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सामाजिक उद्विकास की अवधारणा, अर्थ, सिद्धान्त तथा विशेषताएं | Udvikas kya hai in hindi

सामाजिक उद्विकास (Social Evolution) की अवधारणा

समाज एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें निरन्तर परिवर्तन होते रहते हैं। आज मनुष्य जिस अवस्था में है, उसके पहले वह भिन्न अवस्था में था। समाज का जो वर्तमान स्वरूप है, पहले ऐसा नहीं था। इसी प्रकार समाज की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक संस्थाओं का रूप भी वर्तमान से भिन्न था। इसका मुख्य कारण समाज में निरन्तर परिवर्तन होते रहना ही है। सामाजिक उद्विकास को भी समाज में होने वाले परिवर्तनों से सम्बद्ध किया जाता है। संसार की सभी वस्तएँ परिवर्तन की प्रक्रिया में गतिशील रहती है। यह प्रक्रिया केवल जीव जगत् तक ही सीमित नहीं, वरन सष्टि की सभी वस्तुओं में पायी जाती है। उद्विकास को परिवर्तन की एक निश्चित प्रक्रिया माना जाता है, जिससे उद्विकास के एक स्तर का  दूसरे स्तर के साथ सम्बन्ध होता है। यह परिवर्तन सरल स्तर से जटिल स्तर की ओर होता है। उद्विकास की प्रक्रिया के कारण ही सृष्टि की किसी भी वस्तु का रूप स्थिर नहीं है। व्यक्ति, समाज, संस्था, संस्कृति, वनस्पति पदार्थ आदि कोई भी चीज उद्विकास का अपवाद नहीं है। उद्विकास में परिवर्तन और प्रक्रिया के अतिरिक्त एक अन्य तत्व भी जुड़ जाता है, जिसे दिशा (Direction) कहते हैं। उद्विकास में परिवर्तन आवश्यक है। यह परिवर्तन रुक-रुक करके नहीं, वरन निरन्तर होना चाहिये और एक ही दिशा में हाना चाहिये। स्पष्ट है कि जब निरन्तर परिवर्तन एक दिशा में होता है, तो हम उसे उद्विकास कहते हैं।

सामाजिक उद्विकास(Social Evolution) का अर्थ

सामाजिक उद्विकास अंग्रेजी भाषा के ‘सोशल’ इवोल्यूशन’ (Social Evolution) का पर्याय है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘सामाजिक+उदविकास। इसमें सामाजिक शब्द का तात्पर्य समाज से सम्बन्धित है। उद्विकास शब्द अंग्रेजी के ‘इवोलूशन’ का रूपान्तर है। अंग्रेजी के ‘Evolution’ शब्द की व्यत्पत्ति ‘Evoluere’ से हुई, जिसमें ‘E’ का अर्थ है। बाहर की ओर तथा ‘Volero’ का अर्थ है- फैलने वाला । अतः सामाजिक सन्दर्भ में इवोलूशन का अर्थ हुआ- बाहर की ओर फैलने वाला। सामाजिक उदविकास का तात्पर्य इस प्रकार समाज के बाहर की ओर फैलाव से है। समाज को सामाजिक सम्बन्धों का जाल कहा जाता है। समाज को अनेक सामाजिक संस्थाओं का योग भी माना जाता है। स्पष्ट है कि सामाजिक उदविकास का सरवन्ध मानवीय सम्बन्धों के जाल के विकास से है, सामाजिक संस्थाओं के  विकास से है।

उद्विकास परिवर्तन की एक चिरन्तन प्रक्रिया भी है, जिसके तत्व विकसित होने वाली वस्तु में पहले से ही निहित रहते है। उदाहरणार्थ – एक पौधा जब वृद्धि करता है, तो उस वृद्धि के सभी तत्व पौधे में पहले से ही निश्चित रहते है। मनुष्य के शारीरिक अवयव भी इसी प्रक्रियानुसार ही विकसित होते रहते हैं। स्पष्ट है कि उद्विकास का अभिप्राय उस क्रमागत परिवर्तन से है, जिसका एक स्तर, दूसरे स्तर के साथ जुड़ा रहता है तथा एक स्तर के पूर्ण होने के उपरान्त ही दूसरे स्तर के लक्षण शनैः-शनैः प्रकट होते हैं। उद्विकास की प्रक्रिया का स्पष्टीकरण निम्नलिखित परिभाषाओं से भी होता है

