मैथेटिक्स अभिक्रम

मैथेटिक्स अभिक्रम क्या है? – सोपान, अवधारणाएँ, नियम | स्वनिर्देशित अभिक्रम | Mathematics Program in Hindi

मैथेटिक्स अभिक्रम (Mathematics Program) :

मैथेटिक्स अभिक्रम के मुख्य प्रतिपादक थॉमस एफ. गिलबर्ट (1962) हैं। इस अभिक्रम को अवरोही अभिक्रम भी कहते हैं। मैथेटिक्स शब्द यूनानी भाषा के ‘मैथीन’ शब्द से व्युत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है-सीखना। इसमें विषय-वस्तु की अपेक्षा अध्ययनकर्ता की क्रियाओं को अधिक महत्त्व दिया जाता है। गिलबर्ट ने मैथेटिक्स अभिक्रम की परिभाषा देते हुए कहा है, “अवरोही अभिक्रमित अध्ययन (Mathematics Programmed Learning) जटिल व्यवस्था समूह विश्लेषण एवं पुनर्निर्माण के लिए पुनर्बलन के सिद्धान्तों का व्यवस्थित प्रयोग है जो शिक्षण-सामग्री के पूर्ण अधिकार का प्रतिनिधित्व करता है।”

इस प्रकार पूर्व वर्णित रेखीय अभिक्रम का मुख्य लक्ष्य व्यवहार परिवर्तन करना है और शाखीय अभिक्रम का मुख्य लक्ष्य उपचार करना है, तो मैथेटिक्स अभिक्रम का मुख्य लक्ष्य पाठ्यवस्तु पर स्वामित्व प्रदान करना है। इसमें छात्र सभी प्रकार की निष्पत्तियों को क्रियाओं द्वारा सीखता है। इसके अन्तर्गत व्यवहार में विभेदीकरण, सामान्यीकरण तथा श्रृंखला को महत्त्व दिया जाता है और सभी प्रकार के अनुदेशन में इन्हीं तीनों व्यवहारों का शिक्षण किया जाता है। इसमें भी पाठ्यवस्तु को एक श्रृंखला के रूप में व्यवस्थित किया जाता है, जिसमें छात्रों को विशिष्ट अनुक्रियायें करनी पड़ती हैं, परन्तु अनुक्रियायें अवरोह क्रम में की जाती हैं अर्थात् अन्तिम क्रिया पहले करनी पड़ती है और प्रथम क्रिया अन्त में। इस प्रकार इसमें अवरोह श्रृंखला का प्रयोग किया जाता है, जबकि रेखीय अथवा श्रृंखला अभिक्रम में आरोह क्रम का अनुसरण किया जाता है। पेनिंग्टन (Pennington) तथा स्लेक (Slak) ने भी 1962 के पश्चात् मैथेटिक्स के सिद्धान्तों के आधार पर अनुदेशन का निर्माण किया तथा अनुभव किया कि मैथेटिक्स अभिक्रम शाखीय अभिक्रम से अधिक प्रभावशाली है।

 

मैथेटिक्स अभिक्रम की अवधारणाएँ (Assumptions of Mathematical Programming) :

1. पाठ्यवस्तु के स्वामित्व के लिए अवरोह श्रृंखला अधिक उपयोगी होती है।

2. उद्दीपन तथा अनुक्रिया ही पाठ्यवस्तु के स्वरूप को निर्धारित करते हैं।

3. यह अभिक्रम अधिक प्रेरणादायी क्रियाओं के लिए प्रभावशाली है।

4. अधिगम की परिस्थिति में विभेदीकरण, सामान्यीकरण तथा श्रृंखला अधिगम अधिक प्रभावशाली होता है।

 

 

मैथेटिक्स अभिक्रम के नियम (Principles of Mathematics) :

इस अभिक्रम में प्रस्तुतिकरण को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इसके लिए तीन नियमों का अनुसरण किया जाता है :

(अ) श्रृंखला का नियम- श्रृंखला का प्रयोग उन क्रियाओं में किया जाता है, जहाँ स्वामित्व देने वाली क्रियाओं की व्यवस्था एक क्रम में की जा सकती है। इसमें प्रथम पद की अनक्रिया द्वितीय पद के लिए उद्दीपन का कार्य करती है और दूसरे पद की अनुक्रिया तृतीय पद के लिए उद्दीपन का कार्य करती है, जैसे :

उद्दीपन1→अनुक्रिया1→उद्दीपन2→अनुक्रिया2→उद्दीपन3 →अनुक्रिया3

 

2. विभेदीकरण का नियम- जहाँ उद्दीपन तथा अनुक्रियायें विभिन्न प्रकार की होती हैं, वहाँ विभेदीकरण के नियम का अनुसरण किया जाता है, जैसे-

उदाहरण:

उद्दीपन1 → अनुक्रिया1        

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उद्दीपन2 → अनुक्रिया2        

उद्दीपन3 → अनुक्रिया3        

 

