कार्ल मार्क्स की आर्थिक विकास सिद्धांत | मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत क्या है?

कार्ल मार्क्स की आर्थिक विकास सिद्धांत | मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत क्या है?

मार्क्स की इतिहास की आर्थिक व्याख्या (Economic Interpretation of History)

कार्ल मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के सिद्धान्त के आधार पर संसार के इतिहास की एक नयी व्याख्या की है। इस व्याख्या का नाम आर्थिक व्याख्या है। उनके अनुसार इतिहास का प्रारम्भ आर्थिक आवश्यकताओं से होता है। अतः इतिहास के निर्माण में आर्थिक तत्वों का बड़ा हाथ होता है। इतिहास के निर्माण में आदर्श कार्य नहीं करते। इसी कारण मार्क्स का विचार हेगल से बिल्कुल भिन्न है। हेगल इतिहास की आदर्शवादी व्याख्या करते हैं। उनकी व्याख्या में आध्यात्मिक आत्मा तत्व प्रधान है। उनके अनुसार विश्व का विकास दैवात्मा का विकास है।

कार्ल मार्क्स के अनुसार विश्व का विकास भौतिक है जिसमें आर्थिक तत्व ही प्रधान है। आर्थिक तत्वों का सम्बन्ध आजीविका कमाने से हैं प्रत्येक युग में आजीविका कमाने के साधन भिन्न-भिन्न हैं। जिस प्रकार आर्थिक साधनों में जब परिवर्तन होता है तो सामाजिक व्यवस्था भी। बदल जाती है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उत्पादन की शक्तियाँ (Productive forces) ही इतिहास की निर्धारक शक्तियाँ हैं।

इससे स्पष्ट है कि सामाजिक विकास या परिवर्तन का मुख्य कारण भौतिक या आर्थिक परिवर्तन है। साधारणतः हम समझते हैं कि भौगोलिक परिस्थितियों के कारण। सामाजिक परिवर्तन होता है। कार्ल मार्क्स के अनुसार यह इतिहास की गलत व्याख्या। है। भौगोलिक परिस्थितियों में हजारों वर्षों तक कोई परिवर्तन नहीं होता. परन्त उनकी सामाजिक परिस्थितियों में आकाश-पाताल का अन्तर हो जाता है। भौगोलिक परिस्थितियँ, जैसे भूमि, जलवायु, जनसंख्या आदि बहुत दिनों तक एक ही समान रहते हैं। इससे स्पष्ट है कि सामाजिक जीवन का मुख्य आधार आर्थिक तत्व है। अत: मार्क्स की इतिहास सम्बन्धी व्याख्या को आर्थिक व्याख्या (Economic Interpretation of History) कहते हैं। इस आर्थिक व्याख्या के लिये निम्नलिखित तीन बातों की आवश्यकता है-

 

१. उत्पादन की विधि- मनुष्य को भोजन, वस्त्र, आवास आदि की नितान्त आवश्यकता होती है। इन आवश्यकताओं को पूरा किये बिना मनुष्य सामाजिक जीवन व्यतीत नहीं कर सकता। अतः मनुष्य इन आवश्यक वस्तुओं को इकट्ठा करना चाहता है| अर्थशास्त्र की भाषा में इसी को उत्पादन की विधि का संग्रह कहते हैं। इस प्रकार इन वस्तुओं का उत्पादन सदा ही होता रहा है तथा होता भी रहेगा। अतः उत्पादन की विधि में परिवर्तन ही सामाजिक विकास का आधार है। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं के अनुसार नयी-नयी वस्तुओं का उत्पादन करता है। इससे नए इतिहास की झलक मिलती है।

 

२. उत्पादन के साधन- मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये जिन वस्तुओं का उत्पादन करता है उनके लिए कुछ साधनों की आवश्यकता पड़ती है। तात्पर्य यह है कि आवश्यक वस्तुओं की उत्पत्ति साधन पर निर्भर है। साधन दो प्रकार के हो सकते हैं-

