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शैव धर्म UPSCऔर वैष्णव/भागवत धर्म UPSC

शैव धर्म और वैष्णव धर्म

 

भागवत धर्म

 

* इन्हें घोर अंगिरस का शिष्य बताया गया है। कृष्ण के अनुयायी उन्हें ‘भगवत’ पूज्य कहते थे। इस कारण उनके द्वारा प्रवर्तित धर्म की संज्ञा भागवत हो गई।

*ऋग्वेद में विष्णु का उल्लेख आकाश के देवता के रूप में हुआ है। उत्तर वैदिक काल में तीन प्रमुख देवता-प्रजापति, रुद्र एवं विष्णु थे। विष्णु को लोग पालक एवं रक्षक मानने लगे। पतंजलि ने वासुदेव को विष्णु का रूप बताया है। विष्णु पुराण में भी वासुदेव को विष्णु का एक नाम बताया। गया है। इस प्रकार जब कृष्ण-विष्णु का तादात्म्य नारायण से स्थापित हुआ, तब वैष्णव धर्म की एक संज्ञा ‘पांचरात्र धर्म हो गया। भागवत धर्म, वासुदेव की पूजा का उल्लेख महर्षि पाणिनि ने किया है। उन्होंने यामा के उपासकों को ‘वासुदेवक’ कहा है। यह धर्म प्रारंभ में मथुरा एवं उसके आस पास के क्षेत्रों में प्रचलित था। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज के अनुसार शूरसेन (मथुरा) के लोग ‘हेराक्लीज’ के उपासक थे।

*हेराक्लीज से तार वासुदेव कृष्ण से ही है। मथुरा से इस धर्म का प्रसार धीरे-धीरे भारत के भागों में हुआ। भागवत धर्म से संबद्ध प्रथम उपलब्ध प्रस्तर स्मारक विकि (बसनगर) का गरुड़ रतंभ है। इससे पता चलता है कि तक्षशिला के राजदूत हेलियोडोरस ने भागवत धर्म ग्रहण किया तथा इस स्तंभ की स्थापना करवाकर उसकी पूजा की थी। इस पर उत्कीर्ण लेख में हेलियोडोरस के ‘भागवत’ तथा वासुदेव को ‘देवदेवस’ अर्थात देवताओं का देवता कहा गया था। अपोलोडोटस के सिक्कों पर सबसे पहले भागवत धर्म के चिह्न मिलते है। महाक्षत्रप शोडासकालीन मोरा (मथुरा) पाषाण लेख में पंचवीरों (संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युम्न, साम्ब तथा अनिरुद्ध) की पाषाण प्रतिमाओं को मंदिर में स्थापित ससे किए जाने का उल्लेख मिलता है।

*कुषाण शासक हुविष्क तथा वासुदेव द्वारा विष्णु पूजा का पता चलता है। *गुप्त नरेश वैष्णव मतानुयायी थे तथा उन्होंने इसे अपना राजधर्म बनाया था। अधिकांश गुप्त शासक ‘परममागवत’ की उपाधि धारण करते थे। विष्ण का वाहन ‘गरुड़’ गुप्त शासकों का राजचिह्न था। मेहरौली स्तंभ लेख में उल्लेख मिलता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय ने विष्णुपद पर्वत पर विष्णु ध्वज की स्थापना करवाई थी। स्कंदगुप्त के भितरी स्तंभ लेख (गाजीपुर) में विष्णु की मूर्ति स्थापित किए जाने का उल्लेख है। जूनागढ़ लेख से ज्ञात होता है कि चक्रपालित ने सुदर्शन झील के तट पर विष्णु की मूर्ति स्थापित करवाई थी। देवगढ़ की मूर्ति में विष्णु को शेषशायी पर विश्राम करते हुए दिखाया गया है। अमरसिंह ने अपने ग्रंथ अमरकोश में विष्णु के 42 नामों का वर्णन किया है। वेगी के पूर्वी चालुक्य शासक वैष्णव मतानुयाई थे। गुप्तों के समान ही उनका राजचिह्न ‘गरुड़’ था। राष्ट्रकूट नरेश दंतिदुर्ग ने एलोरा में दशावतार का प्रसिद्ध मंदिर बनवाया था। इस मंदिर में विष्णु के दस अवतारों की कथा मूर्तियों में अंकित है। क्षेमेंद्र रचित ‘दशावतार चरित’ में विष्णु के दस अवतारों का वर्णन मिलता है। अलवार संतों द्वारा दक्षिण भारत में वैष्णव धर्म का प्रचार-प्रसार किया गया। अलवार  शब्द का अर्थ होता है ज्ञानी व्यक्ति ।

