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समुद्रगुप्त की उपलब्धियों का वर्णन कीजिए

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समुद्रगुप्त के जीवन चरित्र तथा कृतियों का विवेचन कीजिए।

जीवन परिचय

चन्द्रगुप्त प्रथम की मृत्यु के बाद उसका बेटा समुद्रगुप्त राजसिंहासन पर बैठा । यद्यपि वह चन्द्रगुप्त का सबसे बड़ा पुत्र न था परन्तु अन्य पुत्रों की तुलना में समुद्रगुप्त सबसे योग्य, प्रतिभावान् एवं वीर था । यही कारण है कि उसके पिता ने अन्य पुत्रों को छोड़कर उसी को अपना उत्तराधिकारी चुना था । वस्तुतः समुद्रगुप्त गुप्त सम्राटों में ही नहीं, वरन् अन्य यशस्वी सम्राटों की श्रृंखला में अद्वितीय माना जाता है । यह योग्य सेनापति, सफल विजेता, गायक, संगीतज्ञ, विद्वान एवं कला-प्रेमी था।

समुद्रगुप्त का चरित्र एवं कृतियाँ

समुद्रगुप्त असाधारण योद्धा, अनेक समर विजेता एवं अजातशत्रु था । वह दक्ष सेनापति, सफल संगठनकर्ता, काव्य-प्रेमी तथा कला एवं संस्कृति का प्रकाण्ड उन्नायक था। समद्रगप्त ने एक सौ से अधिक युद्ध लड़े थे । इन युद्धों के कारण उसके कान्तिपूर्ण शरीर पर शस्त्रों से लगे सैकड़ों घाव शोभा पाते थे । समुद्रगुप्त ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी और भारत में राजनीतिक एकता स्थापित की थी। दूरस्थ राज्यों को कदर राज्य बनाकर उसने अपनी राजनीतिक पटुता का परिचय दिया था।

डॉ० आर० डी० बनजी के अनुसार-“समुद्रगुप्त एक महान् सम्राट था । सम्भवतः वंश का सबसे महान शासक था । उसे अपने पिता से छोटा साम्राज्य प्राप्त हआ न उसने अपने उत्तराधिकारियों के लिए एक विशाल साम्राज्य छोड़ा । उसने कार की पद्धति में सुधार किया उसके द्वारा चलाई गई शासन पद्धति कुछ के साथ, मुसलमानों के द्वारा उत्तरी भारत की विजय के समय तक चलती  रही ।”

आर०पी० त्रिपाठी के अनुसार-“समुद्रगुप्त की प्रारम्भिक स्थिति चाहे जैसी भी रही हो, यह गुप्त सम्राटों में सबसे योग्य प्रमाणित हुआ और अपनी सफलताओ से उसने अपने पिता द्वारा अपने चयन के औचित्य को प्रमाणित  कर दिया।”

इस प्रकार आर० सी० मजूमदार ने लिखा है-”इसमें सन्देह नहीं है कि समुद्रगुप्त का व्यक्तित्व महान् प्रभावक तथा अद्वितीय था । उसने भारतीय इतिहास में एक नये युग का प्रादुर्भाव किया ।”

वास्तव में समुद्रगुप्त विशाल समुद्र के समान अत्यन्त गम्भीर तथा गहन था । उसके व्यक्तित्व में उदायी या उदयन की कलाप्रियता, चन्द्रगुप्त मौर्य की दक्षता तथा साहसिकता, अशोक के समान मृदुता व दयालुता, रघु के समान दानशीलता तथा राजा जनक के समान विद्याप्रियता के समस्त गुण पूर्णरूप से विद्यमान थे।

समुद्रगुप्त महान् विजेता, कुशल प्रशासक, दूरदर्शी राजनीतिज्ञ ही नहीं था, वरन् वह साहित्य एवं कला-प्रेमी सम्राट था । वास्तव में समुद्रगुप्त अद्वितीय व्यक्तिगत गुणों व विभिन्न असाधारण योग्यताओं से परिपूर्ण था । वह एक महान व्यक्ति, एक विद्वान्, एक कविं, एक संगीतज्ञ और एक वीर योद्धा था । इसी कारण समुद्रगुप्त की तुलना चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक तथा नैपोलियन से की जाती है ।

