हिन्दू विवाह क्या है,अर्थ,उद्देश्य तथा विशेषताएं

हिन्दू विवाह क्या है,अर्थ,उद्देश्य व विशेताएं

हिन्दू-विवाह का अर्थ

विवाह-संस्था सार्वभौमिक रूप से सभी समाजों में किसी न किसी रूप में पाई जाती है। पशु समाज में यौनेच्छा सन्तष्टि एक शारीरिक आवश्यकता है, किन्तु मानव समाज में अशतः शारीरिक, अंशतः सामाजिक तथा अंशतः सांस्कृतिक आवश्यकता है। विवाह ही परिवार और नातेदारी की बनियाद है। हिन्दुओं में विवाह-संस्था का सामाजिक संरचना में एक विशेष स्थान है। यह विश्व के अन्य समाजों में पाए जाने वाले विवाहों से भिन्नता लिए हुए है। हिन्दुओं में विवाह को एक पवित्र धार्मिक संस्कार माना जाता है। ग्रामीण समुदाय मे हिन्दुओं की बहुलता होने से वहाँ हिन्दु विवाह प्रथाओं की ही प्रधानता देखी जाती है। गावों में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में हिन्दु आदर्शों का प्रभाव है। गांव में प्रत्येक स्त्री-पुरुष के लिए विवाह करना अनिवार्य माना जाता है। अविवाहित रहना अनुचित समझा जाता है। यौवनावरण को प्राप्त करने के बाद लड़की का पिता के घर में अविवाहित रहना अच्छा नही माना जाता है।

हिन्दू-विवाह के उद्देश्य

ग्रामीण विवाह के उद्देश्य भी हिन्दू विवाह के जैसे है। हिन्दू विवाह को एक धार्मिक  संस्कार के रूप में स्वीकार किया जाता है। इसके मुख्य उद्देश्य धर्म, सन्तानोत्पत्ति और रति आनन्द है। ग्रामीणों में इनके अतिरिक्त विवाह के कुछ अन्य उद्देश्य भी हैं – कृषि में सहायता मिलना, सामाजिक प्रतिष्ठा कायम रखना, वंश की निरन्तरता बनाए रखना हिन्दू विवाह दी। विषमलिंगियों के बीच कोई दीवानी समझौता नहीं है। हिन्दू विवाह एक धार्मिक संस्कार है। एक हिन्दू अपने जीवन में विभिन्न संस्कारों को सम्पन्न करते हुए ही आगे बढ़ता है तथा अपने व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान करता है। प्रत्येक हिन्दू से नित्य प्रति पाँच महायज्ञ करते रहने की अपेक्षा की गयी है। इन यज्ञों को पति-पत्नी के सहयोग से पूरा करने का विधान है बनाया गया है।

हिन्दुओं के लिए विवाह को एक आवश्यक संस्कार और कर्तव्य बताया गया है। मेधातिथि के अनुसार, “विवाह कन्या को पत्नी बनाने के लिए एक निश्चित क्रम से की जाने वाली अनेक विधियों से सम्पन्न होने वाला पाणिग्रहण-संस्कार है, जिसकी अन्तिम विधि सप्तर्षि दर्शन है। हिन्दुओं में कामवासना/यौनेच्छा सन्तष्टि को विवाह में अधिक महत्व नहीं दिया गया है। डा0 कपाडिया का कथन है कि, “हिन्दू विवाह प्राथमिक रूप से कर्तव्यों की पूर्ति के लिए होता है, अतः विवाह का मूल उद्देश्य धर्म था। इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दू विवाह स्त्री-पुरुष का पति-पत्नी के रूप में एक अलौकिक अविच्छेद्य और शाश्वत मिलन है। यह दो आत्माओं का पुनर्मिलन है और इस पवित्र बन्धन को तोड़ देना अधार्मिक है। हिन्दुओं में एक विवाह को ही आदर्श समझा जाता है, अन्य प्रकार के विवाहों को नहीं।

