फ्रेडरिक हेगल का कारण और तर्क

फ्रेडरिक हेगल का कारण और तर्क

फ्रेडरिक हेगल का कारण और तर्क(Cause and Reason)

साधारणत: हम इन दोनों को एक ही समझते हैं। परन्तु इनमें भेद है। हम परम तत्व को परम कारण कहते हैं। परम कारण कहने का तात्पर्य अकारण कारण है। सभी दार्शनिक इस अकारण कारण को ही परम कारण या परम तत्व मानते हैं। भौतिकवादी (Materialist) दार्शनिकों के अनुसार भौतिक तत्व ही परम कारण है। इनसे उत्पन्न होने के कारण सम्पूर्ण संसार का स्वरूप भौतिक है। विज्ञानवादी (Idealist) दार्शनिक परम तत्व को विज्ञान बतलाते हैं। यह विज्ञान पूर्णतः अभौतिक है, इनसे उत्पन्न होने के कारण सम्पूर्ण संसार का स्वरूप विज्ञानात्मक है, अभौतिक है, आध्यात्मिक है। इस प्रकार भौतिकवाद या जड़वाद और विज्ञानवाद या अध्यात्मवाद दो नितान्त विरोधी दार्शनिक सिद्धान्त हैं। हेगल इन दोनों सिद्धान्तों में दोष दिखलाते हैं। हेगल के अनुसार इन दोनों मतों में दोष का कारण परम कारण में विश्वास है। हेगल कारणतावाद का खण्डन कर परम कारण का निषेध करते हैं। कारण सिद्धान्त का खण्डन कर वे तर्क सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं।

कारणवाद दर्शन शास्त्र में सबसे प्रमुख सिद्धान्त माना गया है। कारणतावाद को मानने वाले दार्शनिकों का कहना है कि सम्पूर्ण विश्व कारण और कार्य के नियम से बँधा है। विश्व में कोई भी घटना अकारण नहीं होती, अर्थात् प्रत्येक कार्य का कोई कारण है और प्रत्येक कारण का कोई कार्य है। यदि सभी सांसारिक वस्तुओं का हम विश्लेषण करें तो उनके कारण का पता लगा सकते हैं। परन्तु सभी कारणों का पता लगाते-लगाते एक अन्तिम कारण पर पहुंचेंगे जिसे परम कारण मान लेंगे। यह परम कारण भौतिक पदार्थ या आध्यात्मिक तत्व कोई भी हो सकता है।

हेगल का कहना है कि या तो कारण कार्य का नियम यथार्थ नहीं या परम कारण का सिद्धान्त भ्रान्त है। यदि कारण का नियम सत्य है और हम इस नियम के आधार पर सबका कारण खोजते हैं तो किसी एक स्थान पर रुक कर उसे परम कारण क्यों मान लेते? यदि सबका कारण है तो परम कारण का भी कारण होना चाहिये। परन्तु यदि हम परम कारण का भी कारण विचार करते चले जाये तो कहीं विश्राम नहीं मिलेगा। इसमें अनवस्था दोष होगा। इस दोष से बचने के लिये हम एक को परम कारण भी हैं। हेगल का कहना है कि परम कारण में अकारण कारण को मानकर का का स्पष्टतः निषेध है। इसलिये उचित है कि परम तत्व की व्याख्या कारणता न करें।

उपरोक्त विवरण से फ्रेडरिक हेगल इस निष्कर्ष पर पहुंचते है कि कारणतावाद दोषग्रस्त है। इससे परम तत्व की व्याख्या सम्भव नहीं। फ्रेडरिक हेगल के अनुसार कारणता परम कारण की व्याख्या कर सकता है और न कारण से कार्य की उत्पत्ति विश्व की ही व्याख्या कर सकता है। किसी विशेष कारण से किसी विशेष उत्पत्ति क्यों होती है, यह भी कारणतावाद से स्पष्ट नहीं।

