इमान्युएल काण्ट का सृष्टिशास्त्र, दर्शन की समीक्षा
इमान्युएल काण्ट का सृष्टिशास्त्र, दर्शन की समीक्षा | Immanuel Kant's Review of Philosophy

इमान्युएल काण्ट का सृष्टिशास्त्र, दर्शन की समीक्षा | Immanuel Kant’s Review of Philosophy

सृष्टिशास्त्र(Cosmology)

सृष्टि विज्ञान के अन्तर्गत हम सम्पूर्ण सांसारिक वस्तुओं की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विचार करते है, परन्तु सम्पूर्ण वस्तुओं की सृष्टि तो केवल कल्पना मात्र है, प्रत्यय मात्र है। इस प्रत्यय को जब हम वस्तु मान लेते हैं तो विरोधों का जन्म होता है। वस्तुतः सिद्ध-विज्ञान अनुभवातीत है। जब हम इसे अनुभव का विषय मान लेते हैं। तो सर्वथा विरोधी निर्णय हमारे सामने उपस्थित होते हैं। इमान्युएल काण्ट इन विरोधों को सृष्टिविज्ञान सम्बन्धी विरोध (Antinomies) कहते हैं। काण्ट इन विरोधों को पक्ष एवं प्रतिपक्ष रूप में उपस्थित करते हैं।

 

१. परिणाम सम्बन्धी विरोध-

पक्षः सृष्टि आदि है और काल से सान्त है। सृष्टि की उत्पत्ति किसी काल में हुई है तथा सृष्टि देश से परिच्छिन्न है। यदि सृष्टि आदि नहीं तो अनादि है। यदि अनादि है तो इसका अर्थ है कि अनन्त काल बीत चुका है परन्तु अनन्त का अर्थ है जिसका अन्त न हो। अतः यह कहना कि अनन्त काल बीत चुका है का अर्थ है। अनन्त का अन्त हो गया, अतः सृष्टि अन्त नहीं, सान्त है। पुनः सृष्टि परिच्छिन्न है। यदि सृष्टि परिच्छिन्न नहीं हो तो अपरिच्छिन्न है। यदि अपरिच्छिन्न है तो इसमें असंख्य वस्तुओं के प्रत्यक्ष के लिये अनन्त काल की आवश्यकता है। अनन्त काल तो असिद्ध है, अतः सृष्टि परिच्छिन्न है।

 

प्रतिपक्षः सृष्टि देश अपरिच्छिन्न है, अनादि और अनन्त है। यदि सष्टि किसी। एक काल में हुई तो उसके पूर्व अनन्त काल बीत चुके होंगे। पर जिस काल में कोई सृष्टि न हई वह शून्य काल है। सृष्टि काल में नहीं हो सकती। अतः सृष्टि कभी नहीं हुई, यह अनन्त है। यदि सृष्टि देश से परिच्छिन्न है तो परन्तु सृष्टि से अतिरिक्त देश नहीं। अतः सृष्टि शून्य से व्याप्त है; परन्तु शून्य से कुछ भी व्याप्त नहीं हो सकता। अत: सृष्टि देश से अपरिच्छिन्न है।

२. गुण सम्बन्धी विरोध-

 पक्षः जगत् सरलतम, अविभाज्य परमाणुओं के योग से बना है।

प्रतिपक्षः यदि जगत् का निर्माण परमाणुओं से नहीं होता तो विनाश के पश्चात भी वस्तुओं का लोप हो जायेगा, परन्तु वस्तुओं के विनाश के पश्चात भी अविभाज्य परमाणुओं की सत्ता बनी रहती है। यदि परमाणु सत् है तो अवश्य ही किसी देश में रहते, परन्तु न्यूनतम परमाणु की सत्ता किसी देश में सिद्ध नहीं हो सकता। अतः अविभाज्य परमाणुओं की सत्ता असत् है

 

