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आधुनिकीकरण की विशेषताओं की विवेचना कीजिए

इसे पोस्ट में हम लोग आधुनिकीकरण किसे कहते हैं? ,आधुनिकीकरण से आप क्या समझते है, आधुनिकीकरण का अर्थ एवं परिभाषा, आधुनिकीकरण  की विशेषताओं और आधुनिकीकरण के प्रभावों की संक्षिप्त विवरण,राजनीति आधुनिकीकरण की विशेषता,आधुनिकीकरण के सिद्धांत,आधुनिकीकरण का शिक्षा पर प्रभाव आदि विषयोंं पर चर्चा करेंगे।

आधुनिकीकरण का अर्थ एवं परिभाषा

आधुनिकीकरण राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक विकास की एक ऐसी मिली-जुली पारस्परिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा ऐतिहासिक व समकालीन अविकसित समाज अपने आपको विकसित करने में संलग्न रहते हैं। जहाँ कहीं, जब कभी तथा जिस किसी संदर्भ में इसकी उत्पत्ति हुई, इसकी मूल आत्मा तार्किकता, वैज्ञानिक भावना और परिष्कृत तकनीक से जुड़ी रही है। परिवर्तन भी एक विशिष्ट प्रक्रिया के रूप में, आधुनिकीकरण एक विशिष्ट वांछित प्रकार की तकनीक और उससे सम्बन्धित सामाजिक संरचना, मूल्य व्यवस्था, प्रेरणाओं और आदर्श नियमाचारों का एक पुंज है, जो कि पारस्परिकता से भिन्न होता है।

भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में आधुनिकता का जो अर्थ लगाया गया है, वह इस प्रकार से है-

  1. राजनीतिक आधुनिकीकरण, राजनैतिक दलों, संसद, वयस्क मताधिकार, गुप्त मतदान जैसी मुख्य संस्थाओं में विकास की माँग करता है।
  2. सांस्कृतिक आधुनिकीकरण से अभिप्राय लौकिकीकरण (Secularization) अर्थात् धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया को उत्पन्न करने और राष्ट्रीय विचारधारा को बढ़ावा देने से है।
  3. आर्थिक आधुनिकीकरण श्रम विभाजन, प्रबन्धन तकनीकों के प्रयोग, उन्नत प्रौद्योगिकी तथा व्यापारिक सुविधाओं के विस्तार जैसे क्षेत्रों में आर्थिक परिवर्तनों से सम्बन्धित है।
  4. सामाजिक आधुनिकीकरण उत्तरोत्तर साक्षरता में विकास, बढ़ता हुआ शहरीकरण एवं पारम्परिक सत्ता में ह्रास को इंगित करता है।

इन समस्त परिवर्तनों को बढ़ते हुए सामाजिक-सांस्कृतिक वैमनस्यीकरण के संदर्भ में देखा जाता है। आधुनिकीकरण का सीधा सम्बन्ध आधुनिकता (Modernity) से है। यह । वह प्रक्रिया से जिसके माध्यम से व्यक्ति और समाज के जीवन में आधुनिकता को प्रतिपादित किया जाता है। आधुनिकीकरण की अवधारणा के माध्यम से भारत जैसे विकासशील देशों में परिवर्तन की प्रवृत्तियों का अध्ययन किया जाता है। आधुनिकीकरण को शब्दों में सन्तुलित रूप से परिभाषित करना कठिन है, फिर भी आधुनिकता को ग्रहण करने की प्रक्रिया को ही हम आधुनिकीकरण कह सकते हैं।

ऐतिहासिक दृष्टि से आधुनिकीकरण उन सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक व्यवस्थाओं के प्रकारों की ओर परिवर्तन की प्रक्रिया है, जो कि सत्रहवीं शताब्दी से उन्नीसवी शताब्दी तक पश्चिमी यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका में विकसित हुए तथा वहाँ से अन्य यूरोपीय देशों में फैले हैं और उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दी में दक्षिणी अमेरिकी, एशियाई और • अफ्रीकी महाद्वीपों में फैले हैं।