1. पी. जिस्वर्ट के शब्दों में, – ‘सामाजिक उद्विकास समाज में विजय एवं स्थिरता के साथ-साथ मनुष्य का विकास है।

2. ऑगवर्न एवं निमकॉफ के अनुसार, – ‘उद्विकास(Evolution) केवल मात्र एक निश्चित दिशा में होने वाला परिवर्तन है।’ आगबर्न एवं निमकॉफ की उक्त परिभाषा में दिशा का तत्व सर्वाधिक उल्लेखनीय एवं महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक दिशा में होने वाला परिवर्तन ही उद्विकास कहलाता है।

3. जिन्सबर्ग के शब्दानुसार, – ‘उद्विकास परिवर्तन की वह प्रक्रिया है, जो किसी वस्तु में नवीनता उत्पन्न करती है। संक्रण में निरन्तरता को व्यक्त करती है।

सामाजिक उद्विकास(Social Evolution)की विशेषताएँ

1- सामाजिक उद्विकास का अभिप्राय सम्पूर्ण ब्रह्मांड में होने वाले विकास एवं परिवर्तन से है।

2- सामाजिक उद्विकास की एक सुनिश्चित दिशा होती है तथा उद्विकास उसी दिशा में ही होता है।

3- सामाजिक उद्विकास निरन्तर होते रहता है अर्थात् यह कभी भी अवरुद्ध नहीं होता।

4- सामाजिक उद्विकास सदैव कुछ अवस्थाओं/ स्तरों में ही सम्पन्न होता है। जिस प्रकार भवन में ऊपर चढ़ने के लिये सीढ़ियाँ होती है, उसी प्रकार से सामाजिक उद्विकास की भी सीढियाँ होती है तथा परिवर्तन इन्हीं सीढ़ियों में से होकर गुजरता है।

5- सामाजिक उद्विकास की प्रकृति सदैव गतिशील ही होती है।

6- सामाजिक उद्विकास का सम्बन्ध गुणात्मक परिवर्तन से है। इसका अभिप्राय यह है कि समाज की संरचना/ढांचे और कार्यों में परिवर्तन होता है। उदृविकास की प्रक्रिया में होने वाले परिवर्तन विशेषताएँ है- अनिश्चित से निश्चित की ओर,

(ब) सजातीय से विजातीयता की ओर (स) असम्बद्धता से सम्बद्धता की ओर।

सामाजिक उद्विकास के सिद्धान्त

सामाजिक उद्विकास के सिद्धान्तो नियमों एवं विधियों के सम्बन्ध में निम्नलिखित विद्वानों के विचार उल्लेखनीय माने गये है-

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1. स्पेन्सर का सिद्धान्त –

हरबर्ट स्पेन्सर ने उद्विकास के सिद्धान्त का प्रतिपादन अपनी दो पुस्तकों ‘The Development of Hypothesis और ‘First Principle’ नामक दो निबन्धों के अन्तर्गत किया है। स्पेन्सर के अनुसार भौतिक जगत अत्यन्त जटिल है। इसमें विभिन्न पदार्थ परस्पर इतने अधिक जुड़े हुये है कि उन्हें एक-दूसरे से पृथक करके अपेक्षित ज्ञान नहीं प्राप्त किया जा सकता। रासायनिक पदार्थों की भाँति उनका विश्लेषण नहीं दिया जा सकता। इस कठिनाई को हल करने के लिये स्पेन्सर ने एक सूत्र प्रस्तुत किया, जिसके द्वारा दृश्य जगत का विश्लेषण करके, वास्तविकता को ज्ञात किया जा सकता है। इस सूत्र के अनुसार भौतिक जगत शक्ति व पदार्थ के सम्मिलन से निर्मित हुआ है। शक्ति एवं पदार्थ दो ऐसे तत्व है, जिनका किसी भी प्रकार से विश्लेषण करना कठिन कार्य है। इस सन्दर्भ में यह स्पष्ट करना सम्भव है कि कौन सा तत्व कहां से प्रारम्भ होता है और कहां पर उसका अन्त होता है। स्पेन्सर के अनुसार शक्ति व पदार्थ अपने असितत्व की सुरक्षार्थ एक-दूसरे पर ही आधारित है।

