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शिक्षण सूत्र का अर्थ और शिक्षण सूत्र के प्रकार- Maxims of Teaching

इस पोस्ट में हम लोग शिक्षण सूत्र का अर्थ क्या होता है, शिक्षण सूत्र के प्रकार आदि विषयों पर चर्चा करेंगे।

शिक्षण-सूत्र का अर्थ(Meaning of Maxims of Teaching)

एक योग्य शिक्षक के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि वह अपने ज्ञान को कुशलतापूर्वक छात्रों तक पहुँचा सके। इसके लिए शिक्षक को दो बातों का ज्ञान होना आवश्यक है:

1. विषय का पूर्ण ज्ञान, एवं

2. छात्रों तक विषय को पहुँचाने की शैली का मनोवैज्ञानिक ज्ञान।

विषय को सुविधापूर्वक छात्रों तक पहुँचाने के लिए हरबर्ट स्पेन्सर तथा कॉमेनियस जैसे महान शिक्षाशास्त्रियों ने अपने-अपने अनुभवों तथा निर्णयों को सूत्र रूप में प्रकट किया है। ये उस मार्ग की सुगम उक्तियाँ हैं, जिनसे शिक्षण और सीखना आगे बढ़ते हैं। इनका अनुकरण करके शिक्षक अपने शिक्षण में सफल होता है और छात्र भी सरलता से ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। ये शिक्षण सूत्र इस प्रकार हैं :

 

शिक्षण सूत्र के प्रकार

1. ज्ञात से अज्ञात की ओर (From Known to Unknown):

इस सूत्र के अनुसार शिक्षक छात्र के पूर्वज्ञान को आधार बनाकर नवीन ज्ञान देता है। इसके माध्यम से छात्र को नवीन विषय सीखने में सुविधा होती है, जैसे, सन्तुलित आहार इस विषय को पढ़ा पूर्व छात्रों द्वारा प्रतिदिन भोजन में खाई जाने वाली वस्तुओं के बारे में जानकारी प्राप्त करके उसके आधार पर विभिन्न खाद्य पदार्थों का किस प्रकार समन्वय किया जाए कि वह सन्तुलित आहार बन जाये यह स्पष्ट करना सरल व सुग्राह्य होगा।

2. सरल से जटिल की ओर (From Simple to Complex):

पहले छात्र को सरल विषय बताये जाएं। उसके बाद कठिन विषयों की ओर बढ़ा जाये, जैसे, हिन्दी में ‘सन्धि’ को पढ़ाते समय स्वर सन्धि को पहले लिया जाये और स्वर सन्धि के भेदों में भी दीर्घ सन्धि को इसके बाद क्रमशः कठिनाई के क्रम को देखते हुए विषय को आगे पढ़ाया जाना चाहिए ताकि छात्रों की शिक्षण में रुचि बनी रहे।

3. स्थूल से सूक्ष्म की ओर (From Concrete to Abstract) :

छात्रों में चिन्तन की क्षमता शनैः शनैः अनुभवों के साथ बढ़ती है, पहले छात्र ऐसी वस्तुओं के विषय में ज्ञान प्राप्त कर सकता है, जिसे वह छू सकता है, देख सकता है। यह उसके मूर्त चिन्तन पर आधारित होता है। इसके बाद क्रमशः अमूर्त चिन्तन, कल्पना आदि के आधार पर सूक्ष्म भावों की क्षमता छात्र में उत्पन्न होने लगती है, जैसे ‘गाय’ पर निबन्ध लिखने के लिए छात्रों के समक्ष गाय का चित्र प्रस्तुत करके उसकी बाह्य आकृति के बारे में लिखने को कहना। इसी क्रम में स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ते हुए गाय की उपयोगिता के विषय में लिखने को प्रेरित किया जाये।

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4. प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की आर (From Direct to Indirect):

