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अनुकरणीय शिक्षण कौशल से क्या समझते हैं, अनुकरणीय शिक्षण का अर्थ | Simulated Teaching Skill in Hindi

इसमें आप लोग अनुकरणीय शिक्षण कौशल से क्या समझते हैं, अनुकरणीय शिक्षण का अर्थ, Simulated Teaching Skill in Hindi, अनुकरणीय शिक्षण का स्वरूप, अनुकरणीय शिक्षण का स्वरूप, अनुकरणीयता के प्रकार , शिक्षण कौशलों का एकीकरण, अनुकरणीय शिक्षण के लिए सावधानियाँ (Precautions for Simulated Teaching), आदि  का अध्ययन करेगें।

अनुकरणीय शिक्षण कौशल (Simulated Teaching Skill)

अनुकरणीय शिक्षण को अनुकरणीय सामाजिक कौशल प्रशिक्षण (Simulated Social Skill Teaching) भी कहा जाता है। अनुकरण द्वारा सीखना प्राणी जगत का स्वभाव है। मानव हो अथवा पशु, सभी अनुकरण से सीखते हैं। वर्तमान युग में विभिन्न उद्योगों, युद्धों व प्रबन्धों के प्रशिक्षण में अनुकरणीय शिक्षण का प्रयोग किया जाता है । शिक्षण व्यवसाय में पूर्व अभ्यास अथवा अनुकरणीय शिक्षण का अपना विशिष्ट महत्त्व है । प्रायः शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों में छात्राध्यापकों के समक्ष शिक्षण अभ्यास में जाने से पूर्व प्राध्यापक द्वारा पाठ प्रदर्शन किया जाता है।

छात्राध्यापक पाठ प्रदर्शन का ही अनुकरण करने का प्रयास करते हैं और अपनी मौलिक क्षमताओं का प्रयोग नहीं कर पाते हैं। उन्हें कक्षा के सामाजिक व्यवहारों का बोध नहीं होता है, इसलिए उन्हें कक्षा शिक्षण में अधिक कठिनाइयाँ होती हैं और अपेक्षित शिक्षण व्यवहार का विकास नहीं होता। इसके लिए यह आवश्यक है कि छात्राध्यापकों को विद्यालयों में जाने से पूर्व अपनी कक्षा में ही पूर्व अभ्यास करवाया जाये। अनुकरणीय शिक्षण का विकास संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय में हुआ है। इसका विकास क्रुक शैंक (1968) न अध्यापक प्रशिक्षण प्रणाली के लिए किया था। इसे नाटकीय प्रविधि (Role Playing) भी कहते हैं । ‘कार्ल अपिनसा’ तथा उनके साथियों ने शिक्षक-व्यवहार क्रम का विकास किया है।

 

 

अनुकरणीय शिक्षण का अर्थ (Meaning of Simulated Teaching) :

अनुकरणीय शिक्षण काल्पनिक परन्तु सत्य लगने वाला कृत्रिम रूप से निर्मित शिक्षण होता है जिसके सहारे प्रशिक्षणार्थियों में वास्तविक घटना का सामना करने की क्षमता पैदा की जाती है।

चौहान- “Simulation with the concrete approach to situations, works to bridge the gap between unreal and real, students enact real situation and learning becomes more interesting and lively than purely theoretical.”

टैनस व अनविन (1969)-“अभिरूपता को सादृश्य की संज्ञा देते हैं, क्योंकि इसमें। वास्तविकता का आभास है।”

फिंक (1975)- “अभिरूपता (अनुकरणीयता) वास्तविकता का नियन्त्रित प्रतिनिधित्व करती है।”

क्रुक शैंक (1971) ने अनुकरण को अध्यापन शिक्षा में प्रभावी साधन के रूप में प्रस्तुत करते हुए इसके पक्ष में निम्न पाँच बिन्दु बताये हैं :

1. अनुकरण छात्राध्यापकों की साधारण एवं गहन समस्याओं को सुलझाने के अनेक अवसर प्रदान करता है जो कि अभ्यास क्रम अनुभव में सम्भव नहीं था।

2. अनुकरण शिक्षण विधि में कम खर्च में छात्राध्यापकों को अच्छा वातावरण उपलब्ध करवाया जा सकता है।

3. छात्राध्यापकों को इस विधि में कम समय में ऐसे अवसर उपलब्ध कराये जा सकते हैं, जिनमें उन्हें निर्णय लेना होता है।

4. छात्राध्यापक को एक प्रकार के अभ्यास क्रम द्वारा ही स्कूल का विविध वातावरण अनुकरण विधि द्वारा उपलब्ध कराया जा सकता है।