मैरियन जे0 लेवी के अनुसार, “आधुनिकीकरण की मेरी परिभाषा शक्ति के जड़ स्रोतो और प्रत्यय के प्रभाव को बढाने के लिए उपकरणों के प्रयोग पर आधारित है। मैं इन दो तत्वों में से प्रत्येक को सातत्य (Continuum) का आधार मानता हूँ।” इस परिभाषा से स्पष्ट है कि शक्ति के जड स्रोत (पेट्रोल, डीजल, कोयला, जल विद्युत एवं शक्ति तथा यन्त्रों के प्रयोग) को आधुनिक कहा जाएगा। यह इस बात पर निर्भर करता कि वहाँ जड़ शक्ति एवं यन्त्रों का कितना प्रयोग हुआ है।

आइजन स्टेड के अनुसार, “ऐतिहासिक दृष्टि से आधुनिकीकरण सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्थाओं की ओर परिवर्तन की प्रक्रिया सत्रहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी तक पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका में शताब्दी तक दक्षिणी अमेरिकी, एशियाई और अफ्रीकी देशों में विकसित हई।”

डॉ० श्रीनिवास के अनुसार, “आधुनिकीकरण की प्रक्रिया किसी एकही अथवा क्षेत्र में होने वाले परिवर्तन को ही प्रकट नहीं करती, अपितु एक बहटिया प्रक्रिया है। साथ ही यह किसी भी प्रकार के मूल्यों से बंधी हुई नहीं है, किन्त कभी. इसका अर्थ अच्छाई तथा इच्छित परिवर्तन से लिया जाता है।”

डॉ० योगेन्द्र सिंह के अनुसार, “आधुनिक होने के अर्थ ‘फैशनेबल’ होने से लिया जाता है। वह आधुनिकीकरण को एक सांस्कृतिक सम्प्रत्यय (Concept) मानते हैं, जिसमें तार्किक अभिवृत्ति, सार्वभौम दृष्टिकोण, परानुभूति, वैज्ञानिक विश्व दृष्टि, मानवता प्रौद्योगिक प्रगति, आदि सम्मिलित है। वह आधुनिकीकरण पर किसी एक ही ‘नजातीय समूह‘ अथवा ‘सांस्कृतिक समूह‘ के स्वामित्व को मानने के स्थान पर सम्पूर्ण मानव समाज का अधिकार बताते हैं।

आधुनिकीकरण की विशेषताएँ

डेनियल लर्नर (Daniel Learner) आधुनिकीकरण के पश्चिमी मॉडल का समर्थन करते हैं। उनका कथन है कि आधुनिकीकरण में निम्नलिखित विशेषताएँ निहित हैं –

  1. बढ़ता हुआ शहरीकरण।
  2. बढ़ती हुई साक्षरता।
  3. बढ़ती हुई साक्षरता विभिन्न साधनों, पुस्तकों, समाचार पत्रों, रेडियो आदि के प्रयोग द्वारा शिक्षितों के अर्थपूर्ण विचार विनिमय में सहभागिता की वृद्धि करती है।
  4. इन सबसे मानव क्षमता बढ़ती है, राष्ट्र को आर्थिक लाभ प्राप्त होता है, जो प्रति  व्यक्ति आय में वृद्धि में योग देता है।
  5. आधुनिकीकरण राजनैतिक जीवन की विशेषताओं को उन्नत करने में सहायता प्रदान करता है।

डेनियल लर्नर इन विशेषताओं को शक्ति, तरुणाई, कुशलता, निपुणता तथा तार्किकता के रूप में व्यक्त करते हैं। वह आधुनिकीकरण को मुख्य रूप से मस्तिष्क की एक स्थिति के रूप में मानते हैं। प्रगति की अपेक्षा वृद्धि की ओर उन्मेष और परिवर्तन के अनुरूप स्वयं को ढालने की तत्परता के रूप में स्वीकार करते हैं। वह परानुभूति को भी आधुनिकीकरण का एक मुख्य तत्व मानते हैं, जिसमें अन्य लोगों के सुख-दुःख में भागीदारी करने तथा संकटकाल में उन्हें सहायता देने की प्रवृत्ति बढ़ती है।

डॉ० श्रीनिवास के अनुसार, आधुनिकीकरण एक तटस्थ शब्द नहीं है। उनका विचार  है कि आधुनिकीकरण का अर्थ अधिकांशतः ‘अच्छाई से लगाया जाता है। किसी भी पश्चिमी  देश के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्पर्क के कारण किसी गैर पश्चिमी देश में होने वाले परिवर्तन  के लिए प्रचलित शब्द ‘आधुनिकीकरण’ है। श्रीनिवास ने आधुनिकीकरण में अग्रलिखित बातो को सम्मिलित किया है – बढ़ता हुआ नगरीकरण, साक्षरता का प्रसार, प्रति व्यक्ति आय मे वृद्धि, वयस्क मताधिकार एवं तर्क का विकास।