शक्ति एवं पदार्थ की विशेषताएं – स्पेन्सर के अनुसार शक्ति सदैव गतिमान रहती है। शक्ति की इस विशेषता में कभी कोई अन्तर नहीं आता और न ही शक्ति का विनाश होता है। अतः शक्ति गतिमान होने के साथ-साथ शाश्वत भी है। शक्ति की दूसरी विशेषता यह है। कि इसे न तो कोई समाप्त कर सकता है और न ही इसको बना सकता है। शक्ति की राशि में भी कभी कोई अन्तर नहीं आता, भले ही शक्ति के स्वरूप में अन्तर आ जाये। स्पष्ट है कि स्पेन्सर रूपान्तर के द्वारा शक्ति का अन्त होना स्वीकार नहीं करता है।

यही बात स्पेन्सर पदार्थ के सम्बन्ध में भी कहता है। उसका विचार है कि पदार्थ का भी कभी विनाश नहीं होता, केवल उसका रूप ही बदलता है। कोयले को जलाने पर राख बन जाती है, किन्तु पदार्थ का विनाश तो नहीं होता पदार्थ के मात्र रुप का ही परिवर्तन होता है।

स्पष्ट है कि स्पेन्सर ने शक्ति व पदार्थ की शाश्वत् विशेषताओं का अध्ययन करके तत्वों की निरन्तरता/ शाश्वतता के सिद्धान्त को प्रस्तुत किया। उसने यह भी माना है कि यद्यपि शक्ति व पदार्थ अविनाशी है, फिर भी उनमें सदैव परिवर्तन होते रहते है। उनका स्वरूप स्थिर नहीं है, अतः शक्ति व पदार्थ से निर्मित भौतिक जगत सदैव परिवर्तित होता रहता है। उसका कहना है कि भौतिक जगत में इसकी उत्पत्ति के पश्चात विभिन्न परिवर्तन  हो चुके है। परिवर्तन से उसका अभिप्राय शक्ति व पदार्थों के उस परिवर्तन से ही है जो कि  एक दूसरे के अनुकूल न रहने के कारण बनते बिगड़ते रहते है। इन परिवर्तनों के बारे में स्पेन्सर का मत है कि यह सदैव ही उद्देश्यपूर्ण होते है। शक्ति व पदार्थ में परिवर्तन एक विशेष विधि की प्रेरणावश होता है। इसकी पृष्ठभूमि में जो विधि क्रियाशील होती है, स्पेन्सर के अनुसार वह विकासवाद की विधि ही है। विश्व की उत्पत्ति के सम्बन्ध में स्पेन्सर ने  निम्नलिखित विवेचन प्रस्तुत किया है-

उद्विकास का क्रम

 स्पेन्सर के अनुसार प्रारम्भ में समस्त पदार्थ एक ढेर मात्र ही था, किन्तु यह ढेर शक्तिमान था। शक्ति व पदार्थ की इस अवस्था में समस्त अणुओं का स्वरूप एक सा था। जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया, अणुओं का स्वरूप क्रमशः परिवर्तित होता गया। इस क्रम में सितार और नक्षत्र बने, भौतिक जगत निर्मित हुआ. जल एवं मिट्टी ने भातिक जगत को हरियाली प्रदान की, हरियाले पेड-पौधो ने जीवों की विभिन्न जातियों को उत्पन्न किया। स्पेन्सर का विचार है कि विभिन्न जातियों के जन्म ने के पूर्व विभिन्न विभिन्न प्रकार के जीव उत्पन्न हुये होंगे। इस प्रकार द्रश्य-जगत की विभिन्न वस्तुयें उत्पन्न हुई तथा नष्ट होती चला गयी, जिनका अब कोई भी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।

