शिक्षा में सम्प्रेषण तकनीकी

शिक्षा में सम्प्रेषण तकनीकी, अर्थ तथा परिभाषा | सम्प्रेषण के तत्त्व तथा प्रकार | Communication in Hindi

शिक्षा में सम्प्रेषण तकनीकी(Communication Technology in Education)

आज अधिकाधिक सूचनाएँ किसी भी राष्ट्र के विकास का मेरुदण्ड बन गई हैं। कतिपय उपग्रह अन्य ग्रहों तथा उपग्रहों की भाँति केवल आकाश में विचरण करने वाले ही नहीं होते अपितु सूचनाओं के आदान-प्रदान करने में भी सहायक होते हैं।

भारतवर्ष में सर्वप्रथम संचार उपग्रह एपल द्वारा दूरसंचार तथा डाटा संचार के अनेक प्रयोग किए गए। तत्पश्चात् बहूद्देशीय उपग्रह इन्सैट के आधार पर मौसम की विस्तृत जानकारी सम्बन्धित तथा देशव्यापी दूरदर्शन एवं दरसंचार के अन्तरिक्ष कार्यक्रम तैयार किए गए। जिससे दूर-दराज तक सम्पर्क कर उन्हें विकास की गति में सहभागी बनाया जा सके।

सन् 1983 इन्सैट 1बी उपग्रह के सफल प्रक्षेपण के साथ देश में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह ‘इन्सैट’ प्रणालियाँ आज कामयाबियों के उस शिखर को छा रही हैं जिसके लिए किसी भी देश को गर्व हो सकता है। वस्तुतः इन्सेट प्रणालियों के उपग्रहों के कारण ही देश में सही अर्थ में संचार क्रान्ति सम्भव हुई है। इन्सैट श्रृंखला के उपग्रहों के अतिरिक्त भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह, आई.आर.एस. प्रणाली के उपग्रह भी काम कर रहे हैं जो राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्धन के मुख्य आधार बन गए हैं।

फ्रेंच गुयाना के कौरू से एरियन की 7वीं उड़ान से छोड़ा गया इन्सैट श्रृंखला की दूसरी पीढ़ी का चौथा उपग्रह इन्सैट 2डी सुधरी हई पेलोड क्षमता और नए किस्म के ट्रांसपोंडरों से लैस है। इससे महानगरों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीविजन प्रसारण सुविधाओं तथा देश में चलती-फिरती संचार प्रणालियों में और सुधार हुआ है। इससे पेजर और सेलुलर फोन को भी अधुनातन बनाया जा रहा है। यह इन्सैट 2सी जैसा ही है जिसे कौरू से दिसम्बर 1995 में छोड़ा गया था।

जुलाई 1992 में प्रक्षेपित इन्सैट 2ए, जुलाई 1993 में प्रक्षेपित इन्सैट 2बी और 1990 में प्रक्षेपित इन्सैट-1 संतोषप्रद रूप से कार्य कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त इन्सैट की दूसरी पीढ़ी के उपग्रहों में दस जुलाई 1992 में प्रक्षेपित इन्सैट 2ए जुलाई 1993 में प्रक्षेपित इन्सैट 2बी तथा दिसम्बर 1995 में प्रक्षेपित इन्सैट 2सी भी अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। इन्सैट 2सी ने औपचारिक रूप से फरवरी 1996 से कार्य करना प्रारम्भ कर दिया था। इसके बाद इन्सैट 2डी व 2ई ने भी कार्य प्रारम्भ कर दिया। इन्सैट 3ए के बाद इन्सैट 3बी फरवरी 2000 में प्रक्षेपित किया गया। सन् 2002 तक इन्सैट 3ई तक उपग्रह प्रक्षेपित करने का क्रम जारी रहा।

20 सितम्बर 2004 को शिक्षा के क्षेत्र में अपने पहले उपग्रह ‘एड्यूसेट’ के प्रक्षेपण के साथ ही भारत ने अन्तरिक्ष तकनीक में एक नया आयाम स्थापित किया। 1950 किलोग्राम का यह उपग्रह सात साल तक सक्रिय रहेगा तथा देशभर के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के विद्यालय, महाविद्यालय एवं उच्च शिक्षण संस्थानों से जुड़ कर उन्हें उपग्रह आधारित एकीकृत शिक्षा प्रदान करेगा।

