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व्याख्यान कौशल और श्यामपट्ट-लेखन कौशल | Skill of Black-board Writing and Skill or Lecturing in Hindi

इसमें व्याख्यान कौशल, श्यामपट्ट-लेखन कौशल, Skill of Black-board Writing in Hindi, Skill or Lecturing in Hindi, व्याख्यान कौशल के लिए सूक्ष्म पाठ-योजना, श्यामपट्ट कौशल के लिए सूक्ष्म पाठ-योजना, व्याख्यान कौशल के घटक, श्यामपट्ट-लेखन कौशल के घटक आदि का वर्णन करेगें।

व्याख्यान कौशल (Skill or Lecturing)

व्याख्यान विधि शिक्षण की प्राचीनतम विधि है, वैदिक काल से ही गुरु, ऋषि, महात्मा इस विधि से ही शिक्षण किया करते थे। शिष्य चिन्तन, मनन व निदिध्यासन करते हुए अपनी शंकाओं का समाधान करते थे। इस विधि में अध्यापक का स्थान प्रमुख होता है। दूसरे शब्दों में, अध्यापक सक्रिय तथा छात्र निष्क्रिय रहते हैं। इस विधि की शिक्षाशास्त्रियों द्वारा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में काफी आलोचना होती रही है तथापि शिक्षण में इसका प्रयोग प्रमुख रूप से विषय-वस्तु की व्याख्या करने, विषय-वस्तु को संक्षिप्त में प्रस्तुत करने, विषय-वस्तु को स्पष्ट करने, किन्हीं दो विषयों का तुलनात्मक ज्ञान प्रदान करने तथा छात्रों की समस्याओं का समाधान करने के लिए किया जाता है।

थॉमस एम. रिस्क (Thomas M. Risk) ने अपनी पुस्तक ‘Principle and Practices of Teaching in Secondary Schools’ में कहा है कि, “व्याख्यान उन तथ्यों, सिद्धान्तों या अन्य सम्बन्धों का स्पष्टीकरण है, जिनको शिक्षक चाहता है कि उसके सुनने वाले समझें।”

व्याख्यान कौशल के गुण:

1. यह अत्यन्त सरल, सहज तथा कम खर्चीला है। इसमें शिक्षक तथा शिष्य के अतिरिक्त अन्य व्यवस्थाओं की आवश्यकता नहीं होती।

2. इससे बालक में तर्क तथा वाद-विवाद करने की क्षमता का विकास होता है।

3. इसके द्वारा कम समय तथा कम शक्ति में अधिकाधिक लोगों को ज्ञान दिया जा सकता है।

4. यह विषय-वस्तु का व्यापक तथा विस्तृत रूप प्रस्तुत कर उसे अधिक बोधगम्य बनाता है।

5. इसके द्वारा शिक्षण के ज्ञानात्मक उद्देश्य की प्राप्ति सुविधापूर्वक हो जाती है।

 

व्याख्यान कौशल के दोषः

1. यह कौशल एकपक्षीय है इसमें शिक्षक सक्रिय तथा छात्र निष्क्रिय रहते हैं।

2 यह कौशल विषय के व्यावहारिक पक्ष की अपेक्षा सैद्धान्तिक पक्ष पर अधिक बल देता

3.इसमें अधिकाधिक ज्ञानेन्द्रियों के प्रयोग का अभाव रहता है।

4. इसमें छात्रों की व्यक्तिगत भिन्नताओं का ध्यान नहीं रखा जाता।

5. यह छात्रों को स्वयं-चिन्तन व पढ़ने को विवश नहीं करता,छात्र अध्यापक पर पूर्णत: निर्भर रहते हैं।

6. इसका प्रयोग पूर्व प्राथमिक तथा प्राथमिक स्तर के लिए पूर्णतः अनचित है।

7. इसके द्वारा शिक्षण के कौशलात्मक उद्देश्य की प्राप्ति दुष्कर है।

8. इसको शिक्षण की अपेक्षा छात्रों को किसी एक विषय में विभिन्न सूचनाएं देने मात्र का साधन माना जा सकता है।

