्व संवेदना पर निर्भर है या ज्ञान केवल विज्ञान या प्रत्यय तक सीमित है।

लॉक के बाद बर्कले का अनभववाद प्रायः वैसा ही है जैसा देकार्त के बाद स्पिनोजा का बुद्धिवादा तात्पर्य यह है कि देकार्त ने बुद्धिवाद को जन्म दिया, परन्तु स्पिनोजा ने उसे परिवर्द्धित किया। उसी प्रकार लॉक ने अनुभववाद का प्रारम्भ किया, परन्तु बर्कले ने उसे परिष्कृत किया। अतः स्पिनोजा जैसे पूर्णतः बुद्धिवादी हैं वैसे ही बकले पूर्णतः अनुभववादी हैं। स्पिनोजा ने देकार्त के बुद्धिवाद के दोषों को दूर किया। बर्कले ने लॉक के अनुभववाद की असंगतियों का निराकरण किया बर्कले लॉक के आधारभूत अनुभववाद से ही प्रारम्भ करते है।

परन्तु यदि समस्त ज्ञान अनुभवजन्य है तथा अनुभव से हमें केवल सरल प्रत्यय (Simple idea) ही प्राप्त होते हैं तो हम उन प्रत्ययों के परे कुछ भी स्वीकार नहीं कर सकते। यदि ज्ञान अनुभवजन्य वस्तु है तो अनुभवातीत ज्ञान की सत्ता नहीं तथा अनुभव के परे बाह्य वस्तु का अस्तित्व नहीं। यदि बाह्य वस्तु नहीं है तो मूलगुण तथा उपगुण का भेद भी समाप्त हो जाता है। बाह्य वस्तु की सत्ता में विश्वास करने के कारण लॉक जडवादी (Materials) प्रतीत होते हैं। अतः बर्कले का मुख्य कार्य है कि जड़वाद का निराकरण कर अध्यात्मवाद की स्थापना करना।

बर्कले के समय में विज्ञान की उन्नति के कारण लोगों की ईश्वर में आस्था कम होती जा रही थी। इस अनास्था को दूर करने का बर्कले ने अपना प्रधान लक्ष्य बनाया। बर्कले के अनुसार इस अनास्था का कारण मानव का जड़ वस्तुओं में विश्वास है। यदि हम जड़ के स्थान पर संसार का स्वरूप आध्यात्मिक मानें तो हममें इसके कारण-स्वरूप ईश्वर में अवश्य ही आस्था बढ़ेगी। इसी कारण बर्कले का कहना है कि सृष्टिकर्ता का स्मरण कराती है, अर्थात् संसार का स्वरूप आध्यात्मिक मानने से हम ईश्वर की ओर उन्मुख होते हैं। लॉक अचित (जड़), चित् (आत्मा) और ईश्वर तीनों की सत्ता स्वीकार करते हैं।

बर्कले जड़ तत्त्व का निराकरण कर केवल आत्म तत्त्व और ईश्वर की ही सत्ता स्वीकार करते हैं। बर्कले के अनुसार बाह्य पदार्थ या जड़ जगत् का कोई अस्तित्व ही नहीं। किसी वस्तु की सत्ता उस वस्तु के ज्ञान पर आधारित है। परन्तु ज्ञान तो वस्तु के गुणों का ही होता है, वस्तु का नहीं। इस प्रकार बर्कले का कहना है कि बाह्य वस्तु (जड़ जगत्) की उपलब्धि नहीं होती तथा अनुपलब्ध वस्तु की सत्ता स्वीकार्य नहीं। बर्कले की प्रसिद्ध उक्ति है कि होना और प्रत्यक्ष होना एक ही बात है। यदि मैं कहता हूँ कि अमुक वस्तु है, तो मेरा अर्थ यह है कि मैं उसका प्रत्यक्ष कर रहा हूँ।

अत प्रत्यक्षविहीन वस्तु की सत्ता तो कथमपि स्वीकार्य नहीं। हमें जड तत्त्व की उपलब्धि नहीं होती, अतः उसका अस्तित्व नहीं, क्योंकि होने का अर्थ प्रत्यक्ष होना है। इस प्रकार बर्कले अपने मुख्य सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं- दृश्यते इति वर्तते | हमारा ज्ञान केवल अनुभव तक ही सीमित है| अनुभूति तथा अस्तित्व में समानाधिकरण्य है, अर्थात् अनुभवविहीन अस्तित्व की कल्पना नहीं का जा सकती। जो सत है वह ज्ञेय है तथा जो ज्ञेय है वह सत है। यदि किसी वस्तु का अस्तित्व है तो उसकी उपलब्धि अवश्य ही होगी।