स्पेन्सर के सामाजिक उद्विकास के प्रमुख तत्व है

1- उद्विकास का सम्बन्ध पदार्थ (matter) के एकीकरण एवं उससे सम्बन्धित गति (Motion) से है।

2- इस गति की विशेषताएं है-

(अ) यह अनिश्चित से निश्चित की ओर होता है,

(ब) इसमें स्पष्टीकरण से विभेदीकरण होता रहता है,

(स) यह सजातीयता से विजातीयता की ओर होता है अर्थात् एक ही जाति से विभिन्न जातियों/ प्रकारों का विकास होता है।

स्पेन्सर के सामाजिक उद्विकास के सिद्धान्त के दो मुख्य निष्कर्ष है –

(क)- सामाजिक उद्विकास सरल से जटिल की ओर होता है। पहले समाज सरल था, किन्तु बाद में जटिल होता गया, पहले परिवार, विवाह, धर्म, राज्य, एवं आर्थिक संस्थाऐ आदि अत्यन्त ही सरल थी, किन्तु सभ्यता के विकास के साथ-साथ उनकी जटिलता में भी वृद्धि होती गयी। उदाहरणार्थ- पहले विवाह की संस्था सरल थी।

(ख)- पुरुष ने एक स्त्री के साथ सहमति से विवाह कर लिया। इसके पीछे कोई कानून, निषेध/ प्रतिबन्ध नहीं थे। बाद में यह संस्था जटिल होती गयी, क्योंकि अब विवाह नियमों/ रीतियों के अनुसार होने लगे, विवाह से सम्बन्धित विभिन्न प्रतिबन्ध विकसित हो गये, यथा- विवाह माता-पिता की इच्छानुसार होना चाहिये, विवाह में दहेज दिया जाना चाहिये, विवाह अपनी ही जाति के सदस्यों में करना चाहिये, एक ही गोत्र में विवाह नहीं करना चाहिये, आदि-आदि।

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2- दूसरा नियम श्रम विभाजन है। पहले समाज में श्रम का विभाजन नहीं पाया जाता था, अतः एक ही व्यक्ति सभी तरह के कार्य करता था। वह खेती, पशुपालन एवं लघु-उद्योग धन्धे करता था। बाद में धीरे-धीरे श्रम-विभाजन का प्रचलन होता गया। अब खेती का कार्य एक ही व्यक्ति के द्वारा किया जाने लगा। खेती में भी हल बनाने के लिये बढ़ई, औजार बनाने के लिये लुहार, पानी देने के लिये कहार, फसल की कटाई करने के लिए मजदूर आदि की आवश्यकता उत्पन्न हुयी। इस प्रकार शनैः-शनैः श्रम-विभाजन और फिर विशेषीकरण भी होता गया।

2. गिडिन्गस् का सिद्धान्त –

सामाजिक उद्विकास से सम्बन्धित गिडिन्गस् के विचारों पर डार्विन एवं स्पेन्सर दोनों की स्पष्ट छाप है। उदविकास सम्बन्धी उनके विचारों का सार-संक्षेप निम्नवत् प्रस्तुत है।

(अ) उद्विकास एवं साहचर्य – गिडिन्गस के विचारानुसार समाज की उत्पत्ति का मूल कारण साहचर्य ही है। साहचर्य की उत्पत्ति रीति के कारण होती है। साहचर्य एवं सामूहिक रीति दोनों ही समाज के स्थायित्व हेतु, अत्यावश्यक एवं अनिवार्य भी है। सामूहिक रीति एक प्रकार से सामूहिक व्यवहार का ही रूप है। सामूहिक व्यवहार का कारण देश-काल या स्थान एवं समय की एकरूपता होती है।