9. छात्र समझ रहे हैं अथवा नहीं, इसका निर्णय नहीं हो पाता।

 

व्याख्यान कौशल के घटक

उपर्युक्त दोषों के आधार पर हमें यह नहीं समझना चाहिए कि व्याख्यान विधि अनुचित है, अपितु व्याख्यान देते समय यदि निम्नलिखित बिन्दुओं को ध्यान में रखा जाए, तो शिक्षक में व्याख्यान कौशल का विकास होगा तथा यह विधि अवश्य ही उपयोगी सिद्ध होगी, जैसे:

1. व्याख्यान से पूर्व विषय-वस्तु को सनियोजित कर लिया जाना चाहिए।

2 व्याख्यान का प्रारम्भ आकर्षक, रुचिकर तथा प्रेरणास्पद होना चाहिए।

3. व्याख्यान में सरल भाषा तथा कक्षा के स्तरानसार भावों का प्रयोग किया जाना चाहिए।

4. इसके बीच-बीच में विषय स्पष्ट करने के लिए श्यामपट्ट तथा विविध दृश्य-श्रव्य उपकरणों का प्रयोग भी किया जा सकता है।

5. अध्यापक की वाणी व्याख्यान के भावों के अनसार तीव तथा मन्द होनी चाहिए।

6. व्याख्यान के मध्य में छात्रों को सक्रिय रखने के लिए प्रश्न भी पूछे जाने चाहिए तथा छात्रों को भी अपनी शंकाओं के समाधान हेतु प्रश्न करने का अवसर दिया जाना चाहिए।

7. शिक्षण की गति भी सभी स्तरों के छात्रों के बौद्धिक स्तर को देखते हुए संतुलित होनी चाहिए।

8. भाषण को सरस बनाये रखने के लिए बीच-बीच में मनोरंजक उदाहरणों का प्रयोग भी किया जाना चाहिए। पाठ की समाप्ति पर पाठ का साराश अथवा मुख्य बिन्दुओं की एक बार आवत्ति की जानी चाहिए।

10 अगले दिन व्याख्यान प्रारम्भ करने से पूर्व गत व्याख्यान से सम्बन्धित विषय पर प्रश्न पूछे जाने चाहिए।

 

 

व्याख्यान कौशल के लिए सूक्ष्म पाठ-योजना

विषय : सामाजिक ज्ञान                                           

कक्षा : छठी

प्रकरण : हमारा राष्ट्रीय ध्वज                                           

समय : 10 मिनट

 

शिक्षक-(राष्ट्रीय ध्वज का चित्र प्रस्तुत करते हुए)

आप सभी इस ध्वज से परिचित है, यह ध्वज हाथ से तैयार किये गये कपड़े से बनाया जाता है, क्योंकि खादी हमारी राष्ट्रीयता का प्रतीक है। इसकी चौडाई तथा लम्बाई का अनुपात 2:3 होता है।

(राष्ट्रीय ध्वज में सबसे ऊपर की पट्टी की ओर संकेत करते हुए)

शिक्षक– राष्ट्रीय ध्वज में सबसे ऊपर केसरिया रंग है। यह त्याग, वीरता और बलिदान का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि प्राचीनकाल में राजपूत लोग केसरिया वस्त्र पहनकर युद्ध में जाते थे तथा साधु-सन्यासी केसरिया रंग के वस्त्र पहनते हैं।

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(राष्ट्रीय ध्वज में मध्य की पट्टी की ओर संकेत करते हुए)

 

शिक्षक– राष्ट्रीय ध्वज के मध्य में सफेद रंग है, इसे शान्ति व सहयोग का प्रतीक माना जाता है। प्राचीनकाल में राजा-महाराजा शान्ति की सूचना देने के लिए सफेद कबूतरों को ही। सन्देशवाहक के रूप में भेजते थे। यद्ध बन्द करने के लिये सफेद रंग के ध्वज को ही काम में तथा इस पड़ी के मध्य में नीले रंग का चक्र बना है। इसे अशोक चक्र भी कहते हैं क्योंकि सम्राट अशोक की देन है। यह चक्र निरन्तर चलते रहने का प्रतीक है जो इस बात का संदेश देता है कि हमारा राष्ट्र निरन्तर प्रगति के पथ पर आरूढ़ हो।