समुद्रगुप्त का चरित्र एवं व्यक्तित्व

(1) महान विजेता एवं कुशल सेनापति-

समुद्रगुप्त एक महान् शासक और पराक्रमी विजेता था । उसने भारत के दूर-दूर भागों तक अपनी पताका फहराई । अपने युद्धों में उसे कहीं भी हार नहीं खानी पड़ी। छोटे से प्राप्त राज्य को उसने एक विशाल साम्राज्य में बदल दिया और समस्त उत्तरी भारत तथा दक्षिणी भारत के अधिकांश भागों में अपने वंश का सिक्का जमाया ।

(2) साहित्य एवं भलीत प्रेमी-

समुद्रगुप्त एक सर्वतोन्मुखी प्रतिभा वाला पुरुष था । वह केवल एक विजेता ही नहीं था वरन् एक उच्चकोटि का विद्वान, कवि एवं विद्याप्रेमी था । वह एक कुशल नायक भी था जिसके संगीत के आगे हरिषेण के शब्दानुसार तुम्बरू और नारद की वीणा भी मन्द पड़ जाती थी।

(3) उदार शासक-

समुद्रगुप्त बड़ा उदार एवं प्रजापालक सम्राट था । वह दीनदुखियों एवं असहाय व्यक्तियों की सहायता करने के लिए हर समय तैयार रहता था । हरिषेण ने उसे दीनों को दान देने वाला बताया है । समुद्रगुप्त धार्मिक दृष्टि से भी उदार था। वह स्वयं वैष्णव धर्म का अनुयायी था, परन्तु सभी धर्मों का आदर करता था।

(4) कुशल सेनानायक और योद्धा-

उसने अपने सभी युद्धों में स्वयं सेना का संचालन किया और हमेशा विजयश्री प्राप्त की । इससे सिद्ध होता है कि वह एक कुशल सेनानायक था । प्रयाग प्रशस्ति स्पष्ट करती है कि समुद्रगुप्त की विजयों का रहस्य उसके द्वारा एक महान योद्धा के गुणों का निर्वाह करते हुए, कुशल सैन्य-संचालन था ।

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(5) कुशल राजनीतिज्ञ-

पराजित दक्षिण और गणतन्त्रीय राज्यों के प्रति सम्राट् समुद्रगुप्त ने जो नीति अपनायी वह उसको कुशल राजनीतिज्ञ सिद्ध करती है । समुद्रगुप्त जानता था कि साम्राज्य में अधिक राज्य मिला लेने से संचालन ठीक प्रकार से न हो सकेगा इसलिये उन्होंने अनेक राज्यों को अपने अधीन करने के पश्चात् भी उन्हें अपने राज्य में पूर्ण रूप से सम्मिलित नहीं किया।

उसके गुणों की अनेक विद्वानों एवं इतिहासकारों ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की है । हरिषेण जी ने एकदम सत्य ही कहा है कि “ऐसा कौन-सा गुण है, जो उसमें नहीं है।” स्मिथ ने उसके सम्बन्ध में अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किये हैं-“यह स्पष्ट है कि समुद्रगुप्त साधारण शक्तियों से युक्त न था । वह वास्तव में विलक्षण प्रतिभा का ख्याति प्राप्त व्यक्ति था…”

समुद्रगुप्त की विजय का वर्णन कीजिये

इतिहास जानने के साधन समुद्रगुप्त के जीवन-चरित्र एवं विजयों के विषय में पर्याप्त सामग्री मिल जाती है । स्वयं समुद्रगुप्त ने अपनी प्रशस्ति अशोक के प्रयाग स्तम्भ पर अंकित कराई है । यह स्तम्भ इस प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की दिग्विजय एवं उसके गुणों का गद्य एवं पद्य दोनों में ही बड़ा रोचक वर्णन किया गया है।

