कम्प्यूटर आधारित अभिक्रम

कम्प्यूटर आधारित अभिक्रम | कम्प्यूटर आधारित अधिगम | Computer based Program in Hindi

संगणक/कम्प्यूटर आधारित अभिक्रम(Computer based Program):

आज विज्ञान और तकनीकी के प्रभाव ने मानव चिन्तन को वैज्ञानिक बना दिया है। जिसके फलस्वरूप प्रत्येक क्षेत्र में यान्त्रिकीकरण का बोलबाला है। यान्त्रिकीकरण की इस दौड़ में शिक्षा भी पीछे नहीं रही है, क्योंकि प्रतिदिन बदलने वाली सामाजिक-आर्थिक संरचना में शिक्षा के गणात्मक स्वरूप पर बहत बल दिया जा रहा है, फलत: शिक्षा जगत में कम्प्यूटरों का आगमन हआ है। छात्रों की बढ़ती हुई संख्या को देखते हुए उनके लिए उत्तम ढंग से शिक्षण अधिगम की परिस्थितियाँ उत्पन्न करके, ज्ञान के संचार-प्रवाह में कम्प्यूटर को प्रभावशाली माध्यम माना जा रहा है।

कम्प्यूटर आधारित अधिगम में आवाज को रिकॉर्ड कर लिया जाता है जो अध्ययनकर्ता द्वारा दिये गये उत्तर संकेतों के आधार पर निःसृत होती है। पहले अध्ययनकर्त्ता पर्दे पर देखता है जो एक प्रोजैक्टर से सम्बद्ध होता है। वह उस पर्दे पर जो बिन्दु लिखा या दर्शाया गया है, उसे सीखने का प्रयास करता है। जब वह उसे सीख लेता है तो यह ज्ञात करने के लिए कि वह उसे सीख पाया है या नहीं; कई मिलते-जुलते शब्द या बिन्दु पर्दे पर दर्शाये जाते हैं। अध्ययनकर्ता सही शब्द या बिन्दु को पहचानने के पश्चात् उसे संकेतक से छूता है। छूने के पश्चात् वह उत्तर सही या गलत, जैसा भी होता है वैसी ही ध्वनि जो पहले से ही रिकॉर्ड की हुई होती है, निःसृत होती है। यदि उत्तर गलत होता है तो उसका कारण भी ध्वनि रूप में अध्ययनकर्ता को ज्ञात हो जाता है। इसे उदाहरण रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है :

 

कम्प्यूटर आधारित अभिक्रम

इस प्रकार अध्ययनकर्ता आगे बढ़ता जाता है और उसे उत्तर मिलते चले जाते हैं। कम्प्यूटर आधारित अधिगम में प्रायः चार बिन्दुओं पर अधिक बल दिया जाता है :

(1) ड्रिल और अभ्यास,

(2) ट्यूटोरियल,

(3) प्रश्नोत्तर; एवं

(4) निदानात्मक परीक्षण।

 

यदि कोई छात्र पाठ्य-सामग्री को जल्दी समझ लेता है तो वह ‘+’ बटन दबाकर अपने सीखने की गति में वृद्धि कर सकता है। इसके विपरीत यदि वह किसी तथ्य या पाठ्य-सामग्री को समझने के लिए अतिरिक्त समय चाहता है, तो वह ‘-‘ का बटन दबाकर अपनी सीखने की गति कम कर सकता है। कम्प्यूटर सामूहिक रूप से किसी भी कक्षा में दिये गये शिक्षण का अभिलेख भी रखता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि किसी पाठ के मध्य या अन्त में इस बात की जाँच हो जाती है कि किस छात्र ने किस प्रकार से कार्य किया है। वह अन्य छात्रों से आगे बढ़ा है या पीछे रहा है अथवा कक्षा के सभी छात्रों की सीखने की गति एक जैसी रही है।

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कम्प्यूटर आधारित अभिक्रम की विशेषताएँ:

1. इससे एक साथ हजारों छात्र लाभान्वित हो सकते हैं, जबकि अन्य अभिक्रमों में यह संख्या बहुत अधिक नहीं होती,

2. एक समय में केवल एक ही उत्तर सम्भव है,

3. छात्र द्वारा धोखा दिये जाने की सम्भावना नहीं होती,

4. आगे बढ़ने से पूर्व फ्रेम का उत्तर देना आवश्यक है,

5. छात्र द्वारा प्रदत्त उत्तरों का सही अभिलेख रखा जा सकता है,

6. यह छात्रों के लिए अधिक आकर्षक तथा रुचिकर होता है,

7. किसी भी पाठ्य-बिन्दु को कम्प्यूटर में तब तक बार-बार दोहराया जा सकता है, जब तक कि वह छात्र द्वारा आत्मसात् न कर लिया जाये,

8. इसका प्रयोग सभी स्तरों पर सम्भव है,

9. स्वशिक्षण और अध्यापक नियन्त्रित शिक्षण, दोनों में ही इसके प्रयोग की असीमित सम्भावनाएँ हैं; एवं