 

 

बर्कले के दार्शनिक विचार

भाषा का स्वरूप और उसका दुष्प्रयोग-बर्कले ने दर्शन में सर्वप्रथम भाषा तथा उसके दुष्प्रयोग पर विचार किया है। इसका कारण यह है कि अधिकांश दार्शनिक समस्याएँ भाषा के दुष्प्रयोग के कारण उत्पन्न होती हैं। इसी कारण बर्कले का कहना है कि हमें सर्वप्रथम भाषा के उचित प्रयोग को जानना चाहिये जिससे हम अनुचित प्रयोग से बच सकें। सर्वप्रथम भाषा तथा उसके दुष्प्रयोग की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करने के कारण हम सोच सकते हैं कि बर्कले दार्शनिक विषयों को छोड़कर भाषा-विज्ञान की बातें करते हैं। परन्तु बर्कले भाषा-विज्ञान और व्याकरण का प्रश्न नहीं उठाते। उनके अनुसार दार्शनिक कठिनाइयों का एकमात्र कारण भाषा के यथार्थ स्वरूप को न समझना तथा उसके उचित उपयोगों को न जानना है।

भाषा का दष्प्रयोग ही विचारों को जटिल तथा दोषपूर्ण बनाता है। प्रयोग का ज्ञान आवश्यक है। प्रायः हम दर्शन शास्त्र में समस्या उठाते हैं तथा उसका निदान खोजते हैं। परन्तु हमें निदान मिलता नहीं। हमारी समस्या बढ़ती ही चली जाती है। हम जो भी निदान निकालते हैं उससे कोई नयी समस्या उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार समस्याओं की संख्या तो बढ़ती ही जाती है तथा हमें कोई अन्तिम निदान नहीं प्राप्त होता जिसके आगे समस्या न उत्पन्न हो। प्रश्न यह है कि इन समस्याओं का अन्त कैसे हो? हम किसी अन्तिम निदान की प्राप्ति क्यों नहीं करते? बर्कले इसका उत्तर देते हुए कहते है कि यदि हमें अपनी समस्या की निरर्थकता का पता लग जाय तो समस्या का अन्त हो जाय।

इन्हीं निरर्थक प्रश्नों को बर्कले भाषा का दुष्प्रयोग कहते हैं। तात्पर्य यह है कि यदि हम प्रश्न की सार्थकता पर विचार करें तो प्रश्न की निरर्थकता स्पष्ट हो जाएगी तथा हम प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने का प्रयास नहीं करेंगे। इसी दृष्टि से बर्कले अपने प्रतिवादी से उसके प्रश्न को सही समझने का अनुरोध करते हैं। अपने प्रश्न के विश्लेषण से ही प्रतिवादी को अपनी समस्या की निस्सारता प्रकट हो जाती है, अर्थात् उसे यह प्रतीत होता है कि उसका प्रश्न ही भ्रामक है तथा वह निदान प्राप्त करने का प्रयास नहीं करता।

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भाषा के दुष्प्रयोग के लिये बर्कले अमूर्त-प्रत्यय (Abstract idea) का उदाहरण देते हैं। हम जानते हैं कि अमूर्त्त-प्रत्यय दर्शन शास्त्र की बड़ी समस्या है| लॉक और अनेक दार्शनिकों ने इस समस्या पर अपने-अपने विचार व्यक्त किये हैं। मध्ययुगीन दार्शनिकों के लिये अमूर्त प्रत्यय वाद-विवाद का प्रमुख विषय था। बर्कले इसे भाषा का दुरुपयोग कहते हैं। तात्पर्य यह है कि यह विवाद भाषा के अनुचित प्रयोग के कारण है।

बर्कले के अनुसार अमूर्त्त-प्रत्यय का प्रश्न सामान्य या जातिगत विचार पर आधारित है। हमें उपलब्धि तो व्यक्ति की ही होती है, परन्तु उसके सार रूप में हम ‘सामान्य की कल्पना कर लेते हैं। इसी सार को जाति या सामान्य कहते हैं। उदाहरणार्थ हम राम, श्याम, मोहन आदि अनेक मनुष्यों का अवलोकन करते हैं तथा सभी में एक मनष्यत्व जाति या सामान्य की कल्पना कर लेते हैं। तात्पर्य यह है कि मनुष्यत्व, जाति या सामान्य वह है जो विभिन्न मनष्यों में समान विद्यमान है। प्रश्न यह है कि हम इस सामान्य का निर्माण कैसे करते हैं।