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डॉ० श्रीनिवास ने आधुनिकीकरण के तीन स्रोतों का उल्लेख किया है –

1. भौतिक संस्कृति का क्षेत्र, जिसमें तकनीकी को भी सम्मिलित किया जाता है।

2 सामाजिक संस्थाओं का क्षेत्र और

3. ज्ञान, मूल्य तथा मनोवत्तियों का क्षेत्रा बाह्य रूप से ये तीनों क्षेत्र भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं, किन्तु वास्तव में ये परस्पर सम्बन्धित हैं। एक क्षेत्र में होने वाले परिवर्तन दूसरे क्षेत्र को भी प्रभावित करते हैं।

विभिन्न विद्वानों के विचारों से आधुनिकीकरण की अग्रलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती है-

1. घटनाओं की विवेकपूर्ण व्याख्या,

2. सामाजिक गतिशीलता में वृद्धि.

3. लौकिकीकरण धर्मनिरपेक्षता,

4. नवीन व्यक्तित्व का विकास,

5. वयस्क मताधिकार द्वारा राजनीतिक का लोगों में हस्तान्तरण,

6. बढ़ता हुआ शहरीकरण,

7. औद्योगीकरण,

8. वैज्ञानिक ण का विकास,

9. शिक्षा का प्रसार,

10. प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि, जड़ शक्ति का प्रयोग

11. वस्तु विनिमय के स्थान पर द्रव्य विनिमय,

12. व्यवसायों में विशिष्टता,

13. परानुभूति.

14. कृषि में पुरानी विधियों के स्थान पर नई विधियों-प्रविधियों का प्रयोग,

15… गंचार एवं यातायात व्यवस्था का विकास,

16. चिकित्सा तथा स्वास्थ्य में वृद्धि, आदि।

आधुनिकीकरण के प्रभाव

प्रत्येक समाज के स्वरूप में परिवर्तन होते रहते हैं। अतः सोचना उचित नहीं है कि समाज का वर्तमान रूप ही सदैव बना रहेगा। जिसे भारतीय समाज में परम्परा कहा जाता। है। वह वस्तुतः दीर्घकालीन विकास का परिणाम है। भारत पर अनेक विदेशी आक्रमण हुए और कई बार भारत विदेशी शक्तियों के शासन के अधीन भी रहा। इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक आन्दोलनों ने भी भारतीयों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया। फलस्वरूप उनके मूल्यों में परिवर्तन आया। इस प्रकार भारतीयों का पारिवारिक जीवन, उनके धार्मिक विश्वास एवं क्रियाएँ और उनकी सामाजिक संरचना प्रभावित होती रही है। ग्रामीण समाज की परम्परागत जाति व्यवस्था और संयुक्त परिवार प्रणाली में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। भारतीय ग्रामीण समाज में परम्परागत समाजों की विशेषता, सजातीयता के विपरीत भिन्न धार्मिक एवं जातीय समूह पाए जाते हैं, जिनकी जीवन पद्धति में पर्याप्त अन्तर है। वर्तमान भारत को परम्परागत समाज की श्रेणी में रखना उचित नहीं है, क्योंकि आज वह आधुनिकता की ओर तीव्र गति से बढ़ रहा है।

ग्रामीण समाज पर आधुनिकीकरण के प्रभाव में निरन्तर वृद्धि हो रही है। आधुनिक ग्रामीण समाज में गतिशीलता की दो प्रक्रियाएँ क्रियाशील हैं – संस्कृतिकरण एवं पश्चिमीकरण । इन प्रक्रियाओं द्वारा कछ जनसंख्या परम्परा की ओर अग्रसर और कुछ आधुनिकता की ओर  यातायात और संचार साधनों के तीव्र विकास ने ग्रामीणों की सामाजिक और व्यक्तिगत  गतिशीलता को बढ़ा दिया है। इससे गाँवों का विस्तृत जगत से सम्पर्क हुआ है, यानी उनकी संकीर्णता दूर हुई है। अब ग्रामीण लोग परम्परागत कृषि के अतिरिक्त अन्य व्यवसाय भी करने लगे हैं। कृषि के उपकरणों और तरीकों में भी परिवर्तन आया है।