उदाहरणार्थ हम कहते है कि ठण्ड के कारण पानी जमकर बर्फ बन जाता है। पानी का बर्फ हो जाना एक है जिसका कारण शीत है। परन्तु शीत-कारण से बर्फ कार्य क्यों उत्पन्न होता है। अर्थात् पानी जमकर शीत के कारण क्यों बर्फ बन जाता है, इसका उत्तर नहीं प्राप्त होता। अतः हम केवल मान लेते हैं कि ताप से विस्तार होता है और ठण्ड में सिकुड़न, परन्तु हमें पता नहीं चलता कि ताप से विस्तार तथा ठण्ड से सिकुड़न क्यो होता है? इससे निष्कर्ष निकलता है कि कार्य कारण से न तो विश्व के कारण का पता चलता है और न वस्तु-विशेष की उत्पत्ति ही सिद्ध हो पाती है। अतः कारणकार्य नियम विश्व की उत्पत्ति का परम कारण नहीं बतला पाता तथा वस्तु-विशेषों की उत्पत्ति भी नहीं बतला पाता।

विश्व की व्याख्या तथा वस्तु-विशेष की व्याख्या के लिये हमें तर्क (Reason) की शरण लेनी पड़ेगी। तर्क दोनों की व्याख्या करने में समर्थ है, यह कैसे? हम जानते हैं। कि तर्क स्वयं अपना तर्क है तथा इसका स्वरूप निगमनात्मक है। तर्क की प्रक्रिया में आधार वाक्य से निष्कर्ष निकाला जाता है। इस निष्कर्ष को निगमन कहते है। निगमन आधार वाक्यों पर आधारित रहता है। हम निगमन की सत्यता की जाँच करते हैं परन्तु आधार वाक्यों की नहीं। तात्पर्य यह है कि निगमनात्मक तर्क में हम देखते हैं कि अमुक निगमन अमुक आधार-वाक्यों से निकल रहा है या नहीं? आधार वाक्य और निगमन का सम्बन्ध तार्किक है। इसी तार्किक प्रक्रिया को हेगल विश्व की व्याख्या करने के लिये लागू करना चाहते हैं। इस तार्किक व्याख्या का स्वरूप कारणतावाद के सिद्धान्त से भिन्न है। कारणतावाद में मुख्यतः तीन दोष होते है-

(क) अनवस्था दोष,

(ख) किसी एक कारण को परम कारण मान लेने का दोष एवं

(ग) किसी-किसी कारण विशेष से कार्य विशेष की उत्पत्ति को मान लेने का दोष।

इन सभी दोषों का परिहार तर्क की प्रक्रिया में हो जाता है। इसमें हम आधार वाक्य से निष्कर्ष निकालते हैं। हम आधार वाक्यों की सत्यता की जाँच नहीं करते। हम केवल आधार वाक्यों को सत्य मानकर निगमन की सत्यता की जाँच करते है।

उदाहरणार्थ-

सभी व्यक्ति मरणशील है।

सुकरात एक व्यक्ति है।

इसलिए सुकरात भी मरणशील है।

इस नियमनात्मक तर्क में हम देखते हैं कि सुकरात की मरणशीलता सभी वयक्तियों की मरणशीलता पर आधारित है। अतः सभी व्यक्ति की मरणशीलता आधार वाक्य (Premise) है और सुकरात की मरणशीलता निगमन है। यही आधार वाक्य तथा निगमन (Conclusion) का तार्किक सम्बन्ध है, क्योंकि इसमें तार्किक अनिवार्यता (Logical necessity) है। हम तर्क में केवल इसी अनिवार्यता को देखते है। यह अनिवार्यता ही व्याख्या है जो सर्वमान्य है।

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यदि हम तार्किक व्याख्या को विश्व की व्याख्या करने के लिये काम में लाएँ तो इसका भी निष्कर्ष सर्वमान्य होगा तथा इसमें कारणतावाद के दोष न रहेगे। अतः विश्व की व्याख्या तर्क परक है, कारण परक नहीं। यदि हम विश्व की व्याख्या (सभी वस्तुओं की उत्पत्ति) तार्किक अनिवार्यता के साथ करे तो कारणवाद के सभी दोषों का निराकरण होगा तथा तार्किक निष्कर्ष सर्वमान्य भी होगा इससे स्पष्ट है कि तर्क का सिद्धान्त कारण की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है।

 

 

तर्क क्या है?