* अलवार संतों की संख्या 12 बताई गई है। इनमें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं- पोयगई, पूडम, पेय, तिरुमंगई, आण्डाल, नम्मालवार आदि। अलवार  संतों में एकमात्र महिला साध्वी आण्डाल थी। चोल काल में वैष्णव धर्म के प्रचार का कार्य अलवारों के स्थान पर आचार्यों ने किया। आचार्य परंपरा में प्रथम नाम नाथमुनि का लिया जाता है। इन्हें मधुरकवि का शिष्य बताया जाता है। इन्होंने ‘न्यायतत्व’ की रचना की। *पुराणों में विष्णु के दस अवतारों का विवरण प्राप्त होता है। वे हैं मत्स्य, कूर्म अथवा कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध एवं कल्कि (कलि)। कल्कि अवतार भविष्य में होने वाला है।

* भगवान विष्णु ने दैत्यराज हिरणाक्ष का वध करने के लिए वाराह रूप धारण किया तथा उसके चंगुल से धरती को छुड़ाया। ऐसी कल्पना की गई कि भगवान विष्णु हाथ में तलवार लेकर श्वेत अश्व पर सवार होकर पृथ्वी पर अवतरित होंगे।

*भागवत अथवा पांचरात्र धर्म में वासुदेव (कृष्ण) की उपासना के आ साथ ही तीन अन्य व्यक्तियों की उपासना की जाती थी। इनके नाम हैं-

(i) संकर्षण (बलराम)-वसुदेव और रोहिणी से उत्पन्न पुत्र।

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(ii) प्रद्युम्न-कृष्ण उ और रुक्मिणी से उत्पन्न पुत्र।

(iii) अनिरुद्ध-प्रद्युम्न के पुत्र।

इन चारों को ‘चतुर्व्यूह’ की संज्ञा दी जाती है। वायु पुराण में इन चारों के साथ मे ‘साम्ब’ (कृष्ण और जाम्बवंती से उत्पन्न पुत्र) को मिलाकर ‘पंचवीर’ कहा गया है। भागवत संप्रदाय में ‘नवधा भक्ति’ का विशेष महत्व है। वैष्णव धर्म के प्रमुख आचार्य हैं -रामानुज, मध्व, बल्लभ, चैतन्य आदि।

 

वैष्णव धर्म से संबंधित प्रमुख मंदिर-

 

मंदिर         स्थान
जगन्नाथ मंदिर पुरी (ओडिशा)
दशावतार मंदिर देवगढ़ (उत्तर प्रदेश)
विष्णु मंदिर तिगवां (म.प्र.)
विष्णु मंदिर एरण (म.प्र.)
द्वारिकाधीश मंदिर मथुरा (उत्तर प्रदेश)
द्वारिकाधीश मंदिर द्वारका (गुजरात)

 

शैव धर्म

 

*शिव से संबंधित धर्म को ‘शैव धर्म’ कहा जाता है। शिव के उपासक को ‘शैव’ कहा जाता है। शैव धर्म भारत का प्राचीनतम धर्म है। इसका संबंध प्रागैतिहासिक युग तक है। सिंधु घाटी के लोग शिव की पूजा करते थे। इसका प्रमाण मोहनजोदडो से प्राप्त एक मुद्रा है, जिस पर योगी की आकृति बनी है। योगी के सिर पर एक त्रिशुल जैसा आभूषण है तथा इसके तीन मुख हैं। मार्शल महोदय ने इसे शिव से संबंधित किया है। ऋग्वेद में शिव को ‘रुद्र’ कहा गया है, जो अपनी उग्रता के लिए प्रसिद्ध हैं। रुद्र को समस्त लोकों का स्वामी वाजसनेयी संहिता के शतरुद्रीय मंत्र में कहा गया है। अथर्ववेद में उन्हें पशुपति, भव, शर्व, भूपति आदि कहा गया है। पतंजलि के महाभाष्य से पता चलता है कि दूसरी सदी इसा पूर्व में शिव की मूर्ति बनाकर पूजा की जाती थी।