३. सम्बन्ध विरोध

पक्षः जगत् की उत्पत्ति स्वतन्त्र कारणों के हुई है। यदि कारण कार्य रूप में जगत की व्याख्या की जाये तो प्रत्येक घटना का कारण पूर्व घटना होगी। इस प्रकार अनवस्था के दोष से बचने के लिये यह मानना पड़ेगा कि सृष्टि की उत्पत्ति किसी स्वतन्त्र कारण से हुई है।

प्रतिपक्षः स्वतन्त्र कारण का अस्तित्व नहीं। यदि कोई कारण स्वतन्त्र है तो वह अवश्य ही अकारण होगा, परन्तु अकारण कोई घटना नहीं होगी।

 

४. निरपेक्ष तत्त्व विरोध

पक्षः सृष्टि का कारण निरपेक्ष तत्त्व है।

प्रतिपक्ष: विश्व के भीतर या बाहर कोई निरपेक्ष पदार्थ नहीं, इत्यादि।

 

 

धर्मशास्त्र

धर्मशास्त्र में हम ईश्वर के अस्तित्व पर विचार करते हैं। मध्य युग के दाशानका ने ईश्वर की सिद्धि के लिये अनेकों प्रमाण दिये परन्तु वे प्रमाण से सिद्ध कर ईश्वर को प्रमेय बनाना चाहते हैं। वस्तुतः ईश्वर अप्रमेय है, प्रमाण से उसकी सिद्धि नहीं हो सकती। हम किसी वस्तु को सत् या असत् सिद्ध कर सकते हैं। परन्तु ईश्वर तो विचार या प्रत्यय है। सिद्धि के परे को सिद्ध करना तो स्पष्ट विरोध है। धर्मशास्त्र सम्बन्धी विरोध को काण्ट विरोध (Contradiction) कहते हैं। यहाँ विरोध इसी कारण उत्पन्न होता है कि हम काल्पनिक को वास्तविक समझकर सिद्ध करना चाहते हैं। वस्तुतः ईश्वर अप्रमेय होने के कारण प्रमाणों के द्वारा सिद्ध करने का विषय नहीं। ईश्वर सम्बन्धी मुख्यतः तीन प्रमाण दिये गए हैं। इमान्युएल काण्ट के प्रत्येक पर अलग-अलग विचार कर प्रत्येक प्रमाण का निषेध करते हैं। तात्पर्य यह है कि लिये निम्नलिखित तीनों निरर्थक हैं; क्योंकि वह प्रमेय नहीं-

 

१. सत्तामूलक तर्क (Ontological proof)- हम पहले देख आए हैं कि सन्त एन्सेल्म और देकार्त ने इस तर्क का प्रयोग किया था। इस विचार से ईश्वर की सत्ता सिद्ध की जाती है। हममें पूर्ण ईश्वर का विचार है। इस विचार के अनुरूप पूर्ण ईश्वर भी अवश्य है। इमान्युएल काण्ट इसका खण्डन करते हुए कहते हैं कि केवल विचार से विचार की सत्ता ही सिद्ध हो सकती है, इसके अनुरूप वस्तु की। नहीं। हमारे मन में १00 रुपये का विचार हो सकता; परन्तु इससे हमारे पॉकेट में १00 नहीं हो सकते। यदि विचार से ही किसी वस्तु की सत्ता सिद्ध होती तो कोई भूखा और नंगा नहीं मरता। भूखा व्यक्ति सुन्दर भोजन के विचार से ही अपनी भूख को मिटा लेता।

