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भूमिहीन/कृषि मजदूर से आप क्या समझते हैं,इनकी समस्याएँ

 भूमिहीन/कृषि मजदूर का अर्थ

 

भूमिहीन/कृषि मजदूर या खेतिहर मजदूर से अभिप्राय उन व्यक्तियो से है, जिनके पास अपनी स्वयं की कोई कृषि भूमि नहीं होती, किन्तु जो कृषकों की भूमि पर एक मजदूर के रूप में कार्य करते हैं अथवा जिनके पास अपनी थोड़ी सी कृषि योग्य भूमि है और वह अपने परिवार के लोगों के भरण-पोषण के लिए कृषि मजदूर बनकर कार्य करता है। प्रथम खेतिहर श्रम जांच समिति, 1951-52 ने भूमिहीन मजदूर के अर्थ को स्पष्ट करते हुए लिखा है, “एक का मजदूर वह व्यक्ति है, जो कि वर्ष में अपने काम के कुल दिनों में से आधे से अधिक दिन खेत में मजदूर बनकर काम करे। इस दृष्टि से ऐसे व्यक्ति भी भूमिहीन मजदूर है, जिनके पास यद्यपि अपनी थोडी सी कृषि भूमि है या जो कारीगर है, किन्तु जिन्होंने अपने काम के कुल दिनों में आधे अथवा आधे से अधिक दिन किसी अन्य के खेत में मजदूरी की। द्वितीय खेतिहर श्रम जांच समिति 1956-57 में खेतिहर मजदूर की अपनी परिभाषा में खेती से प्राप्त मजदूरी को ही उनकी आय का प्रमुख स्रोत बताया है। खेती के अन्तर्गत पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन, मत्स्य पालन, बागवानी और दुग्ध-व्यवसाय आदि भी आते हैं, जिनकी प्रथम जांच में सम्मिलित नहीं किया गया था।

 

श्रमिकों के प्रकार

 

कांग्रेस द्वारा गठित कृषि समिति ने कृषि श्रमिकों को तीन वर्गों में बांटा था

1. खेती पर काम करने वाले मजदूर, जिसके अन्तर्गत मिट्टी जोतने बोने वाले श्रमिक आते हैं।

2. साधारण श्रमिक जिसके अन्तर्गत मिट्टी खोदने वाले, मिट्टी साफ करने वाले और बाड़ा बनाने वाले मजदूर आते हैं।

3. कुशल मजदूर, जिसमें बढ़ाई, लोहार, आदि को सम्मिलित किया गया था।

 

स्थायित्व के आधार पर भमिहीन/कृषि मजदूरों को दो भागों में बाटा जा सकता है –

1. स्थायी या अनुलग्न कृषि मजदूर, जो बड़े-बड़े कृषकों के यहां नौकर बनकर काम करते हैं। इनका अपनी नौकरी की अवधि में अपने मालिक के साथ कोई न कोई सम्पर्क बना रहता है। इनकी मजदूरी/वेतन गांव के रीति-रिवाज के द्वारा तय होती है।

2. अस्थायी या आकस्मिक मजदूर, जिन्हें अल्पकाल हेत फसल बोने या काटने के समय अथवा अन्य कृषि कार्यों के लिए रखा जाता है। इनको कार्य की अकार्मकता के अनुसार समय-समय पर रोजगार मिलता रहता है, किन्तु मजदूरी बाजार-दर के अनुसार निर्धारित होती है।

 

 

भूमिहीन मजदूरों की प्रमुख समस्याएँ

 

भारत में भूमिहीन/कृषि मजदूरों की समस्या वास्तव में, ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त निर्धनता, बेरोजगारी एवं अल्पकालीन रोजगार की व्यापक समस्या का एक अंग है। इनकी आर्थिक एवं सामाजिक दशा अत्यन्त दयनीय है। आजादी की प्राप्ति के उपरान्त भारत में राजनीतिज्ञों को एक अत्यन्त लोकप्रिय नारा रहा है – “भूमिहीनों को भूमिका” भूमिहीन की कार्यशील दशाएँ, मजदूरी और जीवन स्तर प्रमुख कठिनाइयाँ हैं। प्रायः इनका स्वयं का मकान (निवास) नहीं होता, अतः वे भू-स्वामियों की कृपा एवं अनुमति से ही उनकी बेकार पड़ी हुई भूमि पर टूटी-फूटी झोपड़ी बनाकर रहने को बाध्य होते हैं। इन झोपड़ियों में मजदूर केवल पैरों को फैलाकर सो सकता है। एक ही झोपड़ी में कई लोगों के सोने से मर्यादा भी समाप्त हो जाती है। इनमें शुद्ध वायु और रोशनी तक की व्यवस्था नहीं होती है, जिससे मजदूर और उसके बच्चों का स्वास्थ्य खराब होता जाता है।