हेगल के अनुसार तर्क से ही विश्व का नियन्त्रण होता है (Reason rules the world) तात्पर्य यह है कि विश्व तथा सभी विश्व की वस्तुओं की व्याख्या तर्क से ही सम्भव है। प्रश्न यह है कि तर्क क्या? साधारणतः हम तर्क को तार्किक नियमों का विज्ञान मानते है। ये तार्किक नियम सामान्य (Universal) होते है। अत: तर्क का सम्बन्ध सामान्यों से है, विशेषों से नहीं हेगल के अनुसार भी तर्क का स्वरूप सामान्य (Reason is universal) बतलाया गया है। उदाहरणार्थ, हम सभी व्यक्तियों की मरणशीलता के बारे में विचार करते है।

यह तार्किक विचार व्यक्ति अर्थात् मनुष्यों की मरणशीलता से भिन्न है। सभी व्यक्तियो की मरणशीलता तो एक आम धारणा, सामान्य विचार या जातिगत प्रत्यय है जो वस्तु विशेषों से भिन्न होता है। इन सामान्य धारणाओं को ही हेगल तर्क कहते है। सामान्य धारणाओं का सम्बन्ध अमूर्त विचारों (Abstract ideas) से है, मूर्त विशेषों (Concrete particulars) से नहीं। तर्क में हम इन्हीं सामान्य धारणाओं या प्रत्यय रूपों (Concepts) का व्यवहार करते है।

उदाहरणार्थ-

सभी क, ख, है।

कुछ क,ग, है।

इसलिए कुछ ग, ख हैं।

यह निगमनात्मक तर्क है। इसमें क, ख, ग सभी प्रतीक (Symbols) है। ये सभी प्रतीक सामान्य की सूचना देते हैं। अतः हेगल तर्क को सामान्यों की प्रक्रिया (Reason is a process of universals) बतलाते हैं। हम प्रत्येक तार्किक प्रक्रिया में केवल प्रतीकात्मक क, ख, ग के समान अमूर्त प्रत्ययों पर विचार करते हैं। यही तर्क का स्वरूप है। यह स्वरूप कारण के स्वरूप से सर्वथा भिन्न है। कारणवाद में हम व्यक्ति विशेषों पर विचार करते हैं परन्तु तर्क में हम सामान्यों पर विचार करते हैं। सामान्य वस्तु नहीं विचार हैं; पदार्थ नहीं प्रत्यय हैं। तर्क को हेगल स्वतः व्याख्येय सिद्धान्त (Self explanatory principle) मानते हैं। तर्क स्वतः साध्य है। तात्पर्य यह है कि तर्क की व्याख्या तर्क ही है। तर्क का सम्बन्ध वस्तु से नहीं विचार से है, विशेषों से नहीं सामान्य से है, व्यक्ति से नहीं जाति से है| अतः किसी वस्तु का विचार तो पूछा जा सकता है, परन्तु विचार का विचार नहीं पूछा जा सकता।

