जाॅन बर्कले का ईश्वर या परमात्मा

जाॅन बर्कले का ईश्वर या परमात्मा | John Berkeley’s God in Hindi

जाॅन बर्कले का ईश्वर

जाॅन बर्कले के समय वैज्ञानिक प्रगति तथा जड़ वस्तु में विश्वास के कारण लोग अनीश्वरवादी होते जा रहे थे। अतः बर्कले का मुख्य उद्देश्य है कि अनीश्वरवाद के स्थान पर ईश्वरवाद की स्थापना करना। इसी कारण बर्कले ने जड़ वस्तु का खण्डन किया है; क्योंकि जड़ की सत्ता में विश्वास ही अनीश्वरवादी भावना को उत्पन्न करता है। अतः जड़ तत्त्व का खण्डन कर बकले ईश्वर के प्रति आस्था उत्पन्न करना चाहते हैं। बर्कले के अनुसार ईश्वर या परमात्मा का अस्तित्व अन्य आत्मा के समान अनुमानगम्य है। तात्पर्य यह है कि जैसे अन्य आत्माओं के अस्तित्व की सिद्धि होती है वैसे ही परमात्मा के अस्तित्व की भी।

ईश्वर की सिद्धि करते हुए बर्कले कहते है कि यदि हम ध्यानपूर्वक प्राकृतिक वस्तुओं की नियमानुकूल व्यवस्था और श्रृंखला पर विचार करें तथा प्रकृति के अपार सौन्दर्य को देखें और यह जानने का प्रयत्न करें कि नित्य, अनित्य ज्ञान, शिव, पूर्ण आदि शब्दों से किन गुणों का परिचय मिलता है। हमें स्पष्ट ज्ञान होगा कि एक सर्वोपरि आत्मा (परमात्मा) है जिसके द्वारा सब सञ्चालित है तथा जो सबके अस्तित्व का कारण ही पुनः बर्कले तर्क उपस्थित करते हैं कि हमें सम्पूर्ण जगत् के विज्ञानों का अनुभव होता है। इन विज्ञानों का कारण कौन है? जड़ तत्त्व इनका कारण नहीं हो सकते, क्योंकि जड़ तो निष्क्रिय है।

इनका कारण मेरी सक्रिय आत्मा भी नहीं, क्योंकि अन्य आत्मा भी इन्द्रिय-संवेदन रूप विज्ञान को केवल ग्रहण करती है। पारिशेष्यात् इनका कारण परमात्मा या नित्य आत्मा (ईश्वर) ही हो सकता है। वह सर्वशक्तिमान है, अतः सभी प्रकार के विज्ञानों। को उत्पन्न करने की उसमें शक्ति है। उसी के बनाये हुए नियमों से जागतिक विज्ञानों में नियमानुकूलता तथा क्रमबद्धता है। सभी विज्ञानों का एकमात्र ईश्वर को कारण मानने के कारण बर्कले दृष्टि-सृष्टिवाद या आत्मनिष्ठ विज्ञानवादः (Subjective idealism) के दोष से बच जाते हैं।

विज्ञान मनाश्रित हैं, क्योंकि मन ही उनका ग्राहक है, परन्तु हमारा मन उनका उत्पादक नहीं। सभी विज्ञानों की उत्पत्ति-ईश्वर से होती है। विज्ञान तथा ईश्वर के सम्बन्ध को स्पष्ट करते हुए बर्कले कहते हैं कि जिस विज्ञान का हमें अनुभव नहीं होता (प्रत्यक्ष नहीं होता) उसका ईश्वर को अनुभव होता है। ईश्वर के मन में असंख्य विज्ञानों की सम्भावना है। संसार में उपलब्ध विज्ञान इन्हीं सम्भाव्य विज्ञानों में से कुछ हैं।

ईश्वर के मन में असंख्य सम्भाव्य विज्ञानों को बर्कले आदि रूप (Archetypal) विज्ञान मानते हैं तथा सांसारिक सृष्ट विज्ञानों को प्राकृतिक मानते हैं। इससे स्पष्ट है कि मानव मन में विद्यमान विज्ञान ईश्वर के मन में असंख्य विज्ञानों के कुछ अंश है। इस प्रकार हम विज्ञानों से ही उनके कारण परमात्मा का अनुमान करते हैं। यह ज्ञान आत्मज्ञान से भिन्न है। आत्मज्ञान को बर्कले स्वानुभूतिजन्य मानते हैं, परन्तु परमात्मा अन्य आत्मा के समान अनुमेय है।

