दल-शिक्षण क्या है?

दल-शिक्षण क्या है? | अर्थ एवं परिभाषा | दल शिक्षण के सिद्धान्त | दल का गठन | Team Teaching in Hindi

दल-शिक्षण (Team Teaching)

दल-शिक्षण शैक्षणिक संगठन का एक ऐसा रूप होता है जिसमें कक्षा में एक अध्यापक के स्थान पर विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ अध्यापक एवं उनके सहायक होते हैं और ये सब मिलकर प्रभावी रूप से शिक्षण कार्य करते हैं। इसे कुछ विद्वानों ने समूह शिक्षण (Team Teaching) तथा सहकारिता शिक्षण (Co-operative Teaching) आदि नाम भी दिये है। वर्तमान समय में शिक्षा तकनीकी के विकास के साथ-साथ शिक्षण में नवीनतम उपकरणों का उपयोगिता को देखते हुए शिक्षाशास्त्रियों ने ‘दल शिक्षण‘ को कक्षा में शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया को भली-भाँति संचालित करने के लिए एक महत्त्वपूर्ण साधन स्वीकार किया है । संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के विद्यालयों में लगभग 40 वर्षों से दल शिक्षण पद्धति का प्रयोग कक्षाओं में किया जा रहा है। भारतीय विद्यालयों में भी दल शिक्षण के महत्त्व को देखते हुए इसके प्रयोगों पर बल दिया जा रहा है।

दल शिक्षण का इतिहास एवं विकास

(History and Development of Team Teaching)

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका में संकट के बादल मंडराने लगे तथा लगभग तीन लाख शिक्षकों ने शिक्षण कार्य को छोड दिया तथा राष्ट्रीय हित के कार्यों  में लग गये तथा शिक्षण हेतु सामान्य शिक्षकों ने कार्य प्रारम्भ किया। जनसंख्या वृद्धि के कारण छात्रों की संख्या भी बहुत अधिक बढ गई। ऐसी विषम परिस्थिति में 1954 में अमेरिका में राष्ट्रीय स्तर की शिक्षण संस्थाआ और विश्वविद्यालयों में एक नवीन प्रयोग प्रारम्भ हुआ जिसमें कक्षा शिक्षण अध्यापक एक ही बिन्दु को कक्षा में दल अथवा समह के रूप में पढ़ाने लगे। यह प्रयोग बहुत सफल सिद्ध हुआ। इस प्रकार दल शिक्षण से मिलती-जुलती योजना सन् 1955 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रारम्भ की गई जिसे ‘लेक्सिंग्टन योजना’ का नाम दिया गया। सन् 1955 में गही हार्वे द्वारा एक योजना प्रारम्भ की गई जिसमें एक सहायक शिक्षक की सहायता से दल शिक्षण प्रारम्भ किया गया।

फोर्ड फाउण्डेशन की आर्थिक सहायता से सन् 1956 में एक आयोग की स्थापना का गई जिसने शिक्षण मंडलों का अधिक प्रभावशाली उपयोग करने से सम्बन्धित अध्ययन किय तथा ‘दल शिक्षण’ के महत्त्व को स्वीकार किया। सन् 1956 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के फ्रांसिस केपल ने ‘दल शिक्षण’ के महत्त्व पर प्रकाश डाला और लेक्सिंग्टन द्वारा सन् 1957 में इसे क्रियान्वित किया गया। ग्रीनविच विद्यालय में सन 1961 से ‘दल शिक्षण’ का प्रयोग प्रारम्भ किया गया।