इक्कीसवीं सदी में हाइटेक कक्षा-कक्ष, कम्प्यूटरीकृत पुस्तकें, पेपरलैस सोसायटी कम्प्यूटर फ्लॉपी एवं सीडी के रूप में डिजीटल पुस्तकालयों की संकल्पना अपना साकार रूप लेती जा रही हैं। अभी तक हमारी सरकारें और उनके कार्यकारी तन्त्र जिन कार्यों को नहीं कर पाए उसे सूचना प्रौद्योगिकी पूर्ण करने में लगी है। शिक्षण संस्थाओं में दिन-प्रतिदिन बढती हई विद्यार्थियों की संख्या, उन्हें योग्य बना देने की कोशिश में लगे प्राध्यापक समाज व राजनीति में सामंजस्य बैठाने वाले प्राधानाध्यापक, प्राचार्य व उपकुलपति सभी जिस व्यवस्था से असन्तुष्ट हैं उसमें परिवर्तन लाने में भी सहायक है ‘शैक्षिक तकनीकी’।

 

 

इक्कीसवीं सदी का कक्षा-कक्ष

इक्कीसवीं सदी में प्राय: कक्षा-कक्ष शिक्षण संस्थाओं के परिसर से उठकर प्रत्येका बालक के अपने घर में आ गया है। घर के किसी एक कमरे में एक पर्सनल कम्प्यूटर एक तेज गति वाला डाटा लिंक उपकरण और एक ठीक-ठाक सा डिजिटल टेलीविजन। बस ये ही वे साधन हैं जो आज बच्चों को न केवल सुशिक्षित बना रहे हैं बल्कि किसी उपयुक्त व्यवसाय अथवा कार्य करने योग्य भी बना रहे हैं।

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आज विद्यार्थी को केवल कुछ बटनों को दबाने व कुछ चाबियाँ घुमाने मात्र से इंग्लैण्ड, अमरीका, कनाडा, आस्ट्रेलिया या फिर अपने ही देश के किसी विश्वविद्यालय के नम्बर मिलाकर फोन पर निवेदन करना होता है कि उसे अमुक विषय के अमुक स्तर के पाठ्यक्रम में प्रवेश लेना है। उधर से उसको एक प्रवेश परीक्षा देने का आमन्त्रण मिलता है। जिसे उत्तीर्ण कर वह विधिवत् उनका स्वयंपाठी विद्यार्थी बन जाता है। इसके बाद ई-मेल से या वीडियो कैसेट के जरिए उसके पास शिक्षण सामग्री पहँचने लगती है और उसके अध्ययन का पर्वेक्षण प्रारम्भ हो जाता है। पाठ्यक्रम समाप्त होने पर उसे अपने ही कक्षा-कक्ष में परीक्षा देनी होती है तथा पास होने पर घर बैठे ही डिग्री भी मिल जाती है।।

इस कक्षा-कक्ष की नींव तो 70 के दशक से प्रारम्भ हो चुकी है जिसका स्वरूप हमें व्यवसायिक शिक्षण संस्थाओं के पत्राचार पाठ्यक्रमों, मुक्त विद्यालयों व मुक्त विश्वविद्यालयों के रूप में देखने को मिलता है।

वर्तमान में विश्वव्यापी वेब के आगमन से हिन्दुस्तान में प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तर तक की शिक्षा घर बैठे सुलभ होने लगी है। दूरस्थ शिक्षा के क्षेत्र में भारतवर्ष में सत्तर के दशक में साइट अर्थात् सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपेरिमेन्ट (SITE) प्रारम्भ हुआ। उपग्रह द्वारा विद्यार्थियों को विशेषत: देश के दूरदराज इलाकों में रहने वाले लोगों को शिक्षित करने के उद्देश्य से प्रयास प्रारम्भ किए गए। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद, नई दिल्ली द्वारा अनेक कार्यक्रम बनाए। गए इनमें छात्र शिक्षक को देख-सुन तो सकते थे, किन्तु उनसे स्वयं बात करके अपनी शंकाओं व जिज्ञासाओं का समाधान नहीं कर सकते थे। कुछ वर्षों बाद अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों ने इस कमी को भी पूरा कर डाला।

