शिक्षाप्रद चलचित्र में दूरदर्शन का योगदान

शिक्षाप्रद चलचित्र में दूरदर्शन का योगदान, शिक्षाप्रद कार्यक्रम, महत्त्व तथा सीमाएँ | Contribution of Doordarshan in Education in Hindi

शिक्षाप्रद चलचित्र क्या है?(Educational Films)-

दूरदर्शन पर विभिन्न शिक्षाप्रद फिल्म्स अलग-अलग चैनल्स पर दिखाई जाती हैं इसके लिए शैक्षिक तकनीकी केन्द्र, एन.सी.ई.आर.टी., इग्नू आदि सक्रिय हैं। जोधपुर के ‘एज्यूकेशनल मीडिया रिसर्च सेंटर’ ने दृश्य-श्रव्य माध्यम (वीडियो फिल्म) से शैक्षिक कार्यक्रमों के प्रसार में तेज प्रगति की है। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर से सम्बद्ध इस केन्द्र ने अब तक विज्ञान, मानविकी, पर्यावरण, कृषि और सांस्कृतिक क्षेत्र के दर्जनों विषयों पर पाँच सौ से ज्यादा फिल्में तैयार की हैं। इनमें से कुछ फिल्में तो अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बिकने लगी हैं जबकि कुछ को पुरस्कार मिले है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कार्यक्रम के अन्तर्गत इस केन्द्र की शिक्षा-फिल्में दूरदर्शन पर नियमित प्रसारित होती हैं। अभी हिन्दी में शिक्षोन्मुखी फिल्में अधिकाधिक बनाने का प्रयास जारी है। इस तरह की फिल्में बनाने के लिए ‘बीटा कैम प्रणाली कैमरा, कमकार्डर, वी.टी.आर., डिजिटल मल्टी हाकेक्ट जनरेटर’ के साथ-साथ वीडियो, सी.डी. प्लेयर आदि उपकरणों की आवश्यकता होती है।

 

 

शिक्षाप्रद चलचित्र में दूरदर्शन का योगदान-(Contribution of Doordarshan in Educational Films)

 

दूरदर्शन आज शिक्षा प्रदान करने का महत्त्वपूर्ण साधन बन गया है। सर्वप्रथम अमरीका के हारवर्ड विश्वविद्यालय के हेराल्ड हण्ट नामक व्यक्ति ने इसका प्रयोग शिक्षा प्रदान करने के लिए किया तथा 1936 में बी.बी.सी. लन्दन ने इसे जनता के लिए उपलब्ध करवाया। भारत में नियमित रूप से इसका प्रचलन 15 सितम्बर, 1959 को हुआ। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में दूरस्थ शिक्षा तथा दूरदर्शन के उपयोग पर और अधिक बल दिया गया और आज इसका प्रयोग विविध शैलियों से शिक्षा प्रदान करने के लिए किया जा रहा है। इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के विषय में चर्चा इसी अध्याय के प्रारम्भ में तथा पुस्तक के प्रथम अध्याय में की जा चुकी है।

वर्तमान में स्काई डीटीएच सेवा को अमरीका उपग्रह पैन एम सेट-4 के माध्यम से प्रसारित किया जा रहा है। इस सेवा में 40 चैनल हैं जिनमें क्षेत्रीय भाषाओं के चैनल विशेषतः समाचार, फिल्म, मनोरंजन चैनल, संगीत, व्यवसाय आदि उपलब्ध हैं। इसमें ‘पैरेन्टल लॉक’ की सुविधा भी है अर्थात् जिस चैनल से बच्चों को दूर रखा जाना चाहिए, उसे अभिभावक बंद कर सकते हैं। इस सेवा में उपग्रह सिग्नलों को संकेतबद्ध करने के लिए अत्याधुनिक डिजिटल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता है।

भारत में 1999 से पूर्व ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में एकमात्र विदेशी चैनल ‘डिस्कवरी’ ही था। इसके कार्यक्रम सूचनात्मक और शिक्षाप्रद होते हैं। ‘डिस्कवरी’ ने भारत में हिन्दी भाषी दर्शकों के बीच अपनी पहुँच बनाने के लिए हिन्दी भाषा में भी कार्यक्रमों की डबिंग प्रारम्भ कर दी। इसके बाद सूचना और शिक्षा सम्बन्धी ‘नेशनल ज्योग्राफिक’ चैनल भी भारत में देखा जाने लगा। डिस्कवरी चैनल एक नई तैयारी के साथ ‘एनीमल प्लैनेट’ नामक नया चैनल लेकर आ गया है। यह जानवरों की दनिया पर केन्द्रित शिक्षाप्रद चैनल है। इन तीन शैक्षिक चैनलों के साथ अभी तक लगभग कुल 70 के आसपास चैनल हैं इनमें से अधिकांश चैनल विदेशी व विविध प्रकार के हैं।