२. कार्य-कारणमूलक तक (Causal Proof)- इस तर्क के अनुसार यह सिद्ध किया जाता है कि प्रत्येक कार्य का कोई कारण अवश्य होती है, अर्थात् कोई भी घटना अकारण नहीं होती। सृष्टि भी एक कार्य है, इसका कारण अवश्य ही ईश्वर है। संसार में प्रत्येक कार्य का कोई कारण होता है; परन्तु इसमें अनवस्था दोष है किसी एक कारण को स्वयम्भू अकारण मानना होगा। यह स्वयम्भू, अकारण ईश्वर ही है। इमान्युएल काण्ट इसका खण्डन करते हुए कहते हैं कि कार्य कारण नियम तो बुद्धि का एक विकल्प है, व्यावहारिक है। यह पारमार्थिक विषयों पर लागू नहीं हो सकता। पुनः कार्य कारण नियम से विश्व का अन्तिम कारण सिद्ध हो सकता है, परन्तु ईश्वर की सत्ता नहीं।

३. प्रयोजनमूलक तर्क (Teleological proof)- इस तर्क से सिद्ध किया जाता है कि विश्व में उपादान है; परन्तु स्वयं उपादान से रचना नहीं हो सकती। पत्थर मूर्ति का उपादान है, परन्तु पत्थर से ही मूर्ति का निर्माण नहीं हो सकता। मूर्ति निर्माण के लिए चेतन निर्माता की आवश्यकता है। ईश्वर ही विश्व का निर्माता है| इस तर्क का खण्डन करते हुए काण्ट कहते हैं कि प्रयोजनमूलक तर्क से शिल्पकार (Architect) की सत्ता सिद्ध हो सकती है, ईश्वर की नहीं। इस तर्क से ईश्वर सृष्टि का निमित्त कारण सिद्ध हो सकता है, स्रष्टा नहीं।

 

इस प्रकार प्रज्ञा परीक्षा में इमान्युएल काण्ट ने बतलाया है कि ईश्वर जीव जगत आदि हमारी प्रज्ञा के कल्पनामात्र हैं या प्रज्ञा के प्रत्यय हैं। इनसे यथार्थ ज्ञान नहीं हो सकता। हमारी बुद्धि तो अनुभव तक ही सीमित है। अतः हमें व्यवहार का ही यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है, परमार्थ का नहीं। यहाँ एक आवश्यक प्रश्न यह होता है कि यदि हमें परमार्थ (ईश्वर, जीव, जगत् आदि) का यथार्थ ज्ञान नहीं प्राप्त होता तो क्या पारमार्थिक विषय निरर्थक हैं? इमान्युएल काण्ट के अनुसार ये विषय भी सार्थक हैं, इनका प्रयोजन है। ये बुद्धि के विषय नहीं, वरन् विश्वास के विषय हैं। ये सप्रयोजन है। इन पारमार्थिक विषयों की उपयोगिता इमान्युएल काण्ट निम्नलिखित तर्क से सिद्ध करते हैं-

१. विश्वास के विषय हमारे ज्ञान के विषयों का नियंत्रण (Regulation) करते हैं। इन विषयों से ही पता चलता है कि हमारे ज्ञान की गति कहाँ तक है? अतः ये हमारे ज्ञान के सीमान्त के द्योतक हैं।

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२. हमें पारमार्थिक विषयों का ज्ञान प्राप्त नहीं होता, परन्तु पारमार्थिक विषयों पर सन्देह भी नहीं किया जा सकता। ईश्वर, जीव, जगत् आदि को सिद्ध नहीं कर सकते, परन्तु इन्हें असिद्ध भी नहीं कर सकते, अर्थात् ये सिद्ध असिद्ध दोनों के परे है। साथ-साथ यह भी सत्य है कि हम इन पर विचार अवश्य करते हैं। मानव में कुछ ऐसी जन्मजात प्रवृत्ति है जिनके कारण इन विषयों का निश्चित ज्ञान न होने पर भी इन विषयों के बारे में विचार करने के लिए मन विवश होता है।

