समाजोपयोगी उत्पादक कार्य

समाजोपयोगी उत्पादक कार्य, अर्थ एवं आवश्यकता | Socially Useful Productive Work in Hindi

समाजोपयोगी उत्पादक कार्य (Socially Useful Productive Work) :

नवीन शिक्षा तकनीकी के विकास के कारण विविध ज्ञान के क्षेत्रों का विस्तार तथा उनको अर्जित करने के विभिन्न आधुनिकतम तरीकों तथा बढ़ती हुई जनसंख्या ने भारतीय परिप्रेक्ष्य में शिक्षा को समाजोपयोगी बनाने पर बल दिया है।

 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background) :

भारत में शिक्षा को समाजोपयोगी बनाने के लिए महात्मा गाँधी ने ‘वर्धा शिक्षा योजना (1937)’ जिसे बुनियादी शिक्षा भी कहा जाता है; में हस्तशिल्प के प्रति छात्रों में जागृति लाकर उन्हें स्वावलम्बी बनाने पर बल दिया। उन्होंने कहा था कि “मैं बच्चे को शिक्षा,उसे एक उपयोगी हस्तशिल्प सिखाकर और जिस समय से वह अपनी शिक्षा प्रारम्भ करता है, उसी समय से उत्पादन करने योग्य बनाकर; प्रारम्भ करना चाहता हूँ। इस प्रकार यदि राज्य विद्यालयों में निर्मित वस्तओं को लेने का उत्तरदायित्व ले लें तो प्रत्येक विद्यालय आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।“

महात्मा गाँधी की बुनियादी शिक्षा से प्रभावित होकर कोठारी आयोग (1964-66) ने उसे कार्यानुभव (Work Experience) का नाम दिया और आयोग द्वारा कहा गया,”हम यह सिफारिश करते हैं कि कार्यानुभव की सभी प्रकार की शिक्षा, चाहे वह सामान्य हो या व्यावसायिक पाठ्यक्रम के एक अभिन्न अंग के रूप में शुरू की जाये।” कार्यानुभव की परिभाषा यह है- स्कूल, घर, कारखाने, खेत, फैक्ट्री या अन्य किसी भी उत्पादक काम में भाग लेना।

तदुपरान्त सन् 1968 में भारत की प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति में विद्यालय और समाज को निकट लाने के लिए कार्यानुभव एवं राष्ट्रीय सेवा पर बल दिया गया। सन् 1979 म प्रथम शिक्षा नीति के आधार पर द्वितीय शिक्षा नीति निर्धारित की गई, जिसमें पुन: इस बात पर बल दिया गया कि गाँधीजी के शैक्षिक विचारों को हमें शिक्षा में क्रियान्वित करना चाहिए। इसके साथ ही माध्यमिक स्तर पर शिक्षा को व्यावसायिक आधार प्रदान किया जाना चाहिए।

स्वतंत्र भारत की तृतीय शिक्षा नीति, जिसे नई शिक्षा नीति, 1986 के नाम से जाना जाता है; में कहा गया कि माध्यमिक स्तर पर शिक्षा का व्यवसायीकरण इस दृष्टि से किया जाये कि बहुमूल्य जन-शक्ति का उपयोग कर आर्थिक विकास किया जा सके, इसके लिए। निम्न माध्यमिक स्तर पर कार्यानभव की योजना बनाई जाये। माध्यमिक स्तर के उपरान्त सुगठित एवं सुनियोजित रूप से व्यावसायिक शिक्षा एक अलग धारा के रूप में दी जाये।

उपर्युक्त तीनों नीतियों से स्पष्ट होता है कि ये सभी शिक्षा के व्यवसायीकरण पर बल देती हैं। इसके अतिरिक्त आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 की समीक्षा समिति का गठन 7 मई, 1990 में किया गया जिसमें समाजोपयोगी उत्पादक कार्य के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया :

(1) लोगों को काम के लिए समर्थ बनाने के उद्देश्य से शिक्षा के हर स्तर पर सभी विद्यार्थियों के लिए सामाजिक दृष्टि से उपयोगी व उत्पादक कार्य को उनके सीखने, उनमें सूझबूझ और समस्या निदान का कौशल विकसित करने और उनकी सृजनात्मकता बढ़ाने का प्रभावशाली माध्यम बनाना होगा, जिससे समाजोपयोगी उत्पादक कार्य एक रस्मोरिवाज बनकर न रह जाये जैसा कि अक्सर होता रहा है। इस लक्ष्य की प्राप्ति एवं माध्यमिक और उच्च शिक्षा के स्तरों पर शिक्षा की गुणवत्ता में हर दृष्टि से सुधार लाने के लिए जरूरी है कि हम निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान केन्द्रित करें :