इंग्लैण्ड में जोसेफ लेंकास्टर तथा बैल ने सन् 1970 में मॉनीटर पद्धति से अनुदेशन कार्य प्रारम्भ किया जिसमें एक वरिष्ठ अध्यापक मॉनीटर्स (नायकों) के साथ मिलकर शिक्षण कार्य करता है जिसमें एक साथ एक भवन में 1000 तक छात्रों को पढ़ाया जाता है। इसमें एक दो नायक अनुशासन बनाये रखने में, एक दो सहायक सामग्री (दृश्य-श्रव्य सामग्री) के प्रयोग करने में तथा अन्य शिक्षण कार्य में सहयोग देते हैं। दल शिक्षण के विकास में सर्वाधिक योगदान हार्वर्ड विश्वविद्यालय तथा कैलिफोर्निया के क्लेयर मॉण्ट कॉलेज ने दिया। इन्होंने अनेक संस्थाओं के सहयोग से इस आन्दोलन को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। श्री हैरी बेकर तथा हैरिस टेलर ने अपने शोधकार्य से दल शिक्षण के स्वरूप को निखारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बिटेन में 1960 में इसका विकास जे. फ्रीमैन ने किया। शिकागो विश्वविद्यालय के फॉसिस चेज ने टोली-शिक्षण का उपयोग प्रभावशाली शिक्षण की आवश्यकताओं हेतु किया था।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में यदि हम प्राचीन शिक्षा-व्यवस्था की ओर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि गुरुकुल शिक्षा प्रणाली में भी नायक पद्धति से शिक्षण कार्य किया जाता था जिसे दल शिक्षण का ही एक गौण रूप कहा जा सकता है। किन्तु आधुनिक काल में भारतीय विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में ‘दल शिक्षण’ का प्रयोग करने का प्रयास जारी है।

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दल शिक्षण का अर्थ एवं परिभाषा

(Meaning & Definition of Team Teaching)

जहाँ दो या दो से अधिक शिक्षक एक-दूसरे को सहयोग करते हुए विद्यार्थियों के समूह के लिए किसी विषय-विशेष का शिक्षण करते हैं उसे समूह शिक्षण अथवा दल शिक्षण कहते है। इसमें शिक्षक अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं। शिक्षकों में से ही एक शिक्षक पूरे दल का नेता होता है जो पूरी व्यवस्था को संचालित करता है तथा शेष शिक्षक उसी के निर्देशन में कार्य करते हैं। इस शिक्षण की सफलता दल के नेता पर निर्भर करती है। इस शिक्षण तकनी में शिक्षक परस्पर सहयोग के आधार पर शिक्षण करते हैं, इसलिए इसे सहकारिता शिक्षण पी कहते हैं।

‘दल शिक्षण’ का अर्थ स्पष्ट करने हेतु विभिन्न विद्वानों ने इसकी अलग-अलग ढंग से परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं :

(1) शैफलिन तथा ओल्ड- “दल शिक्षण अनुदेशनात्मक संगठन का वह प्रकार है जिसमें शिक्षण प्रदान करने वाले व्यक्तियों को कुछ छात्र सुपुर्द कर दिये जाते हैं। शिक्षण प्रदान करने वालों की संख्या दो या उससे अधिक होती है जिन्हें शिक्षण का दायित्व सौंपा जाता है तथा जो एक छात्र समूह को सम्पूर्ण विषय-वस्तु या उसके किसी महत्त्वपूर्ण अंग का एक साथ शिक्षण करते हैं।”

(2) डेविड वारविक- “दल शिक्षण व्यवस्था का एक स्वरूप है जिसमें कई शिक्षक अपने स्रोतों अभिरुचियों तथा दक्षताओं को एकत्रित करते हैं और छात्रों की आवश्यकताओं के अनुसार। शिक्षकों की एक टोली द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। वे विद्यालय की सुविधाओं का समुचित उपयोग करते हैं।”

(3) कार्लो ऑलसन- “यह एक ऐसी शैक्षणिक परिस्थिति है जिसमें अतिरिक्त ज्ञान व कौशल से युक्त दो या अधिक अध्यापक पारस्परिक सहयोग से किसी शीर्षक के शिक्षण की। योजना बनाते हैं तथा एक ही समय में एक छात्र समूह को विशिष्ट अनुदेशन हेतु लचीले कार्यक्रम तथा सामूहिक विधियों का प्रयोग करते हैं।” 

दल शिक्षण की विशेषतायें

(Characteristics of Team Teaching)

1. दल शिक्षण में दो या दो से अधिक शिक्षक शिक्षण कार्य करते हैं।

2. यह सहकारिता की भावना पर आधारित होता है ।

3. यह एक शिक्षण विधि भी मानी जाती है।

4. इस शिक्षण का मुख्य उद्देश्य शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी बनाना अथवा अनुदेशन की गुणवत्ता में वृद्धि करना है।

5. इसमें शिक्षकों के मध्य की दूरी समाप्त हो जाती है तथा शिक्षक एक-दूसरे के ज्ञान से लाभान्वित हो सकते हैं।