३. काण्ट के अनुसार पारमार्थिक विषय श्रद्धा विश्वास के विषय हैं। प्रज्ञा की परीक्षा से काण्ट श्रद्धा पर पहुँचते हैं। ‘शुद्ध ज्ञान की परीक्षा’ को समाप्त करते हुए स्वयं इमान्युएल काण्ट ने कहा है कि श्रद्धा को पाने के लिए मुझे प्रज्ञा को समाप्त करना पड़ा। इन विश्वास के विषयों की उपयोगिता है। ईश्वर का यथार्थ ज्ञान सम्भव नहीं, परन्तु नैतिकता के लिए ईश्वर आवश्यक है। यदि ईश्वर में अविश्वास करें, आत्मा की अमरता अस्वीकार करें तो नैतिकता की आधारशिला समाप्त हो जायेगी।

 

 

आचारमूलक ज्ञान परीक्षा(Critique of Practical Reason)

ज्ञान की परीक्षा में (Critique of Pure Reason) इमान्युएल काण्ट ने बुद्धि के नियमों की परीक्षा की है तथा इस परीक्षा से उनका निष्कर्ष यह है कि हमें व्यवहार का ही ज्ञान सम्भव है, परमार्थ का नहीं। ईश्वर, आत्मा, सृष्टि आदि सभी तत्व मीमांसा के विषय पारमार्थिक है। इन विषयों का यथार्थ सार्वभौम ज्ञान सम्भव नहीं, अर्थात् इन विषयों के बारे में हम नहीं जान सकते। ये विषय हमारी बुद्धि के परे हैं। परन्तु यह निष्कर्ष निषेधात्मक है, क्योंकि इसमें इमान्युएल काण्ट ने सिद्ध किया है कि पारमार्थिक विषय अज्ञेय हैं, अर्थात इनका ज्ञान सम्भव नहीं। परन्तु ईश्वर, जीव, जगत् आदि विषयों के बारे में चिन्तन किये बिना हम नहीं रह सकते।

इस प्रकार काण्ट पारमार्थिक विषयों के यथार्थ ज्ञान का केवल निषेध करते हैं, इन विषयों का निषेध नहीं करते। अपनी आचारमूलक परीक्षा में काण्ट इन विषयों की स्थापना करते हैं। काण्ट स्वयं ईश्वरवादी थे, अतः वे ईश्वर आत्मा आदि को अज्ञेय बतलाकर सन्तुष्ट नहीं थे। उन्होंने आचार मूलक परीक्षा में इन विषयों को स्थायी विश्वास का विषय बतलाया है।

अतः ये ज्ञान नहीं, वरन् विश्वास के विषय हैं। इन विषयों के सम्बन्ध में उन्होंने ज्ञान-मार्ग का परित्याग कर विश्वास मार्ग को अपनाया (I was obliged of destroy knowledge in order to make room for faith)

जिस प्रकार बुद्धि-परीक्षा में इमान्युएल काण्ट बौद्धिक नियमों की खोज करते हैं उसी प्रकार आचार मूलक परीक्षा में काण्ट नैतिक नियमों की खोज करते हैं। हम जानते हैं कि नीतिशास्त्र के अनुसार कर्ता स्वतन्त्र होता है; अर्थात् वह अपनी स्वतन्त्र संकल्प शक्ति से कोई कार्य करता है तथा इसके शुभाशुभ फल को भोगता है। परन्तु प्रश्न यह है व्यक्ति को कैसा कर्म करना चाहिये? इमान्युएल काण्ट के अनुसार व्यक्ति को कर्तव्य के लिये (Duty for duty’s sake) के अनुसार कर्म करना चाहिये। यही काण्ट का अनिवार्य आदेश (Categorical imperative) है।

इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य को भय या प्रलोभन से कोई कार्य नहीं, वरन् कार्य को अपना स्वधर्म समझकर करना चाहिये। साधारणतः हम कर्म, दण्ड तथा पुरस्कार की भावना से प्रेरित होकर करते हैं। जिस कर्म से दण्ड मिलने का भय है उसे हम हेय समझते हैं तथा जिससे पुरस्कार मिलने की आशा है उसे आदेय मानते हैं। इमान्युएल काण्ट के अनुसार दण्ड और पुरस्कार तो नैतिक नियमों को सापेक्ष बना देते हैं। नैतिक नियम निरपेक्ष आदेश (Categorical imperative) हैं। इन्हें किसी अन्य की अपेक्षा नहीं रहती है। ये स्वयं अपने साध्य हैं, साधन नहीं।