(क) प्राकृतिक साधन, जैसे भूमि, जलवायु, खनिज पदार्थ आदि।

(ख) यान्त्रिक साधन, जैसे मशीन आदि।

इन साधनों के बिना आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन नहीं हो सकता। उदाहरण के लिये, कृषि के लिये भूमि, बीज, जल इत्यादि साधनों की आवश्यकता है। वस्त्र के लिये मशीन या हाथ-करघा की आवश्यकता है। इन सभी साधनों का सम्मिलित नाम पूँजी और श्रम है। तात्पर्य यह कि उत्पादन के साधन पूँजी और श्रम हैं।

 

३. उत्पादक शक्ति- केवल उत्पादन के साधनों से ही उत्पादन नहीं होता। इसके लिए जनशक्ति (Man power) की आवश्यकता है। यह मनुष्य की अपनी शक्ति है। इसे मार्क्स सबसे महत्त्वपूर्ण मानते हैं, क्योंकि मानव ही अपने श्रम से सभी भौतिक मूल्यों को उत्पन्न करता है। ये मूल्य ही इतिहास के आधार स्तम्भ हैं। अतः मानव की शक्ति नये मूल्यों को जन्म देने वाली शक्ति है। रूसी लेखक बोरिस दात्स्यक का कहना है कि लोग न केवल मशीनों, विभिन्न औजारों और यन्त्रों का निर्माण करते। हैं, बल्कि उन्हें चलाते और इस्तेमाल भी करते हैं। केवल आदमी ही ज्ञान, उत्पादन, अनुभव और काम की दक्षता का वाहक है। इसलिए मेहनतकश जन-समुदाय पृथ्वी पर तमाम भौतिक मूल्यों का सृजनकर्ता और इतिहास का सच्चा निर्माता है।

इस विवरण से स्पष्ट है कि समाज में परिवर्तन का कारण भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति है। सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य समाज में ही आजीविका प्राप्त करता है तथा आजीविका के अनुसार सामाजिक व्यवस्था बन जाती है। आवश्यकतानुसार उत्पादन के लिये मनुष्य ने औजारों या साधनों को अपनाता है। इससे स्पष्ट है कि आर्थिक आधार पर ही समाज का निर्माण होता है। सभ्यता और संस्कृति का आधार भी आर्थिक व्यवस्था की देन है। अतः आर्थिक मूल्यों से ही इतिहास का निर्माण होता है। साधारणतः हम समझते हैं कि इतिहास के बदलते हुए युग मानव के बदलते हुए विचारों और भावनाओं की सूचना देते हैं। मार्क्स के अनुसार इतिहास के विभिन्न युग केवल विभिन्न आर्थिक साधनों के युग हैं।

आर्थिक मूल्यों के आधार पर मार्क्स इतिहास के विभिन्न युगों की व्याख्या करते हैं। कार्ल मार्क्स के अनुसार इतिहास या सामाजिक विकास के निम्नलिखित चार युग हैं

 

१. आदिम साम्यवादी युग (Primitive Communism)-

यह सामाजिक विकास की सबसे पहली अवस्था है। इस अवस्था में मानव का जीवन अत्यन्त सरल था। इस अवस्था में उत्पादन के साधन भी सीधे-सादे थे। मानव के पास कोई व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं थी। समाज में कोई वर्ग नहीं था। प्रकृति की प्रत्येक वस्तु पर समाज के प्रत्येक व्यक्ति का समान अधिकार था। सभी व्यक्ति अपनी शक्ति के अनुसार कार्य करते थे। मनुष्य फल और मांस खाकर जीवनयापन करते थे। अतः फलों को इकट्ठा करना, मछली पकड़ना, जंगली पशुओं का शिकार करना आदि मनुष्य के मुख्य व्यवसाय थे। इस अवस्था में उत्पादन के साधन भी सीधे-सादे थे। लोग पत्थर के औजार और घनुष, बाण आदि से काम लेते थे। जंगली जानवरों के भय से लोग एक जगह एकत्रित होकर, समूह बनाकर रहा करते थे। इस युग में उत्पादन के साधनों पर पूरे समाज का अधिकार था। अतः न कोई शोषक था और न कोई शोषित। यह आदिम साम्यवादी व्यवस्था का युग कहलाता है, क्योंकि इसमें सभी व्यक्तियों के अधिकार समान थे।