इसका कारण यह है कि किसी वस्तु को हम कार्य-कारण रूप में समझना चाहते हैं परन्तु तर्क का सम्बन्ध वस्तु से नहीं है। अत: तर्क का तर्क नहीं हो सकता। तर्क तो अपने लिये पर्याप्त है। जब हम कहते हैं कि तार्किक अनिवार्यता के कारण ही निगमन आधार वाक्यों पर आश्रित है तो हम निश्चित रूप से एक तार्किक व्याख्या का प्रयोग करते है। इसके लिये किसी अन्य व्याख्या की आवश्यकता नहीं। तार्किक व्याख्या का दूसरा नाम बौद्धिक व्याख्या (Rational explanation) है जो हमारी बौद्धिक जिज्ञासा को शान्त कर देती है। यदि किसी घटना की हम बौद्धिक व्याख्या कर देते हैं तो वह अन्तिम व्याख्या समझी जाती है। इसके अतिरिक्त यदि हम तर्क या बुद्धि की व्याख्या किसी अन्य तत्व से करें तो वह अन्य तत्व तर्क से पहले होगा।

फ्रेडरिग हेगल के अनुसार तर्क के पहले किसी तत्व की कल्पना नहीं कर सकते। आगे चलकर हम देखेंगे कि तर्क तो शुद्ध विचार है, विचार होने के कारण सभी वस्तुओं से पहले है। यही विश्व का प्रथम तत्व है। इसके पहले किसी अन्य तत्व को स्वीकार नहीं किया जा सकता। मान लिया जाय कि किसी जड़ या भौतिक पदार्थ को हम तर्क के पहले स्वीकार कर लें, तो प्रश्न होगा कि भौतिक पदार्थ के पहले होने का तर्क क्या है? परन्तु यह प्रश्न तर्क के साथ नहीं हो सकता। अतः सभी सांसारिक पदार्थों के पूर्व तर्क को सभी पदार्थों से पहले स्वीकार करने का अर्थ है कि सभी पदार्थों की तार्किक व्याख्या सम्भव होगी। तार्किक व्याख्या तो बौद्धिक व्याख्या है, अन्तिम व्याख्या है। इस प्रकार तार्किक या बौद्धिक व्याख्या के ऊपर कोई अन्य व्याख्या नहीं, जिसे इसके पूर्व स्वीकार किया जाय। अत: तर्क सबके पूर्व है, स्वयं अपना तर्क है।

एक आवश्यक प्रश्न यहाँ उपस्थित होता है। सभी सांसारिक पदार्थों से पूर्व प्रत्यय या विचार है। अतः प्रत्यय ही परम तत्व हुआ, परन्तु प्रत्यय तो सामान्य है, इससे विशेषों की उत्पत्ति कैसे होती है। प्रत्यय से पदार्थ कैसे उत्पन्न होते हैं। वस्तुतः यह समस्या द्वन्द्वात्मक प्रणाली (Dialectical method) में है। इस पर हम आगे विचार करेंगे। अभी हमारे सामने यह प्रश्न है कि प्रत्यय से पदार्थ की, सामान्य से विशेष की, विचार से वस्तु की उत्पत्ति कैसे होती है। इस समस्या का समाधान करने में हेगल अपने पूर्ववर्ती दार्शनिक प्लेटो तथा काण्ट के मतों से प्रभावित लगते हैं।

प्लेटो के दर्शन में विज्ञान और वस्तु का, सामान्य और विशेष का द्वैत है। प्लेटो के अनुसार विज्ञान नित्य, अपरिणामी, शाश्वत सामान्य हैं। ये प्रत्यय या विचार रूप हैं, अतः इन्हें विज्ञान कहा गया है। ये विज्ञान वस्तुओं के सामान्य तथा सार गुण हैं। विभिन्न मनुष्यों का सामान्य और सार गुण मनुष्यत्व है, विभिन्न पशुओं का पशुत्व आदि वस्तुएँ तो अनेक होती हैं, परन्तु उनका सार एक होता है। सुन्दर वस्तुएँ संसार में अनेक हैं, परन्तु उनका सार सौन्दर्य एक सामान्य विज्ञान है। यह सौन्दर्य नित्य तथा अपरिणामी है| सुन्दर वस्तुओं का जन्म-मरण होता है, सौन्दर्य विज्ञान या सामान्य का नहीं। पुनः प्लेटो के अनुसार विज्ञान ही वस्तु का कारण है। यहीं पर समस्या जटिल हो जाती है। सौन्दर्य एक सामान्य विज्ञान है, इससे सुन्दर वस्तुओं की उत्पत्ति कैसे होती है? इसका समुचित उत्तर प्लेटो के दर्शन में नहीं प्राप्त होता। सौन्दर्य तो एक अमूर्त विचार है, सुन्दर वस्तुएँ मूर्त हैं। अमूर्त से मूर्त कैसे उत्पन्न होगा।