 

आदेश दो प्रकार के होते हैं-

१. काल्पनिक(Hypothetical) एवं

२. निरपेक्ष (Categorical)

काल्पनिक आदेश में उत्तर भाग पूर्व भाग की अपेक्षा रखता है अर्थात् उत्तर भाग पूर्व भाग पर आश्रित रहता है। उदाहरणार्थ, यदि तुम्हें परीक्षा में अच्छी तरह उत्तीर्ण होना है तो कठिन परिश्रम करना चाहिये। इस वाक्य में पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्द्ध सापेक्ष है। इसके विपरीत निरपेक्ष वाक्य स्वतन्त्र होता है, अर्थात् उसे किसी की अपेक्षा नहीं रहती। इमान्युएल काण्ट के अनुसार नैतिक नियम निरपेक्ष आदेश हैं। इनका पालन किसी शर्त या अपेक्षा पर निर्भर नहीं। नैतिक नियमों का पालन हमें अपना कर्त्तव्य समझकर करना चाहिये।

काण्ट का निरपेक्ष आदेश गीता के निष्काम कर्मयोग के समान है। गीता में भी भगवान् कृष्ण ने सुख-दुःख, लाभ-हानि, यश-अपयश, प्रेम-द्वेष आदि भावनाओं से रहित होकर कार्य करने की शिक्षा दी है। मनुष्य को स्वकर्म स्वधर्म समझकर करना चाहिये। यदि हम लाभ-हानि आदि की कामनाओं से कोई कर्म करते हैं तो हमारा कर्म निष्काम नहीं, वरन् सकाम है। इस प्रकार दोनों में साम्य है।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि नैतिकता भावनाओं पर नहीं वरन विवेक पर आश्रित है। शुद्ध विवेक का आदेश है ऐसा करो, ऐसा न करो इत्यादि विवेक का सम्बन्ध यथार्थ (Fact) से नहीं, वरन् आदर्श (Ideal) से होता है। विवेक का यह आदेश है कि मनुष्य को ऐसा करना चाहिये (Ought)| अत: नैतिक नियम केवल मूल्यों (Values) की रक्षा के लिये होते हैं। मूल्यों की रक्षा बिना किसी अपेक्षा के होनी चाहिये। नैतिक मूल्य स्वयं अपना साध्य है। ये सुख प्राप्ति और दुःख परिहार के साधन नहीं बनाये जा सकते।

सुख-प्राप्ति और दुःख-परिहार के लिये कार्य करना तो व्यवहारिक या वास्तविक नैतिकता है। इमान्युएल काण्ट के नैतिक सिद्धान्त आदर्श मूलक हैं। तात्पर्य यह है कि नैतिक नियमों का पालन हम आदर्श की रक्षा के लिये करना चाहिए। इसी कारण काण्ट नैतिक नियमों को अनिवार्य आदेश मानते हैं। काण्ट के अनसार नैतिक नियमों की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

१. नैतिक नियम सार्वभौम सिद्धान्त हैं- इमान्युएल काण्ट के अनुसार नैतिक नियम अनुभव निरपेक्ष होते हैं, अत: सार्वभौम है। हमें इस सार्वभौम माप-दण्ड को ध्यान में रखकर ही कोई कार्य करना चाहिये। हम कार्य करते समय यदि दूसरे लोगों का भी ध्यान रखें तो हमारा कार्य अवश्य ही सामान्य होगा। उदाहरणार्थ, उधार लेना बुरा है; क्योंकि यदि सभी लोग उधार ही लेने लगें तो उधार देने वाला ही न रहेगा। इसी प्रकार झूठ बोलना बुरा है, क्योंकि यदि सभी लोग झूठ बोलने लगें तो सत्य का भी विश्वास उठ जायेगा। अतः हमें ऐसा आचरण करना चाहिये जो सार्वभौम सर्वमान्य हो।

