निरीक्षित-अध्ययन नीति तथा व्याख्यान एवं प्रयोग प्रदर्शन नीति

निरीक्षित-अध्ययन नीति तथा व्याख्यान एवं प्रयोग प्रदर्शन नीति, विशेषताएँ, दोष, सुझाव

निरीक्षित-अध्ययन नीति(SUPERVISED STUDY STRATEGY)

निरीक्षित-अध्ययन नीति स्वयं में पूर्ण विधि नहीं है। इसलिए इसका प्रयोग अधिकतर अन्य विधियों के साथ किया जाता है। किसी भी समस्या के समाधान के लिए छात्रों को सम्बन्धित साहित्य कक्षा में ही छपे रूप में अथवा साइक्लोस्टाइल्ड रूप में दिया जाता है। छात्रों को यह साहित्य बाँटने से पूर्व साहित्य को पढ़ने के लिए और ध्यान देने के लिए प्रमुख बिन्दुओं की ओर आकर्षित करने के हेतु उचित निर्देश प्रदान किये जाते हैं। फिर साहित्य पठन के लिए निश्चित समय बताया जाता है। छात्र स्वयं पढ़कर अपनी समस्याओं एवं प्रश्नों के उत्तरों तक पहुँचते हैं। पढ़ने के पश्चात् छात्रों से यह साहित्य बन्द रखने के लिए कहा जाता है और फिर शिक्षक प्रश्नों एवं समस्याओं के प्रस्तुतीकरण के माध्यम से पाठ को विकसित करता है।

 

 

निरीक्षित-अध्ययन नीति की विशेषताएँ

(1) छात्र में पढ़ने की प्रवृत्ति बढ़ती है।

(2) किसी चीज को कैसे पढ़ा जाये-विधियों की जानकारी होती है।

(3) छात्रों का ध्यान साहित्य पर केन्द्रित रहता है। उनमें पढ़ने के लिए रुचि बनी रहती है।

(4) छात्र स्वयं समस्याओं का अध्ययन कर समाधान तक पहुँचते हैं, फलस्वरूप उनमें मानसिक सन्तोष रहता है।

(5) शिक्षक के लिए भी पाठन में सरलता रहती है। उसे प्रत्येक वस्तु छात्रों को बतानी नहीं। पड़ती।

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निरीक्षित-अध्ययन नीति के दोष (Demerits)

(1) जहाँ इस प्रकार की साहित्य की प्रतियाँ (कक्षा के छात्रों के अनुसार) निकालने का प्रावधान न हो, वहाँ इसका प्रयोग नहीं हो सकता।

(2) शिक्षक को सम्बन्धित साहित्य की खोज तथा उनका पुनर्लेखन करना पड़ता है।

 

 

निरीक्षित-अध्ययन नीति के सुझाव

(1) वितरित साहित्य स्पष्ट तथा सरल रूप में होना चाहिये।

(2) सम्बन्धित साहित्य की सभी प्रतियाँ कक्षा में लाने से पूर्व अवश्य चैक कर लेना चाहिये तथा आवश्यक संशोधन कर लेना चाहिये।

(3) सम्बन्धित साहित्य की विषय-वस्तु इस प्रकार की होनी चाहिये जो कक्षा के छात्रों के स्तर के अनुकूल हो।

 

इस विधि में छात्रों के समक्ष एक समस्या प्रस्तुत की जाती है और छात्र उसका हल निकालने में लगे रहते हैं। इसमें छात्र अपनी रुचि व इच्छा के अनुसार कार्य करता है।

 

व्याख्यान एवं प्रयोग प्रदर्शन नीति (LECTURE CUM DEMONSTRATION STRATEGY)

व्याख्यान एवं प्रदर्शन नीतियों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है, अतः ये दोनों पृथक् नीतियाँ मिलकर सम्मिलित रूप से व्याख्यान तथा प्रयोग-प्रदर्शन विधि को जन्म देती हैं। इस विधि में व्याख्यान नीति के दोषों को दूर करके प्रदर्शन नीति के गुणों को और भी अधिक प्रभावशाली बना देती हैं। यह सम्मिलित नीति समय और शक्ति दोनों ही ढंग से मितव्ययी है। इस नीति में शिक्षक व्याख्यान की सहायता से सैद्धान्तिक पक्ष को स्पष्ट करता है और श्यामपट एवं अन्य सहायक सामग्री की मदद से चित्र एवं कथन प्रस्तुत करता है। फिर सैद्धान्तिक पक्ष को अधिक स्पष्ट करने के लिए कक्षा में छात्रों की सहायता से प्रयोग प्रदर्शन करता है। प्रदर्शन के मध्य वह छात्रों से प्रश्न पूछता रहता है।

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इसका प्रयोग छात्रों की आयु, क्षमता एवं वातावरण के अनुसार करना चाहिये।

 

 

व्याख्यान एवं प्रयोग प्रदर्शन नीति की विशेषताएँ

(1) व्याख्यान नीति के सभी दोष दूर हो जाते हैं।

(2) प्रदर्शन नीति के सभी गुणों का समावेश होता है।

(3) छात्रों को अधिक स्पष्ट ज्ञान की प्राप्ति होती है।

 

व्याख्यान एवं प्रयोग प्रदर्शन नीति के दोष (Demerits)

(1) छात्रों को स्वयं उपकरणों को स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग करने के अवसर नहीं मिलते।

(2) छात्र इस नीति में प्रयोग न करके निरीक्षण करते हैं। प्रत्येक बालक के लिए निरीक्षण करके आँकड़ों का संग्रह व अंकन सम्भव नहीं हो पाता।

(3) यह नीति आर्थिक दृष्टि से लाभकारी नहीं है।

 

 

व्याख्यान एवं प्रयोग प्रदर्शन नीति की सुझाव

(1) शिक्षक को प्रदर्शन से पूर्व प्रयोग सम्बन्धी सैद्धान्तिक तथा प्रयोगात्मक ज्ञान स्पष्ट होना चाहिये।

(2) शिक्षक को आवश्यकतानुसार दृश्य-श्रव्य सामग्री का प्रयोग करना चाहिये।

(3) प्रयोग-प्रदर्शन सरल और छात्रों के अनुभव तथा स्तर पर आधारित होने चाहिये।

(4) प्रदर्शन से पूर्व शिक्षक को प्रयोग का पूर्व अभ्यास कर लेना चाहिये और उत्पन्न होने वाली सभी शंकाओं में समाधान पर भली-भाँति विचार कर लेना चाहिये।

(5) छात्रों का प्रयोग-प्रदर्शन में अधिकाधिक सहयोग लेना चाहिये। उन्हें प्रयोग सम्बन्धी छोटे-छोटे उत्तरदायित्व भी प्रदान किये जाने चाहिये।

(6) प्रयोग-प्रदर्शन विधि में दिये गये अन्य सुझावों पर भी ध्यान देना चाहिये।

 

 

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