जिन वस्तुओं, घटनाओं, ऐतिहासिक स्थलों को छात्र प्रत्यक्ष रूप से देख लेता है, उनके विषय में जानकारी प्राप्त करना उसके लिए सरल हो जाता है, अतः उसे प्रत्यक्ष वस्तुओं के द्वारा अप्रत्यक्ष वस्तुओं का ज्ञान कराया जाना चाहिए, जैसे इतिहास शिक्षण में राजस्थान के ऐतिहासिक स्थलों का पाठ पढ़ाने से पूर्व शेक्षिक भ्रमण द्वारा कतिपय स्थलों को सविधानसार दिखाया जा सकता है।

5. पूर्ण से अंश की ओर (From Whole to Part) :

पूर्णाकारवादी मनोवैज्ञानिक इस सिद्धान्त को मानते हैं कि यदि किसी विषय का पूर्ण रूप छात्र के समक्ष पहले प्रस्तुत कर दिया जाये, तो उसे उस विषय को समझने में सुविधा होती है, जैसे, हिन्दी में कथा शिक्षण करते समय पहले सम्पूर्ण कहानी को छात्रों के समक्ष संक्षेप में प्रस्तुत कर उसको अंशों में आगे बढ़ाने से छात्रों का ध्यान पाठ की ओर अधिक केन्द्रित होगा।

6. विशिष्ट से सामान्य की ओर (From Particular to General) :

इस शिक्षण सूत्र में आगमन विधि का प्रयोग किया जाता है, अर्थात् विशिष्ट उदाहरणों के प्रस्तुतिकरण के बाद छात्रों से ही सामान्यीकरण क द्वारा नियम निकलवाया जाता है। इसका प्रयोग भाषा-शिक्षण में व्याकरण पढ़ाते समय, विज्ञान तथा गणित शिक्षण करते समय किया जा सकता है, जैसे, द्विगु समास पढ़ाने के लिए पहले इससे सम्बन्धित सामासिक पदों को छात्रों के समक्ष उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करके उनका विग्रह करवाया जाता है, फिर उसके बाद छात्रों के समक्ष नियम प्रस्तुत किया जाता है।

7. विश्लेषण से संश्लेषण का ओर (From Analysis to Synthesis) :

किसी भी विषय को सुग्राह्य बनाने की दृष्टि से उसके विविध पक्षों का विश्लेषण अत्यन्त आवश्यक होता है, जैसे, भूगोल शिक्षण करते समय छात्रों के समक्ष पहले भारत का मानचित्र प्रस्तुत करना, अलग-अलग प्रान्तों की संस्कृति, भौगोलिक स्थिति, जलवायु आदि से परिचित करवाना, पुनः विविध प्रान्तों की विविधता में जो एकरूपता है उसे बताते हए सम्पूर्ण भारत की ओर पुनः लौटना।

8. मनोवैज्ञानिक क्रम से तार्किक क्रम की ओर (From Pychological to Logical) :

बालक की रुचि, जिज्ञासा, मानसिक स्तर के अनुसार विषय का प्रस्तुतिकरण किया जान चाहिए जैसे, छोटी कक्षा में शिक्षण को प्रभावी बनाने के लिए दृश्य-श्रव्य उपकरणों का अधिकाधिक प्रयोग किया जाये, तब यह तो मनोवैज्ञानिक क्रम हआ इसके बाद तर्कों द्वारा विषय की समीक्षा की जाये। इसी प्रकार हिन्दी शिक्षण करते समय छात्र के समक्ष पहले वाक्य प्रस्तुत कर उसकी संरचना, कारकों, ध्वनियों तथा वर्णों का ज्ञान करवाया जाना चाहिए।

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9. अनिश्चय से निश्चय की ओर (From Indefinite to Definite):

प्रारम्भ में बालक का ज्ञान अनिश्चित और अस्पष्ट होता है। शिक्षक को अनिश्चित तथ्यों के आधार पर छात्रों को निश्चित तथ्यों की ओर ले जाना चाहिए, जैसे, विज्ञान के नियमों, सिद्धान्तों तथा घटनाओं के विषय में जानकारी प्राप्त करने में छात्र की स्थिति पहले अनिश्चयात्मक होती है। शिक्षक अपने सहयोग से उसे निश्चयात्मकता की ओर उदाहरण देते हुए ले जाता है।

