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भारतीय भूगोल का इतिहास पर प्रभाव

एक विद्वान का कथन है-“इतिहास भूगोल की उपज है’ देश की प्राकृतिक अवस्था और देशवासियों की कार्यक्षमता के अनुसार ही उस देश की प्राकृतिक रूपरेखा बनती है। किसी देश के नैसर्गिक वातावरण का, उसकी पर्वतीय श्रृखलायों, जलवायु, मैदानी या पठारी प्रदेशों का-उस देश के निवासियों के भोजन, रहन-सहन या राजनैतिक दशा आदि पर व्यापक प्रभाव पड़ता है।कैसे भूगोल इतिहास को प्रभावित करता है?

 

उत्तरी भारत की समस्त नदियाँ हिमालय से ही निकलती हैं। इनकी श्रखंलाओं के बीच-बीच की चौड़ी घाटियाँ हैं. हिमालय का वर्नत श्रखंला में ही खैबर तथा बोलन के दर्रें हैं। यही प्राचीन काल में विभिन्न देशों निवासियों के लिए भारत आवागमन के मुख्य मार्ग रहे हैं। इतिहास और भगोल में संबंध

प्राकतिक दृष्टि से दो भागों में बाँटा गया है – हिमालय का पहाड़ी भाग गंगा और ब्रह्मपुत्र का मैदान दक्षिण भारत का पठार सिन्ध और राजस्थान का मरूस्थली प्रदेश पूर्वी घाट एवं पश्चिमी घाट घाटों का हमारे इतिहास पर प्रभाव भारतीय समुद्र तथा टापू समुद्र तथा टापुओं का इतिहास पर प्रभाव पड़ता है। प्राकृतिक दृष्टि से भारत को चार भागों में बाँटा गया है।

 

(1) हिमालय का पहाडी भाग-

पश्चिम में बिलोचिस्तान से लेकर स्याम तक लगभग 3220 किलोमीटर लम्बी तथा 322 किलोमीटर चौड़ा पर्वतमालाएँ है। ये पर्वत श्रेणियाँ भारत को शेष एशिया से पथक करता इतनी ऊँची एवं दुर्गम हैं कि इनको पार करना असंभव है।

हिमालय का हमारे इतिहास पर प्रभाव-हिमालय पर्वत एक सज शताब्दियों तक विदेशी आक्रमणकारियों से भारत की उत्तरी सीमा का रक्षा – किन्त इस दर्गम पर्वतीय प्रदेश में कछ दर्रे भी हैं जिनके द्वारा विदशा – प्राचीनकाल में भारत में प्रविष्ट हए, इनमें खैबर का दर्रा भारत के इतिहास है। इसी दर्रे से होकर आर्य, यूनानी, शक, कुषाण, हूण, सिाथयन, आदि भारत आये।

हिमालय वर्षा भरी हवाओं को रोककर तथा अपने आँचल से निकलने वाला नावा द्वारा धरती को उपजाऊ बनाता है। यह पर्वतीय प्रदेश जड़ी-बूटियों का बहुत बड़ा भण्डार भी है। इसके वनों से इमारती लकड़ी प्राप्त होती है। इस प्रदेश के अमूल्य पशु, वनसम्पत्ति एवं बहुमूल्य चारागाह आदि ने भारत के आर्थिक जीवन को समृद्धिशाली बनाने में बड़ा योग दिया है।

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(2) गंगा और ब्रह्मपुत्र का मैदानी क्षेत्र-

उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में पठार के बीच विशाल मैदान है जो हिमालय की बड़ी-बड़ी नदियों द्वारा लाई हुई मिट्टी से बना है। इसे गंगा और ब्रह्मपुत्र के मैदान के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है।

भारतीय सभ्यता के विकास में गंगा नदी का महत्वपूर्ण योगदान है। इसके तटों पर हिन्दुओं के सर्वश्रेष्ठ ‘दर्शनों’ का उदय और विकास हुआ। इसके किनारे पर भारतवर्ष के रमणीक एवं औद्योगिक नगर स्थित हैं।  इस प्रदेश में नदियों का जाल-सा बिछा है। ये नदियाँ प्राचीनकाल से आने-जाने का मुख्य साधन बनी रहीं और यह प्रदेश व्यापार का केन्द्र बना रहा। समद्धि तथा उष्ण जलवायु के कारण यहाँ के निवासी आलसी एवं अकर्मण परिणामस्वरूप उन्हें आक्रमणकारियों के सम्मुख नतमस्तक होना पड़ा।

(3) दक्षिण का पठारी क्षेत्र-

यह पठारी प्रदेश विन्ध्याचल पर्वत के दक्षिण में स्थित है। विन्ध्य पर्वत श्रेणियाँ इस प्रदेश को उत्तरी भारत से पृथक् करती है। यही कारण इन दोनों प्रदेशों के निवासियों के रहन-सहन तथा रीति-रिवाजों में विभिन्नता है। इस प्रदेश की प्रमुख पैदावार कपास, नारियल, सुपाड़ी, कहवा आदि हैं।

