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प्रायोजना कार्य विधि | अर्थ एवं परिभाषा | प्रायोजना कार्य के सोपान | Project Work Method in Hindi

प्रायोजना कार्य विधि(Project Work Method)

प्रायोजना कार्य करने के लिए छात्रों के समक्ष कुछ समस्याएँ प्रस्तुत की जाती हैं और उनको इस बात की स्वतन्त्रता प्रदान की जाती है कि वे समस्या का समाधान करने के लिए आँकडे तथा अन्य सम्बन्धित सामग्री एकत्रित करें। इसमें जो समस्याएँ छात्रों को दी जाती हैं, वे यथासम्भव जीवन की यथार्थता से सम्बन्धित होती हैं।

प्रायोजन विधि का स्वरूप रूसो ने अपनी पुस्तक ‘एमील’ में, फ्रॉबेल ने अपनी पुस्तक ‘एजूकेशन ऑफ मैन’ में शिक्षा के लिए क्रियाओं को बल देकर किया है। इसी प्रकार विलियम कॉबेट ने ‘एडवाइस टू यंग मैन’ नामक पुस्तक में अपने स्वयं के बच्चों के लिए ग्रामीण योजनाओं (Rural Projects) का वर्णन किया है। प्रायोजना विधि का प्रयोग सबसे पहले व्यावसायिक क्षेत्र में किया गया। सामान्य शिक्षा के क्षेत्र में इस विचारधारा का श्रेय अमरीका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय के शिक्षाशास्त्र के प्रोफेसर जॉन डीवी को है, किन्तु पद्धति के रूप में सन् 1918 में प्रो. डीवी के प्रयोजनवाद के सिद्धान्त पर इसके निर्माण तथा विकास का श्रेय विलियम किल्पैट्रिक (William Kilpatrick) को जाता है।

प्रायोजना कार्य का अर्थ एवं परिभाषा

(Meaning and Definition of Project Work)

प्रायोजना कार्य में छात्र-छात्राओं को स्वयं कार्य करने के लिए दिया जाता है जो उनके लिए उपयोगी एवं लाभकारी होता है। इसमें छात्रों में उत्तरदायित्व की भावना का विकास करने के लिए उन्हें एक योजना के अनुरूप कार्य करने की स्वतन्त्रता दी जाती है। एवं इसमें सामाजिक भावना के विकास पर बल दिया जाता है। इस विधि में उद्देश्य निर्धारित कर उसकी प्राप्ति हेतु एक योजना तैयार की जाती है एवं छात्र उसे अपनी रुचि के अनुसार पूरा करते हैं तत्पश्चात् छात्रों द्वारा किये गये कार्य का सामाजिक उपयोगिता की दृष्टि से मूल्यांकन किया जाता है। आज प्रायोजना कार्यविधि न केवल शैक्षिक क्षेत्र में अपितु सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, व्यावसायिक, तकनीकी आदि सभी क्षेत्रों में प्रयुक्त की जा रही है।

1. बेलार्ड(Rallard)- “प्रायोजना यथार्थ जीवन का ही एक भाग है जो पाठशाला में प्रदान किया जाता है।”

2. किलपैट्रिक (Kilpatric)-“प्रायोजना एक सोद्देश्य क्रिया है जिसे मन लगाकर सामाजिक वातावरण में किया जाये।”

3. पार्कर(Darker)- “प्रायोजना, कार्य की एक इकाई है जिसमें छात्रों को कार्य की योजना और सम्पन्नता के लिए उत्तरदायी बनाया जाता है।”

 

प्रायोजना कार्य के सिद्धान्त (Principles of Project Work)

प्रायोजना कार्य में क्रियाशीलता,उपयोगिता,रोचकता,उद्देश्यों का निर्धारण,वास्तविकता, समन्वयता, सामाजिकता, मितव्ययिता तथा अनुभव आधारित प्रयोग आदि सिद्धान्तों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

 

प्रायोजना कार्य के प्रकार (Types of Project Work)

प्रायोजना कार्य को विशेषतः दो भागों में बाँटा जा सकता है- व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रायोजना कार्य। किल्पैट्रिक ने इसके चार प्रकार बताये हैं- कलात्मक, समस्यात्मक, रचनात्मक एवं अभ्यास आधारित प्रायोजना कार्य।

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प्रायोजना कार्य के सोपान (Steps of Project Work)