 

 

जाॅन बर्कले का कार्य-कारण

जाॅन बर्कले के अनुसार कारण विचार ईश्वर-विचार का अभिन्न अंग है, क्योंकि ईश्वर ही प्रत्ययों का परम कारण माना गया है। अतः कारण विचार के बिना ईश्वर का स्वरूप अपूर्ण सा लगता है। यह सत्य है कि प्रत्ययों की सत्ता हमारी आत्मा पर निर्भर है; क्योंकि मैं ही अनुभवकर्ता हूँ। परन्तु मेरी आत्मा सभी प्रत्ययों को उत्पन्न नहीं कर सकती; अन्य आत्मा भी सभी प्रत्ययों को उत्पन्न करने में समर्थ नहीं।

फलतः हमें जीवात्मा को छोड़कर परमात्मा की शरण लेनी पड़ती है। बर्कले स्पष्टतः कहते हैं कि जब दिन के प्रकाश में मैं अपनी आँखें खोलता हूँ तो विवश होकर मानता हूँ कि कुछ प्रत्ययों को उत्पन्न करना मेरी शक्ति के बाहर है। इन सभी प्रत्ययों का कारण ईश्वर है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सभी प्रत्ययों का कारण ईश्वर है। यहाँ एक आवश्यक प्रश्न है कि कारण किसे कहते हैं? कारण तथा कार्य में क्या सम्बन्ध है? साधारणतः हम गर्मी का कारण सूर्य, वर्षा का कारण मेघ मानते हैं तथा स्वस्थ शरीर का कारण पौष्टिक भोजन मानते हैं।

बर्कले का मत इससे भिन्न है। उनके अनुसार अग्नि उष्णता का कारण नहीं तथा जल शीतलता का कारण नहीं, वरन् आत्मा इनका कारण है। परन्तु बोलचाल की भाषा में हम कभी नहीं कहते कि आत्मा गर्मी या शीतलता उत्पन्न करती है, परन्तु विद्वानों के लिए तो सर्वथा यही मान्य होगा। बर्कले इसे एक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करते हैं। हम सभी कहते हैं कि सूर्य उदय होता है तथा अस्त होता है। परन्तु वस्तुतः सूर्य स्थिर रहता है तथा पृथ्वी उसके चारों ओर घूमती रहती है। अतः जहाँ तक सत्य का प्रश्न है सभी बुद्धिमान कोपरनिकस की बातें ही मानते हैं कि सूर्य उदय होता है आदि। इससे स्पष्ट है कि अग्नि वस्तुतः ताप का कारण नहीं तथा जल शीतलता का कारण नहीं, वरन् कारण तो आत्मा है।

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इनके अतिरिक्त, बर्कले यह भी कहते हैं कि साधारणतः हम कारण और कार्य में पूर्ववर्ती (Antecedent) और अनुवर्ती (Consequent) का सम्बन्ध बतलाते हैं। हमारा अभिप्राय यह है कि पूर्ववर्ती घटना कारण होती है और अनुवर्ती घटना कार्य। उदाहरणार्थ, अग्नि ताप का कारण है तथा ताप अग्नि का कार्य है। बर्कले के अनुसार अग्नि तो ताप का चिह्न (Sign) है या संकेत है। इस संकेत को जब हम देखते हैं तो संकेतित वस्तु (Signified) का प्रत्यय हमारी बुद्धि में आ जाता है। अतः बर्कले के अनुसार अग्नि संकेत से ताप संकेतित वस्तु का ज्ञान होता है।

परन्तु संकेत तथा संकेतित (कारण तथा कार्य का) सम्बन्ध ईश्वरेच्छा पर निर्भर है। यदि ईश्वर की इच्छा हो तो जल से उष्णता की उत्पत्ति तथा अग्नि से शीतलता का उत्पत्ति हो सकती है। परन्तु यह इच्छा की स्वतन्त्रता ईश्वर तक ही सीमित है। मानव के लिये यह अनिवार्य सम्बन्ध है| तात्पर्य यह है कि संकेत तथा संकेतित का हा हमें ज्ञान होगा। इसी प्रकार जल से शीतलता का तथा मेघ से वृष्टि का इत्यादि।

इश्वर के लिये स्वेच्छा है। अतः साधारणत: जिसे कारण-कार्य कहा जाता है। वह संकेतित सम्बन्ध है जो संकेत तथा हमारे लिये अनिवार्य है परन्तु ईश्वर का इच्छा पर निर्भर है।