समुद्रगुप्त की दिग्विजय समुद्रगप्त को उत्तराधिकार में एक छोटा-सा राज्य प्राप्त हुआ जिससे वह सन्तुष्ट नहीं था । अतः उसने राज्य-विस्तार की योजना बनाई । समुद्रगुप्त ने कहाँ-कहाँ पर विजय प्राप्त की इसका पूरा विवरण प्रयाग प्रशस्ति में मिल जाता है। परन्तु प्रशस्ति में यह नहीं लिखा कि उसने किस राज्य को कब जीता । उसमें केवल विजयों का उल्लेख मात्र ही है। समुद्रगुप्त की दिग्विजय को निम्नलिखित क्रम में रखा जा सकता है

(1)आर्यावर्त्त के राज्य, (2) आटविक राज्य, (3) दक्षिणा-पथ के राज्य, (5) प्रत्यन्त

राज्य, (5) गणराज्य, (6) विदेशी राज्य ।

(1)आर्यावर्त्त की विजय-

विद्वानों का ऐसा अनुमान है कि आर्आर्यावर्त्त यावर्त की दिग्विजय संभवतः समद्रगुप्त की सबसे पहली विजय थी। अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए समद्रगप्त ने सर्वप्रथम अपने पड़ोसी राज्यों से ही निपट लेना उचित समझा । प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार आर्यावर्त में 9 राज्य थे । प्रशस्ति में इन राज्यों के राजाओं के नाम मिलते हैं।

प्रशस्ति में लिखा है कि इन राजाओं के राज्यों को समुद्रगुप्त ने जीतकर अपने – राज्य में मिला लिया। इन विजयों के परिणामस्वरूप अधिकांश उत्तरी भारत समद्रगप्त के अधिकार में आ गया। आर्यावर्त के निम्नलिखित राजाओं का राज्य समुद्रगुप्त ने जीत लिया था-अच्युत्त, नागसेन, कोलकुल का नाम कहाँ है ? कददेव, गोतल, नागदत्त, चतुवैमेन आदि।

(2) आटविक राज्यों की विजय-

प्रयाग प्रशस्ति में आटविक राज्यों के नाम नहीं लिखे हैं । आटविक राज्य अधिकतर जंगली जातियों के थे । बिना इन राज्यों के जाते समुद्रगुप्त दक्षिण की ओर न बढ़ पाता । अतः इन राज्यों को विजय से उसके दक्षिणी अभियान का मार्ग खुल गया । ये राज्य आधुनिक जबलपुर से लेकर उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर तक फैले थे।

(3) दक्षिण के राज्यों की विजय-

आटविक राज्यों को नतमस्तक करके समुद्रगुप्त दक्षिण की ओर बढ़ा और वहाँ 12 राजाओं को परास्त किया । प्रयाग प्रशस्ति में इन राज्यों एवं उनके शासकों के नाम इस प्रकार हैं

(1) कोसल का महेन्द्र, (2) महाकान्तार का व्याघ्रराज, (3) पिष्टपुर का महेन्द्रगिरि, (4) कोट्टर का स्वामिदत्त, (5) कोराल का मंटराज, (6) वंगी का हस्तिवर्धन, (7) कांची का विष्णुगोप, (8) पलक्क का उग्रसेन, (9) एरण्डपल्ल का दमन, (10) अवमुक्त का नीलराज, (11) देवराष्ट्र का कुबेर, (12) कुस्थलपुर का धनञ्जय । इस सूची में यह विदित होता है कि समुद्रगुप्त सुदूर दक्षिण में कांची तक पहुँच गया था।

(4) सीमान्त प्रदेश-

समुद्रगुप्त द्वारा उत्तरापथ एवं आटविक राज्य समाप्त होकर गुप्त साम्राज्य का अंग बन चुके थे और दक्षिण के राज्य नतमस्तक कर दिये गये थे । अतः समुद्रगुप्त से भयभीत होकर पाँच प्रान्तीय राज्यों ने समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार कर ली और वे समुद्रगुप्त को कर इत्यादि देने लगे थे । वे राज्य इस प्रकार थे-(1) समतल-पूर्वी बंगाल प्रान्त, (2) दबाक-ढाका, चटगाँव तथा त्रिपुरा (3) कामरूप (असम), (4) नेपाल, (5) कर्तपुर-यह कुमायूँ, गढ़वाल तथा रुहेलखण्ड का भू-भाग था ।