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२. दासता का युग-

यह इतिहास का दूसरा युग था। इस युग में कृषि-कार्य प्रारम्भ हुआ। कृषि के लिये लोग पशुपालन करने लगे। पत्थर के औजारों के स्थान पर धातु के औजारों का प्रयोग होने लगा। इस प्रकार उत्पादन के साधन बदल गए। लोग आवश्यकतानुसार अन्न का उत्पादन करने लगे। अन्न का सञ्चय भी प्रारम्भ हो गया। कृषि स्थायी सम्पत्ति हो गयी तथा लोग सम्पत्ति के स्वामीन बने। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये आपस में युद्ध करते थे। युद्ध में पराजित व्यक्ति की हत्या न करके उसे दास बना लिया जाता था। ये दास स्वामी के लिये खेती-बारी तथा पशुपालन का कार्य करते थे। दास पर स्वामी का पूर्ण अधिकार था। स्वामी को दास से बलपूर्वक शारीरिक श्रम लेने का आधकार था। कभी-कभी स्वामी दास की  खरीद-बिक्री भी किया करते थे। इससे स्पष्ट है कि समाज में वर्ग भेद प्रारम्भ हो गया था। भूमि के स्वामी शोषक हो गए तथा दास शोषित। समाज का एक वर्ग परावलम्बी, परजीवी बन गया। इस युग में साम्यवादी मान्यताएँ समाप्त हो गयीं तथा वर्ग-भेद प्रारम्भ हो गया।

 

३. सामन्तवादी (Feudalism) युग-

कालान्तर में उत्पादन के साधनों में पुनः परिवर्तन हुआ और नया युग आया। उत्पादन का प्रधान साधन अब कृषि हो गया। कृषिकार्य के लिये हल आदि औजारों का निर्माण हआ। कृषि कार्य के साथ-सथ भूमि के स्वामित्व की भावना का विकास हुआ। अब समाज में व्यक्ति का स्थान इस बात से निश्चित होने लगा कि भू-स्वामित्व की सीढ़ी में उसका स्थान कहाँ है? बड़े-बड़े भू-भाग पर एकाधिकार स्थापित होने लगा। समाज के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति का अधिकार सम्पूर्ण भूमि पर हो गया। वह राजा कहलाने लगा। राजा कुछ लोगों को अपने भू-भाग को बाँटकर देने लगा। इन भू-भागों के स्वामी सामन्त या जागीरदार कहलाने लगे। सामन्त राजा को कर देता था तथा सैनिक सेवाएँ भी प्रदान करता था।

सामन्त लोग अपनी भूमि को कृषि कार्य के लिये किसानों को दिया करते थे। किसान का कार्य कृषि का उत्पादन करना तथा इसका एक बड़ा भाग सामन्त या जागीरदार को देना था। इससे राजा, सामन्त और किसान का वर्ग-भेद प्रारम्भ हो गया। सबसे नीचे का वर्ग कृषक (किसान) या खेतिहर हो गया। खेतों में अन्न का उत्पादन तो किसान करता था, परन्तु अन्न का अधिकांश भाग सामन्त लोगों को मिलने लगा। आर्थिक दृष्टि से किसान भी दास के समान ही थे परन्तु सामाजिक दृष्टि से किसान दास से उच्च माने जाते थे।

दास और किसान दोनों ही शोषित वर्ग में थे परन्तु दोनों के शोषण में अन्तर था। दास युद्ध में पराजित व्यक्ति थे। इन्हें किसी प्रकार की स्वतन्त्रता नहीं थी। इनके पूरे श्रम का लाभ स्वामी को होता था। ये गुलाम थे और इन्हें किसी प्रकार का अधिकार नहीं प्राप्त था। कृषक या किसान के श्रम का अधिकांश भाग सामन्त को मिला था तथा अल्प भाग किसान को। परन्तु किसान को भी नीजि सम्पत्ति रखने का अधिकार था। इस प्रकार सामन्त युग में भूमि के स्वामित्व को लेकर समाज शोषक और शोषित वर्गों में बँटा रहा।

 