1999 में देश में शिक्षा को पूरी तरह समर्पित पहला शैक्षणिक दरदर्शन चैनल इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) ने शिक्षा विभाग के साथ मिलकर ‘ज्ञान दर्शन’ के नाम से विकसित किया था, जिसने सन् 2000 से कार्य प्रारम्भ कर दिया। यह 24 घंटे का चैनल है लेकिन प्रारम्भ में यह 8 से 12 घंटे का ही प्रसारण कर सका। इस चैनल में शिक्षा के प्रत्येक क्षेत्र प्रौढ, प्राथमिक, माध्यमिक, महाविद्यालय स्तर तक के भाषा और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों तथा नौकरी के अवसरों को भी शामिल किया गया।

निकलोडिऑन एवं जी नेटवर्क द्वारा 16 अक्टूबर, 1999 से भारत में एक नया बाल कार्यक्रमों का दूरदर्शन चैनल शुरू किया गया। इस चैनल पर 24 घण्टे अंग्रेजी में बच्चों के विश्वस्तरीय मनोरंजक एवं ज्ञानवर्धक कार्यक्रम प्रसारित किए जा रहे हैं। निकलोडिऑन अमरीका का नम्बर एक केबल चैनल है। इसने 20 वर्ष पूर्व बच्चों के लिए अनूठे कार्यक्रमों को प्रारम्भ किया था। इसके कार्यक्रम विश्व भर में बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय हैं।। इसका उद्देश्य भारत में बिल्कुल नए व मौलिक कार्यक्रमों का प्रसारण करना है। इनमें हास्य, मनोरंजन व ज्ञान-विज्ञान से सम्बन्धित विभिन्न कार्यक्रम शामिल हैं।

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दूरदर्शन पर शिक्षाप्रद कार्यक्रम

(1) शैक्षिक दूरदर्शन (Educational T.V.)- ई.टी.वी. के द्वारा प्रत्येक बालक एवं प्रौढ़ को श्रेष्ठ शिक्षण उपलब्ध करवाया जाता है। इसके द्वारा अनेक शिक्षाप्रद कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं, जैसे- इतिहास व संस्कृति सम्बन्धी, स्वास्थ्य सम्बन्धी, सामान्य ज्ञान आदि।

(2) शैक्षणिक दूरदर्शन (Instructional T.V.)– शैक्षणिक दूरदर्शन कार्यक्रम पाठ्यक्रम से सम्बन्धित नियोजित तथा क्रमबद्ध होते हैं इनका प्रयोग शिक्षण में कई तरह से किया जाता है

(क) पूर्ण दूरदर्शन शिक्षण (Total Television Teaching TTT)- सम्पूर्ण शिक्षण दूरदर्शन कार्यक्रम के द्वारा ही चलता है बाद में शिक्षक छात्रों की समस्याओं का समाधान करता है।

(ख) पूरक दूरदर्शन शिक्षण (Supplemented T.V. Teaching STT)- यह कार्यक्रम आवश्यकतानुसार एक सप्ताह, पन्द्रह दिन अथवा एक महीने में प्रस्तुत किए जाते हैं। इनका उद्देश्य शिक्षक तथा छात्र दोनों को शिक्षण में पूरक सामग्री उपलब्ध करवाना है।

(ग) दूरदर्शन, शिक्षण की सहायक सामग्री के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं, जैसे किसी ऐतिहासिक स्थल की जानकारी देने हेतू, किसी विशेष फसल को बोने की प्रक्रिया आदि का वर्णन समझाने हेतु।

 

प्रसारण अनुक्रिया के आधार पर दूरदर्शन तीन प्रकार के होते हैं-

(1) खुला परिपथ दूरदर्शन (Open Circuit T.V.)

(2) बन्द परिपथ दूरदर्शन (Closed Circuit T.V.)

(3) उपग्रह दूरदर्शन (Satellite T.V.)

 

 

 

शिक्षा में दूरदर्शन का महत्त्व

(1) यह दूरस्थ शिक्षा का सशक्त माध्यम है।

(2) एक समय में अधिकाधिक लोगों को शिक्षित करने में सहायक है।

(3) समय, शक्ति तथा धन की दृष्टि से मितव्ययी है।

(4) इसके द्वारा योग्य व अनुभवी शिक्षकों तथा विशेषज्ञों की सेवाओं का उपयोग सम्भव है।