10. प्रकृति का अनुकरण (Follow Nature):

रूसो ने शिक्षण में प्रकृति को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। उनका मानना था कि शिक्षा प्राकृतिक ढंग से होनी चाहिए। ऐसी शिक्षा छात्रों की मानसिक तथा शारीरिक शक्ति के अनुकूल होगी तथा अधिक स्वाभाविक भी। लैंडन का कथन है, “हमारा शिक्षण और प्रशिक्षण बालक के विकास के नियमों और उसके मस्तिष्क के कार्य करने की विधियों के अनुरूप होना चाहिए।”

11. स्वाध्याय को प्रोत्साहन (Encouragement to Self Study) :

स्कॉट ने कहा है, “प्रत्येक मनुष्य की शिक्षा का सर्वोत्तम भाग वही है, जो उसने स्वयं प्राप्त किया है।” आधुनिक चिन्तन में शिक्षकों ने छात्रों को स्वाध्ययन करने के लिए प्रेरित करना प्रारम्भ किया, जिससे वे ज्ञान ग्रहण करने में सक्रिय भूमिका निभाएँ तथा आत्मचिन्तन और विवेक से विषयों को समझकर अपने ज्ञान को स्थायित्व प्रदान करें।

निष्कर्षतः यह कह सकते हैं कि उपर्युक्त शिक्षण सूत्र शिक्षकों के लिए पथ-प्रदर्शक का काम कर सकते हैं। इन सत्रों को प्रयोग में लाने के लिए न तो यह सम्भव है कि हम कोई नियम निर्धारित करें, और न ही यह सम्भव है कि सभी सूत्रों का सभी विषयों और सभी कक्षाओं को पढ़ाने के लिए प्रयोग किया जाये। लेकिन यह बात सुनिश्चित तौर पर कही जा सकती है कि इन शिक्षण सत्रों में अधिक से अधिक का अनुसरण सामान्य स्तर के शिक्षण को ऊँचा उठाने में सहायक होता है। इन सूत्रों को शिक्षण के प्रयोग में लाने के लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है :

  1. शिक्षक को इन सूत्रों के ऊपर निर्भर न रहकर इन्हें एक साधन के रूप में प्रयोग में लाना चाहिये।
  2. किसी भी शिक्षण सूत्र को प्रयोग में लाने के लिए शिक्षक का निर्णय स्वयं का होना चाहिए।
  3. इन सूत्रों के प्रयोग के लिए कोई क्रम निर्धारित नहीं किया जा सकता।
  4. ये सूत्र शिक्षक की सहायता के यंत्र के रूप में काम आते हैं।
  5. किसी सूत्र का अनुसरण करने के लिए बच्चों की आयु, पूर्वानुभव, मानसिक स्तर व कक्षा की व्यवस्था आदि पर ही आधारित होना चाहिये।

एक शिक्षक के लिए अपना शिक्षण कार्य सफलतापूर्वक व प्रभावशाली रूप से कार्यान्वित करने के लिए उसे शिक्षण व मनोविज्ञान के विभिन्न सिद्धान्तों व विधियों से परिचित होना परम आवश्यक है। शिक्षक के लिए यह भी आवश्यक है कि उसे ऐसे नियमों का ज्ञान हो तथा वह उन्हें अपने शिक्षण में स्थान दे, जो सामान्य समझ व अनुभवों के आधार पर निश्चित किये गये हैं। इन नियमों व सूत्रों से अध्यापक बहुत-सी शिक्षण संस्थाओं व कठिनाइयों से बचने व दूर करने में सफल होते हैं तथा छात्रों को विषय को भली-भाँति ग्रहण कराने में भी सहायक होते हैं।

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