 

२. मानव साध्य है, साधन नहीं- इमान्युएल काण्ट के अनुसार मनुष्य का वही कार्य नैतिक है जो किसी लक्ष्य या उद्देश्य पूर्ति का साधन न हो। यदि कार्य किसी लक्ष्य पूर्ति के लिये हो तो वे कर्म स्वयं साध्य नहीं हो सकते। यदि मानव के कर्म स्वयं साध्य नहीं तो मानव भी साध्य नहीं। मानव को साध्य मानने से ही हमारे सामाजिक व्यवहार में समानता आती है। यदि हम अपने को साध्य मानें तथा सभी व्यक्ति को साध्य मानें तभी समाज में समान व्यवहार सम्भव है। इमान्युएल काण्ट का यह सिद्धान्त प्रजातन्त्र (Democracy) का समर्थन करता है। चूंकि मानव साधन नहीं तथा सबके अधिकार समान हैं; अतः मानव को आपस में मिल-जुलकर काम करना चाहिये। यह प्रजातन्त्र की मूलभूत मान्यता है जिसके अनुसार समाज में किसी भी व्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन नहीं होना चाहिये; क्योंकि सभी समानतः स्वतन्त्र हैं।

 

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३.साध्यों का साम्राज्य (Kingdom of ends)- इमान्युएल काण्ट मानव को साध्य मानकर विश्व प्रजातन्त्र कल्पना करते हैं। इस प्रजातन्त्र में सभी व्यक्ति विवेकपूर्ण हैं। तथा सभी नियमों का पालन करते है। मनुष्य विवेकशील है, अतः उसे तुच्छ भावनाओं पर विजय प्राप्त कर केवल नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिये कार्य करना चाहिये। यही मनुष्य की यथार्थ स्वतन्त्रता है। ऐसे स्वतन्त्र व्यक्ति सभी समान अधिकार से सम्पन्न होते हैं तथा आपस में भाई-भाई का सम्बन्ध रखते हैं। इस प्रकार विश्व-बन्धुत्व की स्थापना हो सकती है जो विश्व प्रजातन्त्र की आधारशिला है, परन्तु इसके लिये व्यक्तिगत वासनाओं का दमन कर मनुष्य को विवेक से पूर्णतः स्वतन्त्र होने की आवश्यकता है।

 

४. नीतिशास्त्र की मान्यताएँ (Postulates of morality)- इमान्युएल काण्ट नैतिक सिद्धान्तों की व्याख्या के लिये तीन बातों की पूर्व मान्यता आवश्यक मानते हैं:-

(क) आत्मा की स्वतन्त्रता

(ख) आत्मा की अमरता एवं

(ग) ईश्वर का अस्तित्व

 

(क) आत्मा की स्वतन्त्रता- हम जानते हैं कि स्वतन्त्र चेतन कर्ता का होना नीतिशास्त्र की पूर्व मान्यता है। किसी परिस्थिति में व्यक्ति के सामने अनेकों विकल्प उपस्थित होते है। इन विकल्पों में वह बिना किसी दबाव के किसी एक विकल्प का चयन करता है। वह स्वतन्त्रता से किसी अच्छे या बुरे विकल्प को चुनता है, इसी कारण हम उसके कार्य को नैतिक या अनैतिक कह सकते हैं। यह स्वतन्त्रता नियतिवाद (Determinism) का विरोधी है। नियतिवाद के अनुसार प्रत्येक घटना नियत है। जो कुछ होना है वह होगा, मनुष्य कार्य को करने में स्वतन्त्र नहीं। यदि मनुष्य कार्य। करने में स्वतन्त्र नहीं तो वह अच्छे बुरे का भागी भी नहीं। इस प्रकार नियति-वाद नैतिकता का विरोधी है तथा स्वतन्त्रता नैतिकता का समर्थन है।