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(क) यह आवश्यक है कि हाथ, दिमाग और दिल को एक सूत्र में पिरो दिया जाये।

(ख) माध्यमिक शिक्षा (कक्षा 9वीं से 12वीं तक) के स्तर पर सभी विद्यार्थियों की शिक्षा का व्यवसायीकरण किया जाये, यानी उसे रोजगारोन्मुख बनाया जाये।

(ग) ‘स्कूल की दुनिया’ एवं ‘काम की दुनिया’ के बीच व्यावहारिक रिश्ता स्थापित करना होगा जिसके लिए व्यवसायीकरण की दृष्टि से ‘काम की दुनिया’ में कार्यपीठ (वर्क बैंच) और अभ्यास शाला (प्रैक्टिस स्कूल) जैसी व्यवस्थाओं को शिक्षा का अंग बनाना होगा।

(घ) पूरे स्कूली तंत्र को इस प्रकार खोल दिया जाये कि जो विद्यार्थी ‘काम की दुनिया’ में प्रवेश करना चाहते हैं और बाद में फिर आगे शिक्षा के लिए या अपनी कुशलताओं का विकास करने के लिए वापस लौटना चाहते हैं, उनके लिए बहुलक्ष्यीय प्रवेश और बहुलक्ष्यीय निर्गम का प्रावधान हो।

(च) विद्यार्थियों को उनकी रुचि एवं आवश्यकता के अनुसार पाठ्य-श्रृंखला के चयन में छूट दी जाये।

(छ) शिक्षा के हर अगले स्तर में भर्ती का आधार प्रवेश परीक्षायें होनी चाहिएँ।

(ज) रोजगार या नियोजक एजेंसियों को अपनी-अपनी परीक्षण प्रणालियों का निर्माण करने की छूट देनी होगी ताकि उपाधियों का नौकरियों से सम्बन्ध तोडा जा सके। इसके लिए जरूरी है कि सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की भर्ती-नीति में भी परिवर्तन लाया जाये।

 

समाजोपयोगी उत्पाद कार्य का अर्थ(Meaning of Socially Useful Production Work):

सन् 1977 में भारतीय प्रशासन के शिक्षा मन्त्रालय द्वारा गुजरात विश्वविद्यालय के तत्कालीन उपकुलपति श्री ईश्वर भाई पटेल की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति गठित की गई जिसमें कार्यानुभव के भाव को स्पष्ट करते हुए कहा गया :

1. कोई हस्त उद्योग ही समाजोपयोगी कार्य हो सकता है।

2. क्रियात्मक कौशल को भी समाजोपयोगी उत्पादक कार्य कहा जा सकता है।

3. समाज के लिए किये जाने वाले सेवा कार्य भी समाजोपयोगी उत्पादक कार्य के अंग हैं।

 

1978 में गजरात विद्यापीठ के शिक्षा विभाग द्वारा एक राष्ट्रीय कार्यशाला भी इस विषय में आयोजित की गई। इस कार्यशाला के प्रकाशित प्रतिवेदनों के आधार पर एस.पी. रूहेला ने ‘समाजोपयोगी उत्पादक कार्य’ के प्रत्येक शब्द की अलग-अलग व्याख्या दी। जिसका संक्षेप में अर्थ है :

‘एक बालक को अपने समुदाय में सामाजिक कौशलों और कार्य-कौशलों की दृष्टि से कुशलतापूर्वक कार्य करने की क्षमता से युक्त होना चाहिए जिससे वह समाज के लिए किसी उपयोगी वस्तु का निर्माण कर सके।’

 

समाजोपयोगी उत्पादन कार्य की आवश्यकता (Necessity of S.U.P.W.) :

‘समाजोपयोगी उत्पादक कार्य’ आज शिक्षा के महत्त्वपूर्ण कार्य हैं, इनके माध्यम से बालकों में हाथ के कार्यों के प्रति स्वस्थ भावना उत्पन्न करके उन्हें स्वावलम्बी बनाया जा सकता है। इनकी आवश्यकता को निम्नलिखित बिन्दुओं में प्रस्तुत किया जा रहा है :

 

(1) बालकों के सर्वांगीण विकास में सहायक :

