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मोहम्मद गोरी के आक्रमण की विवेचना कीजिए

मोहम्मद गोरी का परिचय

मोहम्मद गोरी गजनी का शासक था। उसने महमूद गजनवी के आक्रमण से लगभग 150 वर्ष बाद भारत पर आक्रमण करने प्रारम्भ किये। मोहम्मद गोरी ने गजनी में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के उपरान्त भारत की ओर ध्यान दिया। वह 1175 ई० से 1205 ई० तक भारत पर निरन्तर आक्रमण करता रहा। उसका उद्देश्य भारत को जीतकर अपने साम्राज्य को बढ़ाना था।

मोहम्मद गोरी के आक्रमण मुल्तान तथा कच्छ पर आक्रमण-मोहम्मद गोरी का पहला आक्रमण 1175 ई० में मुल्तान पर हुआ। उसने नगर पर अपना अधिकार कर लिया और उसे अपने सूबेदार के अधीन कर दिया। तत्पश्चात् उसने सिन्ध में स्थित उच्छ पर आक्रमण किया। वहाँ की विश्वासघाती रानी से मिलकर उसने उच्छ के शासक की हत्या कर दी तथा राज्य पर अपना अधिकार कर लिया।

मोहम्मद गौरी के आक्रमण

अन्हिलवाड़ा पर आक्रमण-

मोहम्मद गोरी का दूसरा आक्रमण अन्हिलवाड़ा के राजा भीमदेव पर हुआ। परन्तु अन्हिलवाड़ा के वीर एवं निर्भीक शासक ने 1178 ई० में मोहम्मद को पराजित किया और उसे अपने देश से बाहर खदेड़ दिया।

पंजाब पर आक्रमण-

अन्हिलवाड़ा हारने के बाद मोहम्मद गोरी ने अपनी योजना बदल दी और पंजाब के मार्गों से भारत पहुंचने का निश्चय किया। फलतः 1180 ई० में उसने पेशावर पर आक्रमण किया और उस पर अपना अधिकार कर लिया । 1185 ई० में मुहम्मद गोरी का पंजाब पर प्रभुत्व स्थापित हो गया।

तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई०)-

सिन्ध तथा पंजाब पर अधिकार करने के बाद मुहम्मद ने भारत के सीमावर्ती नगर सरहिन्द, भटिन्डा पर आक्रमण कर इनको हस्तगत कर लिया। मोहम्मद के आगमन की सूचना से समस्त भारतीय राज्यों में खलबली मच गई। राजपूत राजाओं ने आक्रमण का सामना करने के लिए दिल्ली तथा अजमेर के शासक, पृथ्वीराज के नेतृत्व में एक संघ बनाया और 1191 ई० में थानेश्वर से 14 मील दूर स्थित तराइन नामक स्थान पर मुसलमान सेना का सामना किया। कन्नौज का राठौर नरेश जयचन्द ही केवल इस संघ में सम्मिलित नही हुआ था। युद्ध में मुहम्मद गोरी बुरी तरह आहत और पराजित हुआ।

तराइन का द्वितीय युद्ध (119210)-

मोहम्मद गोरी अपनी पराजय को न भूल सका और इस हार का राजपूत राजाओं से प्रतिशोध लेने के लिए उसने भीषण तैयारियाँ की। दूसरे वर्ष ही विशाल सेना लेकर उसने भारत की ओर प्रस्थान कर दिया । तराइन के मैदान में फिर मुसलमानों तथा राजपूतों में घमासान युद्ध हुआ, राजपूतों ने अत्यन्त वीरता से युद्ध किया परन्तु मुहम्मद की युद्ध-नीति के आगे उन्हें मुँह की खानी पड़ी और उसके अश्वारोहियों ने “हिन्दू दल में मृत्यु तथा विनाश फैला दिया।” पृथ्वीराज पकड़ा गया और मार डाला गया। पृथ्वीराज के राज्य पर मुहम्मद का अधिकार हो गया। .