नब्बे का दशक प्रारम्भ होते ही उन्होंने एक ऐसा तरीका खोज निकाला जिसमें छात्र, अध्यापक के सामने अपनी शंकाएँ रख सकते हैं और इसी तरह अध्यापक अपने शिक्षण की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने के लिए छात्र से प्रश्न पूछ सकते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण देश को एक कक्षा-कक्ष में बदले जाने का सपना साकार हो गया। इंटरनेट ने इस देशव्यापी नेटवर्क को विश्वस्तरीय बनाकर इसकी सीमाओं का भूमण्डलीय आकार दे दिया है।

नेट पर तरह-तरह के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम उपलब्ध होने लगे हैं। अनेक निगम अपने प्रशिक्षण तथा विश्वविद्यालय शिक्षण की सामग्री नेट पर देने लगे हैं। इनकी यह सामग्री अनुदेशक द्वारा दी जाने वाली सामग्री का या तो पूरक होती है या फिर विकल्प होती है। इस व्यवस्था में पाठ्यक्रम में प्रवेश से पूर्व विशेष चिन्तन की आवश्यकता होती है। क्रेडिट कार्ड के द्वारा अपने इच्छित पाठ्यक्रम में प्रवेश मिलता है। अनुदेशक व सहपाठियों से विचारों का आदान-प्रदान इलेक्ट्रॉनिक मेल के द्वारा होता है।

गृहकार्य का सम्प्रत्यय भी अपना रूप बदल रहा है। सारी पढाई-लिखाई, जाँच परख, मूल्यांकन व परीक्षा घर पर ही सम्पन्न होने के कारण इसका अब कोई अर्थ नहीं रह गया है। सीखने की गति को बनाए रखने के लिए घर पर ही कुछ विशेष अभ्यास अवश्य करने होते हैं। पाठ्य साम्रगी में ही मूल्यांकन विधि को भी जोड़ दिया गया है जिससे साथ-साथ मूल्यांकन होता रहे।

इसी तरह दूरदर्शन पर पहले से रिकॉर्ड किये हए अथवा जीवन्त प्रसारण के रूप में व्याख्यान उपलब्ध होने लगे हैं। टेलीक्रॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से किसी देश के किसी शहर में बैठा अनुदेशक अपना व्याख्यान दुनिया के छात्रों के लिए दे सकते हैं। वेब आधारित शिक्षा के विभिन्न सहायक तत्त्व, जैसे-पुनरावृत्ति, आकलन, मूल्यांकन आदि शिक्षार्थी को जब चाहे तब उपलब्ध होते हैं। इस प्रकार यह मॉडल हाइब्रिड शिक्षण का है। भविष्य में कार्यालय भी तार रहित प्रौद्योगिकी से ससज्जित होंगे जिन्हें यूनिटेल की संज्ञा दी जा रही है। मेज पर या उनके भीतर जो भी चीजें होंगी वे सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध होंगी। इन्हें वर्कस्टेशन अर्थात् कार्यस्थल का नाम दिया गया है। कर्मचारी मोबाइल फोनों और बैटरी से चलने वाले नोट बुक कम्प्यूटरों के जरिए एक-दूसरे से सम्पर्क में रहेंगे। यह कुछ सूचना प्रौद्योगिकी संस्थाओं में हो भी रहा है।

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सम्प्रेषण का अर्थ (Meaning of Communication)

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह निरन्तर अपने विचारों का आदान-प्रदान करता रहता है। उसकी विभिन्न ज्ञानेन्द्रियाँ इस कार्य में उसे सहायता प्रदान करती हैं। अनुभव एवं अनुभूतियों को एकत्रित करना और दूसरों के साथ बाँटना यही प्रक्रिया सम्प्रेषण (Communication) कहलाती है।

Communication यह शब्द लैटिन भाषा के Communicate (us) से बना है जिसका अर्थ है- to impart, make Common; इस प्रकार अपनी भावनाओं और विचारों को अभिव्यक्त कर उन्हें सर्वसामान्य बनाकर दसरों के साथ बाँटना ही सम्प्रेषण (Communication) है। आंग्ल भाषा के शब्द Communication का अर्थ होता है- The imparting or interchanging of thoughts यह शब्द commune से विकसित हुआ है जिसका अर्थ है भावनाओं तथा अभिव्यक्तियों का आदान-प्रदान।

 

 

सम्प्रेषण की परिभाषा (Definition of Communication)