1. परिस्थिति का निर्माण- इसमें छात्रों पर कोई कार्य थोपा नहीं जाता बल्कि शिक्षक छात्रों से परस्पर वार्तालाप कर ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है कि छात्रों की किसी कार्य विशेष में स्वतः रुचि उत्पन्न हो जाती है एवं उस कार्य के समाधान हेतु वे तैयार हो जाते है।

2. प्रायोजना का चयन एवं उद्देश्य निर्धारण- छात्रों ने जिन विभिन्न परिस्थितियों का अध्ययन किया है, उनमें से शिक्षक की सहायता से एक सर्वोत्तम तथा सबके द्वारा मान्य प्रायोजना का चयन किया जाता है तथा उसके उद्देश्यों को निर्धारित कर लिया जाता है।

3. प्रायोजना का कार्यक्रम बनाना- प्रायोजना विषय सुनिश्चित होने के बाद छात्र उसे पूरा करने के लिए अपने-अपने कार्यक्रम शिक्षक को प्रस्तुत करते हैं। तत्पश्चात् विचार-विमर्श होता है और अन्त में सर्वमान्य कार्यक्रम स्वीकृत किया जाता है।

4. प्रायोजना को व्यावहारिक रूप देना- कार्यक्रम को क्रियान्विति देने हेतु कार्य का विभाजन छात्रों की रुचि एवं योग्यता के अनसार कर सौंपा जाता है। इसमें छात्रों को स्वयं कार्य करना होता है इसलिए उसमें जहाँ अवरोध आएँ शिक्षक को उन्हें उपयुक्त सुझाव देने चाहिएँ तथा छात्रों की गतिविधियों का अवलोकन करते रहना चाहिए।

5. प्रायोजना का मल्यांकन- प्रायोजना के इस सोपान में छात्र पूर्वनिर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति हुई अथवा नहीं, कार्य में क्या-क्या कमियाँ रहीं? कितनी सफलता मिली ? इन सब बातों का मूल्यांकन करता है।

8. प्रायोजना का विवरण- प्रत्येक छात्र को प्रायोजना पुस्तिका में किये गये समस्त सोपानों सूक्ष्म विवरण रखना चाहिए जिससे उसे वर्तमान प्रायोजना के मूल्यांकन में तथा भावष्य में किये जाने वाले प्रायोजना कार्य में सहायता मिले।

प्रायोजना कार्य के गुण (Merits of Project Work)

1. छात्रों में स्वयं कार्य करने की प्रवृत्ति का विकास

2. छात्र में उत्तरदायित्व की भावना का विकास करना

3. विषय-वस्तु के विभिन्न पहलुओं का समावेश,

4. विभिन्न विषयों में सहसम्बन्ध स्थापित करने की योग्यता का विकास

5. लोकतान्त्रिक व सामाजिक भावना का विकास,

6. सभी छात्रों को अभिव्यक्ति का अवसर

7. छात्रों को योग्यतानुसार कार्य,

8. शिक्षक का उपयुक्त मार्ग-दर्शन,

9. यह पद्धति रोचक है,

10. व्यावहारिक ज्ञान प्रदान किया जाता है,

11. यह बाल केन्द्रित है; एवं

12. इसके द्वारा छात्रों में आत्म-विश्वास, आत्मनिर्भरता और आत्मबलिदान जैसे गुणों  का विकास किया जाता है।

 

प्रायोजना कार्य के दोष (Demerits of Project Work)

1. पाठ्यपुस्तकों का अभाव,

2. समय विभाग चक्र की अवहेलना,

3. उत्साही शिक्षकों का अभाव,

4. साधनों का अभाव,

5. विषय-वस्तु की तारतम्यता का अभाव,

6. अधिक समय, शक्ति तथा धन की आवश्यकता,

7. अर्जित ज्ञान की पुनरावृत्ति के लिए कोई स्थान नहीं: एवं

8. सभी विषयों के शिक्षण के लिए उपयोगी नहीं।

 

 

प्रायोजना कार्य पर आधारित आदर्श पाठ-योजना

प्रकरण : बातिक पेन्टिंग बनाना

विद्यालय : सैन्ट एसलम्स पिंकसिटी विद्यालय, जयपुर

कक्षा : नवीं

1. उद्देश्य :

(क) छात्रों में कपड़े पर चित्रकारी करने की योग्यता उत्पन्न हो सकेगी।

(ख) बातिक पेंन्टिग की प्रक्रिया को अपने शब्दों में प्रत्यास्मरण कर सकेंगे।

(ग) छात्र इसमें प्रयुक्त की जाने वाली सामग्री से परिचित हो सकेंगे।

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(घ) छात्र इसे अपने जीविकोपार्जन का साधन बना सकेंगे।