 

(ख) आत्मा की अमरता- नैतिक जीवन के लिए शुद्ध संकल्प की आवश्यकता है परन्तु मानव सांसारिक जीव है तथा उसमें पाशविक प्रवृत्तियाँ भी है। उसके लिए यह सम्भव नहीं कि वह सदा शुभ संकल्प से ही नियन्त्रित हो। उसकी पाशविक प्रवृत्तियाँ उसे प्रायः शुभ संकल्प से पृथक् कर देती हैं। इन प्रवृत्तियों के दमन के लिए हमें अनेकों जीवन की तपस्या की आवश्यकता है। तात्पर्य यह है कि शुभ संकल्प पवित्रता (Holiness) का ही दूसरा रूप है। पवित्रता जन्म-जन्मान्तर की तपस्या का फल है। अतः पवित्र हो शुभ-संकल्पी होने के लिये हमें अनन्त काल और जन्म की आवश्यकता है। इससे अमरता सिद्ध होती है।

 

(ग) ईश्वर का अस्तित्व- इमान्युएल काण्ट के अनुसार शुभ संकल्प से कर्तव्य का पालन करना ही नैतिकता है परन्तु इससे सुख की प्राप्ति नहीं होती है। सदाचारी मनुष्य को सुख अवश्य मिलना चाहिए, परन्तु संसार में प्रायः देखा जाता है कि सदाचारी ही दुःखी रहते है तथा दुराचारी सुखी रहते हैं। इस अन्याय को दूर करने के लिये न्यायप्रिय, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान ईश्वर की आवश्यकता है। ईश्वर ही कर्तव्य और सुख में सम्बन्ध स्थापित करता है। ईश्वर ही वह न्यायाधीश है जो सदाचारियों को सुख तथा दुराचारियों को दुःख देता है।

इस प्रकार सदाचार और सुख, दुराचार और दुःख में सम्बन्ध स्थापित करने के लिए ईश्वर रूप न्यायाधीश की आवश्यकता है। यदि वह न्यायाधीश न हो तो सदाचारी कर्त्तव्यपरायण को कभी सुख न मिलेगा। अतः धर्मअधर्म, पाप-पुण्य, सुख-दुःख आदि के लिए हमें ईश्वर रूप परम न्यायाधीश की आवश्यकता है। ईश्वर का अस्तित्व न हो तो नैतिकता निराधार हो जायेगी। इस प्रकार काण्ट ईश्वर, आत्मा और स्वतन्त्रा तीनों का महत्त्व स्वीकार करते हैं परन्तु ये श्रद्धा के विषय हैं, बुद्धि के नहीं।

 

 

काण्ट के दर्शन की समीक्षा

 काण्ट का नाम विश्व के इने-गिने दार्शनिकों में लिया जाता है। सम्भवतः काण्ट के पहले पाश्चात्य जगत में इतना बड़ा विचारक नहीं उत्पन्न हुआ था। अतः ये केवल जर्मनी के ही नहीं, वरन् विश्व की विभूति माने जाते है। दर्शन शास्त्र के जिस पक्ष  पर काण्ट ने विचार किया है वह अद्वितीय और अभूतपूर्व है। उनकी दार्शनिक देन को हम निम्नलिखित ढंग से समझ सकते हैं-

 

ज्ञान-मीमांसा:-

इमान्युएल काण्ट ने ज्ञान के  स्त्रोत और सीमा पर विचार किया है। ज्ञान के स्रोत में उन्होंने बुद्धिवाद और अनुभववाद दोनों का समन्वय स्थापित किया है। यही उनका समीक्षावाद है। उनके अनुसार बुद्धिवाद और अनुभववाद दोनों एकांगी है। दोनों का उचित समन्वय समीक्षावाद में है। यह समन्वय काण्ट की देन है। इमान्युएल काण्ट के पूर्व बुद्धिवाद और अनुभववाद की विरोधी मान्यताओं के कारण ज्ञान की समुचित व्यवस्था नहीं हो पाती थी। ज्ञान-मीमांसा में इमान्युएल काण्ट की दूसरी देन विकल्पों की धारणा है। हमारा ज्ञान केवल संवेदनाओं के कारण ही नहीं, वरन् बुद्धि के विकल्पों के कारण सम्भव हो पाता है।