5. अनुकरण शिक्षण विधि में तुरन्त प्रतिपुष्टि की सुविधा उपलब्ध है, जिससे छात्राध्यापक के अभ्यास के कारण-प्रभाव सम्बन्धों का विश्लेषण किया जा सकता है।

 

अनुकरणीय शिक्षण की अन्य विशेषताएँ

1. शोधकार्य में इस प्रविधि का प्रयोग किया जा सकता है।

2. यह प्रविधि सरल है तथा इसके द्वारा छात्राध्यापक में आत्मविश्वास पैदा होता है।

3. अनुकरणीय शिक्षण का प्रयोग प्रदर्शन पाठ के स्थान पर किया जा सकता है क्योंकि सभी प्राध्यापक उच्च श्रेणी के नहीं होते।

4. इसको अधिक प्रभावी बनाने के लिए सूक्ष्म शिक्षण की सहायता ली जा सकती है।

5. यह प्रविधि धीमी गति से सीखने वाले छात्राध्यापकों के लिए बहुत लाभकारी है।

6. इसके द्वारा कक्षा शिक्षण को सारांश रूप में प्रस्तुत करने की क्षमताओं का विकास किया जा सकता है।

7. तर्कपूर्ण ढंग से व्याख्यान करने तथा प्रदर्शन की क्षमताओं का विकास किया जा सकता है।

8. पाठ्यवस्तु को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करने की क्षमताओं का विकास किया जा सकता है।

अनुकरणीय शिक्षण का स्वरूप

इस प्रशिक्षण में छात्राध्यापकों को छात्र तथा शिक्षक दोनों की भूमिका निभानी पड़ती है। कक्षा में एक छात्र अध्यापक बन जाता है और शेष छात्र-अध्यापक विद्यार्थी की भूमिका निभाते हैं । इस शिक्षण में भी सूक्षम शिक्षण की तरह छोटे-छोटे प्रकरण लेकर शिक्षण किया जाता है तथा उसका अभ्यास किया जाता है । इसमें शिक्षण 10 या 15 मिनट के छोटे कालांश में किया जाता है । इस शिक्षण अवधि के पश्चात् शिक्षण विधि तथा शिक्षण युक्तियों पर बहस होती है । इसके पश्चात् जिस छात्र-अध्यापक ने शिक्षक की भूमिका निभाई है, वह अन्य छात्रों के साथ बैठकर विद्यार्थियों की भूमिका निभाता है।

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इसके बाद दूसरा छात्राध्यापक शिक्षक बनकर शिक्षण कार्य करता है। दस-पन्द्रह मिनट के शिक्षण कार्य के पश्चात् किया गया वाद-विवाद या बहस छात्र-अध्यापकों के लिए पृष्ठ-पोषण का कार्य करती है और जिससे छात्राध्यापक अपेक्षित व्यवहार का अनुसरण करना सीखते हैं।

 

अनुकरण शिक्षण की प्रक्रिया

इस प्रक्रिया में निम्नलिखित सोपानों का अनुकरण किया जाता है :

1. भूमिकायें निर्धारित करना- सभी अध्यापकों को शिक्षक, शिक्षार्थी, निरीक्षक की भूमिका का निर्वाह करना पड़ता है। इसके लिए प्राध्यापक छात्राध्यापकों को छोटे-छोटे समूहों में विभाजित कर एक समूह विशेष के छात्राध्यापकों की क्रमश: भूमिकाएं निर्धारित करता है।

2. कौशलों का चयन करना- भूमिकाएँ निर्धारित करने के पश्चात् कुछ विशिष्ट सामाजिक कौशलों का चयन किया जाता है तथा उन पर विचार-विमर्श किया जाता है । इन चुने हुए कोशलों से सम्बन्धित प्रकरणों का अभ्यास किया जाता है।

3. कार्यक्रम की रूपरेखा बनाना- शिक्षण के प्रारम्भ, मध्य व अन्त की सम्पूर्ण रूपरेखा बनाई जाती है। कौनसा छात्राध्यापक पाठ का प्रारम्भ करेगा? यह कब समाप्त किया जायेगा ? इसे कौन समाप्त करेगा ? बीच में कौन प्रश्न पूछेगा ? आदि।

4. मापन विधियों का निर्धारण- इस सोपान के अन्तर्गत यह तय किया जाता है कि किस प्रकार की प्रेक्षण प्रविधि को अपनाया जाना है ? किस प्रकार के आँकड़े रिकॉर्ड करने । हैं ? उन आँकड़ों की व्याख्या कैसे करनी है ? आदि।