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हिन्दू विवाह मुसलमानों एवं ईसाइयों के समान एक सामाजिक या दीवानी समझौता नहीं है। आध्यात्मिक प्रयोजनों से ही स्त्री-पुरुष परस्पर स्थायी सम्बन्धों में बँधते हैं। हिन्दुओं की मान्यतानसार विवाह संस्कार के पश्चात ही मनुष्यों में नियमों का परिपालन करने की भावनाएँ जागृत होती हैं। हिन्दू जीवन दर्शन में गृहस्थाश्रम को सर्वश्रेष्ठ और स्वर्ग के समान बताया गया है, जो धार्मिक कर्तव्यों की पूर्ति पुत्र की प्राप्ति, परिवार का सुख, पित-ऋण से मुक्ति, चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति, सामाजिक एकता, आदि उद्देश्यों की पूर्ति करने के लिए किया जाता है।

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हिन्दू विवाह की मुख्य विशेषताएँ

हिन्दू विवाह की प्रकृति धार्मिक है। इसके उद्देश्यों तथा स्वरूपों को देखने से पता चलता है कि यह वस्तुतः एक धार्मिक संस्कार है। डॉ० कपाडिया के अनुसार,हिन्दू विवाह  एक संस्कार है। यह पवित्र समझा जाता है, क्योंकि यह तभी पूर्ण होता है, जबकि यह पवित्र कुत्य पवित्र मंत्रों के साथ सम्पन्न किए जाएं।” संस्कार का अभिप्राय है – व्यक्ति का। शद्धिकरण करना। विवाह भी हिन्दुओ के 16 संस्कारों में से एक है। यह गृहस्थाश्रम प्रवेश का द्वार है। निम्नलिखित विशेषताएँ हिन्दू विवाह को एक धार्मिक संस्कार के रूप में स्पष्ट  करती हैं –

विवाह का आधार धार्मिक है –

हिन्दू विवाह का विश्लेषण करने से ज्ञात होता है कि इसमें धर्म को प्रधान स्थान दिया गया है। प्रत्येक हिन्दू के लिए नित्य नियमपूर्वक पाँच महायज्ञ करना आवश्यक है। ये यज्ञ पत्नी के बिना अपूर्ण माने जाते हैं। इसी तरह प्रत्येक हिन्दू विवाह एक आवश्यक धार्मिक कर्तव्य है। हिन्दू विवाह का एक उद्देश्य पुत्र प्राप्ति है, क्योंकि पुत्र ही पिण्डदान और तर्पण, आदि द्वारा पितरों को नर्क से बचाता है। हिन्दू विवाह में रति (काम वासना) को सबसे निम्न स्थान पर रखा गया है। विवाह के ये उद्देश्य हिन्दू विवाह को एक धार्मिक संस्कार के रूप में प्रकट करते हैं।

विवाह की अविच्छेद्य प्रकृति –

हिन्दू विवाह को पति-पत्नी के जन्म-जन्मान्तर का अटूट और पवित्र बंधन समझा जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो इस जन्म में पति-पत्नी हैं, वे अगले जन्म में भी पति-पत्नी होंगे। हिन्दु धर्मशास्त्रकारों ने विवाह-विच्छेद और परित्याग को निन्दनीय कार्य बताया है।

स्त्रियों के लिए एकमेव संस्कार –

हिन्दू पुरुष अपने जीवन में विभिन्न संस्कारों को सम्पन्न करता है, ताकि उसका व्यक्तित्व विकसित हो, उसका शुद्धिकरण होता रहे, किन्तु  उसके जीवनकाल में विवाह ही एकमेव संस्कार है। वह अन्य स्वीकार करने से वंचित करा दी गयी है।

पतिव्रत का आदर्श –

प्रत्येक हिन्दू स्त्री से यह अपेक्षा की जाती है कि वह  सदैव ही पतिव्रत धर्म का पालन करती रहे।  स्वप्न में भी अन्य पुरुष का चिन्तन न करे। उससे यह आशा की जाती है कि अपना सम्पूर्ण जीवन पति की सेवा के लिए अर्पित करे, पति की प्रत्येक सुख-सुविधा का ध्यान रखे। पति ही पत्नी के लिए ईश्वर है और तीर्थ भी है।

ऋणों से मुक्ति –

हिन्दु धर्मशास्त्रकारों में विवाह को स्वर्ग का द्वार कहा गया  है। विवाह के माध्यम से ही व्यक्ति गृहस्थाश्रम में प्रवेश लेता है। गृहस्थ के रूप में वह अपने देव-ऋण, पित-ऋण और ऋषि-ऋण से ऋण होता है। वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पुरुषार्थों की पूर्ति विवाह द्वारा ही कर सकता है। मनु-स्मृति में विवाह को ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ कहा गया है।