(5) व्यवसायरत लोगों को उनके क्षेत्र में विशिष्ट शिक्षा देने में सहायक होता है।

(6) शिक्षा के लिए समान अवसर प्रदान करता है।

(7) प्रभावशाली शिक्षण का माध्यम है।

(8) स्व-अधिगम को प्रेरित करता है।

(9) शिक्षा में लचीलापन तथा आधुनिकीकरण प्रदान करता है।

(10) अवकाश के क्षणों का सदुपयोग होता है।

(11) नवीनतम ज्ञान में वद्धि एवं जन-जागृति में सहायक है।

(12) राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति जागरूकता उत्पन्न करता है।

 

दूरदर्शन पर शिक्षाप्रद कार्यक्रम की संरचना

दूरदर्शन कार्यक्रम का निर्माण तीन चरणों में किया जाता है-

(1) योजना निर्माण,

(2) प्रस्तुतीकरण,

(3) मूल्यांकन।

 

(1) योजना निर्माण

(1) उद्देश्यों का निर्धारण छात्रों की सम्भावित उपलब्धियों के आधार पर किया जाता है।

(2) छात्रों का पूर्वज्ञान, शैक्षिक योग्यता, रुचि, आवश्यकता आदि को ध्यान में रखा जाता है।

(3) कार्यक्रमों के योजनावद्ध लेखन हेतु विशेषज्ञों का चयन किया जाता है।

(4) लिपि बोधगम्य, प्रभावशाली, स्पष्ट, सुग्राह्य बनाने का प्रयल किया जाता है।

(5) कार्यक्रम के उत्पादन हेतु प्रकाश, ध्वनि एवं सैट्स की समुचित व्यवस्था कर रिकार्डिंग की जाती है।

 

(2) प्रस्तुतीकरण-

कार्यक्रमों का आकर्षक ढंग से प्रस्तुतीकरण किया जा सके एतदर्थ आवश्यक है-

(1) कार्यक्रम छात्रों को पुनर्बलित तथा अभिप्रेरित करने वाले हों।

(2) कार्यक्रमों का क्रम रुचिकर हो।

(3) प्रसारण समय अधिकाधिक लोगों की सुविधा को ध्यान में रखकर निर्धारित किया जाए।

(4) कार्यक्रम प्रसारण का समय व पत्र-व्यवहार का पता आदि जानकारियों स्पष्ट रूप से दी जानी चाहिए।

 

(3) मूल्यांकन

(1) प्रसारणोपरान्त छात्रों का मूल्यांकन तथा कार्यक्रम का मूल्यांकन करने हेतु कार्यक्रम पर छात्रों की प्रतिक्रियाएँ आमंत्रित की जाएँ।

(2) प्रस्तुत किए गए कार्यक्रम पर छोटे-छोटे प्रश्न के उत्तर लिखवाने हेतु पत्र व्यवहार किए जाएँ।

(3) छात्रों की उत्तरपुस्तिकाओं का मूल्यांकन कर पुन: उन्हें लौटा दिया जाए।

 

उपर्युक्त तीनों चरणों का उचित ढंग से अनुकरण करने पर दूरदर्शन के द्वारा प्रदान की जाने वाली शिक्षा अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकेगी।

 

 

दूरदर्शन की सीमाएँ-

(1) शिक्षण में शिक्षक और विद्यार्थी दोनों का अपना महत्त्व है, क्योंकि एडम्स के अनुसार, शिक्षा एक द्विमुखी प्रक्रिया है इसमें शिक्षक प्रेरणा देता है तथा छात्र प्रतिक्रिया करता है। दूरदर्शन में छात्र को प्रेरणा तो मिलती है, किन्तु प्रतिक्रिया अभिव्यक्त करने के अवसर नहीं मिल पाते। अत: यह एक पक्षाय। प्रक्रिया हो जाती है।

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(2) मन्द बुद्धि व पिछड़े हुए छात्रों की दृष्टि से इसकी शिक्षण गति कई बार तीव्र हो जाती है।

(3) अधिक महँगा होने के कारण सबके द्वारा नहीं खरीदा जा सकता।

(4) कई दर-दराज के क्षेत्रों में समुचित विद्युत व्यवस्था के अभाव में इसके कार्यक्रम नहीं पहुँच पाते।

(5) समुचित सामाजिक विकास नहीं हो पाता।

(6) कभी-कभी दूरदर्शन के कार्यक्रम अधिगम में हस्तक्षेप करते हैं। इसके द्वारा प्रसारित कार्यक्रमों में छाया-चित्रों पर अधिक ध्यान देने के कारण विषय-वस्तु गौण हो जाती है। अन्त में, कहा जा सकता है कि शिक्षा का प्रजातंत्रीकरण एवं सार्वभौमिकीकरण करने में दूरदर्शन का अपना विशिष्ट स्थान है। दूरस्थ शिक्षा का एक अमोघ अस्त्र है, तथापि यह पूर्णत: शिक्षक का स्थान नहीं ले सकता उसका सहायक हो सकता है। उपर्युक्त नवीनतम संचार माध्यमों के अतिरिक्त परम्परागत दृश्य-श्रव्य साधन, जैसे- रेखाचित्रात्मक उपकरण, प्रदर्शनपट्ट प्रतिरूप, चलचित्र, फिल्मस्ट्रिप, स्लाइड, ग्रामोफोन, टेपरिकार्डर, आकाशवाणी प्रसारण आदि भी शिक्षा प्रदान करने के सशक्त माध्यम हैं।