5. प्रथम अभ्यास सत्र का संचालन- अब प्रथम अभ्यास सत्र का संचालन किया जाता है तथा अभ्यास सत्र में भाग लेने वाले छात्राध्यापकों को उसके शिक्षण कार्य के बारे में पष्ठ-पोषण दिया जाता है। यदि आवश्यक होता है तो दसरे सत्र के लिए परिवर्तन भी किया जाता है।

6. परिवर्तन की तैयारी- अब उपर्युक्त पाँचों सोपानों का अनुसरण करने के बाद छात्राध्यापक, विषय, कौशल आदि सब कुछ परिवर्तित करने की तैयारी की जाती है तथा अन्य छात्राध्यापकों की भूमिका पुनः बदली हुई परिस्थिति में निर्धारित की जाती है। इस प्रकार यह क्रम छात्राध्यापकों के पूर्व अभ्यास हेतु चलाया जाता है।

अनुकरणीयता के प्रकार 

1. सख्य अनुकरणीयता (Identity Simulation)-

इसमें छात्राध्यापकों के समक्ष आने वाली कठिनाइयों का प्रारूप प्रस्तुत किया जाता है। उन्हें यह बताना होता है कि इन स्थितियों में वे क्या करेंगे। बाद में उन्हें आपसी विचार-विमर्श द्वारा बताया जाता है कि उनके निर्णयों में क्या सही है और क्या गलत है। छात्राध्यापक इसमें स्वयं को आने वाली परिस्थिति में रखकर अपने कार्य की योजना तैयार करता है।

2. प्रायोगिक अनुकरणीयता (Laboratory simulation)-

बड़े-बड़े उद्योगों में होने वाले उत्पादनों की उपयोगिता पहले छोटे पैमाने पर देखी जाती है, उसी प्रकार शिक्षा के क्षेत्र  में भी विभिन्न शिक्षण विधियों एवं दृश्य-श्रव्य साधनों का छोटे पैमाने पर प्रयोग किया जाता है। सफल होने पर उसका वृहत उपयोग हेत प्रचार किया जाता है । सूक्ष्म शिक्षण एक ऐसा ही प्रभावशाली प्रयोग है।

3. विश्लषणात्मक अनुकरणीयता (Analytical Simulation)-

इसमें किसी भी समस्या अथवा कार्य को लेकर उसके विषय में गहन विचार करना. उसके कारण तथा परिणामों को जानना तथा समस्या समाधान के तरीके ढूँढना आदि विश्लेषणात्मक अनुकरणीयता में आता है। छात्राध्यापकों में विश्लेषणात्मक निर्णय लेने की क्षमता उत्पन्न करने हेतु उन्हें शिक्षण के मध्य आने वाली विभिन्न समस्याओं और कार्यों से अवगत कराया जाता है तथा उन समस्याओं का समाधान कैसे सम्भव है यह भी स्पष्ट किया जाता है।

4. व्यक्ति अध्ययन अनुकरणीयता (Case Study Simulation)-

इसमें किसी विशेष छात्र की समस्या के निवारणार्थ उसका विस्तृत अध्ययन छात्राध्यापकों के सामने रखा जाता है तथा विभिन्न छात्राध्यापकों से उसके विषय में लिये गये निर्णयों की जानकारी प्राप्त की जाती है । यह उपचारात्मक शिक्षण के लिए अत्यन्त उपयोगी है।

5. भूमिका निर्वाह (Role Playing)-

अनुकरणीय शिक्षण में भूमिका निर्वाह मुख्य आधार है, इसमें विद्यालय में समय-समय पर लिये जाने वाले निर्णयों के अभ्यास हेतु छात्राध्यापकों को अलग-अलग भूमिका निर्वाह करने के लिए दी जाती है। जैसे, विद्यालय में वार्षिकोत्सव के आयोजन से सम्बन्धित सभा में एक छात्राध्यापक, प्रधानाध्यापक की भूमिका, तीन-चार छात्राध्यापक, अध्यापकों की भूमिका, दो-तीन छात्राध्यापक छात्रों की भूमिका तथा दो-तीन छात्राध्यापक समाज की संस्थाओं के प्रतिनिधि के रूप में तथा अभिभावक के रूप में भूमिका निभाएँगे जिससे छात्राध्यापक वार्षिकोत्सव व अन्य कार्यक्रम विद्यालय में किस प्रकार आयोजित किये जाते हैं, उनका प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें।

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अनुकरणीय शिक्षण के लिए सावधानियाँ (Precautions for Simulated Teaching)

1. छात्राध्यापक को शिक्षण करने से पूर्व एक सूक्ष्म पाठ योजना तैयार करनी चाहिए।

2. इस शिक्षण के समय प्राध्यापक को कक्षा में रहना चाहिए जिससे शिक्षण सुव्यवस्थित ढंग से चले तथा कक्षा में अनुशासन बना रहे ।

