समस्या समाधान नीति तथा दत्त कार्य नीति

समस्या समाधान नीति तथा दत्त कार्य नीति की विशेषताएँ, दोष | Assignment Strategy in Hindi

दत्त कार्य नीति(ASSIGNMENT STRATEGY)

शिक्षण प्रणाली में स्थायी अधिगम व्यवहारों का निर्माण करने में योग देने वाली ‘दत्त कार्य नीति’ महत्त्वपूर्ण है। इसका ध्येय छात्रों को अनुशीलन प्रदान करना है। लियोनार्ड डगलस के अनुसार– दत्त कार्य छोटे लम्बे, कठिन, सरल, सामान्य, भिन्न आदि हो सकते है। इसका सम्बन्ध पाठ, इकाई आदि से विद्यालय में पूरे वर्ष रहता है।

शिक्षण में सैद्धान्तिक, प्रदर्शन तथा प्रायोगिक तीनों ही पहलू दत्त कार्य विधि द्वारा छात्रों को स्पष्ट किये जा सकते हैं। इसमें पाठ्य-वस्तु के छोटे-छोटे दत्त कार्य (Assignments) में विभाजित कर उन्हें छात्रों को निर्धारित समय में करने के लिए दिया जाता है। छात्र आवश्यकतानुसार पुस्तकालयों तथा प्रयोगशालाओं में कार्य करते हैं। शिक्षक समय-समय पर निरीक्षण करता रहता है और उनकी कठिनाइयों का निराकरण भी करता जाता है। छात्र अपने द्वारा पूरे किये गये दत्त कार्य का पूर्ण आलेख रखता है।

 

दत्त कार्य नीति की विशेषताएँ

  1. प्रत्येक छात्र अपनी सामर्थ्य के अनुकूल कार्य करता है।
  2. शिक्षक को पर्याप्त मार्गदर्शन करना पड़ता है।
  3. छात्रों को स्वयं कार्य करने की आदत पड़ती है।
  4. छात्र अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने की आदत विकसित करते हैं।
  5. इस विधि में विषय-वस्तु के सभी पहलुओं का समावेश रहता है।
  6. व्यावहारिक कार्य पर अधिक बल दिया जाता है।

 

दत्त कार्य नीति के दोष (Demerits)

(1) शिक्षक पर छात्रों के कार्य निर्देशन का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है।

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(2) अधिक समय लगता है।

(3) अच्छी प्रयोगशाला एवं अच्छे पुस्तकालय के अभाव में यह विधि उपयोगी नहीं है।

 

 

दत्त कार्य नीति में सुधार के लिए सुझाव

दत्त कार्य देते समय ध्यान रखिये कि-

(1) प्रत्येक दिन दत्त कार्य न दिया जाये।

(2) दत्त कार्य का सम्बन्ध पाठ से अवश्य हो।

(3) छात्रों की योग्यता एवं आयु के अनुसार हो।

(4) उचित मार्ग-दर्शन देने की व्यवस्था हो।

(5) दत्त कार्य स्पष्ट एवं सोद्देश्य हो।

(6) सार्थक हो त छात्र कार्य करने के लिए प्रेरित हों।

 

समस्या समाधान नीति(PROBLEM SOLVING STRATEGY)

हैमण्ड कार्सी (Hammonds Carsie) के शब्दों में-

“Problem solving in teaching refers to the task of making decisions or doing things that learner wants to make or to do, the nature of which he is able to understand but for which at the time he has no solution.”

समस्या समाधान विधि का जन्म प्रयोजनावाद के फलस्वरूप हुआ। इसमें छात्र अपने पाठ से सम्बन्धित समस्याएँ छात्रों के सम्मुख प्रस्तुत करता है और छात्र अपनी रुचि एवं क्षमता के अनुसार उनके समाधान में लग जाता है। इस विधि में समस्या छात्रों के समक्ष स्पष्ट शब्दों में रखी जानी चाहिये तथा उनके अधिगम अनुभवों पर आधारित होनी चाहिये। शिक्षक की सहायता से छात्र समस्याओं का संश्लेषण अथवा विश्लेषण करते हैं और समाधान तक पहुँचने का प्रयत्न करते हैं-

 

समस्या समाधान विधि के सोपान

(1) समस्या का चयन,

(2) समस्या का प्रस्तुतीकरण,

(3) तथ्यों का एकत्रीकरण,

(4) परिकल्पना का निर्माण,

(5) समाधानात्मक निष्कर्ष पर पहुँचना,

(6) मूल्यांकन,

(7) कार्य का आलेखन।

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समस्या समाधान विधि की विशेषताएँ

(1) छात्र समस्याओं का स्वतः हल करना सीखते हैं।

(2) उनमें निरीक्षण एवं तर्क शक्ति का विकास होता है।

(3) वे सामान्यीकरण करने में समर्थ होते हैं।

(4) वे आंकड़ों के एकीकरण, मूल्यांकन एवं निष्कर्ष निकालने की प्रक्रियाओं से परिचित होते हैं।

(5) नवीन सन्दर्भ में पुराने तथ्यों का प्रयोग करना सीखते हैं।

(6) मिल-जुलकर कार्य करने की भावना जाग्रत होती है।

(7) यह प्रेरणात्मक विधि है।

(8) यह “Learning by doing” पर आधारित है।

 

 

समस्या समाधान विधि के दोष (Demerits)

(1) समय एवं शक्ति का अपव्यय होता है।

(2) इस विधि में निष्कर्ष के गलत होने का भी भ्रम बना रह सकता है।

(3) इस विधि के प्रयोग के लिए योग्य शिक्षकों की आवश्यकता है।

(4) यह विधि छोटी कक्षाओं में उपयोगी नहीं है।

किसी विषय-विशेष के शिक्षण के लिए किस विधि का चयन किया जाये तथा शिक्षण के कौन-से उपागम अधिक उपयोगी रहेंगे, इस विषय पर अगले पोस्टों में प्रकाश डाला गया है।

 

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