*महाभाष्य में शिव के विभिन्न नामों का उल्लेख मिलता है। ये प्रमुख नाम है- रुद्र, महादेव, गिरीश, भव, सर्व, त्र्यम्बक आदि। कुषाण शासकों के सिक्कों पर शिव, वृषभ और त्रिशूल की आकृतियां मिलती हैं। उदयगिरि गुहालेख से पता चलता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय के प्रधानमंत्री वीरसेन ने उदयगिरि पहाड़ी पर एक शैव गुफा का निर्माण करवाया था। कुमारगुप्त के समय में खोह या करमदंडा में शिवलिंग की स्थापना करवाई गई थी। गुप्त काल में नचनाकुठार में पार्वती मंदिर तथा भमरा में शिव मंदिर का निर्माण करवाया गया था। कालिदास ने कुमारसम्भवम में शिव की महिमा का गुणगान किया है। चंदेल शासकों द्वारा खजुराहो का प्रसिद्ध कंदारिया महादेव मंदिर निर्मित कराया गया था। राष्ट्रकूटों के समय में एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मंदिर निर्मित कराया गया था।

*पल्लव काल में शैव धर्म का प्रचार-प्रसार दक्षिण भारत में नयनारों द्वारा किया गया था। नयनार संतों की संख्या 63 है। इनमें तिरुज्ञान, सुंदर मूर्ति, सम्बन्दर, अप्पार, मणिक्कवाचगर आदि का नाम उल्लेखनीय है। इनके भक्तिगीतों को एक साथ ‘देवारम’ में संकलित किया गया है। दक्षिण भारत में चोल शासक शिव के अनन्य उपासक थे। चोल शासक राजराज प्रथम ने तंजौर में राजराजेश्वर मंदिर निर्मित करवाया था। राजराज प्रथम ने बृहदीश्वर अथवा राजराजेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया था। कुलोतुंग प्रथम एक कट्टर शैव था। इसने शिव के प्रति अतिशय श्रद्धा के कारण चिदंबरम मंदिर में स्थापित विष्णु की प्रतिमा को उखाड़ कर समुद्र में फेंकवा दिया था। शैव धर्म से संबंधित देश के विभिन्न भागों में स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग हैं-सोमनाथ, नागेश्वर (द्वारका के समीप), केदारनाथ, विश्वनाथ (काशी), वैद्यनाथ, महाकालेश्वर (उज्जैन), ओंकारेश्वर (म.प्र.), भीमेश्वर (नासिक), त्र्यम्बकेश्वर (नासिक), घुश्मेश्वर, मल्लिकार्जुन (आंध्र प्रदेश), रामेश्वरम्।

*वामन पुराण में शैव संप्रदाय की संख्या चार बताई गई है। ये हैं- शैव, पाशुपत, कापालिक एवं कालामुख।

*पाशुपत संप्रदाय की उत्पत्ति ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में हुई थी। पुराणों के अनुसार, इस संप्रदाय की स्थापना लकुलीश अथवा लकुली नामक ब्रह्मचारी ने की थी। इस संप्रदाय के अनुयायी लकुलीश को शिव का अवतार मानते हैं। कापालिक संप्रदाय के उपासक भैरव को शिव का अवतार मानकर उनकी उपासना करते थे। इस मत के अनुयायी सुरा का सेवन करते हैं एवं मांस खाते हैं, शरीर पर श्मशान की भस्म लगाते हैं तथा हाथ में नरमुंड धारण करते हैं। भवभूति के ‘मालतीमाधव’ नाटक की से पता चलता है कि श्रीशैल नामक स्थान कापालिकों का प्रमुख केंद्र था। कालामुख संप्रदाय अतिमार्गी होने के कारण शिवपुराण में इसके अनुयायियों है को महाव्रतधर कहा गया है। शैव धर्म का ही एक संप्रदाय लिंगायत अथवा वीर शैव था। इसका प्रचार बारहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में व्यापक य रूप से हुआ। वसव को इस संप्रदाय का संस्थापक माना जाता है।

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*शैव धर्म का एक नया संप्रदाय कश्मीर में विकसित हुआ। यह संप्रदाय शुद्ध दी रूप से दार्शनिक या ज्ञानमार्गी था। नाथपंथ संप्रदाय दसवीं सदी के अंत व में मत्स्येंद्रनाथ ने चलाया। इसमें शिव को आदिनाथ मानते हुए नौ नाथों को दिव्य पुरुष के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। बाबा गोरखनाथ ने दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में इस मत का अधिकाधिक प्रचार-प्रसार किया।

 

शैव धर्म से संबंधित प्रमुख मंदिर-

 

मंदिर स्थान
राजराजेश्वर मंदिर तंजौर (तमिलनाडु)
शिव मंदिर भूमरा (म.प्र.)
नटराज मंदिर चिदंबरम (तमिलनाडु)
विरुपाक्ष मंदिर हम्पी (कर्नाटक)
विश्वनाथ मंदिर वाराणसी (उ.प्र.)