बर्कले का कहना है कि सामान्य का निर्माण तो अमूर्त-प्रत्यय पर आधारित है। प्रत्यक्ष तो हमें केवल विषयों का ही होता है, अर्थात् हम केवल व्यक्ति को ही देखते हैं, परन्तु सजातीय वस्तुओं से हम उनके सार को अलग कर लेते हैं। यही अमूर्तीकरण है। मनुष्यत्व कोई नहीं, वरन् सभी काले, गोरे, लम्बे, नाटे, मन्द तथा मेधावी मनुष्यों का सार सामान या जाति है। यही मनुष्यत्व अमूर्त प्रत्यय (Abstract idea) है|

पाश्चात्य दर्शन में अमूर्त प्रत्ययों का इतिहास ग्रीक-काल से ही प्रारम्भ हो जाता है। अमूर्त प्रत्ययों की सर्वप्रथम चर्चा महात्मा सुकरात के ज्ञान-सिद्धान्त में उपलका होती है। सुकरात के शिष्य प्लेटो के दर्शन में अमूर्त प्रत्यय तो आधार स्तम्भ हैं। प्लेटो के दर्शन में अमूर्त-प्रत्यय विज्ञान (Idea) कहलाते हैं। प्लेटो ने विज्ञान और वस्तु के द्वैत को माना है। उनके अनुसार विज्ञान ही वस्तु का सार है। विज्ञान नित्य, अपरिणामी है तथा वस्तु का कारण है। सुन्दर वस्तुओं का कारण सौन्दर्य विज्ञान है।सौन्दर्य विज्ञान सत् है तथा सुन्दर वस्तु असत्। सौन्दर्य विज्ञान का निर्माण सुन्दर वस्तओं के सार से होता है, परन्तु सौन्दर्य विज्ञान सुन्दर वस्तुओं से पृथक है।

अरस्तू ने प्लेटो के विज्ञान का खण्डन किया है। यदि विज्ञान वस्तु के सार हैं तो विज्ञान वस्तु से पृथक नहीं हो सकते। किसी वस्तु का सार उस वस्तु में ही रहेगा। अत: विज्ञान और वस्तु, जाति और व्यक्ति, सामान्य और विशेष पृथक् नहीं। इसी प्रकार, मध्य युग में भी सामान्य पर बहुत विचार किया गया है। ऑगस्टाइन, एक्विनस, एन्सेल्म, स्कॉट्स आदि दार्शनिकों ने अपने-अपने मत से सामान्य की व्याख्या की है। तात्पर्य यह है कि ग्रीक युग और मध्य युग दोनों युगों में सामान्य की समस्या बराबर बनी रही। आधुनिक युग में लॉक ने अमूर्त प्रत्ययों की व्याख्या करते हुए सामान्य पर विचार किया है। सामान्य के सम्बन्ध में लॉक का मत संज्ञावाद कहा जा सकता है। इस मत के अनुसार सामान्य या जाति केवल संज्ञा, नाम, काल्पनिक विचार हैं।

जाॅन लॉक सामान्य को वास्तविक नहीं, वरन् काल्पनिक मानते हैं। वास्तविक तो केवल व्यक्ति है, जाति तो कल्पनाप्रसूत है। व्यक्तियों के सार-गुणों से जाति का या विशेषों के सार से सामान्य का निर्माण होता है। लॉक का कहना है कि ये सामान्य ही अमूर्त-प्रत्यय हैं। हमारे मन में अमूर्त प्रत्ययों के निर्माण करने की शक्ति है। जब हम विशेषों को देखते हैं तो उनके सामान्य को पृथक् कर लेते हैं। संक्षेप में लॉक अमूत प्रत्ययों की सत्ता स्वीकार करते हैं।