(अ) शारीरिक विकास- शारीरिक व्यायाम बालक के शरीर को संतुलित बनाये रखने में अपना सहयोग देते हैं। छात्रों को उत्पादक कार्यों में लगाकर श्रम करने का अभ्यास करवाया जाता है। इससे छात्रों की ज्ञानेन्द्रियाँ तथा कर्मेन्द्रियाँ दोनों प्रशिक्षित होती हैं तथा बालक सक्रिय रहता है। छात्रों के गामक विकास (Motor Development) में समाजोपयोगी उत्पादक कार्य विशेष सहयोग देते हैं। इनसे बालकों की पेशियाँ दृढ़ होती हैं और शरीर में स्फूर्ति आती है।

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(ब) मानसिक विकास- यह ‘करके सीखने’ के सिद्धान्त पर बल देता है, अतः बालक में आत्मनिर्णय तथा आत्मचिन्तन का विकास होता है। इसके द्वारा बालक अपनी कल्पना-शक्ति से मौलिक सृजन की ओर अग्रसर होता है।

(स) सामाजिक विकास- इसके द्वारा बालक में सेवा,सहयोग,सहानुभूति जैसे गुणों का विकास होता है। उसमें White collar job अर्थात् आभिजात्य वर्ग के कार्य के प्रति जो आकर्षण है, वह कम होता है तथा Blue Collar Job अर्थात् निम्न वर्ग के कार्यो को भी वह सहर्ष स्वीकार कर लेता है।

(द) संवेगात्मक विकास:

1. समाजोपयोगी उत्पादक कार्य बालक को संवेगों पर नियंत्रण करना सिखात है। वह द्वन्द्वों, तनावों तथा संघर्षों से दूर रहता है।

2. इससे बालक आत्मनिर्भर होकर अपने लिए जीविकोपार्जन कर सकते हैं।

3. इससे बालकों में देशभक्ति की भावना का विकास होता है।

4. समाज के विभिन्न व्यवसायों से परिचित होकर छात्र में सकारात्मक अभिवृत्ति का विकास होता है।

 

समाजोपयोगी उत्पादक कार्यों के प्रकार :

 

1. शारीरिक विकास सम्बन्धी- योगासन, सामूहिक व्यायाम, खेल, दौड़ तथा विविध प्रतियोगितायें।

2. मानसिक विकास सम्बन्धी- विद्यालय पत्रिका, भित्ति-पत्रिका, साहित्यिक गतिविधियाँ (जैसे वाद-विवाद, निबन्ध, कविता पाठ, कहानी लेखन, भाषण आदि), परिचर्चा, गोष्ठी तथा सभा।

3. सामाजिक विकास सम्बन्धी- सामाजिक उत्सव, राष्ट्रीय सेवा योजना, बालचर, ग्राम सर्वेक्षण, एन.सी.सी., प्राथमिक चिकित्सा तथा समूह प्रार्थना।

4. संवेगात्मक विकास सम्बन्धी- प्रदर्शनी, उत्सव, शैक्षिक भ्रमण, सांस्कृतिक गतिविधियाँ (संगीत, नृत्य, नाटक) आदि।

5. हस्तकौशल सम्बन्धी- सिलाई, बुनाई, कढ़ाई, कताई, खिलौने बनाना, चमड़े का कार्य जिल्दसाजी, चित्रकला आदि।

6. नागरिकता के विषय से सम्बन्धित- सहकारी बैंक का गठन, विद्यार्थी परिषद् का गठन, राष्ट्रीय एवं धार्मिक उत्सव, नागरिक संस्थाएँ, वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह आदि।

7. अवकाशकालीन गतिविधियाँ- फोटोग्राफी, एलबम बनाना, टिकटें, सिक्के तथा चित्र एकत्रित करना।

 

निष्कर्षतः उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा को समाजोपयोगी बनाना अत्यन्त आवश्यक है जिससे छात्रों में आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास, स्वावलम्बन, सृजनात्मकता, देश-प्रेम, सहकारिता आदि गुणों का विकास एवं क्षमता विकसित की जा सके। केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने भी सत्र 1993 से एक नवीन विषय माध्यमिक स्तर पर पाठ्यक्रम के साथ जोड़ा है जिसे भविष्य ज्ञान (Futurology) का नाम दिया गया है जिसका उद्देश्य विशेषतः समाज के संदर्भ में चिन्तन करना है, जैसे, समाज में कैसी व्यवस्थाएँ अपेक्षित है? क्या-क्या नवीन दिशाएँ निकल सकती है ? भविष्य में कौनसी समस्याएँ समाज के लिए सकती हैं ? समस्याओं के निराकरण एवं नवीन दिशाओं के प्रतिपादन हेतु कौन-कौनसी भावी योजनाएं बनाई जाएँ? यह समाजोपयोगी उत्पादक कार्य की योजना में सहायक हो सकता है।

 

 

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