किन्तु खेद है कि विश्व के विभिन्न देशों के विद्यालयों में शिक्षा की तकनीक को लेकर असन्तुलन की स्थिति बनी हुई है। जहाँ विकसित देशों के बच्चे इन्टरनेट और कम्प्यूटर की अत्याधुनिक तकनीक के द्वारा शिक्षा का लाभ ले रहे हैं वहीं विकासशील देशों के अधिकांश बच्चे अखबार, दूरदर्शन और आकाशवाणी से भी वंचित हैं।

यनेस्को की शिक्षा सम्बन्धी रिपोर्ट के अनुसार पिछले दशक में इन्टरनेट उपभोक्ताओं में अत्यधिक वद्धि हई और कई विकसित देशों की स्कूली शिक्षा में आँकडों की नवीनतम और वास्तविक जानकारी के लिए इन्टरनेट की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। इसके विपरीत उप-सहारा में प्रति हजार प्राथमिक शिक्षकों में केवल 12 लोग दैनिक अखबार पढ़ते हैं। अरब देशों में यह संख्या 37, लैटिन अमरीकी देशों में 80, संक्रमण दौर से गजर रहे देशों में 114 और इन देशों में से अधिक विकसित देशों में यह संख्या 286 है। इस रिपोर्ट के अनुसार अकेले टोक्यो शहर में सम्पूर्ण अफ्रीका से कहीं अधिक टेलीफोन हैं। नए विश्व में कम्प्यूटर साक्षरता की अपरिहार्यता की स्थिति यह होगी कि अगले साल अमेरिका में मिलने वाली सेवाओं में 60 प्रतिशत के लिए कम्प्यूटर का ज्ञान आवश्यक होगा। इसके विपरीत उपसहारा क्षेत्र के देशों में प्रति हजार में केवल 169 विद्यालयों में रेडियो तथा केवल 33 में दूरदर्शन पाया गया।

रिपोर्ट से ज्ञात होता है, कि विकासशील देशों के बहुत से विद्यालयों में अब बिजली भी नहीं पहुंच पाई है। सूचना माध्यमों की सुविधाओं का लाभ इसलिए नहीं उठा पा रहे कि उनका बजट इस बात की अनुमति नहीं देता।

6 अप्रैल, 1998 को समाचार-पत्रों में प्रकाशित समाचार के आधार पर यूनेस्को के सबके लिए शिक्षा’ के लक्ष्य के बावजूद विश्व में 6 से 11 वर्ष के बीच के आयु वर्ग के लगभग 15 करोड़ बालक विद्यालय जाने से वंचित हैं। विश्व के 180 से अधिक देशों पर किए गए एक नवीनतम सर्वेक्षण के आधार पर यह निष्कर्ष निकल कर आया कि विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं का पूर्णतः अभाव है। अधिकांश विद्यालयों में एक औसत कक्षाकक्ष में उपलब्ध आवश्यक संसाधन, यथा-श्यामपट्ट, चार्ट आदि की भी व्यवस्था नहीं है।

यूनेस्को की 160 पृष्ठों की इस रपट में बताया गया, कि हर चौदह में से आठ देशों में 90 प्रतिशत से अधिक बच्चे ऐसे विद्यालयों में शिक्षा पाने के लिए विवश हैं जहाँ बिजली नहीं है। बहुत से विद्यालयों में पेयजल की व्यवस्था नहीं है। 90 देशों में 90 प्रतिशत छात्रों के पास उनकी मातृभाषा में पाठ्यपुस्तकें भी उपलब्ध नहीं हैं। इन देशों में अधिकतर अफ्रीकी देश हैं। इसके अतिरिक्त एक तिहाई बच्चों के विद्यालय में बैठने व लिखने के लिए उपयुक्त फर्नीचर नहीं है। विश्व के पाँच करोड़ सत्तर लाख शिक्षकों के पास इतने संसाधन नहीं है, कि वे अपना कार्य सुचारू रूप से कर सकें।

उपर्युक्त स्थितियों को देखते हुए शिक्षा में नवीनतम संचार साधनों का अधिकतम उपयोग तब ही सम्भव है, जबकि इन साधनों के उपयोग करने की समुचित व्यवस्था अधिकाधिक लोगों को उलपब्ध हो।

 

 

 

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