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मेज का प्रत्यय या सामान्य हमारे मन में है, इससे वास्तविक मेज कैसे उत्पन्न होगा। इस दोष के रहते हुए भी प्लेटो का सबसे बड़ा गुण है कि वे सबसे पहले दार्शनिक हैं जो सामान्यों की तात्विक सत्ता (Ontological reality) स्वीकार करते हैं। सामान्य केवल बौद्धिक विचार या मानसिक प्रत्यय ही नहीं, ये वास्तविक वस्तु भी हैं। ये सामान्य अतीन्द्रिय लोक या दिव्यलोक में निवास करते हैं, परन्तु ये ही इन्द्रिय जगत् के आधार हैं। इमान्युएल काण्ट भी सामान्यों को स्वीकार करते हैं। काण्ट के सामान्य पदार्थ (Categories) कहलाते हैं।

हमारे मन में द्रव्य, गुण, सत्ता आदि के प्रत्यय पहले से हैं। ये प्रत्यय ही पदार्थ हैं। यदि ये पदार्थ हमारे मन में पहले से नहीं रहते तो हम सांसारिक वस्तुओं को नहीं जान पायेंगे। अतः काण्ट के अनुसार पदार्थ बाह्य संसार में नहीं हैं। ये बौद्धिक प्रत्यय (Epistemological principles) है। इन प्रत्ययो या पदार्थों की सत्ता सांसारिक वस्तुओं से पहले है। ये अनुभव निरपेक्ष (Apriori) प्रत्यय हैं जिनके कारण हमें सार्वभौम और अनिवार्य ज्ञान प्राप्त होता है। फ्रेडरिक हेगल इन अनुभव निरपेक्ष प्रत्ययों या पदार्थों की सत्ता स्वीकार करते हैं। ये प्रत्यय भौतिक नहीं। ये यदि भौतिक होते तो वास्तविक पदार्थ या वस्तु कहलाते परन्तु ये विभिन्न वस्तुओं के सार, सामान्य हैं। इनके बिना हमें वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि सामान्य और विशेष में अन्तर है। सामान्य तो प्रत्यय है तथा विशेष पदार्थ है। पहला विचार है दूसरा वस्तु हेगल इस भेद को मौलिक मानते हैं तथा बतलाते हैं कि कोई भी वस्तु केवल सामान्यों या प्रत्ययों का संघात है। उदाहरण के लिये हम कहते हैं मेज है, कुर्सी है; आदि परन्तु यदि इनका विश्लेषण किया जाय तो वस्तु केवल विभिन्न सामान्यों या प्रत्ययों का संघात सिद्ध होगा। उदाहरण के लिये हम मेज को वस्तु समझते हैं, परन्तु मेज का भूरापन, भारीपन, काठपन, ठोसपन आदि सामान्यों या प्रत्ययों का संघात है। मेज तो एक वस्तु है। इस वस्तु की सत्ता कुछ सामान्यों में निहित है। वे सामान्य हमारे अनुभव के परे हैं। हम देखकर, छूकर मेज का अनुभव कर सकते हैं परन्तु भारीपन और भूरापन को देख, छू नहीं सकते। दूसरे शब्दों में भारीपन, भूरापन इन्द्रियग्राह्य नहीं यह अनुभवेतर हैं।