कन्नौज की विजय (1194 ई०)-

दिल्ली और अजमेर पर अधिकार करने के उपरान्त मोहम्मद गोरी ने कन्नौज तथा बनारस के राजा जयचन्द पर आक्रमण किया। जयचन्द ने यमुना नदी के किनारे चन्दावर नामक स्थान पर मुहम्मद गोरी का सामना किया। उसने शत्रु पर घातक प्रहार किया परन्तु दुर्भाग्यवश जयचन्द की आँख में तीर लगने से वह हाथी से गिर पड़ा और वीरगति को प्राप्त हुआ। उसकी मृत्यु से सेना में भगदड़ मच गई और सहस्रों राजपूत मौत के घाट उतार दिये गये । विजेता ने बनारस की ओर कूच किया और नगर को खूब लूटा तथा नष्ट-भ्रष्ट किया।

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मुसलमानों की अन्य विजये-

1204 ई० में मोहम्मद गोरी का अन्तिम आक्रमण ख्वारिज्म पर हुआ, पर वह बुरी तरह से पराजित हुआ। अन्त में 1206 ई० में जब खोखरों के विद्रोह का दमन कर गजनी लौट रहा था, तो एक खोखर द्वारा उसकी हत्या कर डाली गई। 1202 ई० में कुतुबुद्दीन ने कालिंजर के प्रसिद्ध दुर्ग को जीत लिया। इसके बाद उसने महोबा, कालपी, बदायूँ आदि स्थानों पर अधिकार कर लिया। मुहम्मद के एक अन्य सेनापति बख्तियार ने बिहार और बंगाल को जीत लिया। मुसलमानों की इन विजयों का परिणाम यह हुआ कि अधिकांश उत्तरी भारत उसके अधिकार में आ गया।

महमूद गजनवी और मोहम्मद गोरी की तुलना

(1) दोनों के भारत पर आक्रमण करने के उद्देश्य भिन्न-भिन्न थे। महमूद गजनवी ने मात्र भारत को लूटने के लिए भारत पर आक्रमण किये, जबकि मुहम्मद गोरी ने भारत पर साम्राज्य स्थापित करने के लिये आक्रमण किये थे। वह यहाँ पर अपना स्थायी राज्य स्थापित करना और अपने धर्म का प्रचार करना चाहता था, ताकि सदैव के लिये भारत पर मुसलमानों का अधिकार हो जाये।

(2) महमूद ने भारत पर 17 बार आक्रमण किये और कभी पराजित नहीं हुआ। मोहम्मद गोरी ने अपेक्षाकृत कम आक्रमण किये और कई बार पराजित भी हुआ।

(3) मोहम्मद गोरी महमूद की तुलना में अधिक दूरदर्शी एवम् योग्य राजनीतिज्ञ था।

(4) मोहम्मद गोरी की तुलना में महमूद अधिक कुशल सेनापति था, इसलिये वह कभी पराजित नही हुआ।

(5) मोहम्मद गोरी की विजय महमूद की तुलना में अधिक स्थायी एवं महत्वपूर्ण सिद्ध हुई; क्योंकि गोरी की विजय से भारत में मुस्लिम साम्राज्य की नींव पड़ी।

महमूद गजनवी

महमूद गजनी का शासक था। उसने सिंहासनारूढ़ होते ही गजनी के राज्य को खूब बढ़ाया। डॉ० ईश्वरी प्रसाद के शब्दों में, “अपने राज्य की आन्तरिक व्यवस्था को सम्पन्न कर महमूद ने भारत की ओर ध्यान दिया। भारत की अतुल संपत्ति एवं भारत में सर्वव्यापी मूर्ति-पूजा ने उसकी विजयाकांक्षा को उद्दीप्त कर दिया था।” भारतवर्ष पर प्रतिवर्ष आक्रमण करने का उसने संकल्प किया और इस संकल्प के अनुसार उसने 1000 से लेकर 1026 ई० तक सत्रह बार भारत को आक्रांत किया।

गजनवी के प्रमुख आक्रमण

पहला आक्रमण-

महमूद का सर्वप्रथम आक्रमण 1000 ई० में भारत की सीमा के कुछ नगरों एवं दुर्गों पर हुआ। विजित स्थानों पर उसने अपने शासक नियुक्त किये और विपुल सम्पदा लेकर वह गजनी लौट गया।

जयपाल पर आक्रमण-

उसने सन् 1001 ई० में पंजाब के राजा जयपाल पर आक्रमण कर दिया। पेशावर में भीषण युद्ध हुआ जिसमें हिन्दुओं की पराजय हुई और जयपाल को अपनी पराजय से इतनी ग्लानि हुई कि उसने आत्म-हत्या कर ली। भीरा तथा अन्य नगरों पर आक्रमण-महमूद का तीसरा आक्रमण भीरा नगर तथा चौथा आक्रमण मुलतान पर हुआ।