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देश में भूमिहीन मजदूरों की मुख्य समस्याएँ और कठिनाइयाँ निम्नलिखित हैं –

 

मौसमी रोजगार की समस्या –

ग्रामीण मजदूरों को वर्ष पर्यन्त रोजगार नहीं प्राप्त होता है क्योंकि कृषि वर्ष के कुछ महीने ही होती है। द्वितीय कृषि श्रम जांच समिति की रिपोर्ट के अनुसार, सामान्यतः एक अस्थायी पुरुष कृषि मजदूर को लगभग 197 दिन ही कार्य प्राप्त होता है, 40 दिन वह निजी कार्यों में लगे रहते हैं और शेष 128 दिन बेरोजगार ही रहते हैं। श्रमिकों को वर्ष में केवल 241 दिन और बाल श्रमिकों को 204 दिन रोजगार प्राप्त होता है। स्पष्ट है कि इतने दिन काम करने के कारण वे अपना जीवन अत्यन्त कष्टमय स्थिति में व्यतीत करते हैं।

 

सहायक उद्योग-धन्धों की कमी की समस्या –

देश के अधिकांश गांवों में कटीर उद्योग-धन्धे नष्ट हो गये हैं, अतः कृषि कार्य की समाप्ति के बाद भूमिहीन मजदूर बेकार बैठा रहता है। सहायक उद्योग धन्धों की कमी होने के कारण उसे कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। बाढ़, अकाल, महामारी, फसल के नष्ट हो जाए की स्थिति में इन मजदूर को अपना जीवन निर्वाह करना दुष्कर हो जाता है।

 

निम्न जीवन स्तर की समस्या –

चूंकि कृषि मजदूरी की आय बहुत ही कम है, इसलिए वे भोजन, वस्त्र, चिकित्सा एवं आवास सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ रहते हैं।

 

बेगारी की समस्या –

भारत के लगभग सभी भागों में कृषि श्रमिकों से बेगारी में कार्य लेने की प्रणाली विद्यमान है। प्रायः भूमिपतियों द्वारा कृषि श्रमिकों को कम ब्याज पर या बिना ब्याज के कुछ ऋण दे दिया जाता है, जिनके बदले में उन्हें नाममात्र की मजदूरी पर ही कार्य करना होता है।

 

आवास की समस्या –

भूमिहीन कृषि श्रमिकों के सम्मुख मकानों की समस्या भी होती है प्रायः इनका अपना निजी निवास स्थान नहीं होता है। वे भूमिपतियों की अनुमति से उनकी बेकार भूमि पर झोपड़ी बनाकर रहते हैं।

 

कार्य के अनियमित घण्टों की समस्या –

चूंकि कृषि श्रमिकों के कार्य के घण्टे स्थान, ऋण व फसलों की विभिन्नता के अनुसार बदलते हैं। इसीलिए उन्हें अन्य उद्योगों की भांति स्थायी नहीं किया जा सकता।

 

ऋणग्रस्तता की समस्या –

कृषि श्रमिक की निम्न मजदूरी के कारण उन पर ऋणों का भार रहता है। द्वितीय श्रम जांच समिति ने प्रति कृषि श्रमिक परिवार पर 148 रुपये ऋण का भार बताया था।

 

संगठन के अभाव की समस्या –

अधिकांश कृषि श्रमिक अनपढ़ हैं, उन्हें कारखाने की भांति एक छत के अन्दर कार्य न करके बिखरे रूप में दूर-दूर के खेतों पर कार्य करना पड़ता है, जिससे उनमें संगठन का अभाव है। संगठन के अभाव के कारण वे भू-स्वामियों से अपने अधिकारों की प्रभावशाली ढंग से मांग नहीं कर पाते।