जाॅन बर्कले की समीक्षा

जाॅन बर्कले का अनुभववाद लॉक और ह्यूम के बीच की श्रृंखला स्वीकार किया जाता है। उन्हें दोषरहित लॉक (Locke purged) माना जाता है तथा अपूर्ण ह्यूम (Incomplete Hume) भी स्वीकार किया जाता है। यह कथन अंशत: सत्य भी है। हमने पहले देखा है कि बकले ने लॉक के अनुभववाद के दोषों को दूर किया है। लॉक ज्ञान को इन्द्रियानुभव तक ही सीमित मानते हैं। संवेदन तथा स्वसंवेदन ही हमारे ज्ञान के वातायन हैं, फिर भी लॉक जड़ वस्तु की सत्ता स्वीकार करते हैं, अमूर्त । विचारों का अस्तित्व मानते हैं जिनका हमें अनुभव नहीं होता।

इसी कारण लॉक का अनुभववाद अपूर्ण-सा लगता है, जाॅन बर्कले ने इसे वस्तुतः पूर्ण बनाया है। इसी कारण जाॅन बर्कले को दोषरहित लॉक कहा जाता है। साथ-साथ यह भी कहा जाता है कि बर्कले अपूर्ण ह्यूम हैं, क्योंकि ह्यूम का दर्शन अनुभववाद का चरम उत्कर्ष है। आगे हम देखेंगे कि ह्यूम के दर्शन में अनुभववाद संशयवाद का रूप धारण कर लेता है तथा इसका अन्त हो जाता है।

ऐतिहासिक दृष्टि से आलोचकों ने जाॅन बर्कले के दर्शन को आत्मनिष्ठ विज्ञानवाद कहा है। विज्ञानवाद के जन्मदाता तो प्लेटो (Plato) माने जाते हैं। उनके अनुसार विज्ञान भौतिक वस्तुओं के आदर्श हैं। ये विज्ञान सामान्य या जातिरूप हैं जो व्यक्ति से भिन्न है। अरस्तू (Aristotle) ने प्लेटो के इस विज्ञानवाद का खण्डन किया है। अरस्तू के अनुसार विज्ञान तो है, पर वस्तु से अभिन्न है। सामान्य तथा विशेष, जाति तथा व्यक्ति परस्पराश्रित है।

बर्कले का मत इन लोगों से भिन्न है। बर्कले के अनुसार वस्तु विज्ञान रूप ही है। भारतीय दर्शन में योगाचार बौद्ध लोग भी कहते हैं कि विज्ञान और वस्तु का द्वैत मिथ्या है, यथार्थ रूप में वस्तु तो विज्ञान रूप है; क्योंकि विज्ञान के अतिरिक्त किसी की सत्ता ही नहीं। सत्ता तो केवल मानसिक है, विज्ञान रूप है। बर्कले तथा योगाचार के मत में प्रायः साम्य है।

बर्कले का विज्ञानवाद आलोचना का मुख्य विषय है। कई आलोचकों ने इसकी कटु आलोचना की है। कुछ लोगों का कहना है कि बर्कले ने जागतिक वस्तुओं का निराकरण कर उनके स्थान पर काल्पनिक या विज्ञान जगत् का निर्माण कर दिया है। बकले के अनुसार वास्तविक अग्नि तथा काल्पनिक अग्नि में कोई भेद नहीं; कल्पना या स्वप्न में अपने को जलते हुए पाना तथा वस्तुत: जलना दोनों अभिन्नार्थक है।

यदि सामने स्थित अग्नि वस्तु नहीं, काल्पनिक है तो हमें उस पर हाथ रख देना चाहिये तथा उसे जलाना नहीं चाहिये। इसका उत्तर देते हुए स्वयं बर्कल कहते हैं कि हम जो कुछ भी देखते हैं, सुनते हैं, सोचते हैं, समझते हैं वह यथार्थ है; कल्पना नहीं। अतः यथार्थ और कल्पना में भेद अवश्य है। इसी प्रकार कुछ लोग कहते हैं कि बकले के अनुसार तो बाह्य वस्तु की सत्ता ही नहीं है तो हम विज्ञान ही खाते है, विज्ञान ही पीते हैं, विज्ञान ही पहनते हैं। इसके उत्तर में बर्कले अपने प्रत्यय या विज्ञान शब्द के अर्थ को स्पष्ट करते हैं; क्योंकि विज्ञान को नहीं समझने के कारण ही विज्ञान को खाने, पहनने का भ्रम हो सकता है।