(स) सामान्यीकरण का नियम- इस नियम का प्रयोग उन परिस्थितियों में किया जाता है, जहाँ कई उद्दीपनों के लिए एक ही अनुक्रिया की जा सके। कई उद्दीपनों में समान तत्त्व होने पर एक अनुक्रिया पर्याप्त होती है, इसे सामान्यीकरण कहा जाता है।

 

मैथेटिक्स अभिक्रम निर्माण के सोपान (Steps of or the Development of Mathematical Program) :

मैथेटिक्स प्रोग्राम तैयार करने के लिए पाँच सोपानों का अनुसरण किया जाता है :

1. प्रदत्तों का संकलन तथा कार्य विश्लेषण,

2. स्वामित्व के लिए प्रस्तुतीकरण,

3. पाठयोजना तथा विशिष्टीकरण,

4. अभ्यास के लिए पद, एवं

5. सम्पादन करना।

 

1. प्रदत्तों का संकलन तथा कार्य-विश्लेषण- सर्वप्रथम कार्यक्रम निर्माता प्रदत्तों अथवा तथ्यों का संकलन करता है, फिर कार्य-विश्लेषण में विश्लेषण तथा संश्लेषण दोनों प्रक्रियाओं का प्रयोग किया जाता है।

2. स्वामित्व के लिए प्रस्तुतीकरण- स्वामित्व के लिए प्रस्तुतीकरण करते समय तीन नियमों का ध्यान रखा जाता है, जैसे, श्रृंखला नियम, विभेदीकरण का नियम तथा सामान्यीकरण का नियम आदि।

3. पाठयोजना का निर्माण- इस सोपान में पाठयोजना तैयार की जाती है और इसमें पाठ के पदों का विस्तृत विश्लेषण किया जाता है। इसके लिए निम्न बातों का ध्यान रखा जाता है:

1. पद श्रृंखलाबद्ध हो,

2. बहुविकल्पात्मक हो,

3. उद्दीपन प्रक्रिया के कठिन सम्बन्धों का स्पष्टीकरण तथा मध्यस्थ उद्दीपन का उपयोग हो; एवं

4. परीक्षण पदों की व्यवस्था हो।

4. अभ्यास के लिए पद- पाठ्य-वस्तु पर अधिकार भली-भाँति हो सके। इसके लिए अभ्यास पदों का निर्माण किया जाता है। अभ्यास के पदों में अनुकरणीय प्रविधियों की भी सहायता ली जाती है।

5. सम्पादन करना- अन्त में कार्यक्रम का सम्पादन करते समय भाषायी दोष आदि सभी कमियों को दूर रखने का प्रयास करते हुए अध्ययन अभिक्रम तैयार किया जाता है । यह। सम्पादन दो प्रकार का होता है :

(अ) प्रथम रूप का सम्पादन- इस अवस्था में भाषा, अभिव्यक्ति तथा व्याकरण सम्बन्धी कठिनाइयों तथा त्रुटियों की जाँच करके, उनमें सुधार किया जाता है ।

(ब) प्रायोगिक सम्पादन- इस अवस्था में अनुदेशन के सम्प्रेषण की कमजोरियों को छात्रों के न्यादर्श पर जाँच करके सुधार किया जाता है। जिस उद्दीपक अनुक्रिया में छात्र कठिनाई का अनुभव करते हैं अथवा अधिक त्रुटियाँ करते हैं, उन्हें बदल दिया जाता है।

 

मैथेटिक्स अभिक्रम की विशेषताएँ (Characteristics of Mathematics Programming) :

1. यह अभिक्रम अधिक सुग्राह्य तथा रुचिकर है।

2. इससे अन्य उपक्रमों की अपेक्षा अधिगम अधिक होता है।

3. यह सभी के सहयोग से बनाया जाने के कारण इसमें अशुद्धियाँ कम रहती हैं।

4. इसमें कार्य की पूर्णता ही पुनर्बलन का साधन होती है।

5. यह विभिन्न कोशलों के स्थानान्तरण के लिए अधिक उपयोगी है।

6. इस अभिक्रम में प्रदर्शन, अनुबोधक तथा अनुक्रिया के आधार पर शिक्षण सामग्री पर अधिकार प्राप्त किया जाता है।

7. इस अभिक्रम की पाठ्य-सामग्री में नियम-उदाहरण तथा उदाहरण-नियम दोनों प्रविधियों का प्रयोग किया जाता है।

 

मैथेटिक्स अभिक्रम की सीमाएँ (Limitations of Mathematics Programming) :

1. इस अभिक्रम का निर्माण एक जटिल कार्य है जो केवल कुशल व्यक्ति से ही सम्भव है।

2. इसमें क्रियायें बड़ी लम्बी चलती हैं, अतः समय अधिक लगता है।

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3. इसके अध्ययन में छात्रों की अनुक्रिया के लिए स्वतन्त्रता नहीं होती एवं अन्तिम क्रिया पहले करने से छात्रों को कठिनाई होती है।