(5) गणराज्यों का पतन-

सीमा प्रान्त के राज्यों के समान ही गणराज्य भी समुद्रगुप्त की साम्राज्यवादी नीति से काँप उठे और उन्होंने स्वतः समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार कर ली । इन गणराज्यों में मानव, आर्जुनायन, यौधेय, मुद्रक, आभीर, प्रार्जुन, सनकानिक काक तथा खापरिक के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं । ये गणराज्य आधुनिक राजस्थान एवं मध्य प्रदेश में स्थित थे ।

(6) विदेशी राज्य-

प्रयाग प्रशस्ति में निम्नलिखित विदेशी राज्यों के नामों का भी उल्लेख आता है

‘देवपुत्रशाहिशाहानुशाही शक मरुण्डे सहलकादिभिश्च अर्थात् देवपुत्र शाही शाहानुशाही, शक सिंहल आदि द्वीप ।

इसके अतिरिक्त प्रशस्ति में अन्य द्वीपों की ओर भी संकेत किया गया है।

इस प्रकार समुद्रगुप्त एक महान् विजेता एवं साम्राज्य निर्माता कहा जा सकता है । अपनी विजयों के उपरान्त उसने अश्वमेध यज्ञ किया । इस अवसर पर उसने विशेष प्रकार के सोने के सिक्के बनवाये।

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समुद्रगुप्त का राज्य-विस्तार-

समुद्रगुप्त की विजय की समाप्ति के समय उसका राज्य अति विशाल हो गया था । उनके राज्य की पूर्वी सीमा कदाचित ब्रह्मपुत्र तक थी । दक्षिण में उसका गया नदी तक फैला था । पश्चिम में उसका राज्य सतलज नदी तक था । उत्तर में कश्मीर छोडकर शेष समस्त उत्तरी भारत उसके साम्राज्य के अन्तगत था। इसके अतिरिक्त देश के अनेक राजा उसकी अधीनता में राज्य कर रहे थे ।

महत्वपूर्ण प्रश्न-

1. समुद्रगुप्त के इलाहाबाद सतम्भ लेख का रचयिता कौन था- समुद्रगुप्त के स्तम्भ लेख का रचयिता उसका पदाधिकारी हरिषेण था।

2. गुप्त सम्राटों के चार अभिलेखों के नाम बताइये।- 1. इलाहाबाद स्तम्भ लेख 2. चन्द्रगुप्त द्वितीय का उदयगिरि शैव गुहा लेख। 3. स्कन्दगुप्त का जूनागढ़ व भित्तरी लेश 4. मेहरौली स्तम्भ लेख।

3. समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशास्ति में उल्लिखित दो गणराज्यों का उल्ललेख कीजिए।- 1. मालव 2. यौधेय।

4. गुप्तकाल के दो प्रमुख साहित्यकारों के नाम लिखिए।- कालीदास, विष्णु शर्मा

5. गुप्त वंश के पतन के दो प्रमुख कारण बताइये।- पहला – अयोग्य उत्तराधिकारी तथा उत्तराधिकार युद्ध। दूसरा- वाह्य आक्रमण तथा निरन्तर युद्ध।

6. संस्कृत के चार प्रसिद्ध ग्रंथों के नाम लिखिये।- कौटिल्य का अर्थशास्त्र, हर्षचरित, महाभारत, रामायण।

7. गुप्तकाल में आक्रमण करने वाले हूण आक्रमणकारियों के नाम- तोरमाण तथा मिहिरकुल

8. समुद्रगुप्त द्वारा जीते गये दक्षिण भारत के दो राज्यों के नाम लिखिये।- कांची, कोसल

9. समुद्रगुप्त की विजयों का विस्तृत वर्णन किस अभिलेक में मिलता है। इसके रचनाकार का नाम देते हुए समुद्रगुप्त की दो विजयों  का उल्लेख कीजिए-