४. पूंजीवादी (Capitalism) युग-

कालान्तर में सामन्त युग भी समाप्त हो गया और इसके स्थान पर पूंजीवाद का युग आया। उत्पादन की वस्तुओं तथा साधनों में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ। इस युग में उद्योग और व्यापार का प्रारम्भ हुआ। अब उत्पादन घरेलू उपयोग की दृष्टि से न होकर विनिमय या व्यापार की दृष्टि से होने लगा। व्यापारिक दृष्टि से वस्तुओं की उत्पत्ति होने में सबसे बड़ी बात यह है कि व्यापारी वर्ग का ध्यान केवल लाभ पर होता है। व्यापारी उसी वस्तु का उत्पादन करना चाहता है जिसमें अधिक से अधिक लाभ हो। समाज का एक वर्ग व्यापारी बना गया जो व्यापार केवल लाभ के लिये ही करता था परन्तु व्यापार श्रम के बिना नहीं हो सकता| श्रम करने वाले श्रमिक या मजदूर हो गये।

श्रमिक का कार्य केवल श्रम को बेच कर पारिश्रमिक या वेतन कमाना है। इस प्रकार समाज श्रमिक और स्वामी, मजदूर और मालिक वर्ग में बँट गया। स्वामी पूँजीपति होता है तथा श्रमिक पूंजीविहीन| अतः समाज के शोषक और शोषित दो वर्गों में घोर संघर्ष प्रारम्भ हो गया। इसी युग में अनेक वैज्ञानिक आविष्कार हुए जिनके फलस्वरूप उत्पादन के साधनों में परिवर्तन प्रारम्भ हो गया। मशीनों का आविष्कार होने लगा। मशीनों के कारण शारीरिक श्रम का महत्त्व कम होने लगा। मशीन से उत्पादन अधिक होता था तथा लागत कम पड़ती थी। अतः व्यापारी वर्ग को मशीनों के उपयोग से अधिक लाभ होने लगा। मशीनों के कारण बड़े-बड़े कल-कारखाने खुलने लगे। इन कारखानों के स्वामी पूँजीपति ही होते थे।

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पूंजीपति (उद्योगपति) कम लागत में अधिक से अधिक लाभ कमाना चाहता था। इसके लिए वह मजदूर के स्थान पर मशीन का अधिक उपयोग करने लगा। मजदूरों को अपनी आजीविका के लिए मिल-मालिकों की शरण लेनी पड़ती थी। मिल-मालिक की अर्थिक दशा तेजी से बढ़ने लगी और मजदूरों की आर्थिक दशा तेजी से बिगड़ने लगी। इस प्रकार समाज में शोषक (पूँजीपति) और शोषित (पूँजीविहीन) का वर्ग-भेद प्रारम्भ हो गया। सामन्तवाद का स्थान पूँजीवादी ने ले लिया।

सामन्त युग में किसान अपना श्रम बचते थे, पूँजीवादी युग में मजदूर अपना श्रम बेचने लगे। मजदूरों की दशा किसानों की अपेक्षा अधिक बिगड़ने लगी। कारखाने में मशीनों के उपयोग से मजदूरों की आवश्यकता कम होने लगी। अतः अन्य सामान की तरह मजदूर भी खरीद-बेचे जाने लगे। इस प्रकार पूँजीवाद ने दासता को और भी बढ़ा दिया। सामन्त युग में किसान जमीन्दार का अर्द्धदास (Serf)था। पूजीवादी युग में वह वेतन पानेवाला दास (Wage Slave) बन गया।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि कार्ल मार्क्स इतिहास की व्याख्या आर्थिक आधार पर करते हैं। इतिहास में किसी नये युग के आगमन का कारण केवल उत्पादन के साधनों में परिवर्तन है। इन साधनों से नये आर्थिक मूल्य उत्पन्न होते है। तथा इन नये मूल्यों से इतिहास के नए युग का निर्माण होता है। यह इतिहास सम्बन्धी बिल्कुल नया दृष्टिकोण है जिसे निश्चित रूप से मार्क्स की देन कहा जा सकता है। इतिहास में सभ्यता, संस्कृति, कला, धर्म, नैतिकता, साहित्य आदि का वर्णन करते हैं। ये सभी आर्थिक मूल्यों पर आधारित हैं। अत: आर्थिक मूल्य या उपादान सिद्धान्त तो सभी सिद्धान्तों का आधार-स्तम्भ है। पूरे समाज की इमारत इन्हीं आर्थिक स्तम्भों पर टिकी है।