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ब्राह्मणों की अनिवार्य उपस्थिति –

हिन्दु सामाजिक संगठन एवं व्यवस्था में ब्राह्मणों को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। विवाह कार्य उन्हीं के द्वारा सम्पन्न कराया जाता है। विवाह के अतिरिक्त अन्य कार्यों में उसकी उपस्थिति उस कार्य की पवित्रता बढ़ाती है। निम्न जातियों के लोग भी विवाह के समय ब्राह्मणों की उपस्थिति अनिवार्य मानते हैं।

पत्नी के सम्बोधक शब्द –

हिन्दुओं में अपनी पत्नी को सम्बोधित करने के लिए धर्म पत्नी और सहधर्मचारिणी जैसे शब्दों को प्रयुक्त किया जाता है, जिसका तात्पर्य धार्मिक क्रियाओं में सहयोग से है। पत्नी ही पति के सभी धार्मिक कृत्यों को पूर्णता प्रदान करती है। उसकी अनुपस्थिति में धार्मिक कृत्य पूरे नहीं माने जाते हैं।

अग्नि की साक्षी –

विवाह में अग्नि को पवित्र समझा जाता है। अतः अग्नि की साक्षी में ही लडका-लड़की विवाह बन्धन में आबद्ध कराए जाते हैं। वर-वधू के भावी जीवन  को सुखी-समृद्ध बनाने के लिए अग्नि से कई प्रकार की प्रार्थनाएँ भी की जाती हैं।

धार्मिक अनुष्ठान तथा विधि-विधान –

हिन्दू विवाह को एक संस्कार बनाने के लिए वे सभी धार्मिक अनुष्ठान और विधि विधान भी हैं, जो विवाह के समय किए जाते हैं, यथा – होम, पाणिग्रहण, सप्तपदी, कन्यादान, अग्नि-परिणयन आदि। पाणिग्रहण के अन्तर्गत वर-वध दोनों एक दसरे का हाथ स्वीकार करते हैं। सप्तपदी में वर-वधू सात कदम साथ-साथ चलते हैं, कन्यादान में लडकी का पिता लड़के को अपनी कन्या दान में देता है। वर-वधु दोनों अग्नि की साक्षी में सात फेरे लेते हैं।

वेदमन्त्रों का उच्चारण –

हिन्दू विवाह के दौरान वैदिक रीति-रिवाजों का पालन तथा वैदिक-मंत्रों को उच्चारित किया जाता है। हिन्दुओं में वेदों को आज भी महत्वपूर्ण  माना जाता है। वेदों में जो कुछ भी लिखा गया है, उसे ईश्वर के मुख से निकल माना जाता है। इसीलिए वैदिक मंत्रों का उच्चारण भी हिन्दू विवाह को एक धार्मिक बना देते हैं।

कन्यादान का आदर्श –

हिन्दू धर्मशास्त्रकारों ने कन्यादान को श्रेष्ठ कार्य है। कन्यादान को आज भी हिन्दू एक पुण्य कार्य के रूप में स्वीकार करते हैं। कल कार्य ईश्वर अग्नि तथा ब्राह्मण की साक्षी में सम्पन्न किया जाता है, अतः यह एक पारित एवं धार्मिक कार्य है। इस दृष्टि से भी हिन्दू विवाह को एक संस्कार कहा जाता है।

धार्मिक आदेशों और निषेधों का पालन –

हिन्दू विवाह के दौरान विवाहित दम्पत्ति को पुरोहित द्वारा विभिन्न प्रकार के धार्मिक कार्यों को करने के आदेश दिये जाते हैं। यथा – विवाहित व्यक्ति को नियमपूर्वक प्रतिदिन पांच महायज्ञ सम्पन्न करने चाहिए दान देना, अतिथियों का सत्कार करना, ईश्वर की पूजा-अर्चना करना चाहिए। व्यक्ति को अपने गोत्र, प्रवर तथा सपिण्डी से और विजातीय लोगों से विवाह सम्बन्ध नहीं स्थापित करने चाहिए, क्योंकि ये कार्य धर्म विरुद्ध हैं।

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