आधुनिकीकरण के प्रभाव से ग्रामीण समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता कम हुई है। पहले किसी भी शारीरिक-मानसिक कष्ट को किसी अदृसश्य/अलौकिक शक्ति का कोप माना जाता था। अतः अप्रसन्न देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए जादू-टोने और मंत्रों, आदि का सहारा लिया जाता था। शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोणों के विकास ने रूढ़िवादी विचारों की संकीर्णताओं को दूर किया है।

आधुनिक भारत औद्योगीकरण की दिशा में तेजी से बढ़ता जा रहा है। विल्बर्ट ई० मूर के अनुसार, औद्योगीकरण ही आधुनिकीकरण है। भारत में सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के अनेक उद्योग स्थापित हुए हैं। आधनिकीकरण का एक पक्ष नगरीकरण भी है। 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में कुल जनसंख्या का 34 प्रतिशत भाग नगरो में निवास करता है। आधुनिकीकरण सर्वप्रथम नगरों में होता है. फिर धीरे-धीरे करबों और गाँवों तक फैलता है। भारत में यही हुआ है।

पश्चिमीकरण भी आधनिकीकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करता है। भारत में अग्रजों के 150 वर्षीय शासनकाल में समाज और संस्कृति में विभिन्न परिवर्तन हुए। तकनीकी संस्थाओं, विचारधाराओं, मूल्यों में हुए परिवर्तनों के कारण परम्परागत ग्रामीण समाज प्रभावित हुआ। डेनियल लर्नर ने पश्चिमीकरण को ही आधुनिकीकरण माना है। उनका मत है कि आधुनिकीकरण के कारण ही संचार व्यवस्था में क्रान्ति आती है, शहरीकरण में विद्धि होती  है और शिक्षा का विस्तार होता है। जिसमें प्रति व्यक्ति आय तथा राजनीतिक भागीदारी यानी मतदान प्रभावित होता है। भारत में पश्चिमीकरण से औद्योगीकरण, नगरीकरण संचार साधनों की वृद्धि तथा आर्थिक एवं राजनैतिक विकास हुआ है।

आधुनिकीकरण का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अभिकरण शिक्षा है। शिक्षा आधनिकीकरण को प्रोत्साहन देती है और उसकी सूचक भी होती है। जो देश जितना अधिक साक्षर है, वह उतना ही अधिक विकसित होता है। भारत में अंग्रेजी शासनकाल में शिक्षा का सार्वभौमीकरण हुआ, अतः वे जातियाँ भी शिक्षा के प्रति आकर्षित हुई जिन्हें शिक्षा के अधिकारों से वंचित रखा जाता था। वर्तमान समय में ग्रामीणों में शिक्षा के प्रति  जागरूकता आई है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की संस्थाएँ स्थापित हैं। इससे गाँवों के लोगों में वैज्ञानिक दृष्टि बढ़ी है, सामाजिक संकीर्णता दूर हुई, समानता के भाव दृढ़ हो रहे हैं। सबसे बढ़कर उनमें सामाजिक सहिष्णुता की भावना विकसित हुई है।

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आधुनिकीकरण का एक लक्षण सामाजिक परिवर्तन की इच्छा और सम्भावना है। आधुनिक भारतीय समाज में परिवर्तन की गति अत्यन्त तीव्र है। सरकार ने सामाजिक नियोजन के माध्यम से दीर्घ और अल्पकालीन योजनाएँ तैयार कर भारत को समाजवाद के लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास आज भी जारी रखा है। फलस्वरूप ग्रामीण समाज पर इन परिवर्तनों का सकारात्मक प्रभाव परिलक्षित हो रहा है। गाँव वालों के धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विचारों में काफी बदलाव हुए हैं। सामाजिक परिवर्तन को आधुनिकीकरण का लक्षण होने के साथ ही उसका लक्ष्य भी माना जाता है।

उच्च सहभागिता, संस्थागत राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, वयस्क मताधिकार और राजनीतिक स्थायित्व को भी आधुनिकीकरण का सूचक माना गया है। ये सभी सूचक ग्रामीण समाज में देखे जाते हैं। चुनाव के समय गाँवों के लोग बड़ी संख्या में अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं। विभिन्न राजनैतिक पार्टियाँ संस्थागत रूप से सत्ता की प्राप्ति हेतु प्रतिस्पर्धा करती हैं। चुनावों से पता चलता है कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें अत्यन्त सुदृढ़ हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत में जिस धर्मनिरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक व्यवस्था को स्थापित किया गया है, उसके कुछ अन्य विकासशील देशों के समान विफल होने की कोई सम्भावना नहीं है।