3. इसके लिए छात्रों का समूह में विभाजन उनके विषयानुसार किया जाये। 4. प्रत्येक छात्र को शिक्षक, छात्र तथा पर्यवेक्षक की भूमिका निभानी चाहिए ताकि अभ्यास भली-भाँति हो सके।

5. शिक्षण की समाप्ति पर परस्पर विचार-विमर्श का अवसर दिया जाना चाहिए।

 

शिक्षण कौशलों का एकीकरण

कौशलों के विस्तत विवरण से स्पष्ट होता है कि प्रत्येक विशिष्ट कौशल में छात्राध्यापक को दक्ष बनाने हेत सक्ष्म शिक्षण विधि एक महत्त्वपूर्ण विधि है, किन्तु सामान्य कक्षा अध्यापना में शिक्षक को सभी कौशलों का एक साथ एक ही समय में प्रयोग करना होता है। उनका एकीकरण करके शिक्षण को प्रभावशाली बनाया जा सकता है। विभिन्न कौशलों के एकीकरण के सम्बन्ध में अभी विवाद है। कुछ मनोवैज्ञानिक एवं शिक्षाशास्त्री कौशलों के एकीकरण को सम्भव नहीं मानते हैं तथा कुछ इसे पूर्णरूप से सम्भव मानते हैं। इस दिशा में अनेक अनुसन्धान किये जा रहे हैं। डॉ. एन. के. जंगीरा का ‘Integration of Teaching Skills’ नामक प्रयासं अति-महत्त्वपूर्ण है। सूक्ष्म शिक्षण और वास्तविक शिक्षण के बीच चलने की प्रक्रिया में शिक्षण सूत्र ‘संश्लेषण से विश्लेषण की ओर’ तथा ‘विश्लेषण से संश्लेषण की ओर’ का अनुकरण किया जाता है।

जंगीरा एवं सिंह (1982) ने कौशल के एकीकरण के विषय में कहा है :

“एकीकरण को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में पारिभाषित किया जा सकता है, जिसमें छात्राध्यापक परिस्थितियों के अनुसार विशिष्ट शिक्षण की योग्यता अर्जित करता है तथा शिक्षण कौशल का चयन एवं संगठन वांछित क्रम में इस प्रकार करता है ताकि विशिष्ट निदेशित उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सके एवं उनका विशेष परिस्थितियों में प्रभावशाली ढंग से प्रवाह के साथ उपयोग किया जा सके।”

शिक्षण कौशल समन्वय हेतु अनेक नीतियाँ बनाई गई हैं। आवश्यकतानुसार छात्राध्यापक उनमें से एक या अनेक का प्रयोग कर सकते हैं। प्रारम्भ में दो-तीन कौशलों का ही प्रयोग एक साथ करना उचित है, जैसे-प्रस्तावना कौशल, प्रश्न कौशल, श्यामपट्ट लेखन कौशल आदि समन्वय के समय प्रशिक्षण का आधार घटक कौशल होता है न कि कौशल के घटक। मूल्यांकन उपकरण में घटक कौशल को ही आधार बनाया जाता है। यह उपकरण घटक कौशल की समन्वय प्रक्रिया में प्रासंगिकता, क्रमबद्धता, सहजता, लचीलापन आदि को मापते हैं तथा समन्वय के औचित्य एवं प्रभावशीलता के सम्बन्ध में छात्राध्यापक को प्रतिपुष्टि देने में सहायक होते हैं।

समन्वय प्रक्रिया का सही मूल्यांकन वास्तविक कक्षा अध्यापन में ही होता है। जब छात्राध्यापक अनेक कौशलों का एक साथ एक ही समय में प्रयोग करने की क्षमता का प्रदर्शन करता है। इसका मूल्यांकन करने के लिए अनेक प्रकार के मूल्यांकन उपकरण बनाये। गये हैं, जैसे, :

(1) ‘सामान्य अध्यापन क्षमता अनुमान’ (G.T.C.s), शिक्षा विभाग, बड़ौदा विश्वविद्यालय,

2) स्टेनफोर्ड अध्यापन अर्हण संदर्शिका, स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय,

(3) इन्दौर अध्यापन निर्धारण अनुमाप, शिक्षा विभाग, इन्दौर विश्वविद्यालय एवं 

(4) अध्यापन निर्धारण माला, अध्यापक शिक्षण, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद्, नई दिल्ली।

(इन उपकरणों हेतु ‘सूक्ष्म शिक्षण’ विषय की कोई भी अच्छी पुस्तक देखें)

 

 

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