(राष्ट्रीय ध्वज में नीचे की पट्टी की ओर संकेत करते हुए)

 

शिक्षक– राष्ट्रीय ध्वज की सबसे निचली पट्टी हरे रंग की है जो धन-धान्य की सम्पन्नता का प्रतीक है, क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है तथा हमारे देश का विकास और समद्धि निर्भर करता है। राष्टीय ध्वज का विशेष आरोहण हम 15 अगस्त तथा 26 जनवरी जैसे महत्वपूर्ण दिवसों पर करते हैं। जब राष्ट्र शोकमग्न होता है तब आधा राष्ट्रीय ध्वज झुका दिया जाता है।

उपयुक्त पाठ में सम्पूर्ण व्याख्यान अध्यापक द्वारा दिया गया है तथा इसमें चित्र,श्यामपट्ट आदि का प्रयोग किया गया है।

 

इस विधि का प्रयोग उच्च स्तर के लिए उपयोगी है, किन्तु माध्यमिक स्तर पर इस विधि का प्रयोग अन्य विधियों के साथ बीच-बीच में किया जा सकता है लेकिन स्वतन्त्र रूप में नहीं, क्योंकि माध्यमिक स्तर पर छात्र मानसिक रूप में इतने परिपक्व नहीं होते कि वह व्याख्यान में से महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को स्वयं लिख सके फिर भी व्याख्यान विधि का शिक्षण में सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है।

श्यामपट्ट-लेखन कौशल (Skill of Black-board Writing)

श्यामपट्ट शिक्षण का अभिन्न अंग तथा शिक्षक का घनिष्ठ मित्र है। यह शिक्षण का सबसे सरल व सस्ता दृश्य साधन है। हम किसी ऐसे कक्षा-कक्ष की कल्पना भी नहीं कर सकते जहां पर श्यामपट्ट न हो। प्रोफेसर स्ट्रक का मत है कि “इसे अध्यापक और छात्रों द्वारा प्रयुक्त विद्या समझना चाहिए, क्योंकि अध्यापक इसकी सहायता से निर्देशन देता है और बालक आत्माभिव्यक्ति या व्याख्या करता है। श्यामपट्ट का उपयोग प्रत्येक अध्यापक करता है, परन्तु उसका उपयोग प्रभावशाली ढंग से हो तथा यह बालकों को शिक्षण देने में लाभकारी सिद्ध हो, इसके लिए कुछ महत्त्वपूर्ण बातों पर प्रत्येक शिक्षक को ध्यान देना चाहिए। सर्वप्रथम हम श्यामपट्ट की उपयोगिता के विषय में चर्चा करेंगे।

 

श्यामपट्ट की उपयोगिता (Utility of Black-board) :

1. श्यामपट्ट विषय को प्रारम्भिक सूचनाएँ देने में सहायक होता है।

2. यह विषय की व्याख्या तथा विश्लेषण करने में योगदान देता है।

3. मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से ज्ञानार्जन करते समय जितनी अधिक ज्ञानेन्द्रियों का प्रयोग होता है, ज्ञान उतना ही स्थाई तथा सुदृढ़ होता है। श्यामपट्ट के प्रयोग से शिक्षक बालक की श्रवण तथा दष्टि दोनों ही ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से विषय को समद्याता है तथा शिक्षा को अधिक मनोवैज्ञानिक बनाता है।

4. शिक्षण के मध्य में विषय के स्पष्टीकरण हेतु चित्र, मानचित्र तथा रेखाचित्र बनाने में सहायक है।

5. श्यामपट्ट सारांश लिखने में सहायक :

(अ) पाठ का सारांश लिखने से पाठ का सम्पूर्ण चित्र छात्र के मस्तिष्क में उभर आता है, जो कि विषय-वस्तु की संरचना समझने में सहायता करता है,