बर्कले इन अमूर्त प्रत्ययों को भाषा सम्बन्धी दोष बतलाते हैं। यदि हम अमूर्त प्रत्यय का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि अमर्त प्रत्यय तो निरर्थक वाक्य हा परन्तु हम अमूर्त प्रत्ययों को सत्य मानकर ही इनकी व्याख्या करते हैं। वस्तुतः अमूत प्रत्यय की समस्या बनी ही रह जाती है। हम पहले विचार कर चुके है कि अमूत प्रत्यय और सामान्य में गहरा सम्बन्ध है| अमूर्तीकरण से ही सामान्य की सत्ता सिद्ध होती है। यहाँ स्पष्ट है कि अमूर्तीकरण की समस्या सामान्य की समस्या उत्पन्न करती है। इसी प्रकार हमारे मन में ऐसे बहुत से विचार है जो निरर्थक हैं। हम निरर्थक विचारों को ही समस्या मानकर निदान खोजते हैं। वस्तुत: निदान तो प्राप्त नहीं होता, परन्तु समस्या बढ़ जाती है। ऐसा इसलिये होता है कि हम भाषा तथा उसके उचित प्रयोग पर ध्यान नहीं देते।

 

अमूर्त प्रत्यय (Abstract Idea)

बर्कले के अनुसार अमूर्त-विचारों (जाति-विज्ञानों) का निषेध किये बिना हम जड़ वस्तु की सत्ता का निराकरण नहीं कर सकते, क्योंकि अमूर्त विचार ही जड़ की सत्ता के साधक हैं। हम अमूर्त विचार या काल्पनिक सामान्य के आधार पर जड़ वस्तु का ज्ञान प्राप्त करते हैं। हम विविध मनुष्यों में मनुष्यत्व सामान्य की कल्पना करते हैं विभिन्न गौ में गोत्व की कल्पना करते हैं, इसी प्रकार हम अनेक गुणों में आश्रय या आधार के रूप में द्रव्य या जड़ सामान्य की कल्पना करते हैं। यदि हम सामान्य जाति या प्रत्यय को असत् सिद्ध करें तो द्रव्य की असिद्धि में सहायता मिलेगी।

इसी कारण बर्कले का कहना है कि जड वस्तु में हमारे विश्वास का कारण अमूर्त विचार या जाति प्रत्यय है जो काल्पनिक है, वास्तविक नहीं। लॉक के दर्शन का सबसे बड़ा दोष यह है कि वे अनुभव को ही ज्ञान का स्रोत मानते हैं तथा अमूर्त विचार या जाति प्रत्यय की भी सत्ता स्वीकार करते हैं जिनका अनुभव कथमपि सम्भव नहीं होता। बर्कले के अनुसार अमूर्त विचार तो भाषा का दूषित प्रयोग है। वस्तुतः यह कोई वस्तु नहीं।

जाॅन लॉक के अनुसार मन पहले संवेदनाओं को ग्रहण करने में निष्क्रिय रहता है। परन्तु ग्रहण करने के उपरान्त सक्रिय (Active) हो जाता है। सक्रियता से तात्पर्य यह है कि मन विशेषों के आधार पर सामान्य की कल्पना करता है। विशेषों का सामान्यीकरण ही मन का अमूर्तीकरण (Abstraction) है। इसके द्वारा अनेक समान विशेषों को उनकी समानता के आधार पर एक सामान्य प्रत्यय या जाति प्रत्यय का निर्माण करते हैं। किसी जाति के विभिन्न व्यक्तियों में कुछ सामान्य विशेषताओं को हम उस जाति का सामान्य तथा सार गुण मान लेते हैं।

ये सामान्य तथा सार गुण ही जाति प्रत्यय हैं। उदाहरणार्थ, मनुष्यत्व जाति प्रत्यय है। यह विभिन्न मनुष्यों का सामान्य तथा सार गुण है। विभिन्न व्यक्तियों में आकृति प्रकृति की भिन्नता अवश्य है परन्तु मनुष्यत्त्व सबमें समानतः विद्यमान है। लॉक का कहना है कि यह जाति प्रत्यय है, सामान्य या अमूर्त प्रत्यय है। ये सभी प्रत्ययों की संज्ञायें हैं। लॉक का कहना है कि बुद्धि वस्तुओं को अमूर्त प्रत्यय बनाने में समर्थ है।

सर्वदा हमारी बुद्धि व्यक्तियों के भेद को भूलकर समानताओं को ग्रहण करती रहती है। मनुष्य में काले-गोरे का भेद हो सकता है, लम्बे-नाटे कद का भेद हो सकता है, परन्तु मनुष्यत्व अमन प्रत्यय है। रंग लाल, पीला, नीला, उजला आदि कई प्रकार का हो सकता है; परन्तु सब रंग ही है। अतः रंग जाति प्रत्यय या अमूर्त प्रत्यय है जो सबमें है।

 

 

 

 

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