समुद्रगुप्त की विजयों का विवरण हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग स्तम्भ लेख में मिलता है- दो विजय- 1. उत्तर भारत की विजय। 2. दक्षिण भारत की विजय।

10. समुद्रगुप्त ने किन राज्यों को जीता और उनके प्रति उसने क्या नीति अपनाई-

समुद्रगुप्त ने इन राज्यों पर विजय प्राप्त की – 1. उत्तर भारत के राज्यों पर विजय, 2. आटविक राज्यों पर विजय, 3. दक्षिण राज्यों पर विजय। उसने उत्तरी भारत के राज्यो एवं आटविक राज्यों को अपने साम्राज्य में मिला लिया। दक्षिण के राज्यों को उन्हीं के शासकों को अपनी अधीनता स्वीकार कराके लौटा दिया। इनके अतिरिक्त भी अन्य अनेक राज्यों ने उसकी स्वीकार कर ली।

11. रामगुप्त का संक्षिप्त इतिहास-

रामगुप्त समुद्रगुप्त का द्योष्ठ पुत्र था। उसकी पत्नी का नाम ध्रुवस्वामिनी(ध्रुवदेवी) था, लेकिन रामगुप्त बड़ा अयोग्या व विलासी शासक था। उसकी दुर्बलता का लाभ उठाकर शकराज ने उस पर आक्रमण कर दिया। रामगुप्त अपनी पत्नी के बदले में शकराज से सन्धि करने के लिए तत्पर हो गया। लेकिन रामगुप्त के भाई चन्द्रगुप्त द्वितीय ने षड्यंत्र रचकर स्त्री वेश बनाकर, शत्रु शिविर में जाकर शकराज की हत्या कर दी और अपने कुल के सम्मान को सुरक्षित रखा। कायर रामगुप्त अपने भाई चन्द्रगुप्त के द्वारा ही मार डाला गया था।

रामगुप्त को बहुत से विद्वान काल्पनिक मानते हैं। अब ताम्र मुद्रायें मिल जाने और तीन जैन तीर्थकरों की प्रतिमा की चौकी पर इसकी नाम मिल जाने से यह रामगुप्त ऐतिहासिक हो गया है।

12. भाषा  साहित्य की दृष्टि से गुप्तकाल को स्वर्णकाल क्यों कहा जाता है-

संस्कृत भाषा अपने विकास की चरम सीमा पर पहुँच गई। उसे राजभाषा का पद प्राप्त हुआ और इस भाषा में अनेक उच्चकोटि के साहित्यिक ग्रन्थों की रचना हुई। इस काल में साहित्य की अभूतपूर्व उन्नति हुई। प्रसिद्ध कवि नाटककार कालिदास इसी युग के थे। विशाखदत्त, शूद्रक, वसुबन्धु, वात्सायन इस युग की  अन्य विभूतियाँ थीं।

13. अश्वमेध यज्ञ का क्या तात्पर्य है-

प्राचीन भारत में चक्रवर्ती सम्राट अपनी विजयों के उपरान्त अश्वमेध यज्ञ करने वाले सम्राट की अधीनता स्वीकार करते थे और उसे वार्षिक कर देते थे। गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त और पुष्यमित्र शुंग ने अश्वमेंध यज्ञ का आयोजन किया था।

14. इलाहाबाद की प्रशस्ति के विषय में तुम क्या समझते हो-

इलाहाबाद की प्रशस्ति समुद्रगुप्त के काल के इतिहास की जानकारी का एक प्रामाणिक साधन है। इस प्रशस्ति स्तम्भ का निर्माण पुरातन में सम्राट अशोक ने करवाया था। इसमें एक ओर अशोक की धर्म-विजयों का उल्लेख और दूसरी ओर समुद्रगुप्त की विजयों का वर्णन किया गया है। समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण ने 33  पंक्तियों में संस्कृत भाषा में समुद्रगुप्त की विजयों, चरित्र एवं उपलब्धियों का उल्लेख इस प्रयाग प्रशस्ति में किया है। यह समुद्रगुप्त की विजयों की विस्तृत जानकारी देता है।

 

 

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