प्रत्यय या सामान्य अनुभवेतर होकर भी असत् नहीं। हेगल इन सामान्यों की सत्ता स्वीकार करते हैं तथा विशेष वस्तु की सत्ता नहीं स्वीकार करते। यदि विश्लेषण किया जाय तो कोई भी भौतिक वस्तु (मेज के समान) कुछ प्रत्ययों का संघात है। इन सामान्यों में ही यथार्थ वस्तु की सत्ता निहित है। अतः सामान्य ही सत् है तथा विशेष असत है, परन्तु सामान्य तो प्रत्यय रूप है, पदार्थ रूप नहीं। अतः प्रत्यय ही सत् है, पदार्थ असत् है। प्रत्यय तो विचार है, वस्तु नहीं। अतः विचार सत् है, वस्तु नहीं। परन्तु यह विचार होते हुए भी किसी व्यक्ति का विचार नहीं, न तो ईश्वर के ही विचार हैं। ये विचार वस्तुओं की अन्तर्निहित सत्ता है। यह अन्तर्निहित सत्ता ही परम सत्ता है। यह परम सत्ता निरपेक्ष है। अतः हेगल निरपेक्ष प्रत्ययवादी (Absolute idealist) कहलाते हैं।

फ्रडरिक हेगल को निरपेक्ष प्रत्ययवादी कहने का तात्पर्य है कि ये प्रत्ययों या सामान्यों की ही सत्ता स्वीकार करते हैं, परन्तु आवश्यक प्रश्न यह है कि प्रत्यय परम सत्ता या परम तत्त्व कैसे है? हम पहले विचार कर आए हैं कि परम तत्त्व वही है जिसके परे कोई अन्य तत्त्व न हो, परन्तु यह परम कारण नहीं, क्योंकि परम कारण तो स्वयं अकारण है। कारण के स्थान पर हेगल तर्क की सत्ता स्वीकार करते हैं। हम परम कारण का भी कारण पूछ सकते हैं, परन्तु तर्क का तर्क नहीं। तर्क तो अपने आप में पूर्ण प्रक्रिया है। तर्क से बौद्धिक जिज्ञासा शान्त हो जाती है। तर्क बौद्धिक व्याख्या है। इस व्याख्या के बाद कोई और व्याख्या शेष नहीं रह जाती। यह बौद्धिक व्याख्या सामान्यपरक होती है, विशेषपरक नहीं। अतः सामान्य ही बौद्धिक या तार्किक व्याख्या का सार है। सभी सांसारिक पदार्थों तथा घटनाओं की व्याख्या इन्हीं तार्किक या बौद्धिक सामान्यों से ही सम्भव है।

ये सामान्य किसी व्यक्ति या ईश्वर के विचार नहीं, वरन वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप है। जिसे हम पदार्थ कहते हैं, वस्तुतः वह प्रत्ययात्मक है। हम किसी भी मूर्त पदार्थ को लें। विश्लेषण करने पर वह पदार्थ केवल प्रत्ययों या सामान्यों का संघात होगा परन्तु यहाँ पर भी एक मौलिक प्रश्न रह जाता है। सामान्य तो प्रत्यय हैं, अमूर्त विचार हैं, इनसे पदार्थ या मूर्त वस्तुओं की उत्पत्ति कैसे सम्भव है?

प्रत्यय से पदार्थ की उत्पत्ति हेगल के तर्कशास्त्र (Logic) का सार है। प्रत्ययों से पदार्थों की उत्पत्ति हेगल तार्किक व्याख्या के आधार पर करते हैं। इसके तीन महत्त्वपूर्ण अंग हैं-प्रत्यय, पदार्थ और व्याख्या। इन तीनों पर हमें पृथक्-पृथक् विचार करना होगा।

 

 

 

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