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मोहम्मद बिन तुगलक की योजनाओं की विवेचना कीजिए

मुहम्मद बिन तुगलक का चरित्र

मुहम्मद बिन तुगलक बड़े असाधारण व्यक्तित्व वाला व्यक्ति था। उसकी बुद्धि कुशाग्र एवं स्मरण शक्ति अद्भुत थी। तर्कशास्त्र, दर्शन, गणित, ज्योतिष तथा भौतिक विज्ञानों तथा फारसी का विद्वान था। वह विद्वानों और कलाकारों का आश्रयदाता था और उनकी सत्संगति में उसे आनन्द मिलता था। डॉ० ईश्वरी प्रसाद के शब्दों में “मुस्लिम विजय से लेकर अब तक जितने शासक दिल्ली के सिंहासन पर बैठे, उनमें निःस्सन्देह वह सबसे अधिक विद्वान और गुणवान था।”

परन्तु मुहम्मद में कुछ भीषण दोष भी थे। वह अत्यन्त जल्दबाज एवं दुराग्रही था। दण्ड देते समय वह निर्दयी बन जाता था। उसमें व्यावहारिकता का अभाव था और कभी-कभी वह असंभव प्रतीत होने वाली योजनाएँ बना डालता था। इसलिए कुछ इतिहासकारों ने उसे पागल, रक्तपिपासु, सनकी एवं मूर्ख बताया है पर यह सत्य नहीं है। वह एक महान् शासक था, जिसने ईमानदारी के साथ शासन चलाने का प्रयत्न किया।

(1985) गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु के बाद उसका पुत्र जूना खाँ, मुहम्मद तुगलक के नाम से 1325 ई० में सिंहासन पर बैठा। वह बड़ा विद्वान् एवं असाधारण प्रतिभा का शासक था। पर उसमें कुछ ऐसे दोष थे, जिनके कारण वह असफल सिद्ध हुआ।

मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाएँ

दोआब में कर-वृद्धि (1326 ई०)-

अपनी आय में वृद्धि करने के लिए दोआब में कर बढ़ाना सुल्तान का प्रथम सुधार था। दोआब में कृषि की दशा इतनी अच्छी थी, कि किसान कर देने में पूर्णतया समर्थ थे, पर दुर्भाग्यवश इसी समय अनावृष्टि के कारण दुर्भिक्ष पड़ गया। फिर भी अफसर कठोरता के साथ कर वसूल करते रहे। परिणामस्वरूप कर्मचारियों की कड़ाई तथा दुर्भिक्ष की भयंकरता के कारण प्रजा में हाहाकर मच गया और जब सुल्तान ने इस दुर्दशा की ओर ध्यान दिया तब तक दोआब का सर्वनाश हो चुका था। इससे सुल्तान जनता में अप्रिय बन गया।

राजधानी का परिवर्तन (1327 ई०)-

दिल्ली को छोड़कर देवगिरि (जिसका नाम बदलकर दौलताबाद रख दिया गया) को अपनी राजधानी बनाना, तुगलक की दूसरी प्रसिद्ध योजना थी। राजधानी के परिवर्तन के अनेक कारण थे-प्रथम सुल्तान ऐसे स्थान को अपनी राजधानी बनाना चाहता था, जो राज्य के केन्द्र में हो। दूसरे, दिल्ली पर सदा मंगोलों के आक्रमण का भय बना रहता था। अतः मुहम्मद ऐसे स्थान को अपनी राजधानी बनाना चाहता था, जो इन आक्रमणकारियों से दूर और सुरक्षित रह सके। तीसरे, यद्यपि दक्षिण भारत को दिल्ली के सुल्तानों ने विजय कर लिया था, पर वहाँ पर उनकी सत्ता स्थायी रूप से स्थापित नहीं हो पाई थी। अतः स्थायी विजय एवं सप्रबन्ध के लिए दक्षिण में राजधानी बनाना आवश्यक था।

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निर्णय करने के बाद मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली के सभी नागरिकों को अपने सामान सहित दौलताबाद चलने का आदेश दिया। मार्ग में लोगों के आराम एवं सुविधा के लिए प्रशंसनीय प्रबन्ध किया गया। लेकिन, दौलताबाद से शासन का काम ठीक प्रकार से न चल सका । उत्तर में विद्रोह होने लगे। मंगोलों के आक्रमण भी बढ़ गये। अतः सुल्तान ने प्रजा को पुनः दिल्ली लौट आने का आदेश दिया। सुल्तान ने एक बार फिर पानी राजधानी को आबाद करने का प्रयत्ल किया, पर दिल्ली उजड़ चुकी थी। वहाँ पहले की समृद्धि न लौट सकी और वह अपना पूर्व वैभव न पा सकी। यह योजना भी असफल हुई और इससे सम्राट की प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा।

ताँबे के सिक्के चलाना-

मुहम्मद बिन तुगलक की तीसरी योजना पीतल और ताँबे के सांकेतिक सिक्के चलाने की थी। शासन-प्रबन्ध, युद्ध एवं विद्रोह का दमन करने में अधिक धन व्यय हो गया था। दुर्भिक्ष के कारण सुल्तान की आय में कमी आ गई थी। वह विदेश-विजय की योजना को कार्यान्वित करने के लिए धन इकट्ठा करना चाहता था।

इन्हीं कारणों से सुल्तान ने पीतल और ताँबे के सिक्कों को कानूनी मुद्राएँ घोषित कर दिया और सोने-चाँदी के सिक्कों की भाँति उनका प्रयोग करने का आदेश दे दिया। पर सुल्तान ने इस बात का उचित प्रबन्ध नहीं किया कि लोग जाली सिक्के न बना सकें। फलतः घर घर में जाली सिक्के बनने लगे। लोगों ने सोने-चाँदी के सिक्के अपने घरों में छिपा लिये और ताँबे के सिक्कों को राज्य को कर के रूप में देने लगे। परिणामस्वरूप व्यापार बन्द हो गया।