6. इस शिक्षण में विद्यालय तथा छात्रों की आवश्यकताओं तथा उपलब्ध साधनों का विशेष ध्यान रखा जाता है।

7. इसकी योजना लचीली होती है।

8. इसमें पूरे दल पर शिक्षण का सामूहिक उत्तरदायित्व होता है।

9. दल शिक्षण अनुदेशनात्मक संगठन का एक विशिष्ट प्रकार है जो पूरी तरह से औपचारिक होता है।

10. इसमें अध्यापकों द्वारा अनौपचारिक ढंग से की गई अनुदेशनात्मक क्रियायें भी सम्मिलित की जा सकती हैं।

11. दल शिक्षण में आवश्यकतानुसार शिक्षण हेतु विद्यालय के बाहर के कुछ विशेषज्ञों की सहायता व सहयोग भी लिया जा सकता है।

12. इसमें दल के सदस्यों की संख्या निश्चित नहीं होती।

13. दल शिक्षण द्वारा विषय के स्पष्टीकरण हेतु दृश्य-श्रव्य उपकरणों का प्रयोग भी किया जाता है।

 

दल शिक्षण के सिद्धान्त

(Principles of Team Teaching)

(1) विद्यालय के शिक्षकों का उनकी योग्यतानुसार उपयोग करना ।

(2) समय-सीमा का निर्धारण करना।

(3) छात्रों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं का ध्यान रखना।

(4) छात्रों के पूर्वज्ञान के आधार पर अनुदेशन स्तर का निर्धारण करना।

(5) अधिगम हेतु उपयुक्त वातावरण तैयार करना।

(6) शिक्षकों को योग्यतानुसार उत्तरदायित्व देना।

(7) विभिन्न सूचनाएँ प्रदान करने के साधनों की समुचित व्यवस्था करना।

(8) सम्पूर्ण शिक्षण कार्य का पर्यवेक्षण निरन्तर करना।

(9) छात्रों को सक्रिय रखना।

(10) समूह के आकार का निर्धारण करना।

दल का गठन

दल शिक्षण करते समय एक साथ कितने सदस्यों को रखा जाए; यह विद्यालय के स्तर, विद्यालय में उपलब्ध सुविधाएँ तथा विषय पर निर्भर करता है। सामान्यतः एक दल में प्रधानाध्यापक, अध्यापक (वरिष्ठ), सहायक अध्यापक, प्रयोगशाला सहायक, तकनीशियन तथा लिपिक आदि को सम्मिलित किया जाता है। दल शिक्षण व्यवस्था हेतु लोगों ने अलग-अलग दल के गठन से सम्बन्धित प्रारूप प्रस्तुत किये हैं, उदाहरण के रूप में, शेफलिन तथा ओल्ड की पुस्तक ‘Team Teaching‘ में दिये गये लैक्सिग्टन शिक्षण-दल का लघु प्रारूप यहाँ प्रस्तुत है:

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लैक्सिग्टन शिक्षण-दल का लघु प्रारूप
लैक्सिग्टन शिक्षण-दल का लघु प्रारूप

 

 

इसमें TL = (Team Leader) दल संयोजक, ST = (Senior Teacher) वरिष्ठ अध्यापक, T = (Teacher) अध्यापक, TA (Teacher Aid) अध्यापक सहायक, CA = (Clerical Aid) लिपिकीय सहायक आदि होते हैं।

इस प्रकार उपर्युक्त सदस्य मिलकर शिक्षण कार्य करते हैं। बड़े विद्यालयों हेतु लक्सिग्टन शिक्षण दल का वृहत् प्रारूप भी तैयार किया गया है। भारतीय परिस्थतियों में आवश्यकतानुसार छोटे दलों का गठन भी किया जा सकता है,जैसे, दल का संयोजक अथवा वरिष्ठ अध्यापक,दो-तीन विषय के सहायक अध्यापक, तकनीशियन तथा लिपिक आदि ।

दल के गठन का वर्गीकरण, व्यवस्था के स्वरूप के आधार पर निम्न प्रकार से भी किया जा सकता है:

(1) एक ही विभाग के शिक्षकों का दल- जैसे एक विद्यालय में हिन्दी के तीन अध्यापक हैं। वे तीनों अध्यापक ‘दल शिक्षण’ हेतु एक साथ मिल-जुलकर कार्य करेंगे। इनके साथ तकनीशियन अथवा लिपिक आदि भी आवश्यकतानुसार रहेंगे।

(2) एक ही संस्था के विभिन्न विभागों के शिक्षकों का दल- इस शिक्षक दल का उपयोग प्राय: ऐसे विषयों के लिए किया जाता है, जो आपस में सम्बद्ध हों, जैसे,सामाजिक विज्ञान हेतु इतिहास, भूगोल तथा नागरिक-शास्त्र के अध्यापकों को दल में सम्मिलित किया जाये। इस दल का प्रयोग प्रशिक्षण संस्थाओं हेतु अधिक लाभदायक है।

(3) विभिन्न संस्थाओं के एक ही विभाग के शिक्षकों का दल- जब अपने विद्यालय में एक विषय का एक ही अध्यापक हो, तब दूसरे विद्यालयों से उस विषय-विशेष के अध्यापकों को आमंत्रित कर दल का गठन किया जाता है। इससे छात्रों को ‘दल शिक्षण’ के माध्यम से प्रभावशाली शिक्षकों से पढ़ने का अवसर मिलता है ।

 

दल शिक्षण के कार्यक्रम का संगठन

दल शिक्षण के द्वारा पाठ को पूरा करने के अनेक तरीके हैं, इनमें से एक तरीका निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर प्रस्तुत किया जा रहा है :

(1) अगवानी पाठ या आमसभा सत्र (Lead Lesson or General Assembly Session)

यह सत्र ‘दल शिक्षण’ का प्रथम तथा महत्त्वपूर्ण चरण है। इसमें कक्षा के विभिन्न भागों (Sections) के छात्रों को एक साथ बड़े कक्ष में बैठाया जाता है तथा दल का एक विशिष्ट अध्यापक पूरे समूह के शिक्षण का नेतृत्व करता है तथा अन्य अध्यापक उसकी सहायता करते हैं, जैसे, एक व्याख्या करने में, दूसरा छात्रों की अनुक्रियाओं का अवलोकन करने में, तीसरा अनुशासन बनाये रखने में, चौथा दृश्य-श्रव्य उपकरणों के प्रयोग में इस प्रकार इस सत्र में सभी अध्यापकों का सहयोग अपेक्षित होता है। इस सत्र की सफलता पर आगामी कार्यक्रम निर्भर करता है। इससे छात्रों को सीखने की प्रेरणा मिलती है । इसमें छात्रों को सक्रिय रखने हेतु उनसे बीच-बीच में प्रश्न भी पूछे जाते हैं। इस सत्र की अवधि छात्रों की आय को ध्यान में रखते हुए। निर्धारित की जाती है।

 

(2) अनुसरण काय या लघुसभा सत्र (Follow-up Work or Small Assembly Session)

आमसभा सत्र के बाद छात्रों की जिज्ञासाओं के समाधान हेत बडे समूह को छाटसमहों में बॉट दिया जाता है जिसमें अध्यापक उन्हें मार्गदर्शन देता है। इसके लिए दाता को अपनाया जाता है :

(अ) अगवानी पाठ के समय शिक्षक अपने छोटे समूह के साथ उपस्थित होकर मुख्य बिन्दुओं तथा पाठ्य-पुस्तकों को लिखता है तथा उनका उपयोग अनुसरण के लिए करता है।

(ब) छात्रों को उनकी रुचियों के अनुसार छोटे समूहों में बाँटकर प्रथम सत्र के अगवानी पाठ के आधार पर प्रायोजना कार्य दिया जाता है जिसे छात्र शिक्षक के मार्गदर्शन में पूरा करते हैं।

 

(3) प्रयोगशाला सत्र (Laboratory Session)

इस सत्र में विज्ञान, गृहविज्ञान, सामान्य विज्ञान, गणित आदि ऐसे विषय, जिनमें छात्रों को स्वयं प्रयोग तथा अभ्यास करने हैं, वे छात्र, अध्यापक की उपस्थिति में प्रयोग तथा अभ्यास कर निष्कर्ष निकालते हैं व निष्कर्षों की व्याख्या करते हैं।

 

 

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