 

 

*शाक्त संप्रदाय के लोग शक्ति को इष्टदेवी मानकर पूजा कर थे। शैव धर्म के साथ शाक्त धर्म का घनिष्ठ संबंध रहा है। शाक्त धर्म की प्राचीनता भी शैव धर्म के समान प्रागैतिहासिक युग तक जाती है। सैंधव सभ्यता में मातृदेवी की उपासना व्यापक रूप से प्रचलित थी। मातृदेवी की बहुसंख्यक मूर्तियां खदाई में प्राप्त हुई हैं। वैदिक साहित्य से सरस्वती, अदिति, उषा, लक्ष्मी आदि देवियों के विषय में सूचना मिलता है। देवी महात्म्य का विस्तृत वर्णन महाभारत तथा पुराणों में प्राप्त हाता है। देवी की उपासना तीन रूपों में की जाती थी। ये रूप हैं-शांत या साम्य रूप, उग्र या प्रचंड रूप और काम प्रधान रूप। सौम्य रूप का प्रतीक उमा, पार्वती, लक्ष्मी आदि हैं। उग्र रूप की प्रतीक चंडी, दुर्गा, भैरवी, कपाली आदि हैं।

*कापालिक एवं कालमुख संप्रदाय के लोग देवी के उग्र रूप की आराधना करते हैं। वैष्णो देवी का मंदिर देवी के सौम्य रूप का मंदिर है। कोलकाता स्थित काली मंदिर देवी के उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करता है। असम का कामाख्या मंदिर देवी के काम प्रधान रूप का प्रतिनिधित्व करता है। प्रतिहार शासक महेंद्रपाल के लेखों में दुर्गा की महिषासुरमर्दिनी, कांचनदेवी, अम्बा आदि नामों की स्तुति मिलती है। राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष महालक्ष्मी का अनन्य भक्त था। संजन लेख से ज्ञात होता है कि उसने एक बार अपने बाएं हाथ की अंगुलि काटकर देवी को चढ़ा दिया था। श्रीहर्ष ने अपने ग्रंथ ‘नैषधीयचरित’ में सरस्वती मंत्र की महत्ता का प्रतिपादन किया। संप्रति शाक्त उपासना के तीन प्रमुख केंद्र हैं। ये हैं- कश्मीर, कांची तथा असम स्थित कामाख्या। असम स्थित कामाख्या कौल मत का प्रसिद्ध केंद्र है।

 

शाक्त धर्म से संबंधित प्रमुख मंदिर –

मंदिर स्थान
वैष्णो देवी का मंदिर जम्मू
विंध्यवासिनी देवी का मंदिर विंध्याचल
चौसठ योगिनी का मंदिर भेड़ाघाट (म.प्र.)
पार्वती मंदिर नाचना-कुठार (म.प्र.)
कामाख्या मंदिर असम
दक्षिणेश्वर काली मंदिर कोलकाता

 

 

प्रमुख प्रश्न (FAQ)-

 

 प्रश्न 1. शैव धर्म की उत्पत्ति कब हुई?

उत्तर- (700-1200 ई०) में शैव धर्म की उत्पत्ति हुई।

 

 प्रश्न 2. वामन पुराण में शैव संप्रदाय की शाखाएँ कितनी बताई गई है?

उत्तर- वामन पुराण में शैव संप्रदाय की शाखाएँ चार बताई गई है। ये हैं- शैव, पाशुपत, कापालिक एवं कालामुख।

 

 प्रश्न 3. शैव धर्म के संस्थापक कौन हैं?

उत्तर- पुराणों के अनुसार, इस संप्रदाय की स्थापना लकुलीश अथवा लकुली नामक ब्रह्मचारी ने की थी।

 

 प्रश्न 4. शैव धर्म से संबंधित प्रमुख मंदिर?

उत्तर- राजराजेश्वर मंदिर,शिव मंदिर,नटराज मंदिर,विरुपाक्ष मंदिर,विश्वनाथ मंदिर।

 

 प्रश्न 5. शैव धर्म से संबंधित देश के विभिन्न भागों में स्थित कितने ज्योतिर्लिंग हैं?

उत्तर- शैव धर्म से संबंधित देश के विभिन्न भागों में स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग हैं-सोमनाथ, नागेश्वर (द्वारका के समीप), केदारनाथ, विश्वनाथ (काशी), वैद्यनाथ, महाकालेश्वर (उज्जैन), ओंकारेश्वर (म.प्र.), भीमेश्वर (नासिक), त्र्यम्बकेश्वर (नासिक), घुश्मेश्वर, मल्लिकार्जुन (आंध्र प्रदेश), रामेश्वरम्।

 

 

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