(ब) पाठ का सार लिखने की प्रक्रिया से अर्जित ज्ञान का स्थायित्व होता है,

(स) श्यामपट्ट सार छात्रों की उत्तर-पुस्तिकाओं में लिखा हआ पाठयक्रम का ऐसा अभिलेख होता है जिसका उपयोग छात्र मासिक, अर्द्धवार्षिक तथा वार्षिक परीक्षाओं तथा पाठ्य-सहगामी क्रियाओं आदि में सुविधानुसार कर सकते हैं,

(द) छात्रों में लेखन योग्यता विकसित होती है।

 

6. यह छात्रों का ध्यान केन्द्रित करने में भी सहायक है।

7. इससे सम्पूर्ण समुदाय को निर्देशन देना सम्भव है।

8. इससे अध्यापक के श्रम एवं समय की बचत होती है।

9. श्यामपट्ट पर स्मरणीय तथ्यों, संख्याओं, नामों, शब्दों तथा वाक्यों आदि को लिखा जा सकता है, उन पर आवश्यकतानुसार विचार एवं वाद-विवाद किया जा सकता है ।

10. अध्यापन प्रक्रिया में अनेक बार तुलनात्मक चित्र बनाने की आवश्यकता होती है इसके लिए श्यामपट्ट एक सस्ता माध्यम है।

11. चित्रकला, विज्ञान, गृहविज्ञान आदि विषयों में चित्रों के निर्माण में शिक्षक छात्रों की श्यामपट्ट पर सहायता कर सकता है तथा अभ्यास करवा सकता है।

12. कक्षाध्यापन के अतिरिक्त छात्रों को विद्यालय व्यवस्था सम्बन्धी आवश्यक सूचनायें देने, दिवस का विशेष सुविचार प्रस्तुत करने तथा मुख्य समाचारों को लिखने में भी श्यामपट्ट का उपयोग किया जा सकता है।

13. यह शिक्षण में प्रयुक्त की जाने वाली दृश्य-श्रव्य सामग्रियों में से सबसे सस्ता साधन होने के कारण प्रत्येक विद्यालय में आसानी से उपलब्ध हो जाता है।

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श्यामपट्ट का प्रयोग (Use of Black-Board)

अथवा

श्यामपट्ट-लेखन कौशल के घटक

 

यह सर्वविदित है कि श्यामपट्ट शिक्षण का एक महत्वपूर्ण साधन है, किन्तु अब विचारणीय बिन्दु यह है कि हम श्यामपट्ट का प्रयोग कैसे करें ? अथवा इसके प्रयोग में किन बिन्दुओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए ? नीचे कतिपय महत्त्वपूर्ण बिन्दु प्रस्तुत किये जा रहे हैं।

1. श्यामपट्ट लेख सुन्दर, आकर्षक तथा स्पष्ट होना चाहिए :

(अ) अक्षरों का आकार समान तथा बनावट सुन्दर हो,

(ब) अक्षरों का आकार सडौल हो अर्थात कक्षा के अनुरूप न बहुत बडा और न ही छोटा हो,

(स) प्रत्येक अक्षर और शब्द के मध्य की दूरी बराबर हो; एवं

(द) लेख की पंक्तियाँ सीधी हों।

 

2. विशिष्ट बिन्दुओं को दर्शाने के लिए रंगीन चॉक का प्रयोग किया जाना चाहिए।

3. चित्र, रेखाचित्र, मानचित्र अभ्यास के बाद स्पष्ट रूप से बनाएँ जाएँ।

4 (अ) श्यामपट्ट सार मख्य-मख्य बिन्दुओं के रूप में दिया जाना चाहिए,

(ब) श्यामपट्ट सार सम्पूर्ण पाठ पर आधारित होना चाहिए, ताकि उसे पढ़कर सम्पूर्ण पाठ का चित्र मस्तिष्क में उभर सकें,