चारों ओर अव्यवस्था फैल गई। अतः तुगलक को ताँबे के सिक्के बन्द करने पड़े। उसने हुक्म दिया कि लोग राजकोष से ताँबे के सिक्कों के बदले में सोनेचाँदी के सिक्के ले जायँ । जाली सिक्कों के राजकोष में ढेर लग गये। इससे राज्य को भारी आर्थिक क्षति पहुँची।

विदेशी नीति खुरासान विजय की योजना-

अलाउद्दीन की भाँति मुहम्मद बिन तुगलक ने भी भारत की सीमाओं के बाहर खुरासान को जीतने के लिए एक विशाल सेना संगठित की जिसको उसने एक वर्ष का अग्रिम वेतन दे दिया था। परन्तु कई कठिनाइयों के कारण सुल्तान को यह योजना त्यागनी पड़ी। इससे राज्य को भारी आर्थिक हानि हुई।

कराजल पर चढ़ाई-

1337 ई० में सुल्तान ने कराजल राज्य पर धावा बोल दिया, परन्तु पर्वतीय भूमि तथा अत्यधिक वर्षा के कारण उसे भीषण क्षति उठानी पड़ी। कुछ विद्वानों ने कराजल के आक्रमण को चीन-विजय की असफल योजना बतलायी है।

चीन से सम्बन्ध-

चीन के राज्य के साथ सुल्तान का सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण था। चीनी शासक ने एक राजदूत भी दिल्ली को भेजा था । मुहम्मद बिन तुगलक ने इब्नबतूता को अपना राजदूत बनाकर चीनी शासक के दरबार में भेजा।

विद्रोह-

अपनी असफल योजनाओं, कर बढ़ाने की अत्याचारपूर्ण नीति, कठोर दंड आदि के कारण सुल्तान जनता में अप्रिय बन गया और महत्वाकांक्षी लोगों ने सुल्तान की कठिनाइयों का लाभ उठाना प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने दिल्ली के प्रभुत्व का जुआ उतार फेंका और 1347 ई० में बहमनी राज्य की नींव डाली।

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जिस समय गुजरात के विद्रोहियों को खदेड़ कर मुहम्मद तुगलक सिन्ध में उनका पीछा कर रहा था, वहाँ पर वह बीमार पड़ गया और 20 मार्च, 1351 ई० में मर गया। बदायूँनी के शब्दों में “सुल्तान को उसकी प्रजा से तथा प्रजा को सुल्तान से मुक्ति मिल गई।”

मुहम्मद बिन तुलगक का शासन-प्रबन्ध

सुल्तान एक निरंकुश शासक था। यह धर्माधिकारियों को शासन-प्रबन्ध में हस्तक्षेप नहीं करने देता था। उसने राजनैतिक तथा शासन-सम्बन्धी विषयों में उलेमाओं के प्रभुत्व का अन्त कर दिया और शासन को पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष बना दिया।

मुहम्मद न्यायिक सम्राट था। इसकी न्याय-व्यवस्था की प्रशंसा सभी इतिहासकारों ने की है। दिल्ली सल्तनत का वह प्रथम शासक था, जिसने न्याय को निष्पक्ष बनाने का प्रयत्न किया। उलेमा के अतिरिक्त अन्य लोगों को भी मुहम्मद ने न्यायिक पदों पर नियुक्त किया। उसकी न्याय-व्यवस्था में कानून के समक्ष सब समान थे। वह सैयद तथा उलेमाओं को भी अपराध करने पर दण्ड देता था। वह स्वयं अपने विरुद्ध भी मुकदमा चलाने की अनुमति देता था।

मुहम्मद बिन तुगलक अपने धर्म का पक्का अनुयायी था, फिर भी उसने अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुतापूर्ण नीति अपनाई। उसने हिन्दू मन्दिरों का विध्वंस नहीं कराया और हिन्दुओं को उनकी योग्यतानुसार उच्च पदों पर नियुक्त किया ।

मुहम्मद बिन तुगलक की असफलता के कारण-

मुहम्मद की असफलता का एक बड़ा कारण उसके स्वभाव की कमजोरियाँ थीं। वह बड़ा ही उतावला एवं उग्र प्रकृति का व्यक्ति था । वह जिद्दी, जल्दबाज और कुछ चिड़चिड़े स्वभाव का था। उसकी इन्हीं कमियों के कारण ही उसकी योजनाएँ असफल हुईं।

मुहम्मद की योजनाएँ समयानुकूल न थीं। उसे अपनी प्रजा का समर्थन प्राप्त न हो सका। प्रकृति भी सुल्तान के विरुद्धं थी। भयंकर अकाल के कारण दोआब में कर-वृद्धि की योजना सफल न हो सकी। उलेमा उनसे रुष्ट थे क्योंकि उसने उन्हें राज्य के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करने दिया। परिस्थितियाँ भी दुर्भाग्यवश उसके विरुद्ध थीं। उसे अपने पदाधिकारियों का सहयोग भी प्राप्त न हो सका। साम्राज्य की विशालता ने उसकी कठिनाइयाँ और बढ़ा दीं। सुल्तान की उदार एवं सहिष्णुतापूर्ण धार्मिक नीति के कारण कट्टरपंथी मुसलमान उससे नाराज थे। अतः उन्होंने सुल्तान का साथ नहीं दिया।

 

 

 

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