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मजदूरी के निम्न स्तर की समस्या –

1956-57 की कृषि जांच समिति के अनसार, एक कृषि श्रमिक परिवार की औसत वार्षिक आय 43 रुपये और प्रति व्यक्ति आय 99.4 रुपये थी। मजदूरी का निम्नस्तर होने से श्रमिक की कार्यक्षमता कम रही है व भावी संतति के विकास पर इसका कुप्रभाव पड़ता है।

 

निम्न सामाजिक स्तर की समस्या –

अधिकांश कृषि श्रमिक पिछड़ी जातियों के हैं, जिनका सदियों से शोषण होता आ रहा है, जिससे इनका सामाजिक स्तर निम्न रहता है।

 

भूमिहीन कृषकों की समस्याओं के निवारण की दिशा में सरकार द्वारा किए गए प्रयासों का वर्णन

 

भारत में भूमिहीन श्रमिकों की समस्या के निवारण के संदर्भ में स्वतन्त्र सरकार ने अग्रलिखित कार्य किये हैं-

  1. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम की स्थापना को 19 जुलाई, 1975 से भूमिहीन श्रमिकों पर भी लागू किया गया है, जिससे उनकी आमदनी में पर्याप्त वृद्धि हुई है।
  2. भूमि आवंटन के द्वारा अधिकम जोत से बची हुई भूमिक तथा बंजर भूमि को इन श्रमिकों में बांटा गया है। सन् 1979 तक लगभग 60 लाख भूमिहीन श्रमिकों को इससे लाभान्वित किया जा चुका है।
  3. सरकारी ऋण मुक्ति अध्यादेश के द्वारा,जिन भूमिहीन श्रमिकों की वार्षिक आय 2400 रुपये है, उनको सभी प्रकार के कर्जों से मुक्त कर दिया गया है।
  4. बन्धुआ मजदूर उन्मूलन 1975 के द्वारा सम्पूर्ण देश में इस प्रथा को समाप्त कर दिया गया है।
  5. विभिन्न प्रकार के कल्याण कार्यक्रमों के द्वारा इनकी दशा सुधारी जा रही है। स्थायी समिति, कृषि सेवा समितियों की स्थापना, ग्रामीण कार्य योजना तथा लघु कुटीर उद्योग धन्धों के विकास आदि कार्यक्रम और बैंको से ऋण दिलाना आदि भी ऐसे ही कार्य है जिनसे इनकी दशा में उत्तरोत्तर सुधार हो रहा है।

 

 

ग्रामीण भारत में भूमिहीन श्रमिकों की संख्या में वृद्धि होने के कारकों का वर्णन

 

1. गाँवों में भी जनसंख्या तेजी से बढ़ी रही है। भूमि पर जनसंख्या का भार बढ़ने से गाँवों में भूस्वामी, काश्कार, खेतिहर कई वर्ग बन गये है। भूमि सीमित है और भूमिहीनों की संख्या अधिक है।

2. भूमि का उप-विभाजन और विखण्डन भी भूमिहीन श्रमिकों की संख्या बढा रहा है। जब किसान के अधिकार में भूमिक का एक छोटा-सा टुकड़ा रह जाता है, तो कृषि जोत अनार्थिक हो जाती है, परिवार की गुजर-बसर मुश्किल हो जाती है और कृषक को दूसरों के खेतों पर मजदूरी करनी पड़ती है। कर्ज लेकर काम चलाने के कारण छोटे कृषकों की भूमि महाजन/साहूकारों के हाथों में चली जाती है।

3. ग्रामीण उद्दोग धन्धों का विनाश भी भूमिहीन कृषकों की संख्या बढ़ाने में सहायक है।

4. इसी प्रकार अकाल, आर्थिक कठिनाई, ऋणग्रस्तता, सामाजिक पिछड़ापन, शिक्षा का अभाव, रुढियाँ, अन्धविश्वास, कुरीतियाँ आदि भी भूमिहीन श्रमिकों की संख्या बढ़ाने में सहायक कारक है।

 

 

 

 

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