 

 

मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त(Theory of Surplus Value)

अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त आर्थिक शोषण का सिद्धान्त है। इसके द्वारा मार्क्स सिद्ध करते हैं कि पूँजीपति श्रमिक का शोषण करता है। स्वामी और श्रमिक का विरोध स्वाभाविक है। श्रमिक अपने श्रम से उत्पादन करता है। स्वामी कच्चा माल, प्रबन्ध, मशीन, इत्यादि पर व्यय करता है। परन्तु वह पूरी लागत से अधिक लाभ लेना चाहता है। उदाहरणार्थ, यदि पूरी लागत १०० रु० है तो मालिक उस माल का १५० रु० में बेचना चाहता है। पचास रु0 की पूंजी ही उसका अतिरिक्त मूल्य है. यहि आतरिक्त मूल्य विनिमय मूल्य तथा उत्पादन मूल्य का अन्तर होता है। यह श्रमिकों की कमाई है, परन्तु इसका लाभ मालिक उठाता है।

उन्नीसवीं शताब्दी का प्रारम्भ वैज्ञानिक आविष्कारों का युग माना जाता है। इस युग में वैज्ञानिक आविष्कारों के फलस्वरूप नये-नये यन्त्रों का प्रयोग होने लगा। इन यन्त्रों को क्रियाशील बना कर उत्पादन करने का कार्य श्रमिक करते थे। पूंजीपति श्रमिकों के श्रम के अनुसार वेतन नहीं देता था। वह विनिमय मूल्य का निर्धारण स्वयं करता था। यह मूल्य उत्पादन में लगे श्रम से बहुत अधिक होता था। इसका सृजन न श्रमिकों के श्रम से होता था, परन्तु यह पूँजीपति की जेब में जाता था। अतः अतिरिक्त मूल्य के कारण पूँजीपति की बचत बढ़ती जाती थी। इस बचत से वह नये उपकरणों की वृद्धि करता था जिससे श्रमिकों की माँग कम हो जाती थी। अतः यह श्रमिकों के शोषण का सिद्धान्त है।

मार्क्स के अनुसार पूँजीपति श्रमशक्ति का विनिमय मूल्य चुका कर श्रमिक को काम में लगा देता है। वह उसे केवल निर्वाह भर के लिए मजदूरी देता है और उससे इतना उत्पादन करवाता है कि उसकी बनायी हुई वस्तु का बाजार में अधिक मूल्य हो। इस प्रकार उत्पादित वस्तु के विनिमय का मूल्य श्रमिक के श्रममूल्य से अधिक होता है। इस मूल्य को उद्योगपति हड़प लेते हैं। इससे स्पष्ट है कि मजदूरों के निर्वाह के लिए मजदूरी जरूरी है, उसके अतिरिक्त जो मूल्य उन्होंने उत्पादित किया है वह अतिरिक्त मूल्य है। इस अतिरिक्त मूल्य को उद्योगपति बराबर बढ़ाता रहता। है। वह उत्पादन बढ़ाता है, अधिक से अधिक मजदूरों को काम में लगाता है। इससे उद्योगपति की पूँजी बढ़ती जाती है तथा मजदूरों का शोषण होता जाता है। अतः अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त शोषण प्रक्रिया का सार है।

इसके अतिरिक्त, मार्क्स ने मजदूरी का कठोर नियम भी बतलाया है। इस नियम का तात्पर्य यह है कि उद्योगपति मजदूर को उतनी ही मजदूरी देना चाहता है जिससे केवल उसका निर्वाह हो सके, उसके प्राण-पखेरू उड़ न जायें और दूसरे दिन वह पुनः काम पर आये। इस कठोर मजदूरी के नियम से मजदूर वर्ग का पूरा शोषण होता है। अपनी आजीविका के लिए उसे उद्योगपति की शरण लेनी ही पड़ती है। उसकी लाचारी का पूरा लाभ उद्योगपति को मिलता है। उचित मजदूरी न मिलने से मजदूर वर्ग में असन्तोष छाया रहता है।

 

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