(4)सिन्ध और राजस्थान का मरुस्थली प्रदेशीय विस्तार-

भारत का मरु प्रदेश उत्तर-पर्व में पंजाब तथा उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पूर्व में मध्य भारत से तथा पश्चिम में सिन्धु से घिरा हुआ है। सिन्धु की सहायक नदियों के नाम झेलम, चिनाब, रावी, व्यास और सतलज है। भौगोलिक दृष्टिकोण से राजस्थान को हम दो भागों में विभक्त कर सकते हैं-

(क) अरावली पर्वत का उत्तरी प्रदेश जो बिल्कुल ही रेतीला और अनुपजाऊ है। इसमें अनाज की पैदावार नहीं हो सकती।

(ख) अरावली का दक्षिणी-पूर्वी भाग उर्वर एवं उपजाऊ है तथा यह हरा-भरा रहता है। मरु प्रदेश की प्राकृतिक अवस्था ने यहाँ के इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला है।

भारतीय-भूगोल-का-इतिहास-पर-प्रभाव

(5) पूर्वी घाट एवं पश्चिमी घाट का विस्तार-

भारत के दक्षिणी पठार को पूरबी और पश्चिमी घाट के नाम से सम्बोधित किया जाता है। यहाँ पर अनेक नदियाँ पश्चिमी घाट से निकल कर दक्षिणी पठार पर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। पठारी भू-भाग होने के कारण यहाँ की भूमि अधिक उपजाऊ नहीं है। यहाँ के निवासियों को जीवन-निर्वाह के लिए कठोर परिश्रम करना पड़ता है।

(6) घाटों का हमारे इतिहास पर प्रभाव-

समुद्र का किनारा होने के कारण यहाँ प्राचीन काल में ही अनेक बन्दरगाहों की स्थापना हो गई थी। सूरत, भड़ौच, बम्बई आदि इस प्रदेश के प्रसिद्ध बन्दरगाह हैं। प्राचीन काल में सूरत तथा भडोच बन्दरगाहों से पश्चिमी देशों के साथ भारत का घनिष्ठ व्यापारिक सम्बन्ध रहा है।

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(7) भारतीय समुद्र तथा टापू-

इस देश के तीन ओर सागर हिलोरें मार रहा है। पश्चिम में अरब सागर है। ईरान, अरब, अफ्रीका तथा अन्य देशों से यह समुद्र मिला हुआ है। पूर्व की ओर बंगाल की खाड़ी है। इससे मलाया प्रायद्वीप एवं हिन्द चीन व अन्य पूर्वी द्वीप समूहों से सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। दक्षिण में हिन्द महासागर है ।

(8) समुद्र तथा टापुओं का भारतीय इतिहास पर प्रभाव-

समुद्र एवं तटवर्ती द्वीप-समूहों का भी हमारे इतिहास पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। भारत का समुद्री व्यापार सदा से उन्नतिशील रहा है। अन्य पूर्वी द्वीप समूहों में भारतीय संस्कृति का प्रचार एवं प्रसार हुआ। बाली, बोर्नियो, सुमात्रा, जावा आदि द्वीपों में भारतीय संस्कृति, धर्म एवं कला का विस्तार हुआ था।

कुछ महत्वपूर्ण नोट-

  • सिन्धु नदी की सहायक नदियों का नाम- झेलम, चिनाब, रावी, व्यास, सतलज
  • महाराष्ट्र से प्राप्त होने वाली मुख्य वस्तुओं के नाम लिखिये- कपास, नारियल, काजू, लौंग, इलायची आदि।
  • प्राचीन भारत के प्रमुख बन्दरगाहों के नाम- भड़ोच, कल्याण, कालीकट, कोचीन, आरिकमैडू, महाबलीपुरम, कावेरीपट्टनम, ताम्रलिप्ति आदि।
  • लोहा भारत के किस क्षेत्र में अधिक प्राप्त होता है- बिहार, मध्य प्रदेश के दक्षिण पूर्वी भाग, आन्ध्र प्रदेश और कर्नाटक।
  • दक्षिण भारत के किस वंश ने शीशे के सिक्कों का प्रचलन किया- आन्ध्र के सातवाहन वंश के शासकों ने शीशे के सिक्कों का प्रचलन किया।
  • प्राचीन काल में भारत से विदेश भेजी जाने वाली वस्तुओं के नाम – हीरा, पन्ना, स्फटिक, गोमेद आदि।
  • पुरा- पाषाण काल को कितने भागों में विभाजित किया गया है- निम्न पुरा-पाषाण काल, मध्य पुरा पाषाण काल तथा उत्तर पुरा पाषाण काल
  • दक्षिण भारत में लोहे के प्रवेश का समय – 1000 ई0 पू0 वर्ष के कुछ पहले लोहा दक्षिण भारत में आया।
  • भारत के सबसे पुराने सिक्के किस धातु से निर्मित थे- आहत सिक्के चाँदी से बनाये जाते थे।
  • प्राचीन काल में हमारे देश का क्या नाम था- हमारे देश का नाम जम्बूद्वीप या भारतवर्ष था।
  • पुराणों में भारत का विस्तार कहाँ से कहाँ तक बताया गया है- पराणों में भारतवर्ष का विस्तार हिमालय से कन्याकुमारी तक बताया गया है।
  • भारतवर्ष के तीन प्रमुख प्राकृतिक भागों के नाम -(1) उत्तर का हिमालय की श्रृखंला, (2) सिन्धु-गंगा का मैदान, (3)दक्षिण का पठारी भाग।
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