(स) छात्रों के सक्रिय सहयोग के साथ श्यामपट्ट का विकास किया जाना चाहिए,

(द) पाठ के विकास के साथ-साथ श्यामपट्ट पर मुख्य बिन्दु लिखे जाने चाहिएँ।

5. श्यामपट्ट पर सामनी क्रमबद्ध होनी चाहिए।

6. श्यामपट्ट का तल साफ व समतल होना चाहिए तथा चॉक अच्छी होनी चाहिए।

7. अध्यापक को श्यामपट्ट के एक ओर खड़ा होकर लिखना चाहिए, ताकि छात्र श्यामपट्ट को पूर्णतः देख सकें।

8. जब श्यामपट्ट पर लिखी हुई सामग्री शिक्षण के काम में न आ रही हो, तो उसे साफ कर देना चाहिए।

9. कठिन और अस्पष्ट स्पष्टीकरण कक्षा से पहले की श्यामपट्ट पर बना लेने चाहिएं, इसके लिए लपेट श्यामपट्ट (Roller Black-board) का प्रयोग किया जा सकता है जिससे कक्षा में अनावश्यक समय नष्ट न हो।

10. श्यामपट्ट पर लिखने की गति बहुत मन्द नहीं होनी चाहिए।

11. श्यामपट्ट पर जो कुछ लिखा जाये, वह शुद्ध होना चाहिए।

12. श्यामपट्ट पर अनावश्यक बिन्दु न लिखे जाएं।

13. श्यामपट्ट पर जो कुछ लिखा जाये, उसे पहले मौखिक रूप से कह देना चाहिए।

14. शिक्षक को कक्षा छोड़ने से पूर्व श्यामपट्ट को साफ कर देना चाहिए।

15. शिक्षक को कक्षा में चॉक से खेल नहीं करना चाहिए और न ही छात्रों को टोकने अथवा रोकने के लिए इसका दुरुपयोग करना चाहिए।

16. शिक्षक को श्यामपट्ट पर लिखते समय बीच-बीच में छात्रों पर दृष्टि भी डालनी चाहिए ।

17. श्यामपट्ट पर लिखते समय चॉक तथा श्यामपट्ट की आवाज नहीं होनी चाहिए।

18. छात्रों को भी श्यामपट्ट के प्रयोग का अवसर देना चाहिए।

19, कक्षा में श्यामपट्ट उचित स्थान पर लगाया जाये ताकि सभी छात्र आसानी से उसे देख सकें।

 

उपर्युक्त बिन्दुओं के साथ-साथ श्यामपट्ट का प्रयोग कितना, कब और कैसे किया जाये, यह शिक्षण विषय पर निर्भर करता है, क्योंकि हर विषय की अपनी प्रकृति है, उसी के अनुरूप श्यामपट्ट का प्रयोग किया जाता है। जैसे सामाजिक विज्ञान के विषयों में पाठ के विकास के साथ-साथ श्यामपट्ट का प्रयोग किया जाना चाहिए।

भाषा शिक्षण में इसका प्रयोग कठिन शब्दों की व्याख्या तथा व्याकरण शिक्षण करते समय किया जाता है। गणित शिक्षण में इसका प्रयोग प्रायः सवाल हल करते समय करना अनिवार्य हो जाता है। विज्ञान तथा गृह-विज्ञान आदि में प्रयोग तथा ड्राफ्टिग आदि बताते समय क्रमशः इनका प्रयोग साथ-साथ चलता है।

निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि विषय कोई भी क्यों न हो; शिक्षण में श्यामपट्ट का प्रयोग कम अथवा अधिक अवश्य किया जाता है।

 

 

 

श्यामपट्ट कौशल के लिए सूक्ष्म पाठ-योजना

विषयः हिन्दी                                                                                          

कक्षाः सातवीं

प्रकरण- द्वन्द्व समास                                                                              

समयः 10 मिनट

 

 

श्यामपट्ट लेखन कोशल एक ऐसा कोशल है जो शिक्षक की गरिमा में चार चांद लगाता है। यह शिक्षक को योग्यता का प्रतिबिम्ब होता है। शिक्षक अपने शिक्षण में यदि सुव्यवस्थित तमा सुन्दर लेख के साथ श्यामपट्ट का प्रयोग करता है तो शिक्षण अधिक आकर्षक तथा सुग्राह्य बन जाता है।

 

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