आधुनिक प्रौद्योगिकी के युग में सम्प्रेषण का विशेष महत्त्व है। यह शिक्षाशास्त्र, समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान आदि विषयों से विशेषतः सम्बन्धित है। शिक्षाशास्त्रियों ने इसकी परिभाषा इस प्रकार दी है-

1. लूमिस और बीगल के शब्दों में-‘…..सम्प्रेषण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक सामाजिक व्यवस्था के माध्यम से सूचना, निर्णय एवं निर्देश दिए जाते हैं तथा वे तरीके हैं जिनसे किसी विषय के प्रति ज्ञान, विचारों और अभिवृत्तियों को बनाया अथवा बदला जाता है।’

2. दहामा के अनुसार- ‘सम्प्रेषण एक ऐसा कृत्य है जिससे एक व्यक्ति अपने ज्ञान, भावनाओं, विचारों, सूचनाओं आदि का परस्पर आदान-प्रदान करता है। इस प्रकार अर्थ, उद्देश्य एवं संदेशों के उपयोग के बारे में वह एक सामान्य बोध ग्रहण करता है।’

 

डॉ. श्यामा चरण दुबे के शब्दों में– ‘सम्प्रेषण समाजीकरण का प्रमुख माध्यम है। सम्प्रेषण द्वारा सामाजिक और सांस्कृतिक परम्पराए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती है। सम्प्रेषण की विभिन्न विधाओं के बिना सामाजिक निरन्तरता बनाए रखने की कठिनाइयों का अनुमान सहज ही किया जा सकता है। समाजीकरण की प्रत्येक स्थिति और उसका हर रूप सम्प्रेषण पर आश्रित है। मनुष्य जैविकीय प्राणी से सामाजिक प्राणी तब बनता है। जब वह सम्प्रेषण द्वारा सांस्कृतिक, अभिवृत्तियों, मूल्यों और व्यवहार प्रकारों को आत्मसात् कर लेता है।’

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच विचारों, अनुभूतियों और ज्ञान का प्रभावशाली आदान-प्रदान ही सम्प्रेषण है।

 

 

सम्प्रेषण के तत्त्व (Elements of Communication)

प्रमुखतः सम्प्रेषण में तीन तत्त्व निहित होते हैं-

1. स्रोत/सम्प्रेषक (Source)- यह व्यक्ति, पत्र-पत्रिका अथवा यान्त्रिक उपकरण किसी भी रूप में हो सकता है, जैसे शिक्षक जब कक्षा में समझाता है तब वह एक सम्प्रेषक के रूप में कार्य करता है।

2. संदेश वाहक (Message)-संदेश शाब्दिक अथवा अशाब्दिक दोनों रूपों में हो सकता है। सम्प्रेषक द्वारा प्रस्तुत किए गए विचार ही संदेश हैं।

3. ग्राहक सम्प्रेषक (Receiver)-संदेश सुनकर, देखकर, पढ़कर एवं अन्य इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किये जाते हैं। इस प्रकार श्रोता, दर्शक अथवा पाठक को ‘ग्राहक सम्प्रेषक’ कहा जाता है।

 

 

सम्प्रेषण के प्रकार (Kinds of Communication)

सम्प्रेषण मुख्यत: तीन रूपों में देखने को मिलता है-

1. अन्त:वैयक्तिक सम्प्रेषण (Intrapersonal Communication)- मानव जीवन में ऐसे बहुत से अवसर आते हैं, जबकि व्यक्ति स्वयं से प्रश्न उत्तर करता हुआ बातचीत करता है। यही अन्त:वैयक्तिक संचार है। जैसे- परीक्षा कक्ष में जाने से पूर्व।

2. अन्तरवैयक्तिक सम्प्रेषण (Interpersonal Communication)- जब दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मध्य सम्प्रेषण होता है तब वह अन्तर वैयक्तिक संचार कहलाता है, जैसे- एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के साथ, सामूहिक चर्चा, परिचर्चा आदि।

3. लोक सम्प्रेषण (Mass Communication)- जब सम्प्रेषण एक व्यक्ति तथा समूह के मध्य हो तब वह लोक संचार कहलाता है। जैसे- अध्यापक तथा कक्षा के मध्य, नेता व जनता के मध्य, विशेषज्ञ तथा महाविद्यालय के मध्य।

शिक्षा के क्षेत्र में संचार के विविध माध्यमों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है।

 

 

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