बुद्धि के विकल्प ही साँचे हैं। विकल्पों के बिना अनुभव ज्ञान के रूप में नहीं बदल सकता| ये विकल्प प्रागनुभविक हैं इनकी धारणा इमान्युएल काण्ट की देन है। यह तो कोपरनिकस की क्रान्ति के समान नये सत्य का प्रतिपादन है। ज्ञान-मीमांसा के क्षेत्र मे उनकी तीसरी देन प्रतीत और यथार्थ में भेद है। हमारा ज्ञान प्रतीति और आभास तक ही सीमित है। हमें स्वलक्षण या परमार्थ का ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। यह बुद्धि की क्षमता का सूचक है। ज्ञान को शुद्ध व्यावहारिक काण्ट के बुद्धि की सीमा का निधार्रण किया है।

 

तत्त्व-मीमांसा:-

तत्त्व-मीमांसा के सम्बन्ध में भी काण्ट ने अनेक नये सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। ह्यूम ने जीव, जगत्, ईश्वर आदि अतीन्द्रिय समस्याओं को असत् बतलाया तथा कारणतावाद को शुद्ध कल्पना प्रसूत सिद्ध किया। इमान्युएल काण्ट के अनुसार ये विषय तो निश्चित रूप से अतीन्द्रिय हैं। मनुष्य इनका यथार्थ ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता, क्योंकि इनकी संवेदनाएँ हमें नहीं प्राप्त होतीं। यह ज्ञान बद्धि के विकल्पों से ही उत्पन्न होता है। अतः यह विकल्पात्मक है। विकल्पात्मक होने के कारण यह द्वन्द्वात्मक भी है। तात्पर्य यह है कि बुद्धि केवल द्वन्द्वात्मक तर्क के सहारे इन विषयों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना चाहती है, परन्तु ये विषय बद्धि के परे अतीन्द्रिय हैं। इनके सम्बन्ध में पक्ष और विपक्ष दोनों तर्क समानत: निषिद्ध हैं। ये बद्धि के नहीं वरन् विश्वास के विषय हैं। काण्ट ने विश्वास की वेदी पर बद्धि को न्यौछावर कर दिया। आस्था और विश्वास का विषय बुद्धि और विश्लेषण के परे हैं।

 

नैतिकता की खोज :

नैतिकता की खोज में इमान्युएल काण्ट की सबसे बड़ी देन उनका निरपेक्ष आदेश (Categorical imperative) है। यह कर्त्तव्य के लिये कर्त्तव्य का सिद्धान्त है। यह भगवद्गीता के निष्काम कर्मयोग के अत्यन्त निकट है। भय और परस्कार की आशा से उचित कार्य करने वाला व्यक्ति अनैतिक कहा जा सकता है। परन्तु कर्म को ही स्वधर्म मानकर कर्म करने वाला व्यक्ति उचित अनुचित की संकुचित परिधि को पार कर जाता है। उसका कर्म नैतिक ही नहीं धार्मिक है, ईश्वरीय है।

तात्पर्य यह है कि नैतिकता को साध्य मानने वाला व्यक्ति ही सच्चा ईश्वर का भक्त है एवं उसका कर्म ही समाज में अन्य लोगों के लिए मापदण्ड है। यह पाप और पुण्य, शुभ और अशुभ, उचित और अनुचित, लाभ और हानि नामक द्वन्द्वों के परे है। इस नैतिकता का प्रतिपादन करने में काण्ट भारतीय मनीषियों और महात्माओं के निकट हैं।

 

 

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