10. कम्प्यूटर से छात्र को अपने कार्य के लिए तुरन्त प्रतिपुष्टि और प्रोत्साहन मिल जाता है।

 

 

कम्प्यूटर आधारित अभिक्रम की सीमाएँ :

1. कम्प्यूटर द्वारा शिक्षक और शिक्षार्थी के जो सांवेगिक या सामाजिक सम्बन्ध होते हैं, उनसे अध्ययनकर्ता वंचित रहता है,

2. यह अभिक्रम अधिक व्ययसाध्य है, अत: सामान्य विद्यालयों द्वारा इसे खरीदा नहीं जा सकता,

3. सभी स्थानों पर इसका प्रयोग सम्भव नहीं है,

4. यह शोधकार्य में अधिक सहायक है,

5. इसके लिए विशिष्ट प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है,

6. कम्प्यूटर अनुदेशन विद्यार्थियों को भाषा सम्बन्धी दक्षता प्रदान नहीं कर सकता,

7. विद्यार्थी जो कुछ सीखते हैं, वह कम्प्यूटर से ही सीखते हैं, अतः इस प्रक्रिया में वे यन्त्रवत हो जाते हैं, आसपास के छात्रों की ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता। परिणामत: उनमें मैत्री और सहयोग के भाव विकसित नहीं हो पाते।

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8. छात्रों में सजनात्मकता व स्वतन्त्र चिन्तन के गण विकसित नहीं हो पाते: एवं 9. कम्प्यूटर के रख-रखाव में बड़ी सावधानी की आवश्यकता रहती है, जो प्रायः नहीं हो पाती।

 

 

अभिक्रमित अधिगम वस्तु का निर्माण (Preparation of PL. Material) :

1. तैयारी-इकाई अथवा प्रकरण का चयन, विषय-सामग्री की रूपरेखा का निर्माण, उद्देश्य लेखन, व्यवहारगत परिवर्तनों के रूप में उद्देश्य निर्धारण, व्यवहार का परीक्षण, उद्देश्यों का स्पष्टीकरण, परीक्षण तैयार करना एवं लेखन।

2. अभिक्रमक लेखन-फ्रेम लेखन, फ्रेम तारतम्यता निर्धारण, अनुदेशन कौशल का निर्धारण।

3. परीक्षण तथा पुनरावृत्ति या मूल्यांकन-अपने अभिक्रम का अवलोकन, विद्वानों के सुझावों हेतु अभिक्रम भेजना, थोड़े छात्रों को अपने भिक्रम देकर उनसे अनुक्रियाएँ प्राप्त कर उसका मूल्यांकन करना।

 

अभिक्रमित अधिगम की उपयोगिता (Utility of Programmed Learning) :

1. इससे छात्रों में स्वाध्याय की प्रवृत्ति का विकास किया जा सकता है,

2. व्यक्तिगत भिन्नताओं का ध्यान रखा जा सकता है, क्योंकि इसमें प्रत्येक छात्र को उसकी गति, क्षमता व योग्यता के अनुसार पढ़ने के अवसर मिलते हैं,

3. इसके द्वारा छात्रों का मूल्यांकन सरलता से किया जा सकता है

4. शिक्षक को कक्षा का बहुमूल्य समय छात्रों की त्रुटियों का पता लगाने में नष्ट नहीं करना पड़ता,

5. इसके द्वारा छात्र के सर्वांगीण विकास में सहायता मिलती है,

6. इसके द्वारा अभिक्रमित अध्ययन-सामग्री का निर्माण श्रेष्ठ शिक्षकों द्वारा तैयार कर प्रत्येक छात्र को लाभान्वित किया जा सकता है,

7. यह पत्राचार शिक्षण व व्यक्तिगत शिक्षण में उपयोगी है; एवं

8. इसमें विद्यार्थी उत्तीर्ण अथवा अनुत्तीर्ण नहीं किये जाते अपितु वे स्वयं आत्म-मूल्यांकन कर अपना विकास करते हैं।

 

अभिक्रमित अधिगम की सीमाएँ (Limitations of Programmed Learning) : 

1. इसकी सामग्री तैयार करने की सुविधाएँ अधिकांश विद्यालयों में उपलब्ध नहीं हैं,

2. इसकी सामग्री तैयार करना श्रम-साध्य है तथा इसमें निपुणता की आवश्यकता है जो सामान्य शिक्षक से अपेक्षित नहीं है,

3. इसका प्रयोग केवल व्याख्यात्मक पाठ्य-वस्तु के लिए किया जाता है तथ्यात्मक पाठ्य-वस्तु के लिए नहीं, 

4. इससे सामाजिक प्रेरणा नहीं मिलती; एवं

5. छात्रों को अनुक्रिया (Response) की स्वतन्त्रता नहीं मिलती क्योंकि छात्र व्यक्तिगत रूप से अध्ययन करते हैं।

 

 

 

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