आनन्दपाल पर आक्रमण-

महमूद का छठा आक्रमण जयपाल के पुत्र तथा लाहौर के शासक आनन्दपाल पर 1008 ई० में हुआ। आनन्दपाल ने अन्य राजाओं का संघ बनाया और एक विशाल सेना संगठित कर महमूदं की सेना के साथ घमासान युद्ध किया। कहते हैं. स्त्रियों ने अपने आभूषण बेचकर आनन्दपाल को दिया था। आनन्दपाल के हाथी के अकस्मात बिगड़ जाने से उसकी सेना में भगदड़ मच गई और महमूद को विजय प्राप्त हुई। इस विजय में महमूद को लूट में बहुत माल मिला।

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थानेश्वर पर आक्रमण-

आनन्दपाल को हराने के बाद महमूद के कई छोटे-छोटे आक्रमण हए, पर उसका 1014 ई० में थानेश्वर पर किया गया आक्रमण अधिक महत्वपूर्ण था। थानेश्वर पर आक्रमणकारी का अधिकार हो गया और उसने नगर तथा मन्दिरों को जी भरकर लूटा।

कन्नौज की विजय-

1018 ई० में महमूद ने पूर्वी भारत की प्रमुख राजधानी कन्नौज पर आक्रमण हेतु गजनी से प्रस्थान किया। मार्ग में वह बुलन्दशहर पहुँचा। वहाँ के शासक ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। फिर वह मथुरा की ओर बढा। उसकी आज्ञा से देवालय भूमिसात् कर दिये गये और शहर को लूटा गया। इसके पश्चात वह विशाल सेना के साथ कन्नौज की ओर बढ़ा। वहाँ का प्रतिहार-वशीय शासक राजपाल भयभीत होकर भाग गया। फलतः कन्नौज पर महमूद का अधिकार हो गया।

कालिंजर पर आक्रमण-

डॉ० ईश्वरी प्रसाद के शब्दों में, “प्रतिहार शासक राजपाल के निर्विरोध आत्मसमर्पण को राजपूत गौरव पर कलङ्क समझकर अन्य राजपूत नरेशों के हृदय में उसके प्रति क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो उठी।” इस कारण कालिंजर के चन्देल राजा गण्ड ने उस पर आक्रमण कर दिया तथा उसे मार डाला। महमूद ने अपने अधीन राजा गजनी से फिर प्रयाण किया। चन्देल राजा गण्ड रणक्षेत्र छोड़कर भाग गया। आक्रमणकारी ने चन्देलों के राज्य को बुरी तरह लूटा और महमूद ने 1021-22 में गण्ड को संधि करने के लिए बाध्य किया। इसके पश्चात् महमूद स्वदेश लौट गया।

सोमनाथ पर आक्रमण-

महमूद का सोलहवाँ तथा सबसे महत्वपूर्ण आक्रमण 1026 में काठियावाड़ में स्थित सोमनाथ मन्दिर पर हुआ। महमूद के आक्रमण का समाचार पाते ही आस-पास के सभी हिन्दू राजा सोमनाथ की रक्षा के लिए एकत्र हो गये और अपनी वीरता से मुसलमानों को निराश कर दिया। पर महमूद ने अपने सिपाहियों को धर्म के नाम पर प्रोत्साहन दिया और वे असाधारण साहस एवं जोश से लड़े तथा हिन्दुओं को परास्त किया । अपार सम्पत्ति महमूद के हाथ लगी। सोमनाथ की विजय से महमूद की कीर्ति और भी दीप्त हो उठी।

जाटों पर आक्रमण-

महमूद का अन्तिम आक्रमण सन् 1026 ई० में जाटों पर हुआ। सोमनाथ के विजयोपरान्त महमूद गजनी लौट रहा था। मार्ग में उसकी सेना को जाटों ने बहुत तंग किया। अतः महमूद ने इनको दण्ड देने के लिए उन पर चढ़ाई कर दी और उनको पराजित किया।

महमूद के आक्रमणो के परिणाम-

महमूद एक लुटेरा था और इसी उद्देश्य से उसने भारत पर आक्रमण किये थे। अपने इस उद्देश्य में वह पूर्ण सफल रहा। उसने भारत को आक्रमण से भारत की सैनिक शक्ति को करारी चोट लगी और राजपूत कमजोर हो गये। महमद ने हिन्दुओं को मुसलमान बनाया जिससे इस्लाम धर्म की जड़ें भारत में जम गईं। उसने अनेक मन्दिरों और मूर्तियों को नष्ट किया जिससे हमारी कला को क्षति पहुंची।

 

 

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