 (ब) सामूहिक व्यवहार एवं उद्विकास – गिडिन्गस् का विचार है कि मनाली जो एक ही स्थान या एक ही समय में अपना अस्तित्व कायम रखते है सही तथा प्रतिक्रियाओं के परिणामतः सामूहिक व्यवहार की उत्पत्ति होती है। जगत के वातावरण सामूहिक व्यवहार को सदैव से ही प्रभावित करता आया है। एक निश्चित में उद्विकास के कारण विभिन्न समूहों का विकास होता है, जो जन्म से ही साथ या जीवित रहने के लिये जो संघर्ष होता है, उसके दबाव के कारण एक साथ मिल जाने है। इस प्रकार एक निश्चित विकास के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के समूह होते हैं जिना समानता एवं सादश्यता भी पायी जाती है। यही समानता सर्वप्रथम उन समहों के व्यवसाय में प्राप्त होती है।

3. डार्विन का सिद्धान्त –

चार्ल्स डार्विन को, विकासवाद का पिता कहते है, क्योंकि उसी ने सर्वप्रथम यह प्रतिपादित किया था कि मनुष्य के पूर्वज वानर/ बन्दर (Monkey) ही थे। डार्विन के उद्विकास सिद्धान्त में ‘योग्यतम की जीत’ और ‘प्राकृतिक वरण का चुनाव’ दो ही तथ्य महत्वपूर्ण माने जाते है। डार्विन का कहना है कि असंख्य जीवधारी पैदा होते हैं, यथा – एक कुतिया के आठ-दस पिल्ले होते हैं, एक मछली अनगिनत अण्डे देती है, एक बरगद के वृक्ष के नीचे लाखों पेड/पौधे उगते है। सभी पिल्ले, अन्डे, पेड़/पौधे आवश्यक रूप जीवित नहीं रह सकते, क्योंकि इनमें से अधिकांश मर जाएंगे, क्योंकि जीवित रहने के लिये साधन अत्यन्त सीमित होते है। इसका परिणाम यह होता है कि अस्तित्व या जीवित रहने के लिये प्राणियों में संघर्ष होता है। इस प्रकार के संघर्ष में केवल वही प्राणी जीवित रह पाते हैं, जो सर्वाधिक योग्य होते है, जो स्वयं को परिस्थितियों के सर्वथा अनुकूल बना लेते है। शेष प्राणी मर जाते हैं या उनका अस्तित्व समाप्त हो जाता है।

डार्विन ने अपने उद्विकासीय सिद्धान्त में प्राकृतिक  चुनाव को भी पर्याप्त महत्व दिया है, जिसके अनुसार प्राणियों को जीवित रहने के लिये अपने पर्यावरण के साथ अनुकूलन भी करना पड़ता है। प्रकृति में केवल वही प्राणी जीवित रह पाते है, जो स्वयं को पर्यावरण के सर्वथा अनुकूल बनाने में सफल सिद्ध होते हैं। पर्यावरण निरन्तर परिवर्तित होता रहता है तथा जीवधारी भी इस तरह के परिवर्तित पर्यावरण के साथ अनुकूलन करने का प्रयास करते है। परिवर्तित हो रहे पर्यावरण के साथ जब जीव व्यक्ति अनुकूलन करते है, तो कभी-कभी उनके शरीर ‘उत्परिवर्तन’ (Mutation) में आ जाते है। उत्परिवर्तन का आशय यह है कि उसके शरीर की बनावट ऐसी हो जाती है कि वह नऐ पर्यावरण के साथ शीघ्र अनुकलन कर लेता है। बार-बार पर्यावरण में परिवर्तन होने के कारण भी उसे अनुकूलन करने में अधिक असुविधा नहीं होती। जब उत्परिवर्तन की यही विशेषता वंशानुक्रमण की प्रक्रिया के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होती रहती है, तो जीवधारियों-जातियों में भिन्नता आ जाती है। इस प्रकार से जीवधारियों का विकास भिन्नता एवं सरलता से जटिलता की ओर होता है, जिसे प्राकृतिक चुनाव का नियम कहा जाता है।

 

इन्हें भी देखें-

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