(ङ) इससे छात्र भारतीय कला व संस्कृति के विकास में योगदान दे सकेंगे।

 

2. आवश्यक सामग्री:

(क) उपकरण- स्टोव, मोम गर्म करने हेतु बर्तन, माचिस, बुश, दो-तीन टब, सफेद कपड़ा, लकड़ी का फ्रेम, रबड़ के दस्ताने आदि ।

(ख) आवश्यक रसायन- मोम, बी वैक्स, पैराफीन वैक्स, रैसिन, बातिक रंग,मोनोपाल सोप, कास्टिक सोड़ा, ग्लिसरीन आदि।

3. परिस्थिति का निर्माण :

शिक्षक कक्षा में विभिन्न प्रश्न कर परिस्थितियों का निर्माण करेगाः

(क) घर को सुव्यवस्थित रखना क्यों आवश्यक है ?

(ख) घर को सुव्यवस्थित व आकर्षक बनाने हेतु किन-किन सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है ?

(ग) किस-किस तरह की चित्रकला से आप परिचित हैं ?

(घ) कपड़े पर की जाने वाली पेन्टिग्स के नाम बताइये।

(ङ) बाजार से पेंटिंग खरीदने अथवा स्वयं बनाने में मूल्यों की दृष्टि से आप क्या अन्तर पाते हैं?

(इस तरह शिक्षक छात्रों में स्वयं कार्य करने की भावना विकसित करेगा और वे स्वयं पेंटिंग बनाने के लिये तत्पर होंगे)

 

4. प्रायोजना चयन:

शिक्षक- घर की सजावट हेतु प्रयुक्त की जाने वाली सामग्रियों में से आप किस वस्तु को। बनाना सीखेंगे? छात्र-कुछ छात्र कपड़े पर पेंटिग बनाना,दूसरे छात्र फैबिक पेंटिंग बनाना तथा अन्य बातिक पेंटिंग बनाना सीखना चाहेंगे।

शिक्षक- अच्छा, आज हम बातिक पेंटिंग बनाने की विधि स्वयं करके सीखेंगे।

 

5. कार्यक्रम बनाना, कार्य का निर्णय करना एवं क्रियान्वित करना :

छात्रों की रुचि एवं योग्यता के अनुसार उन्हें छोटे-छोटे समूहों में बाँटकर कार्य सौंपा जायेगा। एक समूह डिजाइन का चयन करेगा, दूसरा समूह उस डिजाइन को कपड़े पर बनायेगा, तीसरा रंगों का संयोजन करेगा। पहला समूह जब तक मोम (दोनों तरह के) को गर्म करने की प्रक्रिया प्रारम्भ करेगा, मोम अच्छी तरह गर्म होने के बाद जिस जगह को, बातिक पेंटिंग में सफेद रखना है, उस जगह बश से मोम लगाया जायेगा। यह क्रम हल्के रंग से गहरे रंग की ओर चलता है, दूसरे शब्दों में, जो स्थान छात्रों ने मोम लगाकर सफेद छोड़ दिया था, उसमें से जो शेष स्थान रंगीन करना है उसके लिए कपड़े को रंग के तैयार टब में डुबो दिया जाता है। यह प्रक्रिया गहरे रंग तक चलती रहती है। अन्त में पानी को खब गर्म करके समस्त लगे मोम को हटा दिया जाता है तथा तैयार चित्र को सूखाने के बाद प्रेस किया जाता है।

(इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को छात्र अपनी पुस्तिका में नोट कर आपस में विचार-विमर्श करते हैं और शिक्षक द्वारा प्रश्नों के माध्यम से पाठ का विकास किया जाता है।)

 

6. कार्य का लेखा:

प्रत्येक छात्र समूह को कार्य को समस्त गतिविधियों को लिखने के लिए कहा जाता है। अन्त में समस्त समूह के सदस्य मिलकर एक प्रतिवेदन तैयार कर कक्षा में प्रस्तुत करते हैं जिस पर विचार-विमर्श होता है।

 

7. प्रायोजना का उपयोग :

विभिन्न विषयों के कालांशों में इस प्रायोजना कार्य की उपयोगिता पर चर्चा की जाती है जैसे भाषा कालांशों में इस पर निबन्ध लेखन, गृहविज्ञान में घर की सज्जा.समाजोपयोगी ‘उत्पादक कार्य के कालांश में इसे जीविकोपार्जन का साधन बनाने की दष्टि से चल जाती है।

 

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