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बर्कले का कहना है कि यदि वास्तविक अग्नि प्रत्यय या विज्ञान से भिन्न है तो यथार्थ वेदना (जिसे अग्नि उत्पन्न करती है) भी वेदना के प्रत्यय से भिन्न है। परन्तु यह कोई भी स्वीकार नहीं करेगा कि यथार्थ वेदना मन के अतिरिक्त कुछ है। इसी प्रकार हम जो भी खाते, पहनते हैं उनका हमें प्रत्यक्ष अनुभव होता है। हमारे इस अनुभव तथा हमारी चेतना के मध्य कोई वस्तु नहीं। लॉक ने वस्तु और विज्ञान में भेद किया है। विज्ञान या प्रत्यय तो वस्तु तक पहुंचने का माध्यम है; परन्तु वस्तु अज्ञेय है। यदि यथार्थ रूप में वस्तु ‘अज्ञेय है तो इसका निश्चय कैसे कि हम विज्ञान से वस्तु तक पहुँचते हैं? सत्य तो यह है कि बर्कले वस्तु की सत्ता स्वीकार करते हैं, परन्तु उनका कहना है कि सत्ता विज्ञान रूप है; क्योंकि विज्ञान ही ज्ञान के विषय है।

सत्ता विज्ञान रूप होने के कारण मन पर आश्रित है। इसी से बर्कले स्पष्ट कहते हैं कि सत्ता अनुभवमूलक है, मनाश्रित है। इसका निषेध करते हुए कुछ लोग यह आक्षेप देते हैं कि हम वस्तुओं को बाहर या अपने से दूर देखते हैं। इससे सिद्ध है कि वे मन में नहीं हैं या मनाश्रित नहीं, अर्थात् बाह्य वस्तु की सत्ता है। बर्कले इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि स्वप्न में वस्तुओं को दूरस्थ देखते हैं; परन्तु उन्हें मन के बाहर नहीं मानते।

बर्कले का कहना है कि दूर होने या बाहर होने इत्यादि का हम केवल दृष्टि प्रत्ययों से अनुमान करते हैं, दृष्टि प्रत्यय ही दूरी के संकेत हैं। जिस प्रकार किसी भाषा के शब्द उन प्रत्ययों का संकेत करते हैं जिनके लिये वे प्रयुक्त होते हैं, उसी प्रकार ये हमारे अनुभव से प्राप्त सम्बन्ध के द्वारा हमें दूरी संकेत करते हैं। यदि कोई जन्मान्ध व्यक्ति बाद में दृष्टि लाभ करता है तो पहली बार वस्तुओं को देखकर मन के बाहर हैं या भीतर यह निश्चय नहीं कर पाता।

‘सत्ता अनुभवमूलक है’ की आलोचना करते हुए कुछ लोग कहते हैं कि यदि अनुभव करने वाला न हो तो सत्ता ही नहीं। बाग के वृक्ष तथा बैठक की कुर्सियों का अस्तित्व तब तक नहीं जब तक उनका द्रष्टा नहीं। जब हम अपनी आँखें मूंद लेते है तो कमरे की सभी चीजें खत्म हो जाती हैं तथा जब आँखें खोल देते हैं तो पुनः सभी चीजें उत्पन्न हो जाती हैं। अतः वस्तु की उत्पत्ति तथा विनाश तो ज्ञाता पर ही आश्रित है| बर्कले का कहना है कि यह आक्षेप निराधार है। वस्तुतः जिसका हमें अनुभव या प्रत्यक्ष नहीं होता उसका अस्तित्व कथमपि स्वीकार्य नहीं। परन्तु अनुभव हम तक ही सीमित नहीं। सत्ता अनुभवमूलक है सत्ता में प्रतीति का विषय बनने का सामर्थ्य है। यदि मैं न भी रहूँ तो भी बाग के वृक्ष तथा बैठक की कुर्सियाँ रहेंगी; क्योंकि-

१. यदि मैं बैठक में होता तो उनका प्रत्यक्ष करता।

२. यदि मैं नहीं तो अन्य कोई उनका प्रत्यक्ष करता।

३. यदि अन्य कोई नहीं तो ईश्वर प्रत्यक्ष करता।

 

 

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