4. यह सभी स्तरों पर और सभी तरह के छात्रों के लिए प्रयुक्त नहीं की जा सकती।

5. इसके द्वारा छात्र मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अभिप्रेरित होते हैं, किन्तु सामाजिक दृष्टि से अभिप्रेरित नहीं होते।

6. सभी प्रकार की पाठ्य-वस्तु का शिक्षण इसके द्वारा सम्भव नहीं।

स्वनिर्देशित अभिक्रम (Adjunct Auto-instruction) :

स्वनिर्देशित अभिक्रम को संयुक्त अभिक्रम के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ संयुक्त का अर्थ सहायता प्रदान करना है। यह अभिक्रम एक ऐसा साधन है, जो अभिक्रमित अनुदेशन तथा उत्तम प्रकार की पाठ्य-पुस्तकों में समन्वय स्थापित करता है। इस प्रकार इस अभिक्रम में अभिक्रमित शिक्षण सहायक सामग्री तथा पाठ्य-पुस्तकों का उपयोग किया जाता है।

स्वनिर्देशित अभिक्रम के प्रकार- यह अभिक्रम मुख्यतः दो प्रकार का होता है :

(1) इसमें पाठ्य-पुस्तक की पाठ्य-वस्तु को ज्यों-का-त्यों रखा जाता है और अभिक्रमित अनुदेशन सामग्री को एक अलग इकाई के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह पाठ्य-पुस्तकों के संक्षेपीकरण के रूप में कार्य करता है। पाठ्य-पुस्तक के अन्त में प्रश्न तथा संक्षेपीकरण दिया जाता है जिससे उसकी प्रभावशीलता बढ़ती है।

(2) दूसरे प्रकार में अभिक्रमित अनुदेशन सामग्री में पाठ्यवस्तु के किसी खण्ड को ज्यों-का-त्यों सूचना प्रदान करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। छात्र अपनी अनुक्रिया की पुष्टि के लिए अध्ययन करता है। इसमें विशिष्ट शाखीय अनुदेशन का प्रयोग किया जाता है, जिसमें पाठ्य-वस्तु का अध्ययन करने के बाद अनुक्रिया का चयन छात्र स्वयं करता है जिसका उद्देश्य उसकी कमजोरियों का निदान करना है।

 

स्वनिर्देशित अभिक्रम का निर्माण :

स्वनिर्देशित अभिक्रम के उपर्युक्त प्रकारों में से प्राय: दूसरे प्रकार का ही प्रयोग अधिक होता है। इस अभिक्रम के निर्माण में निम्नलिखित सात सोपानों का अनुसरण किया जाता है :

प्रथम सोपान   : उद्देश्यों का व्यावहारिक रूप में विश्लेषण करना।

द्वितीय सोपान  : पाठ्यवस्तु विश्लेषण तथा उद्देश्यों में समन्वय स्थापित करना।

तृतीय सोपान  : परीक्षा पदों का निर्माण करना।

चतुर्थ सोपान  : संयुक्त अभिक्रमित अनुदेशन का निर्धारण करना।

पंचम् सोपान  : अभिक्रमित अनुदेशन सामग्री का निर्माण करना।

षष्ठम् सोपान  : अनुदेशन सामग्री की जाँच करना।।

सप्तम् सोपान : मूल्यांकन करना।

 

 

स्वनिर्देशित अभिक्रम की विशेषताएँ :

1. इस अभिक्रम के आधार पर पाठ्य-पुस्तकों को प्रभावशाली तथा सोद्देश्य बनाया जाता है,

2. छात्रों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए सीखने के अवसर उपलब्ध करवाये जाते हैं।

3. शिक्षण सरल, सुग्राह्य व रुचिकर होता है।

4. स्वनिर्देशित अभिक्रम में जो अनुदेशन सामग्री तैयार की जाती है, उसका निर्माण करना एक सरल प्रक्रिया है, क्योंकि इसमें पाठ्य-पुस्तकों की सामग्री को मूलरूप में प्रयोग में लाया जाता है।

5. यह समय, शक्ति तथा धन की दृष्टि से अधिक मितव्ययी होती है।

स्वनिर्देशित अभिक्रम की सीमाएँ :

1. इस अभिक्रम के माध्यम से शिक्षार्थी को विषय का इतना ज्ञान नहीं होता जितना कि वह उसकी वास्तविक समस्याओं को समझ सके।

2. इसके लिए बहुत ही योग्य शिक्षक चाहिए, जिनका ज्ञान विस्तृत हो।

3. जिन प्रश्नों को लेकर अभिक्रम तैयार किया जाता है, हो सकता है अन्य अध्ययनकर्ताओं के प्रश्न उससे भिन्न हों, क्योंकि समस्यायें या प्रश्न सभी के अलग-अलग होते हैं।

 

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