भारतीय समाज में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में विभिन्त्रीकरण के फलस्वरूप नए वर्ग विकसित हुए हैं, द्वितीयक समितियाँ बढ़ी हैं, द्वितीयक समितियों की प्रधानता आधुनिक समाजों की मुख्य विशेषता है, क्योंकि इससे लोकतन्त्रात्मक व्यवस्था में अधिक स्थिरता आती है। पश्चिमी शिक्षा के फलस्वरूप भारत में एक नये अभिजन (Elite) वर्ग का विकास हुआ, जिसने आधुनिकता लाने में विशेष भूमिका निभायी है। भारत में अभी तक एक सुदृढ़ मध्यम वर्ग विकसित नहीं हुआ है, किन्तु बुद्धिजीवियों का एक समूह अवश्य विकसित हो गया है, जो सामाजिक उन्नति प्रगति में अपना योगदान करने में सक्षम है।

कछ विद्वानों के अनुसार भारतीय ग्रामीण समाज में परम्परा और आधुनिकता विरोधाभास के रूप में विद्यमान है। हमने विकास की योजनाएँ बनाई हैं और यह पाया है कि परम्पराएँ उनमें बाधा डालती हैं। साम्प्रदायिकता और जातीयता ने राष्ट्रीय दष्टिकोण के मार्ग में रोडे डाले हैं। धर्मनिरपेक्षता के रास्ते में पवित्रता और अपवित्रता की प्राचीन धारणा  बाधक सिद्ध हई है। विवेक के विकास में धर्म व धार्मिक संस्कार और कर्मकाण्ड बाधक हैं। परम्परा प्रदत्त पदों की समर्थक है, तो आधुनिकता अर्जित पदों की। आधुनिकता तटस्थता चाहती है. तो परम्परा भावात्मकता अतः आवश्यक है कि हमें कर्म का सिद्धान्त जीवन चक्र का सिद्धान्त, स्तरीकरण, परलोकवाद, पवित्रता-अपवित्रता की धारणा, खण्डात्मकता एवं परुषों की प्रधानता, आदि का त्याग करना पड़ेगा और इनके स्थान पर कर्तव्य, निष्ठ एवं अनशासन भावना को अंगीकार करना होगा।

भारतीय गाँव परम्परा और आधुनिकता की दुविधा में फंस गया है। उसके सम्मुख यह द्वन्द्व है कि वह किस सीमा तक परम्परा का त्याग करे और किस सीमा तक आधुनिकता को अपनाए। स्पष्ट है कि ग्रामीण समाज परम्परा और आधुनिकता के दो ध्रुवों के मध्य सहमा हुआ खड़ा है तथा अनिश्चय की स्थिति में उसके एक ओर अतीत है, तो दूसरी ओर प्रगति करने की अनिवार्यता। बदले हुए जीवन के आयाम में परम्परा से सुरक्षा नहीं मिल पाई है, अत: वह नए अधिकार बोध तथा आकांक्षाओं के नए क्षितिज को स्पर्श करना चाहता है। इस संदर्भ में डा० योगेश अटल का कहना है कि आधुनिक भारत में परम्परा तथा आधुनिकता साथ-साथ चल रही है। किन्तु भारत आधुनिकीकरण की दिशा में तेजी से अग्रसर है। भारतीय गाँव भी इस दिशा में प्रवृत्त हैं। गाँव वाले भी परिवर्तन चाहते हैं। उनके मूल्यों एवं आकांक्षाओं में कुछ परिवर्तन दिखाई देने लगे हैं। गाँवों में साक्षरता का प्रतिशत बढ़ता जा। रहा है, आर्थिक दृष्टि से सम्मानित व्यवसाय अपनाए जाने लगे हैं। कृषि के प्रति तार्किक दष्टिकोण अपनाया जा रहा है। इस संदर्भ में यह निश्चित है कि “भारत अमेरिका तथा यरोप की कॉर्बन कापी बनने नहीं जा रहा है और जैसा अमेरिका एवं यूरोप एक दूसरे से भिन्न हैं, भारत में आधुनिकीकरण निश्चित रूप से भारतीय विशिष्टता लिए हुए होगा।

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